Saturday, February 27, 2010

Na kisi ki aankh kaa nuur hoon

न किसी की आँख का नूर हूँ न किसी के दिल का करार हूँ
जो किसी के काम न आ सके मैं वो एक मुश्त- ऐ -गुबार हूँ

न तो मैं किसी का हबीब हूँ न तो मैं किसी का मैं हूँ
जो बिगड़ गया वो नसीब हूँ जो उजाड़ गया वो दयार हूँ

मेरा रंग-रूप बिगाड़ गया मेरा यार मुझ से बिछड़ गया
जो चमन फिजां मैं उजाड़ गया मैं उसी की फसल-इ-बहार हूँ

पाए फातेहा कोई आये क्यूं कोई चार फूल चदाये क्यूं
कोई आके शम्मा जलाए क्यूं मैं वो बेकसी का मज़ार हूँ

मैं नहीं हूँ नगमा-इ-जान_फिझाएं मुझे सुन क्यूं कोई करेगा क्या
मैं बड़े बरोग की हूँ सदा मैं बड़े दुःख की पुकार हूँ

- Bahadur Shah Jafar

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