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May 19, 2026

Lyrics Raja Shivaji Anthem 'Chhatrapati'

हे, हर-हर-हर महादेव शिवशंकर

सह्यगिरी शिखरावर आले

हे, सळ-सळ-सळ रणकंटक तलवारी

वज्रमूठ सरसावून भाले

तू तेजःपुंज झुंजार, चेतवून अंगार

भेदलास अंधार सारा

तू अर्थ रामराज्याचा, हिंदवी स्वराज्याचा

एकमेव आराध्य झाला

दुष्ट दुर्जनांसी संहारले (हे)

पातशाहीला तू ललकारले (हे)

एक नव्या पर्वाची एकजूट करण्यासी

एक छत्र छाया आधार दे

एक शस्त्र, एक अस्त्र शूरवीर छत्रपती

धैर्यशील, सत्वशील, धर्मनिष्ठ छत्रपती

लाख मराठ्यांची तू आग रे (हे-हे)

माय भवानीचा तू वाघ रे

कीर्तीवंत, पुण्यवंत, नीतीवंत छत्रपती

अद्वितीय क्षत्रियकुलावतंस छत्रपती

लाख मराठ्यांची तू आग रे

माय भवानीचा तू वाघ रे

देव, देश, धर्माची, सर्वश्रेष्ठ कर्माची

आन घेतली रक्त सांडले जरी

अंधकार शतकांचा भस्मसात करण्यासी

एक तप्त ज्वाला ही पेटली उरी

भक्ती रूप संतांचा, साधू अन महंतांचा

हात जोडूनी मान राखलास तू

जर कुणी स्वराज्यावर वाकडी नजर केली

हात-पाय चौरंगी छाटलास तू

मोडून जात-पात रयतेसी देई साथ

त्यांचा सदैव कैवारी झाला

झाले बहुत राजे, जगतात नाव गाजे

लाखात एक शिवराय माझा

हात तुझा पाठीशी, वार झेलू छातीशी

ढाल तुझी होण्याचा मान दे

एक शस्त्र, एक अस्त्र शूरवीर छत्रपती

धैर्यशील, सत्वशील, धर्मनिष्ठ छत्रपती

लाख मराठ्यांची तू आग रे (हे-हे)

माय भवानीचा तू वाघ रे

कीर्तीवंत, पुण्यवंत, नीतीवंत छत्रपती

अद्वितीय क्षत्रियकुलावतंस छत्रपती

लाख मराठ्यांची तू आग रे

माय भवानीचा तू वाघ रे

मावळ-मावळ, पाठीशी बारा मावळ

देवाला शोधाया धावून आलं राऊळ

देवा रं देवा, सारं पावन झालं रं

आरती ओवाळा माझं राजं आलं रं

तोरण बांधून साजरं हे करू औक्षण कुंकुम भाळावर

शिवबांना डोळा पाहीन अन डोळ सारं पाणावलं

साष्टांग दर्शनाचा ह्या देवपूजनाचा

हा दैवयोग भाग्यात यावा

ध्वज उंच-उंच भगवा हा, वंदनीय भगवा हा

आसमंत भगवा कराया

जन्म सार्थ करण्यासी प्रार्थना ही चरणासी

प्राण अर्पण्याचा सन्मान दे

एक शस्त्र, एक अस्त्र शूरवीर छत्रपती

धैर्यशील, सत्वशील, धर्मनिष्ठ छत्रपती

लाख मराठ्यांची तू आग रे (हे-हे)

माय भवानीचा तू वाघ रे

कीर्तीवंत, पुण्यवंत, नीतीवंत छत्रपती

अद्वितीय क्षत्रियकुलावतंस छत्रपती

लाख मराठ्यांची तू आग रे

माय भवानीचा तू वाघ रे

--- अजय-अतुल 

Hindi Translation 

हे, हर-हर-हर महादेव शिवशंकर  

सह्यगिरि की शिखर-भूमि पर आए  


हे, सुस्सलाती रणकंटक तलवारें  

वज्रमूठ कसकर भाले  


तुम तेजस्वी, पराक्रमी, अंगार-सा जोश जगाने वाले  

तुमने सारा अंधकार चीर दिया  


तुम रामराज्य के अर्थ हो, हिंदवी स्वराज्य के प्रतीक हो  

और तुम ही एकमात्र आराध्य बन गए  


दुष्टों और दुराचारियों का संहार किया  

सत्ता को ललकार दिया  


एक नए युग को एकजुट करने के लिए  

एक ही छत्र की छाया और सहारा दो  


एक ही शस्त्र, एक ही अस्त्र, वीर छत्रपति  

धैर्यवान, सत्वशील, धर्मनिष्ठ छत्रपति  


लाखों मराठों की तुम ज्वाला हो  

माँ भवानी के तुम शेर हो  


कीर्तिवान, पुण्यवान, नीतिवान छत्रपति  

अद्वितीय क्षत्रिय कुल के आभूषण छत्रपति  


लाखों मराठों की तुम ज्वाला हो  

माँ भवानी के तुम शेर हो  


देव, देश और धर्म के लिए  

सर्वश्रेष्ठ कर्म के लिए  


यदि रक्त भी बहाना पड़ा, तो भी स्वीकार किया  

अंधकार के शतकों को भस्म करने के लिए  


एक तपती ज्वाला हृदय में प्रज्वलित हुई  

भक्ति-रूप संतों, साधुओं और महंतों का  


तुमने हाथ जोड़कर सम्मान रखा  

यदि किसी ने स्वराज्य पर टेढ़ी नजर डाली  


तो तुमने उसके हाथ-पाँव काट दिए  

जात-पात तोड़कर रयत का साथ दिया  


और सदा उनका रक्षक बन गया  

बहुत से राजा हुए, जिनका नाम दुनिया में गूंजा  


मेरे शिवराय तो लाखों में एक हैं  

तुम्हारा हाथ मेरी पीठ पर रहे, मैं सीना तानकर वार सह लूँ  


तुम्हारी ढाल बनने का मुझे सम्मान दो  

एक ही शस्त्र, एक ही अस्त्र, वीर छत्रपति  


धैर्यवान, सत्वशील, धर्मनिष्ठ छत्रपति  

लाखों मराठों की तुम ज्वाला हो  


माँ भवानी के तुम शेर हो  

कीर्तिवान, पुण्यवान, नीतिवान छत्रपति  


अद्वितीय क्षत्रिय कुल के आभूषण छत्रपति  

लाखों मराठों की तुम ज्वाला हो  


माँ भवानी के तुम शेर हो  


मावळ-मावळ, पीछे बारह मावळ  

देव को खोजने दौड़कर रावल आया  


हे देव, सब कुछ पावन हो गया  

मेरे राजा आए, उनकी आरती उतारो  


तोरण बाँधकर इसे उत्सव बनाएं, 

माथे पर कुंकुम से औक्षण करें  

शिवबाओं को आँखों से देखूँ तो

सब कुछ आँसुओं से भर जाए  


इस साष्टांग दर्शन और देवपूजन का  

यह सौभाग्य मेरे भाग्य में आए  


यह ऊँचा-ऊँचा भगवा ध्वज, यह वंदनीय भगवा  

आसमाँ तक भगवा कर दे  


जन्म को सार्थक करने के लिए चरणों में प्रार्थना है  

प्राण अर्पण करने का सम्मान दो  


एक ही शस्त्र, एक ही अस्त्र, वीर छत्रपति  

धैर्यवान, सत्वशील, धर्मनिष्ठ छत्रपति  


लाखों मराठों की तुम ज्वाला हो  

माँ भवानी के तुम शेर हो  


कीर्तिवान, पुण्यवान, नीतिवान छत्रपति  

अद्वितीय क्षत्रिय कुल के आभूषण छत्रपति  


लाखों मराठों की तुम ज्वाला हो  

माँ भवानी के तुम शेर हो  

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May 13, 2026

भारत की वीर‑परंपरा: राजस्थानी, मराठी और बुंदेली लोक‑दोहों का अद्भुत संग्रह

भारत का इतिहास केवल युद्धों का वर्णन नहीं, बल्कि वीरता, शौर्य और आत्मसम्मान का अनंत स्रोत है। राजपूताना, मराठा और बुंदेलखंड की धरती पर पले‑बढ़े अनगिनत योद्धाओं ने अपनी तलवार और अपने वचन से ऐसी गाथाएँ रचीं, जो सदियों बाद भी आज उतनी ही प्रेरक हैं। इस ब्लॉग में आप लोक‑प्रचलित दोहे/उक्तियाँ उनके भावार्थ के साथ पढ़ेंगे  - जो भारतीय वीरता की ज्वाला को फिर से जगाते हैं।

1. घास की रोटी खाय ली, पर माथो न झुकाय; मेवाड़ रै राणा प्रताप, अकबर सूं न डराय।
भावार्थ: महाराणा प्रताप ने कठिन जीवन स्वीकार कर लिया, लेकिन पराधीनता नहीं—वे भूखे रह सकते थे, पर शत्रु के सामने आत्मसमर्पण नहीं।

2. हठ तो राव हमीर को, ओर रावन की टेक; सत राजा हरिचंद को, अरजन वान अनेक।
भावार्थ: कुछ लोगों का साहस और हठ ऐसा होता है कि वे मृत्यु को भी चुनौती दे देते हैं। जैसे हमीर का अटल संकल्प और रावण की जिद—एक बार ठान लेने पर वे पीछे नहीं हटते।

3. सिंह सुवन, सत्पुरुष वचन, कदली फलै इक बार; तिरिया तेल, हमीर हठ, चढ़ै न दूजी बार।
भावार्थ: कुछ अवसर और मूल्य ऐसी दुर्लभ चीजें हैं जो केवल एक बार घटित होती हैं—सज्जन का दिया वचन, सिंह का जन्म, केला का फल, राणा हमीर का अडिग संकल्प,—इन्हें दूसरी बार पाने की अपेक्षा व्यर्थ है; इसलिए समय रहते पहचानना आवश्यक है।

4. चमर हुळे नह सीह सिरै, छत्र न धारे सीह; हांथळ रा बळ सू हुवौ, ओ मृगराज अबीह।
भावार्थसच्चा सामर्थ्य बाहरी प्रतीकों से नहीं आता। शेर बिना चंवर‑छत्र के भी राजा है—उसकी शक्ति ही उसका राजचिह्न है।

5. स्थापूनी हिंदी स्वराज्य आपुले, शौर्याने लिहिली इतिहास‑गाथा;
असा हा जाणता राजा माझा, तयाच्या चरणी झुकवितो माथा.
भावार्थ: शिवाजी महाराज ने अपने साहस और नेतृत्व से हिंदवी स्वराज्य की स्थापना की और इतिहास में अमर गाथा लिखी। अनुभव, न्याय और बुद्धि से राज्य चलाने वाले इस महान “जाणत्या राजा” को माथा झुकाकर प्रणाम करने का मन करता है।

6. सह्याद्रीची साथ होती, घोड्यांच्या टापांचा नाद;  कडेकपारी फिरत होता, मर्द मराठ्यांचा वाघ.
भावार्थसह्याद्री के पर्वत शिवराय के साथ थे और उनके मावळों के घोड़ों की टापें रणभूमि में गूँजती थीं। सह्याद्री के कड़े‑कड़े पहाड़ों पर घूमने वाला यह मराठों का शेर—शिवाजी—हर घाटी में गर्जना करता था।

7. छत्ता तेरे राज में, धक‑धक धरती होय; जित‑जित घोड़ा मुख करे, उत‑उत फतह होय।
भावार्थछत्रसाल के काल में उनका पराक्रम इतना व्यापक था कि सेना जहाँ भी कदम बढ़ाती, विजय वहीं चलकर आ जाती—यह उनकी वीरता और न्यायप्रिय शासन की छवि है।

8. इत यमुना उत नर्मदा, इत चंबल उत टोंस; छत्रसाल सो लरन की, रही न काहू हौंस।
भावार्थ: छत्रसाल का राज्य इतना विस्तृत और बलशाली था कि उस पूरे क्षेत्र में किसी में इतना साहस नहीं कि उनसे युद्ध करने का विचार भी करे।

9. जो गति गजराज की, सो गति भई है आज। बाजी जात बुंदेल की, राखो बाजी लाज॥
भावार्थ: छत्रसाल अपनी स्थिति की तुलना गजेंद्र‑मोक्ष कथा के गजराज से करते हैं। जैसे गजराज ने संकट में भगवान को पुकारा, वैसी ही पुकार छत्रसाल बाजीराव से कर रहे थे।

10. चार बांस, चौबीस गज, अंगुल अष्ट प्रमान; ता ऊपर सुल्तान है, मत चूको चौहान।
भावार्थचार बांस, चौबीस गज दूरी और आठ अंगुल ऊँचाई के बराबर आगे–ऊपर ही सुल्तान (मोहम्मद गोरी) बैठा है। पृथ्वीराज चौहान, अब निशाना मत चूकना — यही सही क्षण है।

11. सिरसा सरोवर डोल्या, रण में उठी पुकार; डरे धरम के द्रोही सब, आल्हा‑ऊदल जूझे जब बार‑बार।
भावार्थजब आल्हा और ऊदल युद्धभूमि में उतरते थे, तो सिरसा झील तक कांप उठती थी। धर्मद्रोही भय से काँप जाते थे, क्योंकि आल्हा‑ऊदल का साहस, शक्ति और प्रतिशोध अजेय था।

इन दोहों और वीर‑उक्तियों में स्वाभिमान, स्वतंत्रता, त्याग और अडिग संकल्प की वह आग जलती है जिसने भारत की मिट्टी को गौरव सौंपा।

Jun 23, 2025

रद्दी

एकदा रेशन संपल्यावर
घरातली रद्दी विकायला काढली
तेव्हा तू हसत म्हणालीस,
तुमच्या कवितांचे कागद
यात घालू का ?
तेवढंच वजन वाढेल !

मी उत्तरलो, जे काम काळ उद्या करणार आहे
ते तू आज करू नकोस.
तुझ्या डोळ्यांत अनपेक्षित आसवं तरारली
आणि तू म्हणालीस,
मी तर नाहीच,
पण काळही ते करणार नाही

- कुसुमाग्रज

रद्दी

एक दफा, 
जब राशन खत्म हुआ था तो 
रद्दी निकाली थी घर से
 कि बेच आएँ! 
हँस के कहा था तू ने तब
कहो तुम्हारी नज़्में भी, डाल दूँ उन में? 
उन से वज़न बढ़ जाएगा।

मैंने कहा था :
"कल जो वक़्त करेगा, 
वो मत आज करो!" 
आँखे भर आई थीं तेरी ! 
और कहा थाः
"मैं तो क्या.... 
वो वक़्त भी न कर पाएगा!!"

अनुवादगुलजार

Nov 14, 2018

सागराने

सागराने नाविका मनी संकट मोठे पेरले,
वादळाने होडीस एका दशदिशांनी घेरले
शीड तुटले, खीळ तुटले, कथा काय या वल्ह्याची,
नाविकास ही फिकीर नव्हती, पुढे राहिल्या पल्ल्याची...

नशीब नव्हते पाठीशी, नव्हता अनुभव गाठीशी
उभा ठाकला एकटाच, युद्ध होते वादळाच्या वय वर्षे साठीशी
स्वबळी विश्वास मोठा, त्यास तोड कर्तुत्वही
रौद्र वादळ शांत झाहले, पागळले शत्रुत्वही.

एकवटला धीर हा, कोठूनी येतो त्या क्षणी,
शत बाहूंचे बळ येते, जव मातृत्व तरळते मनी.

The Sea bore an array of perils
A mighty storm ambushed the lone sailor
The sail snapped, the nails unhooked
The sailor persisted, unfazed by what lay ahead
Luckless, the knots of skill turned loose
He stood there alone, the storm slapped its noose
A life lived in benevolence will not let faith wither
He overcame fear and the storm lulled into slither
Courage of the universe, regathers in a single moment
A hundred arm’s strength regains, as the memory of mother returns

--- Ravindra Ghanshyam Deshpande
-किल्ला (मराठी चित्रपट)

Jun 14, 2013

Stage

We didn’t go to the stage,
nor were we called.
With a wave of the hand
we were shown our place.
There we sat
and were congratulated,
and “they”, standing on the stage,
kept on telling us of our sorrows.
Our sorrows remained ours,
they never became theirs.
When we whispered out doubts
they perked their ears to listen,
and sighing,
tweaking our ears,
told us to shut up,
apologize; or else...

--Waharu Sonavane; translated by Bharat Patankar, Gail Omvedt, and Suhas Paranjape