Sunday, July 10, 2011

बहुत पहले से ...

बहुत पहले से उन क़दमों की आहट जान लेते हैं
तुझे ऐ ज़िन्दगी हम दूर से पहचान लेते हैं

मेरी नज़रें भी ऐसे काफिरों कि जानो-ईमान हैं
निगाहें मिलते ही जो जान और ईमान लेते हैं

जिसे कहती है दुनिया कामयाबी वाये नादानी
उसे किन कीमतों पर कामयाब इंसान लेते हैं

निगाहें बादागूं यूँ तो तेरी बातों का क्या कहना
तेरी हर बात लेकिन अह्तियातन छान लेते हैं

तबियत अपनी घबराती है जब सुनसान रातों में
हम ऐसे में तेरी यादों की चादर तान लेते हैं

खुद अपना फैसला भी इश्क में काफी नहीं होता
उसे भी कैसे कर गुजरें जो दिल में ठान लेते हैं

हयाते इश्क का इक इक नफास जामे शहादत है
वो जाने-नाज़ बर दारां कोई आसन लेते हैं

हम आहंगी में भी इक चाशनी है इख्तिलाफों की
मेरी बातें बउन्वाने दीगर वो मान लेते हैं

तेरी मकबूलियत कि वजह वाहिद तेरी राम्ज़ियत
कि उस को मानते कब हैं जिसको जान लेते हैं

अब इस को कुफ्र मानें या बुलंदी-ए-नज़र जानें
खुदा-ए-दोजहां को दे के हम इंसान लेते हैं

जिसे सूरत बताते हैं पता देती है सीरत का
इबारत देख कर जिस तरह मानी जान लेते हैं

तुझे घाटा न होने देंगे कारोबारे उल्फत में
हम अपने सर तेरा ऐ दोस्त हर नुक्सान लेते हैं

हमारी हर नज़र तुझसे नई सौगंध खाती है
तो तेरी हर नज़र से हम नया पैमान लेते हैं

रफ़ीके ज़िन्दगी थी अब अनीसे वक्ते-आखिर है
तेरा ऐ मौत हम ये दूसरा एहसान लेते हैं

ज़माना वारिदाते-कल्ब सुनने को तरसता है
उसी से तो सर आँखों पर मेरा दीवान लेते हैं

फ़िराक अक्सर बदल कर भेस मिलता है कोई काफिर
कभी हम जान लेते हैं कभी पहचान लेते हैं.

---फ़िराक़ गोरखपुरी

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