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Oct 27, 2026

15 बेहतरीन शेर - 26 !!!

1. जिस धज से कोई मक़्तल में गया वो शान सलामत रहती है,
ये जान तो आनी जानी है इस जान की तो कोई बात नहीं -- फ़ैज़

2. आईये हाथ उठायें हम भी, हम जिन्हें रस्म-ए-दुआ याद नहीं
हम जिंहें सोज़-ए-मोहब्बत के सिवा कोई बुत, कोई ख़ुदा याद नहीं --- फ़ैज़

3. .सामने वाले को हल्का जान कर भारी हैं आप आपका मेयार देखा कितने मेयारी हैं
उफ़ तलक करते नहीं ज़िल्ले इलाही के ख़िलाफ़ आपको दरबार की आदत है दरबारी हैं आप 
--- अब्बास क़मर

4. केहू कहत है खाय का दाना नाय मिलत, केहू के शिकायत है ठेकाना नाय मिलत
येहि दौर से रफ़ीक हैं, हमहूं का शिकायत है, दिल लेहे घूमित है, निशाना नाय मिलत...!!!
--- रफ़ीक शादानी

5. जमीं बेच देंगे, गगन बेच देंगे, कली बेच देंगे, चमन बेच देंगे,
कलम के सिपाही अगर सो गए तो, वतन के मसीहा वतन बेच देंगे।

6. जहाँ रहेगा वहीं रौशनी लुटाएगा किसी चराग़ का अपना मकाँ नहीं होता ~वसीम बरेलवी

7. वो तो खुशबू है, हवाओं में बिखर जाएगा मसला फूल का है, वो किधर जाएगा - परवीन शाकिर 

8. यूँही आबाद रहेगी दुनिया, हम न होंगे कोई हम सा होगा -  नासिर काज़मी

9. ये जो कुछ देखते हैं हम फ़रेब-ए-ख़्वाब-ए-हस्ती है। तख़य्युल के करिश्मे हैं बुलंदी है न पस्ती है।। - बेदम शाह वारसी

10.  लगी जो आँख तो मंज़र था आइने जैसा, खुली जो आँख तो बाहर शदीद कोहरा था ~रशीदी

11.  मुल्ला को जो है हिंद में सजदे की इजाज़त, नादान ये समझता है कि इस्लाम है आजाद -  अल्लामा इकबाल

12. जौक़-ए-निगाह के सिवा शौक़-ए-गुनाह के सिवा , मुझ को बुतों से क्या मिला मुझ को ख़ुदा ने क्या दिया -  'हफ़ीज़' जालंधरी

13. बाज़ीचा-ए-अतफ़ाल है दुनिया मिरे आगे,  होता है शब-ओ-रोज़ तमाशा मिरे आगे - मिर्ज़ा ग़ालिब

14. चराग़-ए-शाम-ए-तन्हाई भी रौशन रख नहीं पाए, अब और आगे हवा की दोस्ती से चाहते क्या हो - ज़फ़र गोरखपुरी

15. चलते चलिए, ये हमें लेकर जिधर जाते हैं , ख़्वाब, आंखों ही में रहते हैं, तो मर जाते हैं। -  जावेद अख़्तर

Oct 24, 2026

मैं ख़याल हूँ किसी और का

मैं ख़याल हूँ किसी और का, मुझे सोचता कोई और है
सर-ए-आइना मेरा अक्स है
सर-ए-आइना मेरा अक्स है, पस-ए-आइना कोई और है
मैं ख़याल हूँ किसी और का, मुझे सोचता कोई और है

सर-ए-आइना मेरा अक्स है
सर-ए-आइना मेरा अक्स है, पस-ए-आइना कोई और है
मैं ख़याल हूँ किसी और का मैं ख़याल हूँ किसी और का

तुझे दुश्मनों की खबर न थी, मुझे दोस्तों का पता नहीं
तुझे दुश्मनों की खबर न थी, मुझे दोस्तों का पता नहीं
तेरी दास्तां कोई और थी
तेरी दास्तां कोई और थी, मेरा वाक़िआ कोई और है
मैं ख़याल हूँ किसी और का मैं ख़याल हूँ किसी और का

मैं किसी के दस्त-ए-तलब में हूँ, तो किसी के हर्फ़-ए-दुआ में हूँ
मैं किसी के दस्त-ए-तलब में हूँ, तो किसी के हर्फ़-ए-दुआ में हूँ
मैं नसीब हूँ किसी और का
मैं नसीब हूँ किसी और का, मुझे माँगता कोई और है

सर-ए-आइना मेरा अक्स है
सर-ए-आइना मेरा अक्स है, पस-ए-आइना कोई और है
मैं ख़याल हूँ किसी और का मैं ख़याल हूँ किसी और का

Sep 30, 2026

15 बेहतरीन शेर - 25 !!!

1. यहाँ सबको दरारों में झाँकने की आदत है, दरवाज़ा खोल दो तो हाल भी पूछने नहीं आएगा। - मुनव्वर राना

2. वह सबकी सुन रहे हैं, सबको दाद-ए-शौक़ देते हैं, कहीं ऐसे में मेरा क़िस्सा-ए-ग़म भी बयाँ होता। — कैफ़ी आज़मी

3. इतनी शिद्दत से मैंने तुम्हें पाने की कोशिश की है, कि हर ज़र्रे ने मुझे तुमसे मिलाने की साज़िश की है। - मयूर पुरी

4. ना तलवार की धार से, ना गोलियों की बौछार से, बंदा डरता है तो सिर्फ़ परवरदिगार से। - संतोष आनन्द

5. इतनी भी बद-मिज़ाजी हर लहज़ा ‘मीर’ तुम को, उलझाव है ज़मीं से, झगड़ा है आसमाँ से। — मीर तकी मीर

6. किसी ने आग लगाई है ठहरे पानी में, सुलग रहा है समुंदर, किनारे रौशन हैं। — बाबर ज़ुहराब

7. कौन आएगा यहाँ, कोई न आया होगा, मेरा दरवाज़ा हवाओं ने हिलाया होगा। — कैफ़ भोपाली

8.  पोंछ कर अश्क अपनी आँखों से मुस्कुराओ तो कोई बात बने, सर झुकाने से कुछ नहीं होता, सर उठाओ तो कोई बात बने। — साहिर लुधियानवी

9. फ़लसफ़ी को बहस के अंदर ख़ुदा मिलता नहीं, डोर को सुलझा रहा है और सिरा मिलता नहीं। — अकबर इलाहाबादी

10. नहीं कि मुझ को क़यामत का ए'तिक़ाद नहीं, शब-ए-फ़िराक़ से रोज़-ए-जज़ा ज़ियाद नहीं। — मिर्ज़ा ग़ालिब

11. कीजै न ज़मील उर्दू का सिंगार, अब ईरानी तल्मीहों से, पहनेगी विदेशी गहने क्यों यह बेटी भारतमाता की - जमील मज़हरी

12. इस तरह इंसान और शिद्दत करे इंसान पर, तुफ़ है तेरे दीन पर, लानत तेरे ईमान पर। - मक़तल-ए-कानपुर

13. सर-ए-महशर यही पूछूँगा ख़ुदा से पहले, तू ने रोका भी था बंदे को ख़ता से पहले  -- आनंद नारायण ‘मुल्ला’

14. अक़्ल के भटके होऊँ को राह दिखलाते हुए, हम ने काटी ज़िंदगी दीवाना कहलाते हुए -- आनंद नारायण ‘मुल्ला’
 
15. मिट्टी की मूरतों में समझा है तू ख़ुदा है, ख़ाक-ए-वतन का मुझको हर ज़र्रा देवता है। — अल्लामा इक़बाल, 






Sep 21, 2026

तू भी है राणा का वंशज फेंक जहां तक भाला जाए

कब तक बोझ संभाला जाए
द्वंद्व कहां तक पाला जाए
दूध छीन बच्चों के मुख से
क्यों नागों को पाला जाए
दोनों ओर लिखा हो भारत
सिक्का वही उछाला जाए
तू भी है राणा का वंशज
फेंक जहां तक भाला जाए

इस बिगड़ैल पड़ोसी को तो
फिर शीशे में ढाला जाए
तेरे मेरे दिल पर ताला
राम करें ये ताला जाए
वाहिद के घर दीप जले तो
मंदिर तलक उजाला जाए

--- वाहिद अली वाहिद

Sep 15, 2026

आंधियां आती थीं लेकिन कभी ऐसा न हुआ...

आँधियाँ आती थीं लेकिन कभी ऐसा न हुआ

ख़ौफ़ के मारे जुदा शाख़ से पत्ता न हुआ

रूह ने पैरहन-ए-जिस्म बदल भी डाला

ये अलग बात किसी बज़्म में चर्चा न हुआ

 रात को दिन से मिलाने की हवस थी हम को

काम अच्छा न था अंजाम भी अच्छा न हुआ

वक़्त की डोर को थामे रहे मज़बूती से

और जब छूटी तो अफ़्सोस भी इस का न हुआ 

ख़ूब दुनिया है कि सूरज से रक़ाबत थी जिन्हें

उन को हासिल किसी दीवार का साया न हुआ


रईस अमरोह

Aug 23, 2026

वो ज़माना गुज़र गया कब का

वो ज़माना गुज़र गया कब का
था जो दीवाना मर गया कब का

ढूंढ़ता था जो इक नई दुनिया
लूट के अपने घर गया कब का

वो जो लाया था हम को दरिया तक
पार अकेले उतर गया कब का

उस का जो हाल है वही जाने
अपना तो ज़ख़्म भर गया कब का

ख़्वाब-दर-ख़्वाब था जो शीराज़ा
अब कहां है बिखर गया कब का

--- जावेद अख़्तर

Aug 21, 2026

Urdu Shayari (Poetry) & Dialogues from Parizaad Serial

### **1. "Tum Toh Siyah Mein Bhi Jachti Ho" (University Scene)**


> **Devanagari (हिंदी):**

> जब धीमे-धीमे हँसती हो, उस बारिश जैसी लगती हो।

> थोड़ी दिल की कहती हो, ज़्यादा दिल में रखती हो।

> क्यों जाऊँ रंगरेज़ के पास, तुम तो सियाह में भी जचती हो।

> करने दो उन्हें सिंगार, तुम सादा भी सजती हो।


> **Urdu (اردو):**

> جب دھیمے دھیمے ہنستی ہو، اس بارش جیسی لگتی ہو۔

> تھوڑی دل کی کہتی ہو، زیادہ دل میں رکھتی ہو۔

> کیوں جاؤں رنگ ریز کے پاس، تم تو سیاہ میں بھی جچتی ہو۔

> کرنے دو انہیں سنگھار، تم سادہ بھی سجتی ہو۔


> **Roman Urdu:**

> *Jab dheeme dheeme hasti ho, us barish jaisi lagti ho.*

> *Thodi dil ki kehti ho, zyada dil mein rakhti ho.*

> *Kyun jaaon rangrez ke paas, tum toh siyah mein bhi jachti ho.*

> *Karne do unhein singaar, tum saada bhi sajti ho.*


---


### **2. "Sitare Jo Damakte Hain"**


> **Devanagari (हिंदी):**

> सितारे जो दमकते हैं, किसी की चश्म-ए-हैरान में

> मुलाक़ातें जो होती हैं, जमाल-ए-अब्र-ओ-बारान में

> ये ना-आबाद वक़्तों में, दिल-ए-नाशाद में होगी

> मोहब्बत अब नहीं होगी, ये कुछ दिन बाद में होगी

> गुज़र जाएँगे जब ये दिन, ये उन की याद में होगी


> **Urdu (اردو):**

> ستارے جو دمکتے ہیں، کسی کی چشمِ حَیراں میں

> ملاقاتیں جو ہوتی ہیں، جمالِ ابرِ باراں میں

> یہ نا آباد وقتوں میں، دلِ ناشاد میں ہوگی

> محبت اب نہیں ہوگی، یہ کچھ دن بعد میں ہوگی

> گزر جائیں گے جب یہ دن، یہ ان کی یاد میں ہوگی


> **Roman Urdu:**

> *Sitare jo damakte hain, kisi ki chashm-e-hairaan mein*

> *Mulaqatein jo hoti hain, jamaal-e-abr-o-baaraan mein*

> *Ye na-aabaad waqton mein, dil-e-naashaad mein hogi*

> *Mohabbat ab nahi होगी, ye kuch din baad mein hogi*

> *Guzar جائیں ge jab ye din, ye un ki yaad mein hogi*


---


### **3. "Qissay Meri Ulfat Ke"**


> **Devanagari (हिंदी):**

> क़िस्से मेरी उल्फ़त के जो मरक़ूम हैं सारे,

> आ देख तेरे नाम से मन्सूब हैं सारे।

> शायद ये ज़र्फ़ है जो ख़ामोश हूँ अब तक,

> वरना तो तेरे ऐब भी मालूम हैं सारे।

> सब जुर्म मेरी ज़ात से मन्सूब हुए,

> क्या मेरे सिवा इस शहर में मासूम हैं सारे?


> **Urdu (اردو):**

> قصے میری الفت کے جو مرقوم ہیں سارے

> آ دیکھ تیرے نام سے منسوب ہیں سارے

> شاید یہ ظرف ہے جو خاموش ہوں اب تک

> ورنہ تو تیرے عیب بھی معلوم ہیں سارے

> سب جرم میری ذات سے منسوب ہوئے

> کیا میرے سوا اس شہر میں معصوم ہیں سارے؟


> **Roman Urdu:**

> *Qissay meri ulfat ke jo marqoom hain saare,*

> *Aa dekh tere naam se mansoob hain saare.*

> *Shayad ye zarf hai jo khamosh hoon ab tak,*

> *Warna toh tere aib bhi maloom hain saare.*

> *Sub jurm meri zaat se mansoob hue,*

> *Kya mere siwa is shehar mein masoom hain saare?*


---


### **4. "Suno! Mujhse Aur Bas Mujhse Nafrat Karna"**


> **Devanagari (हिंदी):**

> सुनो! तुम्हारी वफ़ा पे मुझको गरचे पूरा यक़ीन है,

> मगर ज़माने के वार का कुछ भरोसा नहीं है।

> सो गर कभी ऐसा हो कि तुम्हें मुझसे नफ़रत हो जाए,

> तो कभी उन बातों से नफ़रत मत करना जो हमने एक दूसरे से की थीं,

> वो बेंच जहाँ हम बैठा करते थे, वो पहली बारिश,

> वो कॉफ़ी के ख़ाली मग, वो सिनेमा का पहला टिकट और आख़िरी दो सीटें,

> सबको याद रखना... कभी उनसे नफ़रत ना करना।

> सुनो, मुझसे... और बस मुझसे नफ़रत करना,

> क्योंकि सिर्फ़ मैं और फ़क़त मैं ही तुम्हारी उस नफ़रत के क़ाबिल हूँ।


> **Roman Urdu:**

> *Suno! Tumhari wafa pe mujhko garche poora yaqeen hai,*

> *Magar zamane ke waar ka kuch bharosa nahi hai.*

> *So gar kabhi aisa ho ki tumhein mujhse nafrat ho jaaye,*

> *Toh kabhi un baaton se nafrat mat karna jo humne ek doosre se ki thi,*

> *Wo bench jahaan hum baitha karte the, wo pehli baarish,*

> *Wo coffee ke khaali mug, wo cinema ka pehla ticket aur aakhri do seatein,*

> *Sabko yaad rakhna... kabhi unse nafrat na karna.*

> *Suno, mujhse... aur bas mujhse nafrat karna,*

> *Kyunki sirf main aur faqat main hi tumhari us nafrat ke qabil hoon.*


---


### **Iconic Dialogue:**


> **Devanagari (हिंदी):**

> "शक्ल-ओ-सूरज इंसान का पहला तआरुफ़ है। इंसान का दूसरा और असल तआरुफ़ उसके अल्फ़ाज़ हैं। अपना दूसरा तआरुफ़ इतना मुकम्मल कर लो कि लोग तुम्हारा पहला तआरुफ़ भूल जाएँ।"


> **Roman Urdu:**

> *"Shakl-o-soorat insaan ka pehla taaruf hai. Insaan ka doosra aur asal taaruf uske alfaaz hain. Apna doosra taaruf itna mukammal karlo ke log tumhara pehla taaruf bhool jaayen."*

Aug 15, 2026

वतन को कुछ नहीं ख़तरा निज़ाम-ए-ज़र है ख़तरे में

वतन को कुछ नहीं ख़तरा निज़ाम-ए-ज़र है ख़तरे में
हक़ीक़त में जो रहज़न है वही रहबर है ख़तरे में

जो बैठा है सफ़-ए-मातम बिछाए मर्ग-ए-ज़ुल्मत पर
वो नौहागर है ख़तरे में वो दानिश-वर है ख़तरे में

अगर तशवीश लाहक़ है तो सुलतानों को लाहक़ है
न तेरा घर है ख़तरे में न मेरा घर है ख़तरे में

जहाँ 'इक़बाल' भी नज़्र-ए-ख़त-ए-तनसीख़ हो 'जालिब'
वहाँ तुझ को शिकायत है तिरा जौहर है ख़तरे

--- हबीब जालिब

Aug 11, 2026

समय ने जब भी अंधेरो से दोस्ती की है

समय ने जब भी अंधेरो से दोस्ती की है
जला के अपना ही घर हमने रोशनी की है

सबूत है मेरे घर में धुएं के ये धब्बे
कभी यहाँ पे उजालों ने ख़ुदकुशी की है

ना लड़खडायाँ कभी और कभी ना बहका हूँ
मुझे पिलाने में फिर तुमने क्यूँ कमी की है

कभी भी वक़्त ने उनको नहीं मुआफ़ किया
जिन्होंने दुखियों के अश्कों से दिल्लगी की है

किसी के ज़ख़्म को मरहम दिया है गर तूने
समझ ले तूने ख़ुदा की ही बंदगी की है

--- गोपालदास नीरज

Jul 26, 2026

वो भी क्या दिन थे

 वो भी क्या दिन थे कि जब इश्क़ लड़ा लेते थे,

प्यार की डोर को चर्ख़ी पे चढ़ा लेते थे,

नौजवानी की पतंगों को उड़ा लेते थे,

धड़क के कंकड़ियाँ संभाल लेते थे,

होंठों पे हंसी, आंखों में आस थी,

हर ग़म को हंसी में उड़ाया करते थे।

--- सागर खय्यामी

Jul 23, 2026

15 बेहतरीन शेर - 24 !!!

 1.नहीं नहीं हमें अब तेरी जुस्तुजू भी नहीं तुझे भी भूल गए हम तिरी ख़ुशी के लिए - ज़ेहरा निगाह

2.  मुस्तक़िल जूझना यादों से बहुत मुश्किल है, रफ़्ता रफ़्ता सभी घर-बार में खो जाते हैं। - .मुनव्वर राना

3. रंग ख़ुश्बू और मौसम का बहाना हो गया, अपनी ही तस्वीर में चेहरा पुराना हो गया - खालिद गनी 

4.ये दस्तूर-ए-ज़बाँ-बंदी है कैसा तेरी महफ़िल में , यहाँ तो बात करने को तरसती है ज़बाँ मेरी  - इक़बाल

5. ज़ाहिद शराब पीने दे मस्जिद में बैठ कर, या वो जगह बता दे जहाँ पर ख़ुदा न हो

6. न ख़ुदा ही मिला न विसाल-ए-सनम न इधर के हुए न उधर के हुए, रहे दिल में हमारे ये रंज-ओ-अलम न इधर के हुए न उधर के हुए

7. अगर फ़िरदौस बर-रू-ए-ज़मीं अस्त, हमीं अस्त ओ हमीं अस्त ओ हमीं अस्त

8. सलीक़े से हवाओं में जो ख़ुशबू घोल सकते हैं, अभी कुछ लोग बाक़ी हैं जो उर्दू बोल सकते हैं

9. आतिशे इश्क़ न बुझी, ज़माने ने इंतेहा लाख लिए, वो मयस्सर नहीं अभी, पर जीने को उसकी आरज़ू ही सही !

10. होश आए भी तो क्यों करें, तेरे दीवाने को, एक जाता है तो दो आते हैं समझाने को - होशियार मेरठी 

11.रफ़्ता रफ़्ता वो हमारे दिल के अरमाँ हो गए , पहले जाँ फिर जान-ए-जाँ फिर जान-ए-जानाँ हो गए  - क़मर जलालाबादी

12. तुम से सदियों की वफ़ाओ का कोई नाता था, तुम से मिलने की लकीरें थीं मेरे हाथों में - सईद राही

13.इक रात हर चराग़ की लौ काट दी गई, और वो भी चुप रहे जिन्हें प्यारी है रौशनी - नोमान शौक़

14.दूसरा मौक़ा सबको मिलता है ताबिश, पहली बाज़ी सबने हारी होती है -ज़ुबैर ताबिश

15.जो डूबना है तो इतने सुकून से डूबो, कि आस-पास की लहरों को भी पता न लगे - क़ैसर-उल जाफ़री

Jul 15, 2026

उम्र जल्वों में बसर हो

 उम्र जल्वों में बसर हो ये ज़रूरी तो नहीं 

हर शब-ए-ग़म की सहर हो ये ज़रूरी तो नहीं 

चश्म-ए-साक़ी से पियो या लब-ए-साग़र से पियो 

बे-ख़ुदी आठों पहर हो ये ज़रूरी तो नहीं 

नींद तो दर्द के बिस्तर पे भी आ सकती है 

उन की आग़ोश में सर हो ये ज़रूरी तो नहीं 

शैख़ करता तो है मस्जिद में ख़ुदा को सज्दे 

उस के सज्दों में असर हो ये ज़रूरी तो नहीं 

सब की नज़रों में हो साक़ी ये ज़रूरी है मगर 

सब पे साक़ी की नज़र हो ये ज़रूरी तो नहीं 

मय-कशी के लिए ख़ामोश भरी महफ़िल में 

सिर्फ़ ख़य्याम का घर हो ये ज़रूरी तो नहीं 

- ख़ामोश ग़ाज़ीपुरी

Jul 2, 2026

क्या ज़रूरी है मोहब्बत में तमाशा होना

क्या ज़रूरी है मोहब्बत में तमाशा होना

जिससे मिलना ही नहीं उससे जुदा क्या होना

ज़िंदा होना तो नहीं हिज्र में ज़िंदा होना

हम इसे कहते हैं होने के अलावा होना

तेरा सूरज के क़बीले से त'अल्लुक़ तो नहीं

ये कहाँ से तुझे आया है सभी का होना

तू ने आने में बहुत देर लगा दी वरना

मैं नहीं चाहता था हिज्र में बूढ़ा होना

क्या तमाशा है कि सब मुझको बुरा कहते हैं

और सब चाहते हैं मेरी तरह का होना

--- अब्बास ताबिश

Jun 18, 2026

15 बेहतरीन शेर - 23 !!!

1. उम्र-भर जी के भी जीने का न अन्दाज आया। जिन्दगी छोड़ दे पीछा मेरा मैं बाज आया ॥- मोहम्मद अली 'ताज'  

2.  ख़मोशी से मुसीबत और भी संगीन होती है,  तड़प ऐ दिल तड़पने से ज़रा तस्कीन होती है  - -शाद अज़ीमाबादी

3. जिसको ख़बर नहीं, उसे जोशो-ख़रोश है, जो पा गया है राज़, वो गुम है ख़मोश है  - पंडित ब्रजमोहन दत्तात्रेय 'कैफ़ी'

4.  इश्क़ नाज़ुक मिज़ाज है बेहद, अक़्ल का बोझ उठा नहीं सकता  - अकबर इलाहाबादी

5. 'हफ़ीज़' अपनी बोली मोहब्बत की बोलीन उर्दू, न हिंदी, न हिन्दोस्तानी - हफ़ीज़ जालंधरी

6. क़रार दिल को सदा जिसके नाम से आया, वो आया भी तो किसी और काम से आया - जमाल एहसानी

7 हयात ले के चलो, कायनात ले के चलो, चलो तो सारे ज़माने को साथ ले के चलो - मख़दूम मोहिउद्दीन
 
8. सब मिरे चाहने वाले हैं मिरा कोई नहीं, मैं भी इस मुल्क में उर्दू की तरह रहता हूँ  - हसन काज़मी

9. हम ऐसे ख़ुदपरस्त हैं कि खुदा को भी न मानें, और फिर भी उम्मीद रखते हैं कि लोग हमें खुदा माने। -अकबर इलाहाबादी

10. वहाँ जलेगा दिया कब तक आदमियत का, खुद आदमी हो जहाँ सर फिरि हवा की तरह - महशर बदायूनी 

11. ज़िंदगी ज़िंदा-दिली को जान ऐ रोशन, वरना कितने ही यहाँ रोज़ फ़ना होते हैं। -  ठाकुर रोशन सिंह 

12. बहाने और भी होते जो ज़िंदगी के लिए, हम एक बार तेरी आरज़ू भी खो देते  - ~ मजरूह सुल्तानपुरी

13. छत पे कमरा है मेरा कमरा भी कोने वाला, काम आसानी से हो जाता है रोने वाला - उमैर नजमी

14. लखनऊ तेरी गलियों में अभी भी महकती है वो शायरी, हर मोड़ पे बसता है एक पुराना इश्क़ का सिलसिला। - जोश मलीहाबादी 

15. ज़बाँ हमारी न समझा यहाँ कोई मजरूह, हम अजनबी की तरह अपने ही वतन में रहे - - मजरूह सुल्तानपुरी

May 28, 2026

Samandar Serial Title Song Lyrics (समंदर सीरियल टाइटल सॉन्ग)


समंदर की हसीन लहरों
के कामिल हुक्मराँ हैं हम
समंदर की हसीन लहरों
के कामिल हुक्मराँ हैं हम
नज़र है जिनकी बाने अर्श पर वो
पासबान हैं हम

समंदर की हसीन लहरों
के कामिल हुक्मराँ हैं हम
समंदर की हसीन लहरों
के कामिल हुक्मराँ हैं हम

वतन के ज़र्रे ज़र्रे से मोहब्बत
हमको है ऐ दोस्त
वतन के ज़र्रे ज़र्रे से मोहब्बत
हमको है ऐ दोस्त

है मंज़िल जिनकी ठोकर में
वो मीलें कारवाँ हैं हम
है मंज़िल जिनकी ठोकर में
वो मीलें कारवाँ हैं हम
नज़र है जिनकी बाने अर्श पर वो
पासबान हैं हम

समंदर की हसीन लहरों
के कामिल हुक्मराँ हैं हम
समंदर की हसीन लहरों
के कामिल हुक्मराँ हैं हम

---बाय कर्नल सुल्तान सिंह मलिक

दूरदर्शन पर भारतीय नौसेना पर आधारित सीरियल बहुत दुर्लभ थे, और समंदर (१९९५–१९९६) उसके लिए सबसे प्रसिद्ध और अद्वितीय उदाहरण है। यह २५ एपिसोड वाला हिंदी सीरियल १९९५ से १९९६ तक दूरदर्शन (DD Metro) पर प्रसारित हुआ था, जो भारतीय नौसेना के अधिकारियों के जीवन, उनकी समर्पण भावना, युद्ध में संघर्ष और साथियों के साथ मिलजुलकर रहने की भावना को दर्शाता था। इसका निर्माण सेवानिवृत्त विंग कमांडर अनुप सिंह बेदी वीएसएम ने किया था, जिनकी मदद सेना के सेवानिवृत्त कर्नल (डॉ.) सुल्तान सिंह मलिक (जिन्हें संगीतकार/गायक के रूप में भी जाना जाता है) ने की थी। सीरियल में समीर सोनी, अमन वर्मा, वीनाता मलिक, और गिरिश मलिक जैसे प्रसिद्ध अभिनेताओं ने मुख्य भूमिकाएँ निभाई थीं, साथ ही असली भारतीय नौसेना के अधिकारियों ने भी विशेष अभिनय किया था। इसमें भारतीय नौसेना के बेड़े के वास्तविक मैन्युवर और तस्वीरें भी दिखाई गई थीं। सीरियल का गीत "समंदर की हसीन लेहरों के कामील हुकूमरान हैं हम" से शुरू होता था, जिसकी रचना और गायन कर्नल एसएस मलिक ने किया था, और यह गीत बहुत लोकप्रिय हुआ था। इस सीरियल ने १९९५-९६ में बहुत उच्च TRP प्राप्त किया और ९० के दशक के नॉस्टल्जिक सीरियल के रूप में आज भी प्रेम किया जाता है।

May 17, 2026

क्यों खोये खोये चांद की (Kyon khoye khoye chand ki)


आज शब जो चांद ने है रूठने की थान ली
गर्दिशो में है सितारे बात हमने मान ली
अंधेरी शाम जिंदगी को समझ थी नहीं कहीं
कि एक आज हाथ थमलो की एक हाथ की कमी खाली
क्यों खोए खोए चांद की फिराक में तलाश में उदास है दिल
क्यों अपने आप से खफा खफा जरा ज़रा सा नाराज़ है दिल


ये मंज़िलें भी खुद ही तय करें,
ये फ़सलें भी खुद ही तय करें,
क्यूं तो रस्तों पे फिर सहम सहम
संभल संभल ले चलता है ये दिल
क्यों खोये चाँद की फिराक में तलाश में उदास है दिल


जिंदगी सवालो के जवाब ढूंढने चली
जवाब में सवालों की एक लंबी सी लड़ी मिली
सवाल ही सवाल है सूझती नहीं गली
कि आज हाथ थाम लो एक हाथ की कमी खाली


जी में आता है
मुर्दा सितारा नोच लो
इधर भी नोच लो
उधर भी नोचलो

एक दो का जिक्र क्या
में सारे नोच लो


 2 [इधर भी नोच लो
उधर भी नोच लो
सितारे नोच लो
में सारे नोच लो]2

क्यों तू आज
इतना वैसा है मिजाज में मजा है ऐ गम-ए-दिल
क्यों अपने आप से खफा खफा जरा जरा सा नाराज है दिल


ये मंजिलें भी खुद ही ताई करें,
ये फ़सलें भी खुद ही ताई करें,
क्यूं तो रस्तों पे फिर सहम सहम
संभल ले चलता है ये दिल


दिल को समझना है तो क्या आसान है
दिल तो फितरत से सुन लो ना बेईमान है
ये खुश नहीं है जो मिला
बस मांगता ही है चला


जानता है हर लगी का
दर्द ही है बस एक सिला


[जब कभी ये दिल लगा
दर्द ही हमें मिला
दिल की हर लगी का
सुनलो दर्द ही एक सिला]2


क्यों नए नए से दर्द की फिराक में तलाश उदास है दिल
क्यों अपने ऐप से खफा खफा जरा जरा सा नाराज है दिल


ये मंजिल भी खुद ही ताई करें
ये फासले भी खुद ही ताई करें
क्यों तो रस्तों पे फिर सहम सहम
संभल ले चलता है ये दिल


क्यों खोए खोए चांद की फिराक में तलाश में उदास है दिल
क्यों अपने आप से खफा खफा जरा जरा सा नाराज है दिल


ये मंजिलें भी खुद ही ताई करें, ये फासले भी खुद ही तय करें,
ये फासले भी खुद ही तय करें
क्यों तो रस्तों पे फिर सहम सहम
संभल ले चलता है ये दिल


--- स्वादानंद किरकिरे

May 5, 2026

15 बेहतरीन शेर - 22 !!!

1. ये नया शहर तो है ख़ूब बसाया तुमने, क्यूं पुराना हुआ वीरान ज़रा देख तो लो - जावेद अख़्तर

2. हज़ारों साल नर्गिस अपनी बे-नूरी पे रोती है, बड़ी मुश्किल से होता है चमन में दीदा-वर पैदा - अल्लामा इक़बाल

3. उस पे पत्थर खाके क्या बीती ज़फ़र देखेगा कौन, फल तो सब ले जाएँगे ज़ख़्मे-शजर देखेगा कौन - ज़फ़र गोरखपुरी

4. देख ज़िंदाँ से परे रंग-ए-चमन, रक़्स करना है तो फिर पाँव की ज़ंजीर न देख। - मजरूह सुल्तानपुरी

5. कलकत्ते का जो ज़िक्र किया तू ने हम-नशीं, इक तीर मेरे सीने में मारा कि हाए हाए - मिर्ज़ा ग़ालिब

6. फूल तो दो दिन बहारे-जा-फ़िज़ा दिखला गए, हसरत उन गुंचों पे हैं जो बिन खिले मुरझा गए - ज़ौक़

7. वो ज़हर देता तो सब की निगह में आ जाता, सो ये किया कि मुझे वक़्त पे दवाएं न दीं - अख़्तर नाज़मी

8. हवा को बहुत सर-कशी का नशा है, मगर ये न भूले दिया भी दिया है । - खुमार बाराबंकवी

9. एक से एक जुनूँ का मारा इस बस्ती में रहता है,  एक हमीं हुशियार थे यारो एक हमीं बद-नाम हुए - इब्न-ए-इंशा

10. किस तरह जमा कीजिए अब अपने आप को, काग़ज़ बिखर रहे हैं पुरानी किताब के - -आदिल मंसूरी

11. वो दुश्मनी से देखते हैं, देखते तो हैं, मैं शाद हूँ की हूँ तो किसी की निगाह में - अमीर मीनाई

12. बाद मुद्दत के ये ऐ 'दाग़' समझ में आया, वही दाना है कहा जिसने न माना दिल का - दाग़ देहलवी

13. गो बहुत कुछ रंज यारान ए वतन से था हमेंआँख में आंसू मगर वक़्त ए सफ़र आ ही गया - अकबर इलाहाबादी,

14.  फ़रिश्तों से भी अच्छा मैं बुरा होने से पहले था, वो मुझ से इन्तिहाई ख़ुश ख़फ़ा होने से पहले था - अनवर शुऊर

15. मिरा ज़मीर बहुत है मुझे सज़ा के लिए,  तू दोस्त है तो नसीहत न कर ख़ुदा के लिए - शाज़ तमकनत

Apr 17, 2026

15 बेहतरीन शेर - 21 !!!

1. आनेवाली नस्लें तुम पर फ़ख़्र करेंगी हम-असरो, जब भी उनको ध्यान आएगा तुमने 'फ़िराक़' को देखा है - फ़िराक़ गोरखपुरी

2. हमारे बस में था ही क्या हवा पे हम सवार थे, वहाँ वहाँ गए जहाँ हवा उड़ा के ले गई -अज़्म शाकिरी

3. क्या क्या हुआ है हम से जुनूँ में न पूछिए , उलझे कभी ज़मीं से कभी आसमाँ से हम - असरार-उल-हक़ मजाज़

4. अब तुमसे रुख़सत होता हूँ आओ सम्भालो साज़े-गज़ल नये तराने छेड़ो, मेरे नग्मों को नींद आती है - रघुपति सहाय 'फ़िराक़'

5. तुझे किस बात का ग़म है वो इतना पूछ लें मुझ से वो इतना पूछ लें मुझ से तो फिर किस बात का ग़म है मुझ से - मुशताक़ हुसैन ख़ान हाशमी मुश्ताक़

6.  मुझको तो होश नहीं, तुमको ख़बर हो शायद, लोग कहते हैं कि तुमने मुझे बर्बाद किया - जोश मलीहाबादी

7. मैं तो ग़ज़ल सुना के अकेला खड़ा रहा, सब अपने अपने चाहने वालों में खो गए - कृष्ण बिहारी नूर

8. न जाने कैसा मसीहा था चाहता क्या था, तमाम शहर को बीमार देख कर ख़ुश था  - अमीर क़ज़लबाश

9. दाग़ दुनिया ने दिए ज़ख़्म ज़माने से मिले, हम को तोहफ़े ये तुम्हें दोस्त बनाने से मिले - कैफ़ भोपाली

10.  ख़ुशियाँ देते देते अक्सर खुद ग़म में मर जाते हैं,  रेशम बुनने वाले कीड़े रेशम में मर जाते हैं - ख़ुशबीर सिंह शाद

11. कुछ तो तेरे मौसम ही मुझे रास कम आये और कुछ मेरी मिट्टी में बग़ावत भी बहुत थी - परवीन शाकिर

12. रातें परदेस की डरता था कटेंगी कैसे, मगर आँगन में सितारे थे वही घर वाले - राही मासूम रजा़

13. हम को नीचे उतार लेंगे लोग, इश्क़ लटका रहेगा पंखे से - ज़िया मज़कूर

14. मैखाने के क़रीब थी मस्जिद भले को, दाग़ हर एक पूछता था कि “ हज़रत इधर कहाँ? - दाग़

15. जब तुलू आफताब होता है, ग़म के सागर उछाल देता हूँ, तज़किरा जब वफ़ा का होता है, में तुम्हारी मिसाल देता हूँ.. 

Apr 4, 2026

अभी साज़-ए-दिल में तराने बहुत हैं

अभी साज़-ए-दिल में तराने बहुत हैं
अभी ज़िंदगी के बहाने बहुत हैं

ये दुनिया हक़ीक़त की क़ाइल नहीं है
फ़साने सुनाओ फ़साने बहुत हैं

तिरे दर के बाहर भी दुनिया पड़ी है
कहीं जा रहेंगे ठिकाने बहुत हैं

मिरा इक नशेमन जला भी तो क्या है
चमन में अभी आशियाने बहुत हैं

नए गीत पैदा हुए हैं उन्हीं से
जो पुर-सोज़ नग़्मे पुराने बहुत हैं

दर-ए-ग़ैर पर भीक माँगो न फ़न की
जब अपने ही घर में ख़ज़ाने बहुत हैं

हैं दिन बद-मज़ाक़ी के 'नौशाद' लेकिन
अभी तेरे फ़न के दिवाने बहुत हैं

Mar 31, 2026

हिंदी होने पर नाज़ जिसे कल तक था

हिंदी होने पर नाज़ जिसे कल तक था, हिज़ाज़ी बन बैठा,

अपनी महफ़िल का रिंद पुराना आज नमाज़ी बन बैठा।

महफ़िल में छुपा है कैसे—हज़्रत! दीवाना कोई सहरा में नहीं,

पैग़ाम-ए-जुनूँ जो लाता था, इक़बाल वो अब दुनिया में नहीं।

ऐ मुतरिब! तेरे तरानों में अगली-सी अब वो बात नहीं,

वो ताज़गी-ए-तख़य्युल नहीं, बेसाख़्तगी-ए-जज़्बात नहीं।

— आनंद नारायण ‘मुल्ला’ (शेर-ओ-शायरी से)

“अल्लामा इक़बाल जैसे परिपक्व और विशाल हृदय वाले व्यक्ति को अचानक  मजहब के दलदल में फँसते देखकर लोग दुख और चिंता से कराह उठे।”