उग आता है
बाप की आँखों में मोतियाबिंद
जम जाती हैं
माँ के चेहरे पर झुर्रियाँ
चल बसता है दादा
बिस्तर पकड़ लेती है दादी
रिश्तेदार बदल लेते हैं घर
पाँच सालों में गुज़र जाते हैं
सैकड़ों हंगामे अख़बार सीखा देते हैं
लोगों को नुकीली ज़बान
लाशों के नज़ारे बढ़ा देते हैं
खून की प्यास
घरों के मलबों पर नाचने लगते हैं तमाशबीन
ज़हरीली चरस खींच कर
समाज हो जाता है सुन्न
अंदर और बाहर से
देश हो जाता हैं ठूंठ
पाँच सालों में हो जाता है
पाँच सालों में हो जाता है
बहुत कहने को
सब कुछ ही हो जाता है
हंगामों की अफ़रा-तफ़री में बस...
नहीं होता अदालत में
एक ख़ास मुक़दमा
या किसी हाक़िम की हिम्मत
कि वो दे सके ज़मानत
पाँच सालों में
पाँच सालों में
सिर्फ़ ये ही नहीं हो पाता
हमेशा बस होते-होते रह जाता है
- हुसैन हैदरी
- हुसैन हैदरी
No comments:
Post a Comment