आज शब जो चांद ने है रूठने की थान ली गर्दिशो में है सितारे बात हमने मान ली अंधेरी शाम जिंदगी को समझ थी नहीं कहीं कि एक आज हाथ थमलो की एक हाथ की कमी खाली क्यों खोए खोए चांद की फिराक में तलाश में उदास है दिल क्यों अपने आप से खफा खफा जरा ज़रा सा नाराज़ है दिल
ये मंज़िलें भी खुद ही तय करें, ये फ़सलें भी खुद ही तय करें, क्यूं तो रस्तों पे फिर सहम सहम संभल संभल ले चलता है ये दिल क्यों खोये चाँद की फिराक में तलाश में उदास है दिल
जिंदगी सवालो के जवाब ढूंढने चली जवाब में सवालों की एक लंबी सी लड़ी मिली सवाल ही सवाल है सूझती नहीं गली कि आज हाथ थाम लो एक हाथ की कमी खाली
जी में आता है मुर्दा सितारा नोच लो इधर भी नोच लो उधर भी नोचलो
एक दो का जिक्र क्या में सारे नोच लो
2 [इधर भी नोच लो उधर भी नोच लो सितारे नोच लो में सारे नोच लो]2
क्यों तू आज इतना वैसा है मिजाज में मजा है ऐ गम-ए-दिल क्यों अपने आप से खफा खफा जरा जरा सा नाराज है दिल
ये मंजिलें भी खुद ही ताई करें, ये फ़सलें भी खुद ही ताई करें, क्यूं तो रस्तों पे फिर सहम सहम संभल ले चलता है ये दिल
दिल को समझना है तो क्या आसान है दिल तो फितरत से सुन लो ना बेईमान है ये खुश नहीं है जो मिला बस मांगता ही है चला
जानता है हर लगी का दर्द ही है बस एक सिला
[जब कभी ये दिल लगा दर्द ही हमें मिला दिल की हर लगी का सुनलो दर्द ही एक सिला]2
क्यों नए नए से दर्द की फिराक में तलाश उदास है दिल क्यों अपने ऐप से खफा खफा जरा जरा सा नाराज है दिल
ये मंजिल भी खुद ही ताई करें ये फासले भी खुद ही ताई करें क्यों तो रस्तों पे फिर सहम सहम संभल ले चलता है ये दिल
क्यों खोए खोए चांद की फिराक में तलाश में उदास है दिल क्यों अपने आप से खफा खफा जरा जरा सा नाराज है दिल
ये मंजिलें भी खुद ही ताई करें, ये फासले भी खुद ही तय करें, ये फासले भी खुद ही तय करें क्यों तो रस्तों पे फिर सहम सहम संभल ले चलता है ये दिल
भारत का इतिहास केवल युद्धों का वर्णन नहीं, बल्कि वीरता, शौर्य और आत्मसम्मान का अनंत स्रोत है। राजपूताना, मराठा और बुंदेलखंड की धरती पर पले‑बढ़े अनगिनत योद्धाओं ने अपनी तलवार और अपने वचन से ऐसी गाथाएँ रचीं, जो सदियों बाद भी आज उतनी ही प्रेरक हैं। इस ब्लॉग में आप लोक‑प्रचलित दोहे/उक्तियाँ उनके भावार्थ के साथ पढ़ेंगे - जो भारतीय वीरता की ज्वाला को फिर से जगाते हैं।
1. घास की रोटी खाय ली, पर माथो न झुकाय; मेवाड़ रै राणा प्रताप, अकबर सूं न डराय।
भावार्थ: महाराणा प्रताप ने कठिन जीवन स्वीकार कर लिया, लेकिन पराधीनता नहीं—वे भूखे रह सकते थे, पर शत्रु के सामने आत्मसमर्पण नहीं।
2. हठ तो राव हमीर को, ओर रावन की टेक; सत राजा हरिचंद को, अरजन वान अनेक।
भावार्थ: कुछ लोगों का साहस और हठ ऐसा होता है कि वे मृत्यु को भी चुनौती दे देते हैं। जैसे हमीर का अटल संकल्प और रावण की जिद—एक बार ठान लेने पर वे पीछे नहीं हटते।
3. सिंह सुवन, सत्पुरुष वचन, कदली फलै इक बार; तिरिया तेल, हमीर हठ, चढ़ै न दूजी बार।
भावार्थ: कुछ अवसर और मूल्य ऐसी दुर्लभ चीजें हैं जो केवल एक बार घटित होती हैं—सज्जन का दिया वचन, सिंह का जन्म, केला का फल, राणा हमीर का अडिग संकल्प,—इन्हें दूसरी बार पाने की अपेक्षा व्यर्थ है; इसलिए समय रहते पहचानना आवश्यक है।
भावार्थ: सच्चा सामर्थ्य बाहरी प्रतीकों से नहीं आता। शेर बिना चंवर‑छत्र के भी राजा है—उसकी शक्ति ही उसका राजचिह्न है।
5. स्थापूनी हिंदी स्वराज्य आपुले, शौर्याने लिहिली इतिहास‑गाथा;
असा हा जाणता राजा माझा, तयाच्या चरणी झुकवितो माथा.
भावार्थ: शिवाजी महाराज ने अपने साहस और नेतृत्व से हिंदवी स्वराज्य की स्थापना की और इतिहास में अमर गाथा लिखी। अनुभव, न्याय और बुद्धि से राज्य चलाने वाले इस महान “जाणत्या राजा” को माथा झुकाकर प्रणाम करने का मन करता है।
6. सह्याद्रीची साथ होती, घोड्यांच्या टापांचा नाद; कडेकपारी फिरत होता, मर्द मराठ्यांचा वाघ.
भावार्थ: सह्याद्री के पर्वत शिवराय के साथ थे और उनके मावळों के घोड़ों की टापें रणभूमि में गूँजती थीं। सह्याद्री के कड़े‑कड़े पहाड़ों पर घूमने वाला यह मराठों का शेर—शिवाजी—हर घाटी में गर्जना करता था।
7. छत्ता तेरे राज में, धक‑धक धरती होय; जित‑जित घोड़ा मुख करे, उत‑उत फतह होय।
भावार्थ: छत्रसाल के काल में उनका पराक्रम इतना व्यापक था कि सेना जहाँ भी कदम बढ़ाती, विजय वहीं चलकर आ जाती—यह उनकी वीरता और न्यायप्रिय शासन की छवि है।
8. इत यमुना उत नर्मदा, इत चंबल उत टोंस; छत्रसाल सो लरन की, रही न काहू हौंस।
भावार्थ: छत्रसाल का राज्य इतना विस्तृत और बलशाली था कि उस पूरे क्षेत्र में किसी में इतना साहस नहीं कि उनसे युद्ध करने का विचार भी करे।
9. जो गति गजराज की, सो गति भई है आज। बाजी जात बुंदेल की, राखो बाजी लाज॥
भावार्थ: छत्रसाल अपनी स्थिति की तुलना गजेंद्र‑मोक्ष कथा के गजराज से करते हैं। जैसे गजराज ने संकट में भगवान को पुकारा, वैसी ही पुकार छत्रसाल बाजीराव से कर रहे थे।
10. चार बांस, चौबीस गज, अंगुल अष्ट प्रमान; ता ऊपर सुल्तान है, मत चूको चौहान।
भावार्थ: चार बांस, चौबीस गज दूरी और आठ अंगुल ऊँचाई के बराबर आगे–ऊपर ही सुल्तान (मोहम्मद गोरी) बैठा है। पृथ्वीराज चौहान, अब निशाना मत चूकना — यही सही क्षण है।
11. सिरसा सरोवर डोल्या, रण में उठी पुकार; डरे धरम के द्रोही सब, आल्हा‑ऊदल जूझे जब बार‑बार।
भावार्थ: जब आल्हा और ऊदल युद्धभूमि में उतरते थे, तो सिरसा झील तक कांप उठती थी। धर्मद्रोही भय से काँप जाते थे, क्योंकि आल्हा‑ऊदल का साहस, शक्ति और प्रतिशोध अजेय था।
इन दोहों और वीर‑उक्तियों में स्वाभिमान, स्वतंत्रता, त्याग और अडिग संकल्प की वह आग जलती है जिसने भारत की मिट्टी को गौरव सौंपा।
Do you know what I was, how I lived? You know what despair is; then winter should have meaning for you.
I did not expect to survive, earth suppressing me. I didn't expect to waken again, to feel in damp earth my body able to respond again, remembering after so long how to open again in the cold light of earliest spring--
afraid, yes, but among you again crying yes risk joy in the raw wind of the new world.
फिर कोई मास्टर प्लान बनाया जाएगा, देश को बाईसवीं सदी में पहुंचाया जाएगा. अपना देश महान है, आप गर्व करेंगे सुन कर, अभी आंकड़ों का गणित, समझाया जाएगा.
दुखदर्द, गरीबी सब हवा हो जाएंगी, आप को आश्वासनों का जाम पिलाया जाएगा. सुखे, बाढ़ की समस्या से चितित हैं हम, अभी हवाई सर्वेक्षण करवाया जाएगा.
कुंआ खोदने की आप नाहक जिद न करें, आग लगने तो दीजिए, फिर देखा जाएगा. देशद्रोहियों को राह पर लाने की कोशिश करेंगे, उन्हें देशभक्ति का रिकार्ड सुनवाया जाएगा.
कोई और परेशानी है तो पी. ए. को लिखवा दें, आप के क्षेत्र में दोबारा पांच वर्ष बाद आया जाएगा.
*Fakhr ad-Din al-Razi was a famous Persian theologian and philosopher in the
twelfth century.
Context: In a qaside “Kurdêkî Koyî” he tells the details of his encounter with a person from Koye, his hometown, who complains that Şêx Kake Ehmed translates the Quran and the prophet’s sayings (hadith) into Kurdish. Upon hearing his complaint Hacî Qadir becomes furious and comments.
Ice people They're just made of ice They don't treat Their fellow man very nice You wear your hair long As Jesus did They'll crucify you You're not part of the establishment You stand up for your rights They'll call you a fool If you don't go to war You're not living by the golden rule Ice people They're just made of ice They don't treat Their fellow man very nice The red man lives and dies on the reservation And the black man just lives anywhere he can And the poor white man he doesn't live any better He can't say I'm red, I'm black, I'm yellow, I'm tanned We're all caught up together Like the buffalo on the plains We're just shooting sport for ice people We're just a game Ice people They're just made of ice They don't treat Their fellow man very nice Ice people They're just made of ice No, they don't treat Their fellow man very nice Ice people They're just made of ice They don't treat Their fellow man very nice
अर्थ: विद्या (ज्ञान) दुष्ट लोगों के लिए विवाद के लिए होती है, धन (धन संपत्ति) घमंड के लिए होता है, और शक्ति दूसरों को पीड़ित करने के लिए होती है। परंतु सज्जन लोगों के लिए विद्या ज्ञान प्राप्ति के लिए, धन दान करने के लिए, और शक्ति दूसरों की रक्षा करने के लिए होती है।
3. न तेन वृद्धो भवति येनास्य पलितं शिरः |
यो वै युवापि अधीयानस्तं देवाः स्थविरं विदुः ||
अर्थ: यह है कि केवल उम्र बढ़ने से या बाल सफेद होने से कोई व्यक्ति बड़ा या बुद्धिमान नहीं माना जाता। असली बढ़ेपन का पैमाना ज्ञान और बुद्धिमत्ता है। जो युवा होते हुए भी सीखते हैं, ज्ञान अर्जित करते हैं, वही सच्चे वृद्ध और सम्मानित माने जाते हैं।
4. काक: कृष्ण: पिक: अपि कृष्ण: को भेद: काकपिकयो: | वसंत काले सम्प्राप्ते काक: काक: पिक: पिक: ||
अर्थ: कौआ और कोयल दोनों काले रंग के होते हैं और देखने में समान लगते हैं, लेकिन जब वसंत ऋतु आ जाती है तो उनकी असली पहचान उनके स्वर से हो जाती है। कौआ अपनी कर्कश आवाज करता है जबकि कोयल मधुर गीत गाती है।
5. शैले शैले न माणिक्यम् मौक्तिकम् न गजे गजे।
साधवो न हि सर्वत्र चन्दनम् न वने वने।।
अर्थ: हर पर्वत पर हीरा (माणिक्य) नहीं मिलता, हर हाथी के मस्तक में मोती (मौक्तिक) नहीं होता। सभी जगह सज्जन लोग (साधु) नहीं मिलते और हर वन में चंदन वृक्ष भी नहीं होते। ये चीजें दुर्लभ और मूल्यवान होती हैं।
6. मूर्खो अपि शोभते तावत् सभायां वस्त्रवेष्टित: ।
तावत् शोभते मूर्खो यावत् किंचित् न भाषते ॥
अर्थ: मूर्ख व्यक्ति भी अच्छे वस्त्र पहनकर सभा में तब तक शोभित होता है (अच्छा लगता है), जब तक वह कुछ नहीं बोलता। मूर्ख उसी समय तक शोभा पाता है, जब तक वह चुप रहता है.
अर्थ: जिस सुख का प्रारंभ विष (जहर) जैसा कष्टदायक होता है, पर परिणाम अमृत के समान सुखद होता है, वही सात्त्विक सुख कहलाता है। यह सुख आत्मबुद्धि के प्रसाद से उत्पन्न होता है। जो सुख विषय (इंद्रिय) के संयोजन से उत्पन्न होता है, उसका प्रारंभ तो अमृत के समान सुखद होता है, लेकिन परिणाम विष (जहर) के समान कष्टदायक होता है, उसे राजसिक सुख कहा गया है।
1857 का भारतीय विद्रोह, जिसे आज़ादी की पहली क्रांति भी कहा जाता है, सिर्फ़ युद्ध की लड़ाई तक सीमित नहीं था। इस विद्रोह के दौरान आखिरी मुग़ल सम्राट बहादुर शाह ज़फ़र की शख्सियत और उनकी शायरी ने भी इतिहास में अपनी अलग छाप छोड़ी।
कहा जाता है कि विद्रोह के बाद, जब अंग्रेज़ अधिकारी ज़फ़र को पकड़ने आए, उन्होंने उन्हें तंज़ के साथ कहा:
“दमदमे में दम नहीं है ख़ैर मांगो जान की.. ऐ ज़फ़र ठंडी हुई अब तेग हिंदुस्तान की।” (अब तुम्हारे पास कोई ताक़त नहीं, ज़फ़र। हिंदुस्तान की तलवार भी अब नुकीली नहीं रही।)
लेकिन बहादुर शाह ज़फ़र की शायरी में छिपी जज़्बात और आत्मसम्मान ने जवाब में इतिहास रच दिया। उन्होंने शेर कहा:
“ग़ाज़ियों में बू रहेगी जब तलक ईमान की, तख़्त ऐ लंदन तक चलेगी तेग हिंदुस्तान की।” (भारत की तलवार और उसका साहस कभी कम नहीं होगा, और ईमान की शक्ति के साथ यह London तक अपनी गूँज पहुंचाएगी।)
इस जवाब से साफ़ झलकता है कि ज़फ़र का मनोबल और उनका देशभक्ति का जज़्बा अंग्रेज़ों की धमकियों से कम नहीं हुआ। यह सिर्फ़ एक शेर नहीं, बल्कि उस युग की एक प्रेरणादायक कहानी है, जो यह बताती है कि कठिन परिस्थितियों में भी आत्मसम्मान और विश्वास कभी नहीं मरते।
भावार्थ: भगवान की कृपा बिना संत नहीं मिलते, और संतों की कृपा बिना भगवान नहीं।
10. जाको प्रिय न राम वैदेही, त्यागहु ताहि कोटि बैरी सम।
भावार्थ: जिसे राम और सीता प्रिय नहीं, उसे शत्रु के समान समझकर त्याग देना चाहिए।
11. जहां सुमति तहं संपति नाना, जहां कुमति तहं विपति निदाना।
भावार्थ: जिस घर में आपसी प्रेम और सद्भाव होता है वहां सारे सुखी होते हैं और जहाँ आपस में द्वेष और वैमनष्य होता है उस घर के वासी दुखी जाते हैं.
12. आवत ही हरसै नही, नैनन नही सनेह
तुलसी तहां न जाईये कंचन बरसे मेह ।
भावार्थ : जिस स्थान पर लोग आपके आने से खुश न हों और उनकी नजरों में आपके प्रति स्नेह न हो, वहाँ कभी न जाएँ ।
13. रघुकुल रीति सदा चलि आई। प्राण जाहि बरु बचनु न जाई॥
भावार्थ: रघुकुल की परंपरा यही रही है कि प्राण त्याग दिए जाएँ, लेकिन दिया गया वचन कभी नहीं तोड़ा जाए
14. इहाँ कुम्हड़बतिया कोउ नाहिं। जे तरजनी देखि मरि जाहिं॥
भावार्थ: रामचरितमानस (अयोध्या कांड) में लक्ष्मण परशुराम के फरसे को देखकर कहते हैं कि मैं कोई कुम्हड़े का कोमल फल नहीं जो उंगली दिखाने से मर जाऊँ। यहां कोई कमजोर, नाजुक चीज नहीं है जो उंगली के इशारे से ही नष्ट हो जाए।
It was afternoon the sky dressed as spring. One moment more and it would have conducted the dance of death in the city. It was afternoon. In no hurry the children went down the street. Like gazelles they came and went in twos in threes. They part they mix happily.
It was afternoon. Oppressive clouds of death descend on the city 18 minutes earthquake fear, silence. Bodies red with blood reshape flowerbeds.
A prisoner condemned to life. Chains round his ankles, handcuffs, in a narrow jail cell. He dreams like horsemen, the horses and the wind. He dreams like babies, the stars and the grass. I, too, like the prisoner, dream every night of a strength I bring to the mountains and they to me.
1. आईना! मुँह पर ही कहता है—साफ-साफ। सच यह है-जो साफ होता है, सफा कहता है।।
2. सँभल कर बैठना, जलवा मुहब्बत देखने वाले। तमाशा खुद न बन जाना तमाशा देखने वाले॥
3. खुदाने हुस्न नादानोंको, बख्सा जर रजीलों को। अक्लमंदों को रोटी खुश्क, औ हलुवा वखीलों को ॥
4. एक बुतको चूमनेको शेखजी काबा गये। गरचे-हर बुत काबिले बोसा है इस बुतखानेमें॥
5. नजर से सर कलम कर दे, उसे शमशीर कहते हैं। निशाने में जो लग जाये, उसीको तीर कहते हैं॥
6. न कह गया, न सुन गया और न नाम बता गया। मैं क्या कहूँ कि मेरे दिल, किसने चुरा लिया
7. है इबादत की इबादत है, मुहब्बत की मुहब्बत है। मेरे माशूक की सूरत खुदा से मिलती जुलती है॥
8. शेखजीसे मैंने पूछी, मंजिल जब यार की। बुतकदे की और चुपकेसे, इशारा कर दिया॥
9. बहुत मुश्किल निभाना है मुहब्बत अपने दिलवर से। उधर मूरत अमीराना इधर हालत फकीराना॥
10. चाँद बदली में छिपा है मुझे मालूम न था। सकल इनसान में खुदा है, मुझे मालूम न था॥
11. बुतपरस्ती मेरे हकमें हकपरस्ती हो गयी। दे दिया तेरा पता कुछ, यारकी तसबीरने॥
12. मुहब्बत करो और निभा लो तब पूछना, कि दुश्चारियाँ हैं कि आसानियाँ हैं?
13. समझकर अपना दीवाना, वह मुझसे मुँह छिपाते हैं। हकीकत यों है, दरपरदा, मुहब्बत आजमाते हैं॥
14. शिकाइत किस जबाँसे मैं करूँ उनके न आनेकी। यही अहसान क्या कम है कि मेरे दिलमें रहते हैं॥
15. दुनियाँ इक इफसाना कहने को थे मगर सोचा। दुनियाँ है खुद इफसाना, इफसाने से क्या कहना?
16. रहमान के फिरश्ते' गो हैं बहुत मुकद्दस? शैतानही की जानिब, लेकिन मिजोरटी है॥
17..तमन्ना दर्ददिल में हो, तो कर खिदमत फकीरों की । नहीं वह “लाल” मिलता है अमीरों के खजानेमें॥
--- श्रीपारसनाथ सरस्वती
(गीताप्रेस गोरखपुर द्वारा प्रकाशित "एक लोटा पानी" पुस्तक में एक नैतिक कहानी है, जिसका शीर्षक है "हिंदू राज्य कैसे गया?"। शेर-ओ-शायरी उसी कहानी से लिये गये हैं।)
Night has completely passed, yet you lie awake here, I cannot sleep—when will I sleep without you? The home has turned into a prison where I suffer, Until dawn, darkness and sorrow surround me.
Your presence—once a single heartbeat in mine— Oh heart, does no one compare to that one? Why constantly does my heart return to the yearning for them? At times I felt their hands upon my head— So many dreams and visions came with that closeness.
And I stayed awake, oh heart—why did the night vanish? Did I kill them, oh heart—why did the night vanish? Get up quickly, oh heart, bring them back, We embraced—oh heart, why did the night vanish?
अल्लामा मुहम्मद इक़बाल केवल शायर नहीं थे, वे एक विचारक, दार्शनिक और आत्मचेतना के कवि थे। उनकी शायरी व्यक्ति, समाज और सत्ता—तीनों से सवाल करती है। बाल-ए-जिब्रील में इक़बाल की आवाज़ सबसे अधिक बेबाक और वैचारिक रूप में सामने आती है।
शेर 1: (बाल-ए-जिब्रील से)
सोचा भी है ऐ मद-ए-मुसलमाँ कभी तूने,
क्या चीज़ है फ़ौलाद की शमशीर-ए-जिगरदार?
इस बैत का ये मिस्रअ-ए-अव्वल है कि जिसमें,
पोशीदा चले आते हैं तौहीद के असरार।
भावार्थ: इक़बाल मुसलमान से पूछते हैं - क्या तुमने कभी सोचा है कि सच्चे ईमान और आत्मबल से बनी फ़ौलाद की तलवार वास्तव में क्या होती है? इस शेर की पहली ही पंक्ति में एकेश्वरवाद (तौहीद) के गहरे रहस्य छिपे हुए हैं।
संदेश: असली शक्ति हथियार में नहीं, ईमान और आत्मचेतना में होती है।
शेर 2: (बाल-ए-जिब्रील से)
इस राज़ को इक मद-ए-फ़िरंगी ने किया फ़ाश,
हरचंद कि दाना इसे खोला नहीं करते।
जम्हूरियत इक तर्ज़-ए-हुकूमत है कि जिसमें,
बंदों को गिना करते हैं, तोला नहीं करते।
भावार्थ: इक़बाल कहते हैं कि इस सच्चाई को एक पश्चिमी विचारक ने उजागर किया - हालाँकि बुद्धिमान लोग भी इसे खुलकर नहीं कहते। लोकतंत्र एक ऐसी शासन-प्रणाली है जिसमें इंसानों को गिना तो जाता है, पर परखा नहीं जाता।
संदेश: संख्या-बल से चलने वाली व्यवस्था हमेशा न्याय और गुण की गारंटी नहीं देती।
शेर 3:
वा न करना फ़रक़ाबदी के लिए अपनी ज़ुबां,
छिपके है बैठा आ हंगाम-ए-महशर यहाँ।
वफ़्ल के सामान पैदा है तेरी तहरीर से,
देखे कोई दिल न दुख जाए तेरी तक़रीर से।
महफ़ले-नव में पुरानी दास्तानों को न छेड़,
रंग पर जो अब न आएँ उन फ़सानों को न छेड़।
भावार्थ:इक़बाल चेतावनी देते हैं - अपनी ज़ुबान का इस्तेमाल फ़िरक़ाबंदी के लिए मत करो। तेरी लिखावट और तक़रीर से फसाद के बीज पैदा हो सकते हैं। नई महफ़िलों में पुराने, बेमानी झगड़ों को मत उछालो।
संदेश: शब्दों की जिम्मेदारी भी उतनी ही बड़ी है जितनी कर्म की।
शेर 4:
वो दीने-हिजाज़ी का बेबाक बेड़ा-निशाँ,
जिसका अक्सा-ए-आलम में पहुँचा।
न था जिसको ख़तरा न उम्म में, न क़ुलज़ुम में,
झिझका किये बे-सपर जिसने सातों समंदर—
वो डूबा दहाने में गंगा के आकर।
भावार्थ: इक़बाल उस इस्लामी सभ्यता को याद करते हैं जिसका जहाज़ पूरी दुनिया में बेख़ौफ़ चला, जिसे न समंदरों से डर लगा, न तूफ़ानों से। लेकिन वही सभ्यता गंगा के किनारे आकर डूब गई - यानी अपने मूल उद्देश्य और आत्मा से दूर होकर।
संदेश: सभ्यताएँ बाहरी शक्ति से नहीं, आंतरिक पतन से गिरती हैं।
translated by Alana Marie Levinson-LaBrosse & Halo Fariq
*Translator’s note: On March 16, 1988, as part of Anfal, Saddam Hussein’s military campaign against the Kurds of Iraq, Halabja withstood a chemical-weapons attack. The largest directed against a civilian population in history, it has been recognized as an act of genocide by the Iraqi High Criminal Court.
I heard a girl's lament - yesterday she howled Like a prisoner and so passionate, it melted the heart
Such voice and shape no one has heard or seen before she tore at the depths of the heart's old scab
She said: This veil has not only covered our face, Against us, no rights, forgotten names
Never have we had a day when we freely demanded our right for our own fate, gone to the battlefield
From beginning to end, this black veil was wrong It became our obstacle, disabled us from entering the community of men
Pull it off, please tear it away, throw it into the furnace of fire It's a pity that at the light of day, you drag yourselves down into the darkness of night
The oppression of these traitors, it left no just judgement They put our sex under the spell of men's pleas
Why did our lot become a shroud, both in life and in judgement? Here black, there white, it’s sewn unto our bodies
Want to know, ask your elders, those who came before you Who ever saw veil over Kurdistan's woman’s face
When did the veil become a symbol of the virtue of the tender body? the heart is the arrow of the denier of God, who take no responsibility over faith
Tare it off, put it among you and surround it I hope to see it with my own eyes, with my wandering soul
Take it away please, throw it away, throw it into the furnace of fire It is a pity that at the light of day, you drag yourselves down into the darkness of night
Let a circle gather round it, say farewell to it Let its name go with this April flood
Put it in a coffin, let it be carried over the shoulders of longing Put it in a grave, on top of the ‘Saywan’ hill
Forgive us, O God - to bury it is not right Put it in a deep hole, over the hill of ‘Gawran’
Arrange a sad memorial, where each of you come to his ceremony, with joy and smiling lips
Don't believe that this lament is "Nuri's" idea, nor his poem It belongs to the girl with a beautiful voice, who said it with tears in her eyes
Take it away please, throw it away, throw it in the furnace of fire It's a pity that the light of day, you drag yourselves into the darkness of night
You know that you are a human. You know that, or do you not? That smile of yours is unique to you, That torment of yours is unique to you, Your eyes no other person has got.
अकबर इलाहाबादी केवल आलोचक नहीं थे; वे सर सैयद के सामाजिक सुधारों के समर्थक भी थे। उनके दृष्टिकोण में सर सैयद के प्रयासों का सम्मान था, लेकिन कुछ बातें उनके तरीक़े और शैली में उन्हें कमज़ोर या असंगत प्रतीत होती थीं। यही संतुलित दृष्टि इलाहाबादी की शायरी में झलकती है। यहाँ कुछ उद्धृत शेर और उनका विश्लेषण प्रस्तुत है:
शेर 1: ईमान बेचने को तो तैयार हैं हम भी, लेकिन, खरीद हो जो अलीगढ़ के भाव से।
व्याख्या: यहाँ इलाहाबादी व्यंग्य करते हैं कि लोग तो ईमान भी बेच सकते हैं, पर यदि इसे अलीगढ़ (जहाँ सर सैयद ने आधुनिक शिक्षा को बढ़ावा दिया) के तर्ज़ पर खरीदा जाए, तभी यह स्वीकार्य होगा। यह हल्का-फुल्का व्यंग्य अलीगढ़ मूवमेंट पर है।
शेर 2: हजार शेख ने डाढ़ी बढ़ाई सन की – सी, मगर, वो बात कहाँ मालवी मदन की – सी।
व्याख्या: इस शेर में इलाहाबादी कहते हैं कि लाखों लोगों ने बाहरी रूप (जैसे दाढ़ी बढ़ाना) अपनाया, लेकिन असली असर वही नहीं हुआ जो मालवी मदन या असली दृष्टिकोण वाला व्यक्ति दर्शाता। यह शेर दिखावे और वास्तविकता के बीच अंतर को उजागर करता है।
शेर 3: तालीम–ए दुस्तुराँ से ये उम्मीद है ज़रा, नाचे दुल्हन ख़ुशी से ख़ुद अपनी बरात में।
व्याख्या: यह शेर शिक्षा और सुधार की उम्मीदों पर व्यंग्य करता है। इलाहाबादी कहते हैं कि शिक्षा का लक्ष्य सिर्फ़ दिखावा न बन जाए, बल्कि उसका असर वास्तविक जीवन में महसूस होना चाहिए।
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अकबर इलाहाबादी की शायरी यह दिखाती है कि आलोचना हमेशा विरोध नहीं होती, बल्कि यह सुधार और सुधारकों के दृष्टिकोण को समझने और परखने का माध्यम भी हो सकती है। उनकी शेरों में व्यंग्य, सामाजिक टिप्पणियाँ और गहरी समझ का सुंदर मिश्रण मिलता है।
What I know of the sea is so little yet all I want to do is swim! Without leaning too long on reality I'd like to view all my memories one by one; leisurely.
I'd like to go, for example, to your dream world where you open the window and walk
where you rise and weave your fingers into unkempt hair.
Rains wander your face, the gentleness of dew is in your voice. Let each and every spring be yours! May all mountains tire and arrive here! Here at the place where stars have spilled you where waters flow; the place where you say Curl up on my lap and let birds take flight In the place where we collected questions such as 'what was before words?'
What I know of love is so little! Yet I'm constantly thinking of you!
गीत का संदर्भ : "वो मिट्टी के बेटे" एक देशभक्ति गीत की पंक्ति है जो हाल ही में रिलीज़ हुई फिल्म बॉर्डर 2 से ली गई है। यह उन शहीद सैनिकों को श्रद्धांजलि है जो मातृभूमि की रक्षा में लौटकर नहीं आए।यह गीत सोनू निगम द्वारा गाया गया है, संगीत मिथून का है, और बोल मनोज मुंतशिर ने लिखे हैं। गीत सैनिकों के बलिदान, माँ के लालों की बेफिक्री और तिरंगे की रक्षा पर केंद्रित है।
I tell you about children throwing rocks at Israeli tanks
seconds before becoming daisies. I want to be like those poets
who care about the moon.
Palestinians don't see the moon
from jail cells and prisons. It's so beautiful, the moon. They're so beautiful, the flowers.
I pick flowers for my dead father when I'm sad. He watches Al Jazeera all day. I wish Jessica would stop texting me Happy Ramadan. I know I'm American because when I walk into a room something dies.
Metaphors about death are for poets who think ghosts care about sound. When I die, I promise to haunt you forever. One day, I'll write about the flowers like we own them.
पाँच सालों में उग आता है बाप की आँखों में मोतियाबिंद जम जाती हैं माँ के चेहरे पर झुर्रियाँ चल बसता है दादा बिस्तर पकड़ लेती है दादी रिश्तेदार बदल लेते हैं घर
पाँच सालों में गुज़र जाते हैं सैकड़ों हंगामे अख़बार सीखा देते हैं लोगों को नुकीली ज़बान लाशों के नज़ारे बढ़ा देते हैं खून की प्यास घरों के मलबों पर नाचने लगते हैं तमाशबीन
Tell them yes. Tell them poetry is what chose you. Tell them you had a night, once, just as they did, when you knelt alone on the cold tiles and asked the night to give you a reason for being. Tell them the answer was your life. Tell them we are nothing, nothing without passion, the wild dark flock that fills our rooms with joy. Tell them you will give the rest of your blazing days to try to give another life that moment, that moment when you opened to the coldness and found that the music of your ruin was too beautiful to ever be destroyed.
1. अब रहीम मुश्किल पड़ी, गाढ़े दोऊ काम। सांचे से तो जग नहीं, झूठे मिलें न राम॥
विस्तृत अर्थ: जब मनुष्य पर कठिन समय आता है, तब सच्चाई का साथ देने वाला समाज नहीं मिलता और झूठ का सहारा लेने पर ईश्वर भी प्राप्त नहीं होते। अर्थात विपत्ति में मनुष्य अकेला पड़ जाता है।
2. वे रहीम नर धन्य हैं, पर उपकारी अंग। बाटनवारे को लगे, ज्यों मेंहदी को रंग॥
विस्तृत अर्थ: उपकारी व्यक्ति चाहे कितना ही बाँट दिया जाए, उसका गुण और प्रभाव कभी कम नहीं होता, जैसे मेहंदी बाँटने पर भी अपना रंग छोड़ती है।
3. रहिमन पानी राखिए, बिन पानी सब सून। पानी गए न ऊबरै, मोती, मानुष, चून॥
विस्तृत अर्थ:: यहाँ ‘पानी’ का अर्थ मर्यादा, लज्जा और आत्मसम्मान से है। इनके बिना मनुष्य, मोती और चूना—सबका मूल्य नष्ट हो जाता है।
4. रहिमन निज मन की व्यथा, मन ही राखो गोय। सुनि अठलैहैं लोग सब, बाँटि न लेहैं कोय॥
विस्तृत अर्थ: अपनी पीड़ा सबको बताने से लोग मज़ाक तो उड़ाते हैं, पर दुख बाँटने या सहायता करने कोई आगे नहीं आता।
5. जो बड़ेन को लघु कहे, नहिं रहीम घट जाय। गिरधर मुरलीधर कहे, कछु दुख मानत नाह॥
विस्तृत अर्थ: महान व्यक्ति छोटे नाम या साधारण संबोधन से छोटा नहीं हो जाता, जैसे कृष्ण को कोई भी नाम कहे, उनकी महत्ता कम नहीं होती।
6. समय लाभ सम लाभ नहिं, समय चूक सम चूक। चतुरन चित रहीम लगी, समय चूक कछु चूक॥
विस्तृत अर्थ: समय का सदुपयोग सबसे बड़ा लाभ है और समय चूक जाना सबसे बड़ा नुकसान, क्योंकि समय हाथ से निकल जाए तो अवसर लौटकर नहीं आते।
7. ए रहीम दर दर फिरहिं, माँगि मधुकरी खाहिं। यारो यारी छोड़िये, वे रहीम अब नाहिं॥
विस्तृत अर्थ: जो व्यक्ति स्वाभिमान छोड़कर दर-दर भीख माँगता फिरता है, उससे मित्रता छोड़ देनी चाहिए, क्योंकि वह अपना आत्मसम्मान खो चुका होता है।
8. रहिमन वे नर मर चुके, जे कहुँ माँगन जाहिं। उनते पहिले वे मुए, जिन मुख निकसत नाहिं॥
विस्तृत अर्थ:: माँगकर जीना आत्मसम्मान की मृत्यु है; पर उससे भी पहले वे मर चुके हैं जिनके मुख से ‘न’ शब्द नहीं निकलता।
9. जो रहीम उत्तम प्रकृति, का करि सकत कुसंग। चन्दन विष व्यापत नहीं, लिपटे रहत भुजंग॥
विस्तृत अर्थ: अच्छे स्वभाव वाला व्यक्ति बुरी संगति में रहकर भी अपना गुण नहीं खोता, जैसे चंदन पर लिपटा साँप भी उसे विषैला नहीं बना पाता।
10. रहिमन प्रीति न कीजिए, जस खीरा ने कीन। ऊपर से तो दिल मिला, भीतर फांकें तीन॥
विस्तृत अर्थ:: जो प्रेम केवल दिखावे का हो, उसमें भीतर से टूटन होती है; ऐसा प्रेम अंत में धोखा ही देता है।
11. तरुवर फल नहिं खात है, सरवर पियहि न पान। कहि रहीम पर काज हित, संपति संचहि सुजान॥
विस्तृत अर्थ:: जैसे पेड़ अपने फल नहीं खाते और तालाब अपना पानी नहीं पीते, वैसे ही सज्जन व्यक्ति अपनी संपत्ति दूसरों के कल्याण के लिए संचित करता है।
विस्तृत अर्थ: अच्छे और सज्जन लोगों से संबंध टूटने न दें, क्योंकि वे टूटे मोती के हार जैसे होते हैं जिन्हें फिर से पिरोना चाहिए।
13. क्षमा बड़न को चाहिए, छोटन को उत्पात। कह रहीम हरि का घट्यौ, जो भृगु मारी लात॥
विस्तृत अर्थ: क्षमा केवल महान लोगों का गुण है; क्रोध करना छोटे मन का लक्षण है | उदाहरण के रूप में वे कहते हैं कि जब महर्षि भृगु ने भगवान विष्णु को पैर मारा, तब भी भगवान ने क्रोध नहीं किया, बल्कि उनके पैर दबाने लगे।
14. रहिमन धागा प्रेम का, मत तोड़ो चटकाय। टूटे से फिर ना जुड़े, जुड़े गाँठ पड़ जाय॥
विस्तृत अर्थ: प्रेम का संबंध बहुत नाज़ुक होता है; एक बार टूट जाए तो दोबारा जुड़ने पर भी उसमें गाँठ रह जाती है।
15. एकही साधे सब सधै, सब साधे सब जाय। रहिमन मूल सींच बोये, फूल लहि अघाय॥
विस्तृत अर्थ: यदि मूल कारण पर ध्यान दिया जाए तो सभी कार्य सफल हो जाते हैं; इधर-उधर भटकने से सब कुछ नष्ट हो जाता है।
16. रहिमन ओछे नरन सो, बैर भली न कीत। काटे चाटे स्वान के, दोऊ भाँति ती प्रतीत॥
विस्तृत अर्थ: नीच व्यक्ति से शत्रुता दोनों ही स्थितियों में नुकसानदायक होती है, चाहे वह नुकसान करे या दिखावटी प्रेम दिखाए।
17. जो रहीम गति दीप की, कुल कपूत गति सोय। बारे उजियारो करे, बढ़े अँधेरो होय॥
विस्तृत अर्थ: कुपुत्र परिवार का नाम रोशन करने के बजाय बदनामी लाता है, जैसे दीपक बुझने पर अंधकार बढ़ जाता है।
18. रहिमन चुप हो बैठिए, देखि दिनन को फेर। जब नीके दिन आइहैं, बनत न लागै बेर॥
विस्तृत अर्थ: बुरे समय में धैर्य और मौन रखना चाहिए, क्योंकि अच्छे दिन आने पर परिस्थितियाँ स्वयं सुधर जाती हैं।
19. रहिमन प्रेम न छाँड़िए, लघु जन जानि। कूँजा पथिक न छोड़ई, देखि बावड़ी पानी॥
विस्तृत अर्थ: छोटे व्यक्ति या छोटे साधन को तुच्छ न समझें, क्योंकि संकट में वही सहारा बन सकता है।
20. रहिमन मीत बनाइए, कठिन समय के काम। आपत्ति काज न आवहीं, संपत्ति साँचि सुजान॥
विस्तृत अर्थ: सच्चे मित्र वही होते हैं जो संकट में साथ दें; धन केवल सुरक्षित रखा जा सकता है, मदद नहीं कर सकता।
21. रहिमन गति अगम्य है, प्रेम की रीति अपार। दादुर डूबे पंक में, मीन न उबरै पार॥
विस्तृत अर्थ: प्रेम की शक्ति और उसकी गति को समझना कठिन है; इसमें अयोग्य डूब जाते हैं और योग्य भी पार नहीं पा पाते।
22. रहिमन जिह्वा बावरी, कह गई सरग पाताल। आप तो कह भीतर रही, जूता खात कपाल॥
विस्तृत अर्थ: असंयमित वाणी मनुष्य को अपमान और संकट में डाल देती है, जबकि बोलने वाली जिह्वा स्वयं सुरक्षित रहती है।
23. रहिमन हानि लाभ जीवन मरण, यश अपयश विधि हाथ। जेति बने तित होइये, एहि विधि रहीम रीत॥
विस्तृत अर्थ: लाभ-हानि, जीवन-मरण और मान-अपमान सब विधि के हाथ में हैं; इसलिए जो मिले उसे स्वीकार करना चाहिए।
24. ओछो काम बड़े करैं तौ न बड़ाई होय।
ज्यों रहीम हनुमंत को, गिरधर कहै न कोय॥
विस्तृत अर्थ: यदि कोई छोटा या सामान्य व्यक्ति कोई बड़ा काम करता है, तो भी उसकी बड़ाई नहीं होती, जैसे हनुमान को कोई कृष्ण (गिरधर) नहीं कहता।
25. रहिमन यह तन विष की बेलरी, गुरु अमृत की खान। सीस दिए जो गुरु मिले, तो भी सस्ता जान॥
विस्तृत अर्थ: यह शरीर नश्वर और विष के समान है, जबकि गुरु का ज्ञान अमृत तुल्य है; गुरु के लिए जीवन भी न्योछावर करना सस्ता सौदा है।
26. “बिगरी बात बने नहीं, लाख करो किन कोय।
रहिमन फाटे दूध को, मथे न माखन होय॥”
विस्तृत अर्थ: कुछ नुकसान लौटकर ठीक नहीं होते - बिगड़ा हुआ संबंध या अवसर, कितनी भी कोशिश करो, वैसा पहले जैसा नहीं बनता।
27. रहिमन चुप हो बैठिये, देखि दिनन के फेर।
जब नीके दिन आइहैं, बनत न लगिहैं बेर॥
विस्तृत अर्थ: रहीम कहते हैं—दिनों के चक्र को देखकर चुपचाप बैठ जाओ। बुरे दिन भी गुजर जाते हैं। जब सुख के दिन आएँगे, तब ये दुखमय दिन तुच्छ और अर्थहीन प्रतीत होंगे