Wednesday, May 1, 2013

ये चाह कब है मुझे सब का सब जहान मिले

ये चाह कब है मुझे सब का सब जहान मिले
मुझे तो बस मेरी ज़मीं मेरा आसमान मिले

कमी नहीं है सजावट की इन मकानों में
सुकून भी तो कभी इनके दरमियान मिले

अजीब वक़्त है सबके लबों पे ताले हैं
नज़र नज़र में मगर अनगिनत बयान मिले

जवां हैं ख़्वाब क़फ़स में भी जिन परिंदों के
मेरी दुआ है उन्हें फिर नई उड़ान मिले

हमारा शहर या ख़्वाबों का कोई मक़्तल है
क़दम क़दम पे लहू के यहाँ निशान मिले

हो जिसमें प्यार की ख़ुशबू मिठास चाहत की
हमारे दौर को ऐसी भी इक ज़ुबान मिले.

--- देवमणि पांडेय

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