Wednesday, June 8, 2011

Shamm-E-Mazaar Thi Na Koi Sogwaar Tha

शम्म-ए-मज़ार थी ना कोई सोगवार था,
तुम जिस पे रो रहे थे वो किसका मज़ार था ।

तड़पूँगा उम्र भर दिल-ए-मर्हुम के लिये,
कम्बख़्त नामुराद लड़कपन का यार था ।

जादू है या तिलिस्म तुम्हारी ज़ुबान में,
तुम झूठ कह रहे थे मुझे ऐतबार था ।

क्या क्या हमारे सज़दे की रूसवाईयाँ हुई,
नक़्श-ए-क़दम किसी का सरे रह-गुज़ार था ।

---Bekhud Dehlvi

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