Sunday, January 2, 2011

ढाका से वापसी पर

हम के ठहरे अजनबी इतनी मदारातों के बाद
फिर बनेंगे आशना कितनी मुलाक़ातों के बाद

कब नज़र में आयेगी बे-दाग़ सब्ज़े की बहार
ख़ून के धब्बे धुलेंगे कितनी बरसातों के बाद

थे बहुत बे-दर्द लम्हे ख़त्मे-दर्दे-इश्क़ के
थीं बहुत बे-मह्र सुब्हें मह्रबाँ रातों के बाद

दिल तो चाहा पर शिकस्ते-दिल ने मोहलत ही न दी
कुछ गिले-शिकवे भी कर लेते, मुनाजातों के बाद

उनसे जो कहने गए थे “फ़ैज़” जाँ सदक़ा किये
अनकही ही रह गई वो बात सब बातों के बाद

--- फ़ैज़ अहमद फ़ैज़

2 comments:

pragya said...

बहुत ख़ूबसूरत व दिल को छूने वाली ग़ज़ल....

Yayaver said...

faiz sahab ki baat hee aise hai. Love and revolution ko mila ke nazm likh dete hain.

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