Poetry is untranslatable, like the whole art.
वो भी क्या दिन थे कि जब इश्क़ लड़ा लेते थे,
प्यार की डोर को चर्ख़ी पे चढ़ा लेते थे,
नौजवानी की पतंगों को उड़ा लेते थे,
धड़क के कंकड़ियाँ संभाल लेते थे,
होंठों पे हंसी, आंखों में आस थी,
हर ग़म को हंसी में उड़ाया करते थे।
--- सागर खय्यामी
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