Death is the sea, the mountain, the breeze, it blooms in fragments of love and is crowned in every wedding the seasons tend.
Where can death go to escape the face of man? Man is the sea, the mountain, the breeze, he blooms in fragments of love and is crowned in every wedding the seasons tend.
In nature's prison cell they find themselves neighbors, are forced to become fast friends: death, and man.
So, there’s no way to be sure. Not about much of anything. No more about anyone else than ourselves. Perhaps not even of death, except that it’s bound to happen. To you, yes; to me, us: the lot of humankind, given how humankind sees it from this near side. So what.
So nothing that we here and now can perfectly know. Save, though the lens our eyes raise, the old here and now. The this, the already-going that moves us. The red-shift we’re constantly part of. And why not? Between what we were, and are going to be, is who and how we best love.
> *Wo coffee ke khaali mug, wo cinema ka pehla ticket aur aakhri do seatein,*
> *Sabko yaad rakhna... kabhi unse nafrat na karna.*
> *Suno, mujhse... aur bas mujhse nafrat karna,*
> *Kyunki sirf main aur faqat main hi tumhari us nafrat ke qabil hoon.*
---
### **Iconic Dialogue:**
> **Devanagari (हिंदी):**
> "शक्ल-ओ-सूरज इंसान का पहला तआरुफ़ है। इंसान का दूसरा और असल तआरुफ़ उसके अल्फ़ाज़ हैं। अपना दूसरा तआरुफ़ इतना मुकम्मल कर लो कि लोग तुम्हारा पहला तआरुफ़ भूल जाएँ।"
> **Roman Urdu:**
> *"Shakl-o-soorat insaan ka pehla taaruf hai. Insaan ka doosra aur asal taaruf uske alfaaz hain. Apna doosra taaruf itna mukammal karlo ke log tumhara pehla taaruf bhool jaayen."*
मैं आज शाम को बिलकुल फ़्री हूं, आओगी मिलने? मैंने चाची से मिन्नतें की वो जानती थीं, तुम मेरे होने वाले शौहर हो तो मान गयीं मैंने पर्स उठाया, ठीक-ठाक कपड़े पहने, ऑटो बुक किया और पार्क के गेट पर पहुंच गयी तुम गेट पर ही खड़े थे...
तुम्हारे बगल में एक मूंगफली बेचने वाला दस-बारह साल का लड़का खड़ा था जो तुमसे बार-बार मूंगफली ख़रीदने का निवेदन कर रहा था मेरे कहने पर तुमने 10 ₹ की मूंगफली तुलवा ली
हम पार्क मैं बैठे रहे बैठे-बैठे मूंगफली छीलते रहे
मैं मुस्कराती रही, तुम हंसते रहे मैं क़िस्से सुनाती रही, तुम क़िस्से सुनते रहे फिर अचानक से तुमने मुझे चूम लिया
मैं अंगुली से मिट्टी खोदने लगी... फिर न जाने किस उम्मीद में, मैं उठकर ओट में आ गयी फिर हम दोनों एक-दूसरे को आलिंगन में भरकर चूमने लगे
तभी एक लड़का आया उसके चेहरे पर घृणा का भाव था — 'ये सब यहां नहीं चलेगा'
तुम सकपका गये मैं डर गयी... तुमने लड़के से कहा — 'सॉरी'
पांच मिनट पहले मुझे पता चला था — 'चुंबन किसे कहते हैं' पांच मिनट बाद मुझे पता चला — 'चुंबन लेना ज़ुर्म है'
मैं मुंडी नीचे झुकाये पार्क से बाहर आ गयी... मेरे बदन पर कपड़े थे पर यूं लगा जैसे मैं बिलकुल नंगी हूं
मेरे कानों में तुम्हारी कोई आवाज़ नहीं आयी... महीनों तक कैसेट की तरह कानों में बस यही बजता रहा — ये सब यहां नहीं चलेगा...
तुम फ़ोन पर फ़ोन करते रहे मैं फ़ोन काटती रही...
तुमने मैसेज किया — 'सॉरी ! हम जल्दी शादी कर लेंगे' फिर हमारी शादी हो गयी
हमारे हिस्से में एक बिस्तर और एक छोटा-सा कमरा आ गया काम से थके-ऊबे हम कमरे में आते तो मैं रोशनी बुझा देती आहिस्ता-आहिस्ता तुम्हारे होंठ मेरे होंठो की तरफ़ बढ़ते तभी वह लड़का मेरे कानों में जोर से चीख़ता, “ये सब यहां नहीं चलेगा!”
उस अनजान लड़के ने सिर्फ़ एक वाक्य बोलकर उस एहसास को कुचल दिया जिससे मैं ज़िन्दगीभर चुम्बन लेती और देती...
translated by Alana Marie Levinson-LaBrosse & Halo Fariq
Translator’s note: On March 16, 1988, as part of Anfal, Saddam Hussein’s military campaign against the Kurds of Iraq, Halabja withstood a chemical-weapons attack. The largest directed against a civilian population in history, it has been recognized as an act of genocide by the Iraqi High Criminal Court
I don’t believe we can stitch together only scraps of beauty, squares of light. I don’t believe in a quilt that doesn’t also have patches of sorrow, blocks of ache. Such pieces are, of course, much harder to want to stitch in. But it matters that we do not exclude them. It matters right now that we don’t pretend they do not exist. It matters that we sew every piece into the grand cloth. It matters, too, how we sew these pieces in, perhaps using our finest silk thread, perhaps with an elaborate stitch our grandmother taught us, or perhaps we must use a stitch we make up because no one ever taught us how to do this most difficult task— to meet what at first seems unwanted, wrong, and to incorporate it into the whole and to do this for as long as we can stitch, that’s how long.
Writing to you from here, my friend, what else can I tell you about other than pain, sadness? I would have to paint for you a picture of us here in this city, have to show you the face of who is a stranger, driven out from his very own land, I would have to draw a country of frontiers – spikes and guns between mouth and mouth between hand and hand – borders.
Slowly the hours meander in the darkness of streets, lanes, markets dragging sorrow, sadness; hours hung on the trees and the walls, people wounded by the stabs of bad luck. Here, time is a machine and the police control it.
It’s also fine to die in our beds on a clean pillow and among our friends. It’s fine to die, once, our hands crossed on our chests, empty and pale, with no scratches, no chains, no banners, and no petitions. It’s fine to have a clean death, with no holes in our shirts, and no evidence in our ribs. It’s fine to die with a white pillow, not the pavement, under our cheek, with our hands resting in those of our loved ones, surrounded by desperate doctors and nurses, with nothing left but a graceful farewell, paying no attention to history, leaving this world as it is, hoping that, someday, someone else will change it.
What passing-bells for these who die as cattle? — Only the monstrous anger of the guns. Only the stuttering rifles' rapid rattle Can patter out their hasty orisons.
No mockeries now for them; no prayers nor bells; Nor any voice of mourning save the choirs,— The shrill, demented choirs of wailing shells; And bugles calling for them from sad shires.
What candles may be held to speed them all? Not in the hands of boys, but in their eyes Shall shine the holy glimmers of goodbyes. The pallor of girls' brows shall be their pall; Their flowers the tenderness of patient minds, And each slow dusk a drawing-down of blinds.
हिंदी अर्थ: श्लोक में चातक पक्षी से संबोधित करते हुए कहा गया है कि वह सावधान रहे क्योंकि आसमान में कई प्रकार के बादल होते हैं। कुछ बादल जीवनदायक वर्षा करते हैं, पर कुछ केवल गर्जते हैं और कुछ भी नहीं देते। इसलिए जो भी तुम्हें मदद या सहारा देगा, उसकी खोज समझदारी से करो और किसी के सामने कमजोर वाणी से याचना न करो।
हिंदी अर्थ: जो मनुष्य साहित्य, संगीत और कला से वंचित होता है, वह बिना पूंछ और बिना सींगों वाला साक्षात् पशु के समान होता है। वह घास नहीं खाता हुआ भी जीवित रहता है, यानि यह पशुओं के लिए बड़ी सौभाग्य की बात है। यह श्लोक भर्तृहरि के नीतिशतकम् से लिया गया है।
3. अश्वं नैव गजं नैव व्याघ्रं नैव च नैव च ।
अजापुत्रं बलिं दद्यात् देवो दुर्बलघातकः
हिंदी अर्थ: अश्वं (घोड़ा) नहीं, गजं (हाथी) नहीं, व्याघ्रं (बाघ) नहीं, न ही कोई और बड़ा जानवर, बलिदान (बलि) देवता केवल अजापुत्र (बकरी के बच्चे) को देते हैं। अर्थात् देव भी दुर्बलों को हानि पहुँचाते हैं। समाज में या सत्ता व्यवस्था में अकसर ताकतवरों को शक्तिशाली माना जाता है और वे सुरक्षित रहते हैं, जबकि कमजोरों को ही नुकसान और कठिनाइयों का सामना करना पड़ता है।
हिंदी अर्थ: काक चेष्टा - कौवे की तरह प्रयासशील और धैर्यवान होना। बको ध्यानं - बगुले की तरह एकाग्र और ध्यान केंद्रित रखें। श्वान निद्रा - कुत्ते जैसी नींद लेना अर्थात सतर्क और कम नींद लेना। अल्पहारी - कम मात्रा में भोजन करना ताकि शरीर हल्का और सक्रिय रहे। गृहत्यागी - घर की सुविधाओं और आराम की मोह छोड़कर, पढ़ाई पर ध्यान लगाना।
यह पांच गुण एक आदर्श विद्यार्थी के लिए महत्वपूर्ण माने जाते हैं। इनमें मेहनत, एकाग्रता, सतर्कता, संयम, और त्याग शामिल हैं।
हिंदी अर्थ: राह धीरे धीरे कटती है, कपड़ा धीरे धीरे बुनता है, पर्वत धीरे धीरे चढा जाता है, विद्या और धन भी धीरे-धीरे प्राप्त होते हैं, ये पाँचों धीरे धीरे ही होते हैं।
6. न ही लक्ष्मी कुलक्रमज्जता, न ही भूषणों उल्लेखितोपि वा।
खड्गेन आक्रम्य भुंजीतः, वीर भोग्या वसुंधरा ।।
हिंदी अर्थ:न तो लक्ष्मी (धन-समृद्धि) जन्म से कुलीन होती है, न ही आभूषणों (भूषणों) का कोई उल्लेख ही है। खड़ग (तलवार) से आक्रमण करके ही भोगी जाती है—वीरों द्वारा ही धरती (वसुंधरा) भोग्य है।
Trying to warn about Hitler’s plans for the Jews, Raphael Lemkin, linguist and jurist, invented the word genocide in 1943 describing the annihilation of the Armenians in 1915,“a systematic destruction of a population segment, or race, by a ruling government.”
Wholesale massacres by Turks
were taught them by their
ancestors, Genghis Khan
and Tamerlane.
In 1895 the word
Holocaust was used by missionary
Corwin Shattuck to label the 1895
burning of Armenians in the Urfa cathedral.
These fires leveling
churches with Armenians locked
inside, spread to schools and barns.
Then to neighbors.
Assyrians named it Seifo.
The Greeks, the burning of Smyrna.
The Arabs, Nakba for catastrophe, calamity, disaster.
समंदर की हसीन लहरों के कामिल हुक्मराँ हैं हम समंदर की हसीन लहरों के कामिल हुक्मराँ हैं हम
वतन के ज़र्रे ज़र्रे से मोहब्बत हमको है ऐ दोस्त वतन के ज़र्रे ज़र्रे से मोहब्बत हमको है ऐ दोस्त
है मंज़िल जिनकी ठोकर में वो मीलें कारवाँ हैं हम है मंज़िल जिनकी ठोकर में वो मीलें कारवाँ हैं हम नज़र है जिनकी बाने अर्श पर वो पासबान हैं हम
समंदर की हसीन लहरों के कामिल हुक्मराँ हैं हम समंदर की हसीन लहरों के कामिल हुक्मराँ हैं हम
---बाय कर्नल सुल्तान सिंह मलिक
दूरदर्शन पर भारतीय नौसेना पर आधारित सीरियल बहुत दुर्लभ थे, और समंदर (१९९५–१९९६) उसके लिए सबसे प्रसिद्ध और अद्वितीय उदाहरण है। यह २५ एपिसोड वाला हिंदी सीरियल १९९५ से १९९६ तक दूरदर्शन (DD Metro) पर प्रसारित हुआ था, जो भारतीय नौसेना के अधिकारियों के जीवन, उनकी समर्पण भावना, युद्ध में संघर्ष और साथियों के साथ मिलजुलकर रहने की भावना को दर्शाता था। इसका निर्माण सेवानिवृत्त विंग कमांडर अनुप सिंह बेदी वीएसएम ने किया था, जिनकी मदद सेना के सेवानिवृत्त कर्नल (डॉ.) सुल्तान सिंह मलिक (जिन्हें संगीतकार/गायक के रूप में भी जाना जाता है) ने की थी। सीरियल में समीर सोनी, अमन वर्मा, वीनाता मलिक, और गिरिश मलिक जैसे प्रसिद्ध अभिनेताओं ने मुख्य भूमिकाएँ निभाई थीं, साथ ही असली भारतीय नौसेना के अधिकारियों ने भी विशेष अभिनय किया था। इसमें भारतीय नौसेना के बेड़े के वास्तविक मैन्युवर और तस्वीरें भी दिखाई गई थीं। सीरियल का गीत "समंदर की हसीन लेहरों के कामील हुकूमरान हैं हम" से शुरू होता था, जिसकी रचना और गायन कर्नल एसएस मलिक ने किया था, और यह गीत बहुत लोकप्रिय हुआ था। इस सीरियल ने १९९५-९६ में बहुत उच्च TRP प्राप्त किया और ९० के दशक के नॉस्टल्जिक सीरियल के रूप में आज भी प्रेम किया जाता है।
अर्थ: हे निषाद (वनवासी या शिकारी), तुम्हें कभी भी प्रतिष्ठा या सम्मान प्राप्त नहीं होगा, क्योंकि तुमने प्रेम-मोह में क्रौंच पक्षी के जोड़े में से एक को मार डाला है।
यह संस्कृत श्लोक वाल्मीकि रामायण के प्रथम सर्ग (बालकाण्ड, श्लोक 15) का है | यह श्लोक महर्षि वाल्मीकि के मुख से एक प्रकार का श्राप स्वरूप निकला था, जब उन्होंने प्रेमी पक्षियों के बीच खिलवाड़ किया गया देखा था। इस श्लोक को रामायण के प्रथम श्लोक के रूप में मान्यता मिली है।
आज शब जो चांद ने है रूठने की थान ली गर्दिशो में है सितारे बात हमने मान ली अंधेरी शाम जिंदगी को समझ थी नहीं कहीं कि एक आज हाथ थमलो की एक हाथ की कमी खाली क्यों खोए खोए चांद की फिराक में तलाश में उदास है दिल क्यों अपने आप से खफा खफा जरा ज़रा सा नाराज़ है दिल
ये मंज़िलें भी खुद ही तय करें, ये फ़सलें भी खुद ही तय करें, क्यूं तो रस्तों पे फिर सहम सहम संभल संभल ले चलता है ये दिल क्यों खोये चाँद की फिराक में तलाश में उदास है दिल
जिंदगी सवालो के जवाब ढूंढने चली जवाब में सवालों की एक लंबी सी लड़ी मिली सवाल ही सवाल है सूझती नहीं गली कि आज हाथ थाम लो एक हाथ की कमी खाली
जी में आता है मुर्दा सितारा नोच लो इधर भी नोच लो उधर भी नोचलो
एक दो का जिक्र क्या में सारे नोच लो
2 [इधर भी नोच लो उधर भी नोच लो सितारे नोच लो में सारे नोच लो]2
क्यों तू आज इतना वैसा है मिजाज में मजा है ऐ गम-ए-दिल क्यों अपने आप से खफा खफा जरा जरा सा नाराज है दिल
ये मंजिलें भी खुद ही ताई करें, ये फ़सलें भी खुद ही ताई करें, क्यूं तो रस्तों पे फिर सहम सहम संभल ले चलता है ये दिल
दिल को समझना है तो क्या आसान है दिल तो फितरत से सुन लो ना बेईमान है ये खुश नहीं है जो मिला बस मांगता ही है चला
जानता है हर लगी का दर्द ही है बस एक सिला
[जब कभी ये दिल लगा दर्द ही हमें मिला दिल की हर लगी का सुनलो दर्द ही एक सिला]2
क्यों नए नए से दर्द की फिराक में तलाश उदास है दिल क्यों अपने ऐप से खफा खफा जरा जरा सा नाराज है दिल
ये मंजिल भी खुद ही ताई करें ये फासले भी खुद ही ताई करें क्यों तो रस्तों पे फिर सहम सहम संभल ले चलता है ये दिल
क्यों खोए खोए चांद की फिराक में तलाश में उदास है दिल क्यों अपने आप से खफा खफा जरा जरा सा नाराज है दिल
ये मंजिलें भी खुद ही ताई करें, ये फासले भी खुद ही तय करें, ये फासले भी खुद ही तय करें क्यों तो रस्तों पे फिर सहम सहम संभल ले चलता है ये दिल
भारत का इतिहास केवल युद्धों का वर्णन नहीं, बल्कि वीरता, शौर्य और आत्मसम्मान का अनंत स्रोत है। राजपूताना, मराठा और बुंदेलखंड की धरती पर पले‑बढ़े अनगिनत योद्धाओं ने अपनी तलवार और अपने वचन से ऐसी गाथाएँ रचीं, जो सदियों बाद भी आज उतनी ही प्रेरक हैं। इस ब्लॉग में आप लोक‑प्रचलित दोहे/उक्तियाँ उनके भावार्थ के साथ पढ़ेंगे - जो भारतीय वीरता की ज्वाला को फिर से जगाते हैं।
1. घास की रोटी खाय ली, पर माथो न झुकाय; मेवाड़ रै राणा प्रताप, अकबर सूं न डराय।
भावार्थ: महाराणा प्रताप ने कठिन जीवन स्वीकार कर लिया, लेकिन पराधीनता नहीं—वे भूखे रह सकते थे, पर शत्रु के सामने आत्मसमर्पण नहीं।
2. हठ तो राव हमीर को, ओर रावन की टेक; सत राजा हरिचंद को, अरजन वान अनेक।
भावार्थ: कुछ लोगों का साहस और हठ ऐसा होता है कि वे मृत्यु को भी चुनौती दे देते हैं। जैसे हमीर का अटल संकल्प और रावण की जिद—एक बार ठान लेने पर वे पीछे नहीं हटते।
3. सिंह सुवन, सत्पुरुष वचन, कदली फलै इक बार; तिरिया तेल, हमीर हठ, चढ़ै न दूजी बार।
भावार्थ: कुछ अवसर और मूल्य ऐसी दुर्लभ चीजें हैं जो केवल एक बार घटित होती हैं—सज्जन का दिया वचन, सिंह का जन्म, केला का फल, राणा हमीर का अडिग संकल्प,—इन्हें दूसरी बार पाने की अपेक्षा व्यर्थ है; इसलिए समय रहते पहचानना आवश्यक है।
भावार्थ: सच्चा सामर्थ्य बाहरी प्रतीकों से नहीं आता। शेर बिना चंवर‑छत्र के भी राजा है—उसकी शक्ति ही उसका राजचिह्न है।
5. स्थापूनी हिंदी स्वराज्य आपुले, शौर्याने लिहिली इतिहास‑गाथा;
असा हा जाणता राजा माझा, तयाच्या चरणी झुकवितो माथा.
भावार्थ: शिवाजी महाराज ने अपने साहस और नेतृत्व से हिंदवी स्वराज्य की स्थापना की और इतिहास में अमर गाथा लिखी। अनुभव, न्याय और बुद्धि से राज्य चलाने वाले इस महान “जाणत्या राजा” को माथा झुकाकर प्रणाम करने का मन करता है।
6. सह्याद्रीची साथ होती, घोड्यांच्या टापांचा नाद; कडेकपारी फिरत होता, मर्द मराठ्यांचा वाघ.
भावार्थ: सह्याद्री के पर्वत शिवराय के साथ थे और उनके मावळों के घोड़ों की टापें रणभूमि में गूँजती थीं। सह्याद्री के कड़े‑कड़े पहाड़ों पर घूमने वाला यह मराठों का शेर—शिवाजी—हर घाटी में गर्जना करता था।
7. छत्ता तेरे राज में, धक‑धक धरती होय; जित‑जित घोड़ा मुख करे, उत‑उत फतह होय।
भावार्थ: छत्रसाल के काल में उनका पराक्रम इतना व्यापक था कि सेना जहाँ भी कदम बढ़ाती, विजय वहीं चलकर आ जाती—यह उनकी वीरता और न्यायप्रिय शासन की छवि है।
8. इत यमुना उत नर्मदा, इत चंबल उत टोंस; छत्रसाल सो लरन की, रही न काहू हौंस।
भावार्थ: छत्रसाल का राज्य इतना विस्तृत और बलशाली था कि उस पूरे क्षेत्र में किसी में इतना साहस नहीं कि उनसे युद्ध करने का विचार भी करे।
9. जो गति गजराज की, सो गति भई है आज। बाजी जात बुंदेल की, राखो बाजी लाज॥
भावार्थ: छत्रसाल अपनी स्थिति की तुलना गजेंद्र‑मोक्ष कथा के गजराज से करते हैं। जैसे गजराज ने संकट में भगवान को पुकारा, वैसी ही पुकार छत्रसाल बाजीराव से कर रहे थे।
10. चार बांस, चौबीस गज, अंगुल अष्ट प्रमान; ता ऊपर सुल्तान है, मत चूको चौहान।
भावार्थ: चार बांस, चौबीस गज दूरी और आठ अंगुल ऊँचाई के बराबर आगे–ऊपर ही सुल्तान (मोहम्मद गोरी) बैठा है। पृथ्वीराज चौहान, अब निशाना मत चूकना — यही सही क्षण है।
11. सिरसा सरोवर डोल्या, रण में उठी पुकार; डरे धरम के द्रोही सब, आल्हा‑ऊदल जूझे जब बार‑बार।
भावार्थ: जब आल्हा और ऊदल युद्धभूमि में उतरते थे, तो सिरसा झील तक कांप उठती थी। धर्मद्रोही भय से काँप जाते थे, क्योंकि आल्हा‑ऊदल का साहस, शक्ति और प्रतिशोध अजेय था।
इन दोहों और वीर‑उक्तियों में स्वाभिमान, स्वतंत्रता, त्याग और अडिग संकल्प की वह आग जलती है जिसने भारत की मिट्टी को गौरव सौंपा।
Do you know what I was, how I lived? You know what despair is; then winter should have meaning for you.
I did not expect to survive, earth suppressing me. I didn't expect to waken again, to feel in damp earth my body able to respond again, remembering after so long how to open again in the cold light of earliest spring--
afraid, yes, but among you again crying yes risk joy in the raw wind of the new world.
फिर कोई मास्टर प्लान बनाया जाएगा, देश को बाईसवीं सदी में पहुंचाया जाएगा. अपना देश महान है, आप गर्व करेंगे सुन कर, अभी आंकड़ों का गणित, समझाया जाएगा.
दुखदर्द, गरीबी सब हवा हो जाएंगी, आप को आश्वासनों का जाम पिलाया जाएगा. सुखे, बाढ़ की समस्या से चितित हैं हम, अभी हवाई सर्वेक्षण करवाया जाएगा.
कुंआ खोदने की आप नाहक जिद न करें, आग लगने तो दीजिए, फिर देखा जाएगा. देशद्रोहियों को राह पर लाने की कोशिश करेंगे, उन्हें देशभक्ति का रिकार्ड सुनवाया जाएगा.
कोई और परेशानी है तो पी. ए. को लिखवा दें, आप के क्षेत्र में दोबारा पांच वर्ष बाद आया जाएगा.
*Fakhr ad-Din al-Razi was a famous Persian theologian and philosopher in the
twelfth century.
Context: In a qaside “Kurdêkî Koyî” he tells the details of his encounter with a person from Koye, his hometown, who complains that Şêx Kake Ehmed translates the Quran and the prophet’s sayings (hadith) into Kurdish. Upon hearing his complaint Hacî Qadir becomes furious and comments.
Ice people They're just made of ice They don't treat Their fellow man very nice You wear your hair long As Jesus did They'll crucify you You're not part of the establishment You stand up for your rights They'll call you a fool If you don't go to war You're not living by the golden rule Ice people They're just made of ice They don't treat Their fellow man very nice The red man lives and dies on the reservation And the black man just lives anywhere he can And the poor white man he doesn't live any better He can't say I'm red, I'm black, I'm yellow, I'm tanned We're all caught up together Like the buffalo on the plains We're just shooting sport for ice people We're just a game Ice people They're just made of ice They don't treat Their fellow man very nice Ice people They're just made of ice No, they don't treat Their fellow man very nice Ice people They're just made of ice They don't treat Their fellow man very nice
अर्थ: विद्या (ज्ञान) दुष्ट लोगों के लिए विवाद के लिए होती है, धन (धन संपत्ति) घमंड के लिए होता है, और शक्ति दूसरों को पीड़ित करने के लिए होती है। परंतु सज्जन लोगों के लिए विद्या ज्ञान प्राप्ति के लिए, धन दान करने के लिए, और शक्ति दूसरों की रक्षा करने के लिए होती है।
3. न तेन वृद्धो भवति येनास्य पलितं शिरः |
यो वै युवापि अधीयानस्तं देवाः स्थविरं विदुः ||
अर्थ: यह है कि केवल उम्र बढ़ने से या बाल सफेद होने से कोई व्यक्ति बड़ा या बुद्धिमान नहीं माना जाता। असली बढ़ेपन का पैमाना ज्ञान और बुद्धिमत्ता है। जो युवा होते हुए भी सीखते हैं, ज्ञान अर्जित करते हैं, वही सच्चे वृद्ध और सम्मानित माने जाते हैं।
4. काक: कृष्ण: पिक: अपि कृष्ण: को भेद: काकपिकयो: | वसंत काले सम्प्राप्ते काक: काक: पिक: पिक: ||
अर्थ: कौआ और कोयल दोनों काले रंग के होते हैं और देखने में समान लगते हैं, लेकिन जब वसंत ऋतु आ जाती है तो उनकी असली पहचान उनके स्वर से हो जाती है। कौआ अपनी कर्कश आवाज करता है जबकि कोयल मधुर गीत गाती है।
5. शैले शैले न माणिक्यम् मौक्तिकम् न गजे गजे।
साधवो न हि सर्वत्र चन्दनम् न वने वने।।
अर्थ: हर पर्वत पर हीरा (माणिक्य) नहीं मिलता, हर हाथी के मस्तक में मोती (मौक्तिक) नहीं होता। सभी जगह सज्जन लोग (साधु) नहीं मिलते और हर वन में चंदन वृक्ष भी नहीं होते। ये चीजें दुर्लभ और मूल्यवान होती हैं।
6. मूर्खो अपि शोभते तावत् सभायां वस्त्रवेष्टित: ।
तावत् शोभते मूर्खो यावत् किंचित् न भाषते ॥
अर्थ: मूर्ख व्यक्ति भी अच्छे वस्त्र पहनकर सभा में तब तक शोभित होता है (अच्छा लगता है), जब तक वह कुछ नहीं बोलता। मूर्ख उसी समय तक शोभा पाता है, जब तक वह चुप रहता है.
अर्थ: जिस सुख का प्रारंभ विष (जहर) जैसा कष्टदायक होता है, पर परिणाम अमृत के समान सुखद होता है, वही सात्त्विक सुख कहलाता है। यह सुख आत्मबुद्धि के प्रसाद से उत्पन्न होता है। जो सुख विषय (इंद्रिय) के संयोजन से उत्पन्न होता है, उसका प्रारंभ तो अमृत के समान सुखद होता है, लेकिन परिणाम विष (जहर) के समान कष्टदायक होता है, उसे राजसिक सुख कहा गया है।
1857 का भारतीय विद्रोह, जिसे आज़ादी की पहली क्रांति भी कहा जाता है, सिर्फ़ युद्ध की लड़ाई तक सीमित नहीं था। इस विद्रोह के दौरान आखिरी मुग़ल सम्राट बहादुर शाह ज़फ़र की शख्सियत और उनकी शायरी ने भी इतिहास में अपनी अलग छाप छोड़ी।
कहा जाता है कि विद्रोह के बाद, जब अंग्रेज़ अधिकारी ज़फ़र को पकड़ने आए, उन्होंने उन्हें तंज़ के साथ कहा:
“दमदमे में दम नहीं है ख़ैर मांगो जान की.. ऐ ज़फ़र ठंडी हुई अब तेग हिंदुस्तान की।” (अब तुम्हारे पास कोई ताक़त नहीं, ज़फ़र। हिंदुस्तान की तलवार भी अब नुकीली नहीं रही।)
लेकिन बहादुर शाह ज़फ़र की शायरी में छिपी जज़्बात और आत्मसम्मान ने जवाब में इतिहास रच दिया। उन्होंने शेर कहा:
“ग़ाज़ियों में बू रहेगी जब तलक ईमान की, तख़्त ऐ लंदन तक चलेगी तेग हिंदुस्तान की।” (भारत की तलवार और उसका साहस कभी कम नहीं होगा, और ईमान की शक्ति के साथ यह London तक अपनी गूँज पहुंचाएगी।)
इस जवाब से साफ़ झलकता है कि ज़फ़र का मनोबल और उनका देशभक्ति का जज़्बा अंग्रेज़ों की धमकियों से कम नहीं हुआ। यह सिर्फ़ एक शेर नहीं, बल्कि उस युग की एक प्रेरणादायक कहानी है, जो यह बताती है कि कठिन परिस्थितियों में भी आत्मसम्मान और विश्वास कभी नहीं मरते।
भावार्थ: भगवान की कृपा बिना संत नहीं मिलते, और संतों की कृपा बिना भगवान नहीं।
10. जाको प्रिय न राम वैदेही, त्यागहु ताहि कोटि बैरी सम।
भावार्थ: जिसे राम और सीता प्रिय नहीं, उसे शत्रु के समान समझकर त्याग देना चाहिए।
11. जहां सुमति तहं संपति नाना, जहां कुमति तहं विपति निदाना।
भावार्थ: जिस घर में आपसी प्रेम और सद्भाव होता है वहां सारे सुखी होते हैं और जहाँ आपस में द्वेष और वैमनष्य होता है उस घर के वासी दुखी जाते हैं.
12. आवत ही हरसै नही, नैनन नही सनेह
तुलसी तहां न जाईये कंचन बरसे मेह ।
भावार्थ : जिस स्थान पर लोग आपके आने से खुश न हों और उनकी नजरों में आपके प्रति स्नेह न हो, वहाँ कभी न जाएँ ।
13. रघुकुल रीति सदा चलि आई। प्राण जाहि बरु बचनु न जाई॥
भावार्थ: रघुकुल की परंपरा यही रही है कि प्राण त्याग दिए जाएँ, लेकिन दिया गया वचन कभी नहीं तोड़ा जाए
14. इहाँ कुम्हड़बतिया कोउ नाहिं। जे तरजनी देखि मरि जाहिं॥
भावार्थ: रामचरितमानस (अयोध्या कांड) में लक्ष्मण परशुराम के फरसे को देखकर कहते हैं कि मैं कोई कुम्हड़े का कोमल फल नहीं जो उंगली दिखाने से मर जाऊँ। यहां कोई कमजोर, नाजुक चीज नहीं है जो उंगली के इशारे से ही नष्ट हो जाए।
It was afternoon the sky dressed as spring. One moment more and it would have conducted the dance of death in the city. It was afternoon. In no hurry the children went down the street. Like gazelles they came and went in twos in threes. They part they mix happily.
It was afternoon. Oppressive clouds of death descend on the city 18 minutes earthquake fear, silence. Bodies red with blood reshape flowerbeds.
A prisoner condemned to life. Chains round his ankles, handcuffs, in a narrow jail cell. He dreams like horsemen, the horses and the wind. He dreams like babies, the stars and the grass. I, too, like the prisoner, dream every night of a strength I bring to the mountains and they to me.
1. आईना! मुँह पर ही कहता है—साफ-साफ। सच यह है-जो साफ होता है, सफा कहता है।।
2. सँभल कर बैठना, जलवा मुहब्बत देखने वाले। तमाशा खुद न बन जाना तमाशा देखने वाले॥
3. खुदाने हुस्न नादानोंको, बख्सा जर रजीलों को। अक्लमंदों को रोटी खुश्क, औ हलुवा वखीलों को ॥
4. एक बुतको चूमनेको शेखजी काबा गये। गरचे-हर बुत काबिले बोसा है इस बुतखानेमें॥
5. नजर से सर कलम कर दे, उसे शमशीर कहते हैं। निशाने में जो लग जाये, उसीको तीर कहते हैं॥
6. न कह गया, न सुन गया और न नाम बता गया। मैं क्या कहूँ कि मेरे दिल, किसने चुरा लिया
7. है इबादत की इबादत है, मुहब्बत की मुहब्बत है। मेरे माशूक की सूरत खुदा से मिलती जुलती है॥
8. शेखजीसे मैंने पूछी, मंजिल जब यार की। बुतकदे की और चुपकेसे, इशारा कर दिया॥
9. बहुत मुश्किल निभाना है मुहब्बत अपने दिलवर से। उधर मूरत अमीराना इधर हालत फकीराना॥
10. चाँद बदली में छिपा है मुझे मालूम न था। सकल इनसान में खुदा है, मुझे मालूम न था॥
11. बुतपरस्ती मेरे हकमें हकपरस्ती हो गयी। दे दिया तेरा पता कुछ, यारकी तसबीरने॥
12. मुहब्बत करो और निभा लो तब पूछना, कि दुश्चारियाँ हैं कि आसानियाँ हैं?
13. समझकर अपना दीवाना, वह मुझसे मुँह छिपाते हैं। हकीकत यों है, दरपरदा, मुहब्बत आजमाते हैं॥
14. शिकाइत किस जबाँसे मैं करूँ उनके न आनेकी। यही अहसान क्या कम है कि मेरे दिलमें रहते हैं॥
15. दुनियाँ इक इफसाना कहने को थे मगर सोचा। दुनियाँ है खुद इफसाना, इफसाने से क्या कहना?
16. रहमान के फिरश्ते' गो हैं बहुत मुकद्दस? शैतानही की जानिब, लेकिन मिजोरटी है॥
17..तमन्ना दर्ददिल में हो, तो कर खिदमत फकीरों की । नहीं वह “लाल” मिलता है अमीरों के खजानेमें॥
--- श्रीपारसनाथ सरस्वती
(गीताप्रेस गोरखपुर द्वारा प्रकाशित "एक लोटा पानी" पुस्तक में एक नैतिक कहानी है, जिसका शीर्षक है "हिंदू राज्य कैसे गया?"। शेर-ओ-शायरी उसी कहानी से लिये गये हैं।)
Night has completely passed, yet you lie awake here, I cannot sleep—when will I sleep without you? The home has turned into a prison where I suffer, Until dawn, darkness and sorrow surround me.
Your presence—once a single heartbeat in mine— Oh heart, does no one compare to that one? Why constantly does my heart return to the yearning for them? At times I felt their hands upon my head— So many dreams and visions came with that closeness.
And I stayed awake, oh heart—why did the night vanish? Did I kill them, oh heart—why did the night vanish? Get up quickly, oh heart, bring them back, We embraced—oh heart, why did the night vanish?
अल्लामा मुहम्मद इक़बाल केवल शायर नहीं थे, वे एक विचारक, दार्शनिक और आत्मचेतना के कवि थे। उनकी शायरी व्यक्ति, समाज और सत्ता—तीनों से सवाल करती है। बाल-ए-जिब्रील में इक़बाल की आवाज़ सबसे अधिक बेबाक और वैचारिक रूप में सामने आती है।
शेर 1: (बाल-ए-जिब्रील से)
सोचा भी है ऐ मद-ए-मुसलमाँ कभी तूने,
क्या चीज़ है फ़ौलाद की शमशीर-ए-जिगरदार?
इस बैत का ये मिस्रअ-ए-अव्वल है कि जिसमें,
पोशीदा चले आते हैं तौहीद के असरार।
भावार्थ: इक़बाल मुसलमान से पूछते हैं - क्या तुमने कभी सोचा है कि सच्चे ईमान और आत्मबल से बनी फ़ौलाद की तलवार वास्तव में क्या होती है? इस शेर की पहली ही पंक्ति में एकेश्वरवाद (तौहीद) के गहरे रहस्य छिपे हुए हैं।
संदेश: असली शक्ति हथियार में नहीं, ईमान और आत्मचेतना में होती है।
शेर 2: (बाल-ए-जिब्रील से)
इस राज़ को इक मद-ए-फ़िरंगी ने किया फ़ाश,
हरचंद कि दाना इसे खोला नहीं करते।
जम्हूरियत इक तर्ज़-ए-हुकूमत है कि जिसमें,
बंदों को गिना करते हैं, तोला नहीं करते।
भावार्थ: इक़बाल कहते हैं कि इस सच्चाई को एक पश्चिमी विचारक ने उजागर किया - हालाँकि बुद्धिमान लोग भी इसे खुलकर नहीं कहते। लोकतंत्र एक ऐसी शासन-प्रणाली है जिसमें इंसानों को गिना तो जाता है, पर परखा नहीं जाता।
संदेश: संख्या-बल से चलने वाली व्यवस्था हमेशा न्याय और गुण की गारंटी नहीं देती।
शेर 3:
वा न करना फ़रक़ाबदी के लिए अपनी ज़ुबां,
छिपके है बैठा आ हंगाम-ए-महशर यहाँ।
वफ़्ल के सामान पैदा है तेरी तहरीर से,
देखे कोई दिल न दुख जाए तेरी तक़रीर से।
महफ़ले-नव में पुरानी दास्तानों को न छेड़,
रंग पर जो अब न आएँ उन फ़सानों को न छेड़।
भावार्थ:इक़बाल चेतावनी देते हैं - अपनी ज़ुबान का इस्तेमाल फ़िरक़ाबंदी के लिए मत करो। तेरी लिखावट और तक़रीर से फसाद के बीज पैदा हो सकते हैं। नई महफ़िलों में पुराने, बेमानी झगड़ों को मत उछालो।
संदेश: शब्दों की जिम्मेदारी भी उतनी ही बड़ी है जितनी कर्म की।
शेर 4:
वो दीने-हिजाज़ी का बेबाक बेड़ा-निशाँ,
जिसका अक्सा-ए-आलम में पहुँचा।
न था जिसको ख़तरा न उम्म में, न क़ुलज़ुम में,
झिझका किये बे-सपर जिसने सातों समंदर—
वो डूबा दहाने में गंगा के आकर।
भावार्थ: इक़बाल उस इस्लामी सभ्यता को याद करते हैं जिसका जहाज़ पूरी दुनिया में बेख़ौफ़ चला, जिसे न समंदरों से डर लगा, न तूफ़ानों से। लेकिन वही सभ्यता गंगा के किनारे आकर डूब गई - यानी अपने मूल उद्देश्य और आत्मा से दूर होकर।
संदेश: सभ्यताएँ बाहरी शक्ति से नहीं, आंतरिक पतन से गिरती हैं।