Friday, September 6, 2013

फिर सफ़ेद-पोश उठे, काएँ - काएँ करने लगे|

अँधेरे चारों तरफ़ सायं-सायं करने लगे
चिराग़ हाथ उठाकर दुआएँ करने लगे |

तरक़्क़ी कर गए बीमारियों के सौदागर ,
ये सब मरीज़ हैं जो अब दवाएँ करने लगे|

लहू - लोहान पड़ा था ज़मीं पे इक सूरज ,
परिन्दे अपने परों से हवाएँ करने लगे |

ज़मीं पे आ गए आँखों से टूट कर आँसू,
बुरी ख़बर है फ़रिश्ते ख़ताएँ करने लगे |

अजीब रंग था मजलिस का, ख़ूब महफ़िल थी.
फिर सफ़ेद-पोश उठे, काएँ - काएँ करने लगे|

---राहत इन्दौरी

2 comments:

Aparna Bose said...

Waah ...SHUKRIYA POST KARNE KE LIYE

Himanshu Rai said...

You are welcome.. again and again...

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