Tuesday, February 22, 2011

दिल-ए-मन मुसाफ़िर-ए-मन

मेरे दिल मेरे मुसाफ़िर
हुआ फिर से हुक्म् सादिर
के वतन बदर हों हम तुम
दें गली गली सदायेँ
करें रुख़ नगर नगर का
के सुराग़ कोई पायेँ
किसी यार-ए-नामाबर का
हर एक अजनबी से पूछें
जो पता था अपने घर का
सर-ए-कू-ए-नाशनायाँ
हमें दिन से रात करना
कभी इस से बात करना
कभी उस से बात करना
तुम्हें क्या कहूँ के क्या है
शब-ए-ग़म बुरी बला है
हमें ये भी था ग़निमत
जो कोई शुमार होता
हमें क्या बुरा था मरना
अगर एक बार होता

---फ़ैज़ अहमद फ़ैज़

No comments:

Popular Posts

Total Pageviews