Mar 16, 2026

IT WAS AFTERNOON¹


It was afternoon
the sky dressed as spring.
One moment more
and it would have conducted
the dance of death in the city.
It was afternoon.
In no hurry the children
went down the street.
Like gazelles
they came and went
in twos
in threes.
They part
they mix
happily.

It was afternoon.
Oppressive clouds of death
descend on the city
18 minutes
earthquake
fear, silence.
Bodies red with blood
reshape flowerbeds.

¹ This is from The Song of the Slaughtered City, which city is Halabja in Iraqi Kurdistan. On 16 and 17 March 1988 that city was bombed with chemical bombs by the Iraqi air force and later destroyed with dynamite.

Mar 14, 2026

MOUNTAINS


A prisoner condemned to life.
Chains round his ankles, handcuffs,
in a narrow jail cell.
He dreams like horsemen, the horses and the wind.
He dreams like babies, the stars and the grass.
I, too, like the prisoner,
dream every night of a strength
I bring to the mountains
and they to me.


(About F. N. Souza mentioned in photo)

Mar 11, 2026

शेर-ओ-शायरी - गीताप्रेस की किताब "एक लोटा पानी"


1. आईना! मुँह पर ही कहता है—साफ-साफ। सच यह है-जो साफ होता है, सफा कहता है।।

2.  सँभल कर बैठना, जलवा मुहब्बत देखने वाले। तमाशा खुद न बन जाना तमाशा देखने वाले॥

3. खुदाने हुस्न नादानोंको, बख्सा जर रजीलों को। अक्लमंदों को रोटी खुश्क, औ हलुवा वखीलों को ॥

4. एक बुतको चूमनेको शेखजी काबा गये। गरचे-हर बुत काबिले बोसा है इस बुतखानेमें॥

5. नजर से सर कलम कर दे, उसे शमशीर कहते हैं। निशाने में जो लग जाये, उसीको तीर कहते हैं॥

6.  न कह गया, न सुन गया और न नाम बता गया। मैं क्या कहूँ कि मेरे दिल, किसने चुरा लिया

7. है इबादत की इबादत है, मुहब्बत की मुहब्बत है। मेरे माशूक की सूरत खुदा से मिलती जुलती है॥

8. शेखजीसे मैंने पूछी, मंजिल जब यार की। बुतकदे की और चुपकेसे, इशारा कर दिया॥

9. बहुत मुश्किल निभाना है मुहब्बत अपने दिलवर से। उधर मूरत अमीराना इधर हालत फकीराना॥

10. चाँद बदली में छिपा है मुझे मालूम न था। सकल इनसान में खुदा है, मुझे मालूम न था॥

11. बुतपरस्ती मेरे हकमें हकपरस्ती हो गयी। दे दिया तेरा पता कुछ, यारकी तसबीरने॥

12. मुहब्बत करो और निभा लो तब पूछना, कि दुश्चारियाँ हैं कि आसानियाँ हैं?

13.  समझकर अपना दीवाना, वह मुझसे मुँह छिपाते हैं। हकीकत यों है, दरपरदा, मुहब्बत आजमाते हैं॥

14. शिकाइत किस जबाँसे मैं करूँ उनके न आनेकी। यही अहसान क्या कम है कि मेरे दिलमें रहते हैं॥

15. दुनियाँ इक इफसाना कहने को थे मगर सोचा। दुनियाँ है खुद इफसाना, इफसाने से क्या कहना?

16. रहमान के फिरश्ते' गो हैं बहुत मुकद्दस? शैतानही की जानिब, लेकिन मिजोरटी है॥

17..तमन्ना दर्ददिल में हो, तो कर खिदमत फकीरों की । नहीं वह “लाल” मिलता है अमीरों के खजानेमें॥

--- श्रीपारसनाथ सरस्वती 

(गीताप्रेस गोरखपुर द्वारा प्रकाशित "एक लोटा पानी" पुस्तक में एक नैतिक कहानी है, जिसका शीर्षक है "हिंदू राज्य कैसे गया?"। शेर-ओ-शायरी उसी कहानी से लिये गये हैं।)

Mar 7, 2026

Agirê Evîndarî (The Fire of Love)

Night has completely passed, yet you lie awake here,
I cannot sleep—when will I sleep without you?
The home has turned into a prison where I suffer,
Until dawn, darkness and sorrow surround me. 

Your presence—once a single heartbeat in mine—
Oh heart, does no one compare to that one?
Why constantly does my heart return to the yearning for them?
At times I felt their hands upon my head—
So many dreams and visions came with that closeness. 

And I stayed awake, oh heart—why did the night vanish?
Did I kill them, oh heart—why did the night vanish?
Get up quickly, oh heart, bring them back,
We embraced—oh heart, why did the night vanish?

--- Cigerxwîn

Mar 3, 2026

अल्लामा इक़बाल की शायरी: इस्लाम, जम्हूरियत और आत्मबल का दर्शन


अल्लामा मुहम्मद इक़बाल केवल शायर नहीं थे, वे एक विचारक, दार्शनिक और आत्मचेतना के कवि थे। उनकी शायरी व्यक्ति, समाज और सत्ता—तीनों से सवाल करती है। बाल-ए-जिब्रील में इक़बाल की आवाज़ सबसे अधिक बेबाक और वैचारिक रूप में सामने आती है।
 
शेर 1: (बाल-ए-जिब्रील से)

सोचा भी है ऐ मद-ए-मुसलमाँ कभी तूने,
क्या चीज़ है फ़ौलाद की शमशीर-ए-जिगरदार?
इस बैत का ये मिस्रअ-ए-अव्वल है कि जिसमें,
पोशीदा चले आते हैं तौहीद के असरार।

भावार्थ:  इक़बाल मुसलमान से पूछते हैं - क्या तुमने कभी सोचा है कि सच्चे ईमान और आत्मबल से बनी फ़ौलाद की तलवार वास्तव में क्या होती है?  इस शेर की पहली ही पंक्ति में एकेश्वरवाद (तौहीद) के गहरे रहस्य छिपे हुए हैं।

संदेश: असली शक्ति हथियार में नहीं, ईमान और आत्मचेतना में होती है।
 
शेर 2: (बाल-ए-जिब्रील से)

इस राज़ को इक मद-ए-फ़िरंगी ने किया फ़ाश,
हरचंद कि दाना इसे खोला नहीं करते।
जम्हूरियत इक तर्ज़-ए-हुकूमत है कि जिसमें,
बंदों को गिना करते हैं, तोला नहीं करते।

भावार्थ:  इक़बाल कहते हैं कि इस सच्चाई को एक पश्चिमी विचारक ने उजागर किया - हालाँकि बुद्धिमान लोग भी इसे खुलकर नहीं कहते। लोकतंत्र एक ऐसी शासन-प्रणाली है जिसमें इंसानों को गिना तो जाता है, पर परखा नहीं जाता।

संदेश: संख्या-बल से चलने वाली व्यवस्था हमेशा न्याय और गुण की गारंटी नहीं देती।
 
शेर 3:

वा न करना फ़रक़ाबदी के लिए अपनी ज़ुबां,
छिपके है बैठा आ हंगाम-ए-महशर यहाँ।
वफ़्ल के सामान पैदा है तेरी तहरीर से,
देखे कोई दिल न दुख जाए तेरी तक़रीर से।
महफ़ले-नव में पुरानी दास्तानों को न छेड़,
रंग पर जो अब न आएँ उन फ़सानों को न छेड़।
 
भावार्थ:  इक़बाल चेतावनी देते हैं - अपनी ज़ुबान का इस्तेमाल फ़िरक़ाबंदी के लिए मत करो। तेरी लिखावट और तक़रीर से फसाद के बीज पैदा हो सकते हैं। नई महफ़िलों में पुराने, बेमानी झगड़ों को मत उछालो।

संदेश: शब्दों की जिम्मेदारी भी उतनी ही बड़ी है जितनी कर्म की।

 शेर 4:

वो दीने-हिजाज़ी का बेबाक बेड़ा-निशाँ,
जिसका अक्सा-ए-आलम में पहुँचा।
न था जिसको ख़तरा न उम्म में, न क़ुलज़ुम में,
झिझका किये बे-सपर जिसने सातों समंदर—
वो डूबा दहाने में गंगा के आकर।


भावार्थ:  इक़बाल उस इस्लामी सभ्यता को याद करते हैं जिसका जहाज़ पूरी दुनिया में बेख़ौफ़ चला, जिसे न समंदरों से डर लगा, न तूफ़ानों से। लेकिन वही सभ्यता गंगा के किनारे आकर डूब गई - यानी अपने मूल उद्देश्य और आत्मा से दूर होकर।

संदेश: सभ्यताएँ बाहरी शक्ति से नहीं, आंतरिक पतन से गिरती हैं।