Saturday, November 20, 2010

दीने-आदमीयत

ये मुसलमाँ है, वो हिन्दु, ये मसीही, वो यहूद

इस पे ये पाबन्दिया है, और उस पर ये क़यूद



शैख़ो-पण्डित ने भी क्या अहमक़ बनाया है हमें

छोटे-छोटे तंग ख़ानों में बिठाया है हमें



क़स्त्रे-इंसानी पे ज़ुल्मों-जहल बरसाती हुई

झंडियाँ कितनी नज़र आती हैं लहराती हुई



कोई इस जुल्मत में सूरत ही नहीं है नूर की

मुहर दिल पे लगी है इक-न-इक दस्तूर की



घटते-घटते मेह्ने-आलमताब से तारा हुआ

आदमी है मज़हबो-तहज़ीब का मारा हुआ



कुछ तमद्दुन के ख़लफ़ कुछ दीन के फ़र्ज़न्द हैं

कुलज़मों के रहने वाले बुलबुलों में बन्द हैं



क़ाबिले-इबरत है ये महदूदियत इंसान की

चिट्ठियाँ चिपकी हुई हैं, मुख़्तलिफ़ अदयान की



फिर रहा है आदमी भूला हुआ भटका हुआ

इक-न-इक लेबिल हर इक माथे पे है लटका हुआ



आख़िर इंसाँ तंग साँचों मे ढला जाता है क्यों

आदमी कहते हुए अपने को शर्माता है क्यों



क्या करे हिन्दोस्ताँ, अल्लाह की है ये भी देन

चाय हिन्दू, दूध मुस्लिम, नारियल सिख, बेर जैन



अपने हमजिंसों के कीने से भला क्या फ़ायदा

टुकड़े-टुकड़े होके जीने से भला क्या फ़ायदा



- जोश मलीहाबादी


क़यूद – बन्धन

क़स्त्रे-इंसानी – मानवता के महलों पर

तमद्दुन – संस्कृति

ख़लफ़ – संतान

फ़र्ज़न्द – पुत्र

कुलज़मों – समुद्र

क़ाबिले-इबरत – सीख योग्य

महदूदियत – संकीर्णता

मुख़्तलिफ़ – भिन्न-भिन्न्

अदयान – मज़हबों की

हमजिंसों – साथी मनुष्यों

कीने – द्वेष

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