समंदर की हसीन लहरों के कामिल हुक्मराँ हैं हम समंदर की हसीन लहरों के कामिल हुक्मराँ हैं हम
वतन के ज़र्रे ज़र्रे से मोहब्बत हमको है ऐ दोस्त वतन के ज़र्रे ज़र्रे से मोहब्बत हमको है ऐ दोस्त
है मंज़िल जिनकी ठोकर में वो मीलें कारवाँ हैं हम है मंज़िल जिनकी ठोकर में वो मीलें कारवाँ हैं हम नज़र है जिनकी बाने अर्श पर वो पासबान हैं हम
समंदर की हसीन लहरों के कामिल हुक्मराँ हैं हम समंदर की हसीन लहरों के कामिल हुक्मराँ हैं हम
---बाय कर्नल सुल्तान सिंह मलिक
दूरदर्शन पर भारतीय नौसेना पर आधारित सीरियल बहुत दुर्लभ थे, और समंदर (१९९५–१९९६) उसके लिए सबसे प्रसिद्ध और अद्वितीय उदाहरण है। यह २५ एपिसोड वाला हिंदी सीरियल १९९५ से १९९६ तक दूरदर्शन (DD Metro) पर प्रसारित हुआ था, जो भारतीय नौसेना के अधिकारियों के जीवन, उनकी समर्पण भावना, युद्ध में संघर्ष और साथियों के साथ मिलजुलकर रहने की भावना को दर्शाता था। इसका निर्माण सेवानिवृत्त विंग कमांडर अनुप सिंह बेदी वीएसएम ने किया था, जिनकी मदद सेना के सेवानिवृत्त कर्नल (डॉ.) सुल्तान सिंह मलिक (जिन्हें संगीतकार/गायक के रूप में भी जाना जाता है) ने की थी। सीरियल में समीर सोनी, अमन वर्मा, वीनाता मलिक, और गिरिश मलिक जैसे प्रसिद्ध अभिनेताओं ने मुख्य भूमिकाएँ निभाई थीं, साथ ही असली भारतीय नौसेना के अधिकारियों ने भी विशेष अभिनय किया था। इसमें भारतीय नौसेना के बेड़े के वास्तविक मैन्युवर और तस्वीरें भी दिखाई गई थीं। सीरियल का गीत "समंदर की हसीन लेहरों के कामील हुकूमरान हैं हम" से शुरू होता था, जिसकी रचना और गायन कर्नल एसएस मलिक ने किया था, और यह गीत बहुत लोकप्रिय हुआ था। इस सीरियल ने १९९५-९६ में बहुत उच्च TRP प्राप्त किया और ९० के दशक के नॉस्टल्जिक सीरियल के रूप में आज भी प्रेम किया जाता है।
अर्थ: हे निषाद (वनवासी या शिकारी), तुम्हें कभी भी प्रतिष्ठा या सम्मान प्राप्त नहीं होगा, क्योंकि तुमने प्रेम-मोह में क्रौंच पक्षी के जोड़े में से एक को मार डाला है।
यह संस्कृत श्लोक वाल्मीकि रामायण के प्रथम सर्ग (बालकाण्ड, श्लोक 15) का है | यह श्लोक महर्षि वाल्मीकि के मुख से एक प्रकार का श्राप स्वरूप निकला था, जब उन्होंने प्रेमी पक्षियों के बीच खिलवाड़ किया गया देखा था। इस श्लोक को रामायण के प्रथम श्लोक के रूप में मान्यता मिली है।
आज शब जो चांद ने है रूठने की थान ली गर्दिशो में है सितारे बात हमने मान ली अंधेरी शाम जिंदगी को समझ थी नहीं कहीं कि एक आज हाथ थमलो की एक हाथ की कमी खाली क्यों खोए खोए चांद की फिराक में तलाश में उदास है दिल क्यों अपने आप से खफा खफा जरा ज़रा सा नाराज़ है दिल
ये मंज़िलें भी खुद ही तय करें, ये फ़सलें भी खुद ही तय करें, क्यूं तो रस्तों पे फिर सहम सहम संभल संभल ले चलता है ये दिल क्यों खोये चाँद की फिराक में तलाश में उदास है दिल
जिंदगी सवालो के जवाब ढूंढने चली जवाब में सवालों की एक लंबी सी लड़ी मिली सवाल ही सवाल है सूझती नहीं गली कि आज हाथ थाम लो एक हाथ की कमी खाली
जी में आता है मुर्दा सितारा नोच लो इधर भी नोच लो उधर भी नोचलो
एक दो का जिक्र क्या में सारे नोच लो
2 [इधर भी नोच लो उधर भी नोच लो सितारे नोच लो में सारे नोच लो]2
क्यों तू आज इतना वैसा है मिजाज में मजा है ऐ गम-ए-दिल क्यों अपने आप से खफा खफा जरा जरा सा नाराज है दिल
ये मंजिलें भी खुद ही ताई करें, ये फ़सलें भी खुद ही ताई करें, क्यूं तो रस्तों पे फिर सहम सहम संभल ले चलता है ये दिल
दिल को समझना है तो क्या आसान है दिल तो फितरत से सुन लो ना बेईमान है ये खुश नहीं है जो मिला बस मांगता ही है चला
जानता है हर लगी का दर्द ही है बस एक सिला
[जब कभी ये दिल लगा दर्द ही हमें मिला दिल की हर लगी का सुनलो दर्द ही एक सिला]2
क्यों नए नए से दर्द की फिराक में तलाश उदास है दिल क्यों अपने ऐप से खफा खफा जरा जरा सा नाराज है दिल
ये मंजिल भी खुद ही ताई करें ये फासले भी खुद ही ताई करें क्यों तो रस्तों पे फिर सहम सहम संभल ले चलता है ये दिल
क्यों खोए खोए चांद की फिराक में तलाश में उदास है दिल क्यों अपने आप से खफा खफा जरा जरा सा नाराज है दिल
ये मंजिलें भी खुद ही ताई करें, ये फासले भी खुद ही तय करें, ये फासले भी खुद ही तय करें क्यों तो रस्तों पे फिर सहम सहम संभल ले चलता है ये दिल