अपनी महफ़िल का रिंद पुराना आज नमाज़ी बन बैठा।
महफ़िल में छुपा है कैसे—हज़्रत! दीवाना कोई सहरा में नहीं,
पैग़ाम-ए-जुनूँ जो लाता था, इक़बाल वो अब दुनिया में नहीं।
ऐ मुतरिब! तेरे तरानों में अगली-सी अब वो बात नहीं,
वो ताज़गी-ए-तख़य्युल नहीं, बेसाख़्तगी-ए-जज़्बात नहीं।
— आनंद नारायण ‘मुल्ला’ (शेर-ओ-शायरी से)
“अल्लामा इक़बाल जैसे परिपक्व और विशाल हृदय वाले व्यक्ति को अचानक साम्यवाद के दलदल में फँसते देखकर लोग दुख और चिंता से कराह उठे।”
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