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May 5, 2026

15 बेहतरीन शेर - 22 !!!

1. ये नया शहर तो है ख़ूब बसाया तुमने, क्यूं पुराना हुआ वीरान ज़रा देख तो लो - जावेद अख़्तर

2. हज़ारों साल नर्गिस अपनी बे-नूरी पे रोती है, बड़ी मुश्किल से होता है चमन में दीदा-वर पैदा - अल्लामा इक़बाल

3. उस पे पत्थर खाके क्या बीती ज़फ़र देखेगा कौन, फल तो सब ले जाएँगे ज़ख़्मे-शजर देखेगा कौन - ज़फ़र गोरखपुरी

4. देख ज़िंदाँ से परे रंग-ए-चमन, रक़्स करना है तो फिर पाँव की ज़ंजीर न देख। - मजरूह सुल्तानपुरी

5. कलकत्ते का जो ज़िक्र किया तू ने हम-नशीं, इक तीर मेरे सीने में मारा कि हाए हाए - मिर्ज़ा ग़ालिब

6. फूल तो दो दिन बहारे-जा-फ़िज़ा दिखला गए, हसरत उन गुंचों पे हैं जो बिन खिले मुरझा गए - ज़ौक़

7. वो ज़हर देता तो सब की निगह में आ जाता, सो ये किया कि मुझे वक़्त पे दवाएं न दीं - अख़्तर नाज़मी

8. हवा को बहुत सर-कशी का नशा है, मगर ये न भूले दिया भी दिया है । - खुमार बाराबंकवी

9. एक से एक जुनूँ का मारा इस बस्ती में रहता है,  एक हमीं हुशियार थे यारो एक हमीं बद-नाम हुए - इब्न-ए-इंशा

10. किस तरह जमा कीजिए अब अपने आप को, काग़ज़ बिखर रहे हैं पुरानी किताब के - -आदिल मंसूरी

11. वो दुश्मनी से देखते हैं, देखते तो हैं, मैं शाद हूँ की हूँ तो किसी की निगाह में - अमीर मीनाई

12. बाद मुद्दत के ये ऐ 'दाग़' समझ में आया, वही दाना है कहा जिसने न माना दिल का - दाग़ देहलवी

13. गो बहुत कुछ रंज यारान ए वतन से था हमेंआँख में आंसू मगर वक़्त ए सफ़र आ ही गया - अकबर इलाहाबादी,

14.  फ़रिश्तों से भी अच्छा मैं बुरा होने से पहले था, वो मुझ से इन्तिहाई ख़ुश ख़फ़ा होने से पहले था - अनवर शुऊर

15. मिरा ज़मीर बहुत है मुझे सज़ा के लिए,  तू दोस्त है तो नसीहत न कर ख़ुदा के लिए - शाज़ तमकनत

Apr 17, 2026

15 बेहतरीन शेर - 21 !!!

1. आनेवाली नस्लें तुम पर फ़ख़्र करेंगी हम-असरो, जब भी उनको ध्यान आएगा तुमने 'फ़िराक़' को देखा है - फ़िराक़ गोरखपुरी

2. हमारे बस में था ही क्या हवा पे हम सवार थे, वहाँ वहाँ गए जहाँ हवा उड़ा के ले गई -अज़्म शाकिरी

3. क्या क्या हुआ है हम से जुनूँ में न पूछिए , उलझे कभी ज़मीं से कभी आसमाँ से हम - असरार-उल-हक़ मजाज़

4. अब तुमसे रुख़सत होता हूँ आओ सम्भालो साज़े-गज़ल नये तराने छेड़ो, मेरे नग्मों को नींद आती है - रघुपति सहाय 'फ़िराक़'

5. तुझे किस बात का ग़म है वो इतना पूछ लें मुझ से वो इतना पूछ लें मुझ से तो फिर किस बात का ग़म है मुझ से - मुशताक़ हुसैन ख़ान हाशमी मुश्ताक़

6.  मुझको तो होश नहीं, तुमको ख़बर हो शायद, लोग कहते हैं कि तुमने मुझे बर्बाद किया - जोश मलीहाबादी

7. मैं तो ग़ज़ल सुना के अकेला खड़ा रहा, सब अपने अपने चाहने वालों में खो गए - कृष्ण बिहारी नूर

8. न जाने कैसा मसीहा था चाहता क्या था, तमाम शहर को बीमार देख कर ख़ुश था  - अमीर क़ज़लबाश

9. दाग़ दुनिया ने दिए ज़ख़्म ज़माने से मिले, हम को तोहफ़े ये तुम्हें दोस्त बनाने से मिले - कैफ़ भोपाली

10.  ख़ुशियाँ देते देते अक्सर खुद ग़म में मर जाते हैं,  रेशम बुनने वाले कीड़े रेशम में मर जाते हैं - ख़ुशबीर सिंह शाद

11. कुछ तो तेरे मौसम ही मुझे रास कम आये और कुछ मेरी मिट्टी में बग़ावत भी बहुत थी - परवीन शाकिर

12. रातें परदेस की डरता था कटेंगी कैसे, मगर आँगन में सितारे थे वही घर वाले - राही मासूम रजा़

13. हम को नीचे उतार लेंगे लोग, इश्क़ लटका रहेगा पंखे से - ज़िया मज़कूर

14. मैखाने के क़रीब थी मस्जिद भले को, दाग़ हर एक पूछता था कि “ हज़रत इधर कहाँ? - दाग़

15. जब तुलू आफताब होता है, ग़म के सागर उछाल देता हूँ, तज़किरा जब वफ़ा का होता है, में तुम्हारी मिसाल देता हूँ.. 

Apr 4, 2026

अभी साज़-ए-दिल में तराने बहुत हैं

अभी साज़-ए-दिल में तराने बहुत हैं
अभी ज़िंदगी के बहाने बहुत हैं

ये दुनिया हक़ीक़त की क़ाइल नहीं है
फ़साने सुनाओ फ़साने बहुत हैं

तिरे दर के बाहर भी दुनिया पड़ी है
कहीं जा रहेंगे ठिकाने बहुत हैं

मिरा इक नशेमन जला भी तो क्या है
चमन में अभी आशियाने बहुत हैं

नए गीत पैदा हुए हैं उन्हीं से
जो पुर-सोज़ नग़्मे पुराने बहुत हैं

दर-ए-ग़ैर पर भीक माँगो न फ़न की
जब अपने ही घर में ख़ज़ाने बहुत हैं

हैं दिन बद-मज़ाक़ी के 'नौशाद' लेकिन
अभी तेरे फ़न के दिवाने बहुत हैं

Mar 31, 2026

हिंदी होने पर नाज़ जिसे कल तक था

हिंदी होने पर नाज़ जिसे कल तक था, हिज़ाज़ी बन बैठा,

अपनी महफ़िल का रिंद पुराना आज नमाज़ी बन बैठा।

महफ़िल में छुपा है कैसे—हज़्रत! दीवाना कोई सहरा में नहीं,

पैग़ाम-ए-जुनूँ जो लाता था, इक़बाल वो अब दुनिया में नहीं।

ऐ मुतरिब! तेरे तरानों में अगली-सी अब वो बात नहीं,

वो ताज़गी-ए-तख़य्युल नहीं, बेसाख़्तगी-ए-जज़्बात नहीं।

— आनंद नारायण ‘मुल्ला’ (शेर-ओ-शायरी से)

“अल्लामा इक़बाल जैसे परिपक्व और विशाल हृदय वाले व्यक्ति को अचानक साम्यवाद के दलदल में फँसते देखकर लोग दुख और चिंता से कराह उठे।”

Mar 27, 2026

बहादुर शाह ज़फ़र और हिंदुस्तान की तलवार: ऐतिहासिक शायरी की कहानी

1857 का भारतीय विद्रोह, जिसे आज़ादी की पहली क्रांति भी कहा जाता है, सिर्फ़ युद्ध की लड़ाई तक सीमित नहीं था। इस विद्रोह के दौरान आखिरी मुग़ल सम्राट बहादुर शाह ज़फ़र की शख्सियत और उनकी शायरी ने भी इतिहास में अपनी अलग छाप छोड़ी।

कहा जाता है कि विद्रोह के बाद, जब अंग्रेज़ अधिकारी ज़फ़र को पकड़ने आए, उन्होंने उन्हें तंज़ के साथ कहा:

“दमदमे में दम नहीं है ख़ैर मांगो जान की.. ऐ ज़फ़र ठंडी हुई अब तेग हिंदुस्तान की।”
(अब तुम्हारे पास कोई ताक़त नहीं, ज़फ़र। हिंदुस्तान की तलवार भी अब नुकीली नहीं रही।)

लेकिन बहादुर शाह ज़फ़र की शायरी में छिपी जज़्बात और आत्मसम्मान ने जवाब में इतिहास रच दिया। उन्होंने शेर कहा:

“ग़ाज़ियों में बू रहेगी जब तलक ईमान की, तख़्त ऐ लंदन तक चलेगी तेग हिंदुस्तान की।”
 (भारत की तलवार और उसका साहस कभी कम नहीं होगा, और ईमान की शक्ति के साथ यह London तक अपनी गूँज पहुंचाएगी।)

इस जवाब से साफ़ झलकता है कि ज़फ़र का मनोबल और उनका देशभक्ति का जज़्बा अंग्रेज़ों की धमकियों से कम नहीं हुआ। यह सिर्फ़ एक शेर नहीं, बल्कि उस युग की एक प्रेरणादायक कहानी है, जो यह बताती है कि कठिन परिस्थितियों में भी आत्मसम्मान और विश्वास कभी नहीं मरते।

Mar 23, 2026

15 बेहतरीन शेर - 20 !!!

 1. सरजमीने-हिंद में अकवामे आलम के फ़िराक़,  कारवां आते गए हिंदोस्ताँ बनता गया  - फ़िराक़ गोरखपुरी

2. कुछ मेरे बाद और भी आएंगे क़ाफ़िले, कांटे ये रास्ते से हटा लूं तो चैन लूं। -तसव्वुर किरतपुरी

3. इन्हीं ज़र्रों से होंगे कल नये कुछ कारवां पैदा,  जो ज़र्रे आज उड़ते हैं ग़ुबारे-कारवां हो कर। - शफ़क टौंकी

4. इस शहर में जीने के अंदाज़ निराले हैं, होठों पे लतीफे हैं आवाज़ में छाले हैं। - जावेद अख़्तर

5. जिनके आँगन में अमीरी का शजर लगता है, उसका हर ऐब ज़माने को हुनर लगता है - अंजुम रहबर

6. ऐ दिल वो आशिक़ी के फ़साने किधर गए, वो उम्र क्या हुई वो ज़माने किधर गए - अख़्तर शीरानी‬

7. सियाह रात नहीं लेती नाम ढलने का, यही तो वक़्त है सूरज तेरे निकलने का - शहरयार

8. नतीजा एक ही निकला, कि थी क़िस्मत में नाकामी, कभी कुछ कह के पछताये, कभी चुप रह के पछताये। - आरज़ू लखनवी

9. हमारी ज़िन्दगी के सानहे भी क्या अजब गुज़रे, उसी पर मर मिटे जिस से हमें बेज़ार होना था - मनीष शुक्ला

10. अब ज़मीं पर कोई गौतम न मोहम्मद न मसीह, आसमानों से नए लोग उतारे जाएँ - अहमद फ़राज़

11. हम वो हैं जो ख़ुदा को भूल गए तुम मेरी जान किस गुमान में हो - जौन एलिया

12. दफ़'अतन घटा की आड़ से चाँदनी कशीद हो गई, ज़ुल्फ़ उस के चेहरे से हटी और मेरी 'ईद हो गई - आलम निज़ामी

13. जुर्रत से हर नतीजे की परवाह किये बगैर, दरबार छोड़ आया हूँ सजदा किये बगैर ! - मुनव्वर राना

14. ये हमसे कौन दिन भर की कमाई छीन लेता है, उतर कर अपनी मसनद से चटाई छीन लेता है - सलाहउद्दीन नैयर

15. अपने बच्चों को मैं बातों में लगा लेता हूं, जब भी आवाज़ लगाता है खिलौने वाला - राशिद राही

Mar 11, 2026

शेर-ओ-शायरी - गीताप्रेस की किताब "एक लोटा पानी"


1. आईना! मुँह पर ही कहता है—साफ-साफ। सच यह है-जो साफ होता है, सफा कहता है।।

2.  सँभल कर बैठना, जलवा मुहब्बत देखने वाले। तमाशा खुद न बन जाना तमाशा देखने वाले॥

3. खुदाने हुस्न नादानोंको, बख्सा जर रजीलों को। अक्लमंदों को रोटी खुश्क, औ हलुवा वखीलों को ॥

4. एक बुतको चूमनेको शेखजी काबा गये। गरचे-हर बुत काबिले बोसा है इस बुतखानेमें॥

5. नजर से सर कलम कर दे, उसे शमशीर कहते हैं। निशाने में जो लग जाये, उसीको तीर कहते हैं॥

6.  न कह गया, न सुन गया और न नाम बता गया। मैं क्या कहूँ कि मेरे दिल, किसने चुरा लिया

7. है इबादत की इबादत है, मुहब्बत की मुहब्बत है। मेरे माशूक की सूरत खुदा से मिलती जुलती है॥

8. शेखजीसे मैंने पूछी, मंजिल जब यार की। बुतकदे की और चुपकेसे, इशारा कर दिया॥

9. बहुत मुश्किल निभाना है मुहब्बत अपने दिलवर से। उधर मूरत अमीराना इधर हालत फकीराना॥

10. चाँद बदली में छिपा है मुझे मालूम न था। सकल इनसान में खुदा है, मुझे मालूम न था॥

11. बुतपरस्ती मेरे हकमें हकपरस्ती हो गयी। दे दिया तेरा पता कुछ, यारकी तसबीरने॥

12. मुहब्बत करो और निभा लो तब पूछना, कि दुश्चारियाँ हैं कि आसानियाँ हैं?

13.  समझकर अपना दीवाना, वह मुझसे मुँह छिपाते हैं। हकीकत यों है, दरपरदा, मुहब्बत आजमाते हैं॥

14. शिकाइत किस जबाँसे मैं करूँ उनके न आनेकी। यही अहसान क्या कम है कि मेरे दिलमें रहते हैं॥

15. दुनियाँ इक इफसाना कहने को थे मगर सोचा। दुनियाँ है खुद इफसाना, इफसाने से क्या कहना?

16. रहमान के फिरश्ते' गो हैं बहुत मुकद्दस? शैतानही की जानिब, लेकिन मिजोरटी है॥

17..तमन्ना दर्ददिल में हो, तो कर खिदमत फकीरों की । नहीं वह “लाल” मिलता है अमीरों के खजानेमें॥

--- श्रीपारसनाथ सरस्वती 

(गीताप्रेस गोरखपुर द्वारा प्रकाशित "एक लोटा पानी" पुस्तक में एक नैतिक कहानी है, जिसका शीर्षक है "हिंदू राज्य कैसे गया?"। शेर-ओ-शायरी उसी कहानी से लिये गये हैं।)

Mar 3, 2026

अल्लामा इक़बाल की शायरी: इस्लाम, जम्हूरियत और आत्मबल का दर्शन


अल्लामा मुहम्मद इक़बाल केवल शायर नहीं थे, वे एक विचारक, दार्शनिक और आत्मचेतना के कवि थे। उनकी शायरी व्यक्ति, समाज और सत्ता—तीनों से सवाल करती है। बाल-ए-जिब्रील में इक़बाल की आवाज़ सबसे अधिक बेबाक और वैचारिक रूप में सामने आती है।
 
शेर 1: (बाल-ए-जिब्रील से)

सोचा भी है ऐ मद-ए-मुसलमाँ कभी तूने,
क्या चीज़ है फ़ौलाद की शमशीर-ए-जिगरदार?
इस बैत का ये मिस्रअ-ए-अव्वल है कि जिसमें,
पोशीदा चले आते हैं तौहीद के असरार।

भावार्थ:  इक़बाल मुसलमान से पूछते हैं - क्या तुमने कभी सोचा है कि सच्चे ईमान और आत्मबल से बनी फ़ौलाद की तलवार वास्तव में क्या होती है?  इस शेर की पहली ही पंक्ति में एकेश्वरवाद (तौहीद) के गहरे रहस्य छिपे हुए हैं।

संदेश: असली शक्ति हथियार में नहीं, ईमान और आत्मचेतना में होती है।
 
शेर 2: (बाल-ए-जिब्रील से)

इस राज़ को इक मद-ए-फ़िरंगी ने किया फ़ाश,
हरचंद कि दाना इसे खोला नहीं करते।
जम्हूरियत इक तर्ज़-ए-हुकूमत है कि जिसमें,
बंदों को गिना करते हैं, तोला नहीं करते।

भावार्थ:  इक़बाल कहते हैं कि इस सच्चाई को एक पश्चिमी विचारक ने उजागर किया - हालाँकि बुद्धिमान लोग भी इसे खुलकर नहीं कहते। लोकतंत्र एक ऐसी शासन-प्रणाली है जिसमें इंसानों को गिना तो जाता है, पर परखा नहीं जाता।

संदेश: संख्या-बल से चलने वाली व्यवस्था हमेशा न्याय और गुण की गारंटी नहीं देती।
 
शेर 3:

वा न करना फ़रक़ाबदी के लिए अपनी ज़ुबां,
छिपके है बैठा आ हंगाम-ए-महशर यहाँ।
वफ़्ल के सामान पैदा है तेरी तहरीर से,
देखे कोई दिल न दुख जाए तेरी तक़रीर से।
महफ़ले-नव में पुरानी दास्तानों को न छेड़,
रंग पर जो अब न आएँ उन फ़सानों को न छेड़।
 
भावार्थ:  इक़बाल चेतावनी देते हैं - अपनी ज़ुबान का इस्तेमाल फ़िरक़ाबंदी के लिए मत करो। तेरी लिखावट और तक़रीर से फसाद के बीज पैदा हो सकते हैं। नई महफ़िलों में पुराने, बेमानी झगड़ों को मत उछालो।

संदेश: शब्दों की जिम्मेदारी भी उतनी ही बड़ी है जितनी कर्म की।

 शेर 4:

वो दीने-हिजाज़ी का बेबाक बेड़ा-निशाँ,
जिसका अक्सा-ए-आलम में पहुँचा।
न था जिसको ख़तरा न उम्म में, न क़ुलज़ुम में,
झिझका किये बे-सपर जिसने सातों समंदर—
वो डूबा दहाने में गंगा के आकर।


भावार्थ:  इक़बाल उस इस्लामी सभ्यता को याद करते हैं जिसका जहाज़ पूरी दुनिया में बेख़ौफ़ चला, जिसे न समंदरों से डर लगा, न तूफ़ानों से। लेकिन वही सभ्यता गंगा के किनारे आकर डूब गई - यानी अपने मूल उद्देश्य और आत्मा से दूर होकर।

संदेश: सभ्यताएँ बाहरी शक्ति से नहीं, आंतरिक पतन से गिरती हैं।

Feb 13, 2026

अकबर इलाहाबादी और सर सैयद: व्यंग्य और सामाजिक सुधार की शायरी

अकबर इलाहाबादी केवल आलोचक नहीं थे; वे सर सैयद के सामाजिक सुधारों के समर्थक भी थे। उनके दृष्टिकोण में सर सैयद के प्रयासों का सम्मान था, लेकिन कुछ बातें उनके तरीक़े और शैली में उन्हें कमज़ोर या असंगत प्रतीत होती थीं। यही संतुलित दृष्टि इलाहाबादी की शायरी में झलकती है। यहाँ कुछ उद्धृत शेर और उनका विश्लेषण प्रस्तुत है:

शेर 1: ईमान बेचने को तो तैयार हैं हम भी, लेकिन, खरीद हो जो अलीगढ़ के भाव से।

व्याख्या: यहाँ इलाहाबादी व्यंग्य करते हैं कि लोग तो ईमान भी बेच सकते हैं, पर यदि इसे अलीगढ़ (जहाँ सर सैयद ने आधुनिक शिक्षा को बढ़ावा दिया) के तर्ज़ पर खरीदा जाए, तभी यह स्वीकार्य होगा। यह हल्का-फुल्का व्यंग्य अलीगढ़ मूवमेंट पर है।

शेर 2: हजार शेख ने डाढ़ी बढ़ाई सन की – सी, मगर, वो बात कहाँ मालवी मदन की – सी।

व्याख्या: इस शेर में इलाहाबादी कहते हैं कि लाखों लोगों ने बाहरी रूप (जैसे दाढ़ी बढ़ाना) अपनाया, लेकिन असली असर वही नहीं हुआ जो मालवी मदन या असली दृष्टिकोण वाला व्यक्ति दर्शाता। यह शेर दिखावे और वास्तविकता के बीच अंतर को उजागर करता है।

शेर 3: तालीम–ए दुस्तुराँ से ये उम्मीद है ज़रा, नाचे दुल्हन ख़ुशी से ख़ुद अपनी बरात में।

व्याख्या: यह शेर शिक्षा और सुधार की उम्मीदों पर व्यंग्य करता है। इलाहाबादी कहते हैं कि शिक्षा का लक्ष्य सिर्फ़ दिखावा न बन जाए, बल्कि उसका असर वास्तविक जीवन में महसूस होना चाहिए।

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अकबर इलाहाबादी की शायरी यह दिखाती है कि आलोचना हमेशा विरोध नहीं होती, बल्कि यह सुधार और सुधारकों के दृष्टिकोण को समझने और परखने का माध्यम भी हो सकती है। उनकी शेरों में व्यंग्य, सामाजिक टिप्पणियाँ और गहरी समझ का सुंदर मिश्रण मिलता है।

Feb 9, 2026

15 बेहतरीन शेर - 19 !!!

1. हमें तो ख़ैर कोई दूसरा अच्छा नहीं लगता, उन्हें ख़ुद भी कोई अपने सिवा अच्छा नहीं लगता -मोहसिन ज़ैदी

2. मिरे लहू से वज़ू और फिर वज़ू पे वज़ू, डरा हुआ हूँ ज़माने तिरी नमाज़ से मैं - रफ़ी रज़ा

3. कुछ मेरे बाद और भी आएंगे क़ाफ़िले, कांटे ये रास्ते से हटा लूं तो चैन लूं। -तसव्वुर किरतपुरी

4. हमारे दिल में भी झांको अगर मिले फुर्सत, हम अपने चेहरे से उतने नजर नहीं आते..!! ~ वसीम बरेलवी

5. अब छोड़ साथ मेरा ऐ याद-ए-नौजवानी, इस उम्र का मुसाफ़िर तन्हाई चाहता है - क़तील शिफ़ाई

6. बुरा न मान अगर यार कुछ बुरा कह दे, दिलों के खेल में ख़ुद्दारियाँ नहीं चलतीं - कैफ़ भोपाली

7. मोहब्बत क्या बला है चैन लेना ही भुला दे है, ज़रा भी आँख झपके है तो बेताबी जगा दे है -कलीम आजिज़

8. मैं तो इस वास्ते चुप हूँ कि तमाशा न बने, तू समझता है मुझे तुझ से गिला कुछ भी नहीं - अख़्तर शुमार

9.सुब्ह हो जाएगी हाथ आ न सकेगा महताब, आप अगर ख़्वाब में चलते हैं तो चलते रहिए - मलिकज़ादा मंज़ूर अहमद

10. मैं मुद्दतों जिया हूँ किसी दोस्त के बग़ैर अब तुम भी साथ छोड़ने को कह रहे हो ख़ैर ~ फ़िराक़ गोरखपुरी

11. तुम पूछो और मैं न बताऊँ ऐसे तो हालात नहीं, एक ज़रा सा दिल टूटा है और तो कोई बात नहीं - क़तील शिफ़ाई

12. जाने ये कैसा ज़हर दिलों में उतर गया, परछाईं ज़िंदा रह गई, इंसान मर गया...!!! - उम्मीद फ़ाज़ली

13. लाई हयात आए क़ज़ा ले चली चले, अपनी ख़ुशी न आए न अपनी ख़ुशी चले - शेख़ इब्राहीम ज़ौक़

14. वो आए घर में हमारे ख़ुदा की क़ुदरत है, कभी हम उन को कभी अपने घर को देखते हैं - मिर्ज़ा ग़ालिब

15. देखिए पाते हैं उश्शाक़ बुतों से क्या फ़ैज़ इक बरहमन ने कहा है कि ये साल अच्छा है - मिर्ज़ा ग़ालिब

Jan 18, 2026

घर लौट के रोएँगे माँ बाप अकेले में

घर लौट के रोएँगे माँ बाप अकेले में
मिट्टी के खिलौने भी सस्ते न थे मेले में
 
काँटों पे चले लेकिन होने न दिया ज़ाहिर
तलवों का लहू धोया छुप छुप के अकेले में

ऐ दावर-ए-महशर ले देख आए तिरी दुनिया
हम ख़ुद को भी खो बैठे वो भीड़ थी मेले में
 
ख़ुशबू की तिजारत ने दीवार खड़ी कर दी
आँगन की चमेली में बाज़ार के बेले में

--- क़ैसर उल जाफ़री

Jan 12, 2026

पाँच साल

पाँच सालों में
उग आता है
बाप की आँखों में मोतियाबिंद
जम जाती हैं
माँ के चेहरे पर झुर्रियाँ
चल बसता है दादा
बिस्तर पकड़ लेती है दादी
रिश्तेदार बदल लेते हैं घर

पाँच सालों में गुज़र जाते हैं
सैकड़ों हंगामे अख़बार सीखा देते हैं
लोगों को नुकीली ज़बान
लाशों के नज़ारे बढ़ा देते हैं
खून की प्यास
घरों के मलबों पर नाचने लगते हैं तमाशबीन

ज़हरीली चरस खींच कर 
समाज हो जाता है सुन्न 
अंदर और बाहर से 
देश हो जाता हैं ठूंठ

पाँच सालों में हो जाता है 
बहुत कहने को 
सब कुछ ही हो जाता है 
हंगामों की अफ़रा-तफ़री में बस... 

नहीं होता अदालत में
एक ख़ास मुक़दमा
या किसी हाक़िम की हिम्मत
कि वो दे सके ज़मानत

पाँच सालों में 
सिर्फ़ ये ही नहीं हो पाता
हमेशा बस होते-होते रह जाता है

- हुसैन हैदरी

Nov 26, 2025

इश्क़ जलाकर - Ishq Jalakar | Karvaan - Hindi Lyrics– Dhurandhar Movie

धूप टूट के
कांच की तरह
चुभ गई तो क्या
अब देखा जाएगा आंधियां कई
दिल में है मेरे
चुभ गई तो क्या
अब देखा जाएगा दिल है टूटा
मेरा मैं इश्क जला कर आ गया...

दिल है टूटा
मेरा मैं इश्क जला कर आ गया
आंधी बन के आया हूं
मेरा हौसला भी अय्याश है...
ना तो कारवां की तलाश है
ना तो कारवां की तलाश है
ना तो हमसफर की तलाश है
ना तो कारवां की तलाश है

आधी बातें आँखें बोले
आधी बातें आँखें बोले
बाकी आधी खामोशी कह दे...
हमजुबान की तलाश है
ना तो कारवां की तलाश है
ना तो कारवां की तलाश है
ना तो हमसफर की तलाश है
मेरा शौक तेरा दीदार है
यही उम्र भर की तलाश है

- इरशाद कामिल और साहिर लुधियानवी



Nov 24, 2025

ये एक मेला है वादा किसी से क्या लेगा

मैं इस उम्मीद पे डूबा के तू बचा लेगा
अब इसके बाद मेरा इम्तेहान क्या लेगा

ये एक मेला है वादा किसी से क्या लेगा
ढलेगा दिन तो हर एक अपना रास्ता लेगा

मैं बुझ गया तो हमेशा को बुझ ही जाऊंगा
कोई चराग़ नहीं हूं जो फिर जला लेगा

कलेजा चाहिए दुश्मन से दुश्मनी के लिए
जो बे-अमल है वो बदला किसी से क्या लेगा

मैं उसका हो नहीं सकता बता न देना उसे
सुनेगा तो लकीरें हाथ की अपनी जला लेगा

हज़ार तोड़ के आ जाऊं उस से रिश्ता वसीम
मैं जानता हूं वो जब चाहेगा बुला लेगा

--- वसीम बरेलवी

Oct 31, 2025

15 बेहतरीन शेर - 18 !!!

1. चला था ज़िक्र मेरी खामियों का महफ़िल में, जो लोग बहरे थे उनको सुनाई देने लगे - सलीम सिद्दीक़ी

2. रहता है सिर्फ एक ही कमरे में आदमी उसका गुरूर रहता है बाकी मकान में। - महशर अफरीदी

3. उसके फ़रोग़-ए-हुस्न से झमके है सब में नूर, शमा-ए-हरम हो या कि दिया सोमनाथ का - मीर

4. अब्र था कि ख़ुशबू था, कुछ ज़रूर था एक शख़्स, हाथ भी नहीं आया, पास भी रहा एक शख़्स - ज़फ़र गोरखपुरी

5. ज़िक्र जब होगा मोहब्बत में तबाही का कहीं, याद हम आएँगे दुनिया को हवालों की तरह - सुदर्शन फ़ाक़िर

6. जिन की यादें हैं अभी दिल में निशानी की तरह, वो हमें भूल गए एक कहानी की तरह -वाली आसी

7. काबिल तो हैं कामयाब़ भी हो जाएंगे, ये ज़ुगनू ही एक दिन, आफ़ताब हो ज़ाएंगे। - ~प्रह्लाद पाठक

8. हमने तमाम उम्र अकेले सफ़र किया, हमपर किसी खुदा की इनायत नहीं रही। - दुष्यंत कुमार

9. कम हैं सिपाही फ़ौज में सरदार बहुत हैं, यह जंग हार जाने के आसार बहुत हैं  - अज्ञात

10. इस सफ़र में नींद ऐसी खो गई,  हम न सोए रात थक कर सो गई - -राही मासूम रज़ा

11. तुम्हें नींद नहीं आती तो कोई और वजह होगी, अब हर ऐब के लिए कसूरवार इश्क़ तो नहीं..! - अज्ञात

12. बच्चों की फ़ीस उन की किताबें क़लम दवात, मेरी ग़रीब आँखों में स्कूल चुभ गया - मुनव्वर राना

13. अपने बच्चों को मैं बातों में लगा लेता हूं,  जब भी आवाज़ लगाता है खिलौने वाला -राशिद राही

14. आने वाले जाने वाले हर ज़माने के लिए आदमी मज़दूर है राहें बनाने के लिए -हफ़ीज़ जालंधरी

15. कुचल कुचल के न फ़ुटपाथ को चलो इतना, यहाँ पे रात को मज़दूर ख़्वाब देखते हैं - अहमद सलमान

Oct 1, 2025

बनारस की गली / नज़ीर बनारसी

हर गाम पे हुशियार बनारस की गली में
फ़ितने भी हैं बेदार बनारस की गली में

ऐसा भी है बाज़ार बनारस की गली में
बिक जायें ख़रीदार बनारस की गली में

हुशियारी से रहना नहीं आता जिन्हें इस पार
हो जाते हैं उस पार बनारस की गली में

सड़कों पे दिखाओगे अगर अपनी रईसी
लुट जाओगे सरकार, बनारस की गली में

दूकान पे रूकिएगा तो फिर आपके पीछे
लग जायेंगे दो-चार बनारस की गली में

हैरत का यह आलम है कि हर देखने वाला
है ऩक्श ब दीवार बनारस की गली में

मिलता है निगाहों को सुकूँ हृदय को आराम
क्या प्रेम है क्या प्यार बनारस की गली में

हर सन्त के, साधू के, ऋषि और मुनि के
सपने हुए साकार बनारस की गली में

शंकर की जटाओं की तरह साया फ़िगन
साया करने वाला, सरपरस्ती छाँह देने वाला है

हर साया-ए-दीवार बनारस की गली में
गर स्वर्ग में जाना हो तो जी खोल के ख़रचो
मुक्ति का है व्योपार बनारस की गली में

Aug 21, 2025

ऐ उम्र..! कुछ कहा मैंने

ऐ उम्र..!

कुछ कहा मैंने,
पर शायद तूने सुना नहीं..
तू छीन सकती है बचपन मेरा,
पर बचपना नहीं..!!

हर बात का कोई जवाब नहीं होता
हर इश्क का नाम खराब नहीं होता…
यूं तो झूम लेते है नशे में पीनेवाले
मगर हर नशे का नाम शराब नहीं होता…

खामोश चेहरे पर हजारों पहरे होते हैं
हंसती आँखों में भी जख्म गहरे होते हैं
जिनसे अक्सर रूठ जाते हैं हम,
असल में उनसे ही रिश्ते गहरे होते हैं…

किसी ने खुदा से दुआ मांगी
दुआ में अपनी मौत मांगी,
खुदा ने कहा, मौत तो तुझे दे दूँ मगर,
उसे क्या कहूं जिसने तेरी जिंदगी की दुआ मांगी…

हर इन्सान का दिल बुरा नहीं होता
हर एक इन्सान बुरा नहीं होता
बुझ जाते है दीये कभी तेल की कमी से…
हर बार कुसूर हवा का नहीं होता !!!

Aug 15, 2025

ये दाढ़ियाँ ये तिलक धारियाँ नहीं चलतीं

ये दाढ़ियाँ ये तिलक धारियाँ नहीं चलतीं
हमारे अहद में मक्कारियाँ नहीं चलतीं
 
क़बीले वालों के दिल जोड़िए मिरे सरदार
सरों को काट के सरदारियाँ नहीं चलतीं
 
बुरा न मान अगर यार कुछ बुरा कह दे
दिलों के खेल में ख़ुद्दारियाँ नहीं चलतीं
 
छलक छलक पड़ीं आँखों की गागरें अक्सर
सँभल सँभल के ये पनहारियाँ नहीं चलतीं
 
जनाब-ए-'कैफ़' ये दिल्ली है 'मीर' ओ 'ग़ालिब' की
यहाँ किसी की तरफ़-दारियाँ नहीं चलतीं

--- कैफ़ भोपाली

Aug 9, 2025

रक्षाबंधन विशेष: 'मैं अपने हाथ से प्यारे के बाँधूँ प्यार की राखी'

चली आती है अब तो हर कहीं बाज़ार की राखी
सुनहरी सब्ज़ रेशम ज़र्द और गुलनार की राखी
बनी है गो कि नादिर ख़ूब हर सरदार की राखी
सलोनों में अजब रंगीं है उस दिलदार की राखी
न पहुँचे एक गुल को यार जिस गुलज़ार की राखी

अयाँ है अब तो राखी भी चमन भी गुल भी शबनम भी
झमक जाता है मोती और झलक जाता है रेशम भी
तमाशा है अहा हा-हा ग़नीमत है ये आलम भी
उठाना हाथ प्यारे वाह-वा टुक देख लें हम भी
तुम्हारी मोतियों की और ज़री के तार की राखी

मची है हर तरफ़ क्या क्या सलोनों की बहार अब तो
हर इक गुल-रू फिरे है राखी बाँधे हाथ में ख़ुश हो
हवस जो दिल में गुज़रे है कहूँ क्या आह मैं तुम को
यही आता है जी में बन के बाम्हन, आज तो यारो
मैं अपने हाथ से प्यारे के बाँधूँ प्यार की राखी

हुई है ज़ेब-ओ-ज़ीनत और ख़ूबाँ को तो राखी से
व-लेकिन तुम से ऐ जाँ और कुछ राखी के गुल फूले
दिवानी बुलबुलें हों देख गुल चुनने लगीं तिनके
तुम्हारे हाथ ने मेहंदी ने अंगुश्तों ने नाख़ुन ने
गुलिस्ताँ की चमन की बाग़ की गुलज़ार की राखी

अदा से हाथ उठते हैं गुल-ए-राखी जो हिलते हैं
कलेजे देखने वालों के क्या क्या आह छिलते हैं
कहाँ नाज़ुक ये पहुँचे और कहाँ ये रंग मिलते हैं
चमन में शाख़ पर कब इस तरह के फूल खिलते हैं
जो कुछ ख़ूबी में है उस शोख़-ए-गुल-रुख़्सार की राखी

फिरें हैं राखियाँ बाँधे जो हर दम हुस्न के तारे
तो उन की राखियों को देख ऐ जाँ चाव के मारे
पहन ज़ुन्नार और क़श्क़ा लगा माथे उपर बारे
'नज़ीर' आया है बाम्हन बन के राखी बाँधने प्यारे
बँधा लो उस से तुम हँस कर अब इस त्यौहार की राखी

--- नज़ीर अकबराबादी

Jul 25, 2025

15 बेहतरीन शेर - 17 !!!

 1. ये कैसी हवा-ए-तरक्की चली है , दिए तो दिए, दिल बुझे जा रहे हैं  -  ख़ुमार बाराबंकवी

2. ये इनायतें ग़ज़ब की ये बला की मेहरबानी,  मिरी ख़ैरियत भी पूछी किसी और की ज़बानी - नज़ीर बनारसी

3. हवाएँ ज़ोर कितना ही लगाएँ आँधियाँ बन कर, मगर जो घिर के आता है वो बादल छा ही जाता है -  जोश मलीहाबादी

4. खड़ा हूँ आज भी रोटी के चार हर्फ़ लिए, सवाल ये है किताबों ने क्या दिया मुझ को - नज़ीर बाकरी

5. मोहब्बत क्या बला है चैन लेना ही भुला दे है, ज़रा भी आँख झपके है तो बेताबी जगा दे है - कलीम आजिज़

6. सुब्ह हो जाएगी हाथ आ न सकेगा महताब, आप अगर ख़्वाब में चलते हैं तो चलते रहिए - मलिकज़ादा मंज़ूर अहमद

7. मैं तो इस वास्ते चुप हूँ कि तमाशा न बने, तू समझता है मुझे तुझ से गिला कुछ भी नहीं  - अख़्तर शुमार

8. हसरत पे उस मुसाफ़िर-ए-बे-कस की रोइए, जो थक गया हो बैठ के मंज़िल के सामने...!!! - मुसहफ़ी ग़ुलाम हमदानी

9. जाने ये कैसा ज़हर दिलों में उतर गया, परछाईं ज़िंदा रह गई, इंसान मर गया...!!!  - उम्मीद फ़ाज़ली

10.  अपने माज़ी से निकलना भी हुनर होता है, घर को छोड़ आइए पीछे, तो सफ़र होता है...!!! - वसीम बरेलवी

11.  किसे अपना बनाएँ कोई इस क़ाबिल नहीं मिलता, यहाँ पत्थर बहुत मिलते हैं लेकिन दिल नहीं मिलता - मख़मूर देहलवी

12.  चारागर यूँ तो बहुत हैं मगर ऐ जान-ए-'फ़राज़', जुज़ तेरे और कोई ज़ख़्म न जाने मेरे - अहमद फ़राज़

13. दिल गया, जान गई, यार के पैमॉं के साथ, घर से घर वाले भी रूख़सत हुए मेहमान के साथ 

14. उफ़ तलक करते नहीं ज़िल्ल-ए-इलाही के ख़िलाफ़, आप को दरबार की आदत है, दरबारी हैं आप - ~ अब्बास क़मर

15. मस्जिद तो बना दी शब भर में, ईमाँ की हरारत वालों ने, मन अपना पुराना पापी है, बरसों में नमाज़ी बन न सका। -अल्लामा इक़बाल