Friday, January 28, 2011

सुकूत-ए-शाम मिटाओ बहुत अँधेरा है

सुकूत-ए-शाम मिटाओ बहुत अँधेरा है
सुख़न की शम्ओ जलाओ बहुत अँधेरा है

चमक उठेंगी सियहबख्तियां जमाने की
नवा-ए-दर्द सुनाओ, बहुत अँधेरा है

हर इक चराग से हर तीरगी नहीं मिटती
चराग़े-अश्क जलाओ बहुत अँधेरा है

दयार-ए-ग़म में दिल-ए-बेक़रार छूट गया
सम्भल के ढूंढने जाओ बहुत अँधेरा है

ये रात वो है के सूझे जहाँ न हाथ को हाथ
ख़्यालों दूर न जाओ बहुत अँधेरा है

वो ख़ुद नहीं जो सरे बज़्मे ग़म तो आज उसके
तबस्सुमों को बुलाओ बहुत अँधेरा है

पसे-गुनाह जो ठहरे थे चश्में आदम में
उन आंसुओ को बहाओ बहुत अँधेरा है

हवाए नीम शबी हों कि चादर-ए-अंजुम
नक़ाब रुख़ से उठाओ बहुत अँधेरा है

शब-ए-सियाह में गुम हो गई है राह-ए-हयात
क़दम संभल के उठाओ बहुत अँधेरा है

गुज़श्ता अह्द की यादों को फिर करो ताज़ा
बुझे चिराग़ जलाओ बहुत अँधेरा है

थी एक उचटती हुई नींद ज़िंदगी उसकी
'फ़िराक़' को न जगाओ बहुत अँधेरा है

--- Firaq Gorakhpuri

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