Saturday, February 27, 2010

Baat karani mujhe mushkil kabhii aisi to na thii

बात करनी मुझे मुश्किल कभी ऎसी तो न थी
जैसी अब है तेरी महफ़िल कभी ऎसी तो न थी

ले गया छीन के कौन आज तेरा सब्र-ओ-करार
बेक़रारी तुझे ऐ दिल कभी ऎसी तो न थी

चश्म-इ-कातिल मेरी दुश्मन थी हमेशा लेकिन
जैसे अब हूँ गई कातिल कभी ऎसी तो न थी

उन की आँखों ने खुदा जाने किया क्या जादू
के तबीयत मेरी माँ'इल कभी ऎसी तो न थी

अक्स-इ-रुख-इ-यार ने किस से है तुझे चमकाया
ताब तुझ मैं माह-इ-कामिल कभी ऎसी तो न थी

क्या सबाब तू जो बिगड़ता है "ज़फर" से हर बार
खू तेरी हूर-इ-शमा_इल कभी ऎसी तो न थी

- Bahadur Shah Jafar

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