2. हज़ारों साल नर्गिस अपनी बे-नूरी पे रोती है, बड़ी मुश्किल से होता है चमन में दीदा-वर पैदा - अल्लामा इक़बाल
3. उस पे पत्थर खाके क्या बीती ज़फ़र देखेगा कौन, फल तो सब ले जाएँगे ज़ख़्मे-शजर देखेगा कौन - ज़फ़र गोरखपुरी
4. देख ज़िंदाँ से परे रंग-ए-चमन, रक़्स करना है तो फिर पाँव की ज़ंजीर न देख। - मजरूह सुल्तानपुरी
5. कलकत्ते का जो ज़िक्र किया तू ने हम-नशीं, इक तीर मेरे सीने में मारा कि हाए हाए - मिर्ज़ा ग़ालिब
6. फूल तो दो दिन बहारे-जा-फ़िज़ा दिखला गए, हसरत उन गुंचों पे हैं जो बिन खिले मुरझा गए - ज़ौक़
7. वो ज़हर देता तो सब की निगह में आ जाता, सो ये किया कि मुझे वक़्त पे दवाएं न दीं - अख़्तर नाज़मी
8. हवा को बहुत सर-कशी का नशा है, मगर ये न भूले दिया भी दिया है । - खुमार बाराबंकवी
9. एक से एक जुनूँ का मारा इस बस्ती में रहता है, एक हमीं हुशियार थे यारो एक हमीं बद-नाम हुए - इब्न-ए-इंशा
10. किस तरह जमा कीजिए अब अपने आप को, काग़ज़ बिखर रहे हैं पुरानी किताब के - -आदिल मंसूरी
11. वो दुश्मनी से देखते हैं, देखते तो हैंमैं शाद हूँ की हूँ तो किसी की निगाह में - अमीर मीनाई
12. बाद मुद्दत के ये ऐ 'दाग़' समझ में आया, वही दाना है कहा जिसने न माना दिल का - दाग़ देहलवी
13. गो बहुत कुछ रंज यारान ए वतन से था हमेंआँख में आंसू मगर वक़्त ए सफ़र आ ही गया - अकबर इलाहाबादी,
9. एक से एक जुनूँ का मारा इस बस्ती में रहता है, एक हमीं हुशियार थे यारो एक हमीं बद-नाम हुए - इब्न-ए-इंशा
10. किस तरह जमा कीजिए अब अपने आप को, काग़ज़ बिखर रहे हैं पुरानी किताब के - -आदिल मंसूरी
11. वो दुश्मनी से देखते हैं, देखते तो हैंमैं शाद हूँ की हूँ तो किसी की निगाह में - अमीर मीनाई
12. बाद मुद्दत के ये ऐ 'दाग़' समझ में आया, वही दाना है कहा जिसने न माना दिल का - दाग़ देहलवी
13. गो बहुत कुछ रंज यारान ए वतन से था हमेंआँख में आंसू मगर वक़्त ए सफ़र आ ही गया - अकबर इलाहाबादी,
14. फ़रिश्तों से भी अच्छा मैं बुरा होने से पहले था, वो मुझ से इन्तिहाई ख़ुश ख़फ़ा होने से पहले था - अनवर शुऊर
15. मिरा ज़मीर बहुत है मुझे सज़ा के लिए, तू दोस्त है तो नसीहत न कर ख़ुदा के लिए - शाज़ तमकनत
15. मिरा ज़मीर बहुत है मुझे सज़ा के लिए, तू दोस्त है तो नसीहत न कर ख़ुदा के लिए - शाज़ तमकनत
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