शेर 1: ईमान बेचने को तो तैयार हैं हम भी, लेकिन, खरीद हो जो अलीगढ़ के भाव से।
व्याख्या: इस शेर में इलाहाबादी कहते हैं कि लाखों लोगों ने बाहरी रूप (जैसे दाढ़ी बढ़ाना) अपनाया, लेकिन असली असर वही नहीं हुआ जो मालवी मदन या असली दृष्टिकोण वाला व्यक्ति दर्शाता। यह शेर दिखावे और वास्तविकता के बीच अंतर को उजागर करता है।
शेर 3: तालीम–ए दुस्तुराँ से ये उम्मीद है ज़रा, नाचे दुल्हन ख़ुशी से ख़ुद अपनी बरात में।
व्याख्या: यह शेर शिक्षा और सुधार की उम्मीदों पर व्यंग्य करता है। इलाहाबादी कहते हैं कि शिक्षा का लक्ष्य सिर्फ़ दिखावा न बन जाए, बल्कि उसका असर वास्तविक जीवन में महसूस होना चाहिए।
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अकबर इलाहाबादी की शायरी यह दिखाती है कि आलोचना हमेशा विरोध नहीं होती, बल्कि यह सुधार और सुधारकों के दृष्टिकोण को समझने और परखने का माध्यम भी हो सकती है। उनकी शेरों में व्यंग्य, सामाजिक टिप्पणियाँ और गहरी समझ का सुंदर मिश्रण मिलता है।