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Jan 4, 2026

रहीम के 25 अमर दोहे: सरल भाषा में विस्तृत अर्थ


1. अब रहीम मुश्किल पड़ी, गाढ़े दोऊ काम।
सांचे से तो जग नहीं, झूठे मिलें न राम॥

विस्तृत अर्थ: जब मनुष्य पर कठिन समय आता है, तब सच्चाई का साथ देने वाला समाज नहीं मिलता और झूठ का सहारा लेने पर ईश्वर भी प्राप्त नहीं होते। अर्थात विपत्ति में मनुष्य अकेला पड़ जाता है।

2. वे रहीम नर धन्य हैं, पर उपकारी अंग।
बाटनवारे को लगे, ज्यों मेंहदी को रंग॥

विस्तृत अर्थ: उपकारी व्यक्ति चाहे कितना ही बाँट दिया जाए, उसका गुण और प्रभाव कभी कम नहीं होता, जैसे मेहंदी बाँटने पर भी अपना रंग छोड़ती है।

3. रहिमन पानी राखिए, बिन पानी सब सून।
पानी गए न ऊबरै, मोती, मानुष, चून॥

विस्तृत अर्थ:: यहाँ ‘पानी’ का अर्थ मर्यादा, लज्जा और आत्मसम्मान से है। इनके बिना मनुष्य, मोती और चूना—सबका मूल्य नष्ट हो जाता है।

4. रहिमन निज मन की व्यथा, मन ही राखो गोय।
सुनि अठलैहैं लोग सब, बाँटि न लेहैं कोय॥

विस्तृत अर्थ: अपनी पीड़ा सबको बताने से लोग मज़ाक तो उड़ाते हैं, पर दुख बाँटने या सहायता करने कोई आगे नहीं आता।

5. जो बड़ेन को लघु कहे, नहिं रहीम घट जाय।
गिरधर मुरलीधर कहे, कछु दुख मानत नाह॥

विस्तृत अर्थ: महान व्यक्ति छोटे नाम या साधारण संबोधन से छोटा नहीं हो जाता, जैसे कृष्ण को कोई भी नाम कहे, उनकी महत्ता कम नहीं होती।

6. समय लाभ सम लाभ नहिं, समय चूक सम चूक।
चतुरन चित रहीम लगी, समय चूक कछु चूक॥

विस्तृत अर्थ: समय का सदुपयोग सबसे बड़ा लाभ है और समय चूक जाना सबसे बड़ा नुकसान, क्योंकि समय हाथ से निकल जाए तो अवसर लौटकर नहीं आते।

7. ए रहीम दर दर फिरहिं, माँगि मधुकरी खाहिं।
यारो यारी छोड़िये, वे रहीम अब नाहिं॥

विस्तृत अर्थ: जो व्यक्ति स्वाभिमान छोड़कर दर-दर भीख माँगता फिरता है, उससे मित्रता छोड़ देनी चाहिए, क्योंकि वह अपना आत्मसम्मान खो चुका होता है।

8. रहिमन वे नर मर चुके, जे कहुँ माँगन जाहिं।
उनते पहिले वे मुए, जिन मुख निकसत नाहिं॥

विस्तृत अर्थ:: माँगकर जीना आत्मसम्मान की मृत्यु है; पर उससे भी पहले वे मर चुके हैं जिनके मुख से ‘न’ शब्द नहीं निकलता।

9. जो रहीम उत्तम प्रकृति, का करि सकत कुसंग।
चन्दन विष व्यापत नहीं, लिपटे रहत भुजंग॥

विस्तृत अर्थ: अच्छे स्वभाव वाला व्यक्ति बुरी संगति में रहकर भी अपना गुण नहीं खोता, जैसे चंदन पर लिपटा साँप भी उसे विषैला नहीं बना पाता।

10. रहिमन प्रीति न कीजिए, जस खीरा ने कीन।
ऊपर से तो दिल मिला, भीतर फांकें तीन॥

विस्तृत अर्थ:: जो प्रेम केवल दिखावे का हो, उसमें भीतर से टूटन होती है; ऐसा प्रेम अंत में धोखा ही देता है।

11. तरुवर फल नहिं खात है, सरवर पियहि न पान।
कहि रहीम पर काज हित, संपति संचहि सुजान॥

विस्तृत अर्थ:: जैसे पेड़ अपने फल नहीं खाते और तालाब अपना पानी नहीं पीते, वैसे ही सज्जन व्यक्ति अपनी संपत्ति दूसरों के कल्याण के लिए संचित करता है।

12. रूठे सुजन मनाइए, जो रूठे सौ बार।
रहीमन फिरि फिरि पोइए, टूटे मुक्ता हार॥

विस्तृत अर्थ: अच्छे और सज्जन लोगों से संबंध टूटने न दें, क्योंकि वे टूटे मोती के हार जैसे होते हैं जिन्हें फिर से पिरोना चाहिए।

13. क्षमा बड़न को चाहिए, छोटन को उत्पात।
कह रहीम हरि का घट्यौ, जो भृगु मारी लात॥

विस्तृत अर्थ: क्षमा केवल महान लोगों का गुण है; क्रोध करना छोटे मन का लक्षण है | उदाहरण के रूप में वे कहते हैं कि जब महर्षि भृगु ने भगवान विष्णु को पैर मारा, तब भी भगवान ने क्रोध नहीं किया, बल्कि उनके पैर दबाने लगे। 

14. रहिमन धागा प्रेम का, मत तोड़ो चटकाय।
टूटे से फिर ना जुड़े, जुड़े गाँठ पड़ जाय॥

विस्तृत अर्थ: प्रेम का संबंध बहुत नाज़ुक होता है; एक बार टूट जाए तो दोबारा जुड़ने पर भी उसमें गाँठ रह जाती है।

15. एकही साधे सब सधै, सब साधे सब जाय।
रहिमन मूल सींच बोये, फूल लहि अघाय॥

विस्तृत अर्थ: यदि मूल कारण पर ध्यान दिया जाए तो सभी कार्य सफल हो जाते हैं; इधर-उधर भटकने से सब कुछ नष्ट हो जाता है।

16. रहिमन ओछे नरन सो, बैर भली न कीत।
काटे चाटे स्वान के, दोऊ भाँति ती प्रतीत॥

विस्तृत अर्थ: नीच व्यक्ति से शत्रुता दोनों ही स्थितियों में नुकसानदायक होती है, चाहे वह नुकसान करे या दिखावटी प्रेम दिखाए।

17. जो रहीम गति दीप की, कुल कपूत गति सोय।
बारे उजियारो करे, बढ़े अँधेरो होय॥

विस्तृत अर्थ: कुपुत्र परिवार का नाम रोशन करने के बजाय बदनामी लाता है, जैसे दीपक बुझने पर अंधकार बढ़ जाता है।

18.  रहिमन चुप हो बैठिए, देखि दिनन को फेर।
जब नीके दिन आइहैं, बनत न लागै बेर॥

विस्तृत अर्थ: बुरे समय में धैर्य और मौन रखना चाहिए, क्योंकि अच्छे दिन आने पर परिस्थितियाँ स्वयं सुधर जाती हैं।

19. रहिमन प्रेम न छाँड़िए, लघु जन जानि।
कूँजा पथिक न छोड़ई, देखि बावड़ी पानी॥

विस्तृत अर्थ: छोटे व्यक्ति या छोटे साधन को तुच्छ न समझें, क्योंकि संकट में वही सहारा बन सकता है।

20. रहिमन मीत बनाइए, कठिन समय के काम।
आपत्ति काज न आवहीं, संपत्ति साँचि सुजान॥

विस्तृत अर्थ: सच्चे मित्र वही होते हैं जो संकट में साथ दें; धन केवल सुरक्षित रखा जा सकता है, मदद नहीं कर सकता।

21. रहिमन गति अगम्य है, प्रेम की रीति अपार।
दादुर डूबे पंक में, मीन न उबरै पार॥

विस्तृत अर्थ: प्रेम की शक्ति और उसकी गति को समझना कठिन है; इसमें अयोग्य डूब जाते हैं और योग्य भी पार नहीं पा पाते।

22. रहिमन जिह्वा बावरी, कह गई सरग पाताल।
आप तो कह भीतर रही, जूता खात कपाल॥

विस्तृत अर्थ: असंयमित वाणी मनुष्य को अपमान और संकट में डाल देती है, जबकि बोलने वाली जिह्वा स्वयं सुरक्षित रहती है।

23. रहिमन हानि लाभ जीवन मरण, यश अपयश विधि हाथ।
जेति बने तित होइये, एहि विधि रहीम रीत॥

विस्तृत अर्थ: लाभ-हानि, जीवन-मरण और मान-अपमान सब विधि के हाथ में हैं; इसलिए जो मिले उसे स्वीकार करना चाहिए।

24. 
ओछो काम बड़े करैं तौ न बड़ाई होय।
ज्‍यों रहीम हनुमंत को, गिरधर कहै न कोय॥

विस्तृत अर्थ: यदि कोई छोटा या सामान्य व्यक्ति कोई बड़ा काम करता है, तो भी उसकी बड़ाई नहीं होती, जैसे हनुमान को कोई कृष्ण (गिरधर) नहीं कहता।

25. रहिमन यह तन विष की बेलरी, गुरु अमृत की खान।
सीस दिए जो गुरु मिले, तो भी सस्ता जान॥

विस्तृत अर्थ: यह शरीर नश्वर और विष के समान है, जबकि गुरु का ज्ञान अमृत तुल्य है; गुरु के लिए जीवन भी न्योछावर करना सस्ता सौदा है।


“बचपन में पिता जी ने ये दोहे सिखाए थे—आज समझ आता है कि ये सिर्फ़ कविता नहीं, जीवन के सबसे गहरे पाठ थे।”

Dec 31, 2025

UP Board Hindi Book "महान व्यक्तित्व" (पूर्व नाम – हमारे पूर्वज) के प्रेरक दोहे

1. चढ़ै टरै सूरज टरै, टरै जगत व्यवहार। पै दृढ़ हरिचंद को, टरै न सत्य विचार।।

2. नौ लख पातर आगे नाचै, पीछे सहज अखाड़ा।  ऐसो मन लै जोगी खेलै तव अंतर बसै भंडारा।।   गोरखनाथ

3. गोरी सोवे सेज पर, मुख पर डारै केस। चल खुसरो घर आपल्या, साँझ भई चहुँ देस।। – अमीर खुसरो

4. परहित सरिस धरम नहि भाई। पर पीड़ा सम नहि अधमाई।। – तुलसीदास

5. सुरतिय, नरतिय, नागतिय, यह चाहत सब कोय। गोद लिए लली फिरै, तुलसी सो सुत होय।। – तुलसीदास

6. हे री! मैं तो प्रेम दिवानी, मेरो दरद न जाने कोय।  सूली ऊपर सेज हमारी, सोवण कोन विध होय।। – मीराबाई

7. मेरे तो गिरधर गोपाल, दूसरो न कोई। जाके सिर मोर मुकुट, मेरो पति सोई।।-  मीराबाई

8. चकित में रहिमन रहै, रहिमन जब पर विपदा पड़े। अवध नरेस वह आवत यह देस।। – रहीम

9. जो गरीब सहत कर, कहाँ सुदामा‑धन रहीम? वे बापुरे लोग, कृष्ण मथाई जोग। – रहीम

10. कबिरा हर के ठाठ ते, गु के सरन न जाइ। गु के ठाठ नित नवें, हर ठाढ़ रहें सहाइ॥ - कबीरदास

11. निंदक नियरे राखिए, आँगन कुटी छवाय।  बिन पानी, साबुन बिना, निर्मल करे सुभाय॥ -  कबीरदास

12. आजु जो हरिहि नहिं दुःख गहाऊँ, तौ लाज गंगा जननी को; शान्तनु सुत न कहाऊँ। -भीष्म प्रतिज्ञा

13. भला भयो विधि ना धियो शेषनाग के कान धरा मेरु सब डोलते तानसेन की तान ।

14. विद्या बिना मति गई, मति बिना गति गई, गति बिना नीति गई, नीति बिना वित्त गया, वित्त बिना शूद्र खचले।

15. अब न अहले वलवले हैं और न अरमानों की भीड़। एक मिट जाने की हसरत अब दिल-ए-बिस्मिल में है ।

16. कुछ आरजू नहीं है, है आरजू तो यह। रख दे कोई ज़रा सी ख़ाक़े वतन कफ़न में।

हमारे पूर्वज" (Hamare Purvaj) नाम की किताबें यूपी बोर्ड में पहले पढ़ाई जाती थीं, खासकर जूनियर कक्षाओं (जैसे कक्षा 6 - 8) में, लेकिन अब ये किताबों के नाम बदल गए हैं या इनका पाठ्यक्रम बदल गया है, और अब ये किताबें 'महान व्यक्तित्व' (Mahan Vyaktitva) जैसे नामों से या अन्य विषयों के तहत मिल सकती हैं, जो शुरुआती भारतीय इतिहास और पूर्वजों के बारे में जानकारी देती हैं

Dec 24, 2025

अरावली के आख़िरी दिन

एक मधुमक्खी परागकणों के साथ

उड़ते-उड़ते थक जाएगी।

सभी बहेलिए जाल को देखकर

उलझन में पड़ जाएँगे।

एक नन्हा ख़रगोश लू की बौछार में

हाँफते-हाँफते थक जाएगा।

चेतना आकुलित बघेरे कहीं नहीं दिखेंगे

इस निरीह-निर्वसन धरती पर।

अरावली के आख़िरी दिन

युवतियाँ छाता लेकर सैर करने जाएँगी

और लॉन में टहलकर लौट आएँगी।

एक शराबी चंद्रमा की रोशनी में

बहेलिए बस्तियों की ओर लौटते नज़र आएँगे।

कुछ पीले चेहरे सब्ज़ियों के ठेले लेकर

मुहल्लों में रेंगते हुए आवाज़ें देंगे।

बिना तारों वाली सघन अँधेरी रात में

रावण-हत्थे की आवाज़ के साथ तैरेगी

बच रह गए एक गीदड़ की टीस।

और जिन्हें नीले नभ में बिजलियाँ चमकने,

बादल गरजने और वर्षा की बूँदों का इंतिज़ार है,

सूखे काले अँधेरे में आँख मिचमिचाते और

कानों में कनिष्ठिकाएँ हिलाते थक जाएँगे।

और जिन्हें किताबें पढ़ने का शौक होगा,

शब्दकोश में साँप का अर्थ ढूँढ़कर

अपने बच्चों को कालबेलिया जोगियों की कथा सुनाएँगे

और सुनहरे केंचुल ओढ़े कोई देवता

सितारों की ओट में धरती को भरी आँख से निर्निमेष निहारेगा।

हालाँकि बात ऐसी है


अरावली की कोई एक तस्वीर देखकर

सूरज और चाँद के नीचे सुन नहीं पाता कोई

कभी ख़त्म न होने वाली बिलख, जो हर

इमारत की नींव तले दबी फूटती रहती है।

बड़ी आलीशान इमारतों में खिलते रहते हैं

ख़ूबसूरत गुलाबों जैसे नन्हे शिशु

और इसीलिए किसी को विश्वास नहीं होता कि

अरावली के आख़िरी दिन अरावली ऐसी होगी?

अरावली के आख़िरी दिन ऐसा ज़रूर होगा

एक अवतारी पुरुष आएँगे

एक नबी पुकारेगा

लेकिन बात ऐसी है कि वे दोनों आईफ़ोन पर व्यस्त होंगे

उन्हें न धनिए, न हरी मिर्च, न मेथी, न आलू,

न टमाटर, न ज़ीरे और न हरे चने की ज़रूरत होगी,

क्योंकि उनके बैग में

मैक्डॉनल्ड के बर्गर, मैकपफ़ और सालसा रैप होंगे।

अरावली का इसके अलावा यहाँ और क्या अंत होगा?

अरावली का इसके अलावा वहाँ और क्या अंत होगा?

स्रोत :रचनाकार : त्रिभुवन

प्रकाशन : हिन्दवी के लिए लेखक द्वारा चयनित

सौरभ द्विवेदी ने कविता “अरावली के आख़िरी दिन” अपने अंदाज़ में पढ़ी है और इसे आज के अरावली के दर्द से जोड़ दिया है। 

संदर्भ : सुप्रीम कोर्ट ने नवंबर 2025 में अरावली पहाड़ियों की नई परिभाषा को मंजूरी दी, जिसमें 100 मीटर ऊंचाई से कम की पहाड़ियों को बाहर रखा गया, जिससे राजस्थान के 91% से अधिक क्षेत्र असुरक्षित हो गए। यह फैसला पर्यावरण मंत्रालय की सिफारिश पर आधारित था, लेकिन सुप्रीम कोर्ट की ही समिति (सीईसी) और भारतीय वन सर्वेक्षण (एफएसआई) ने इसका विरोध किया, क्योंकि इससे अवैध खनन को बढ़ावा मिलेगा।अरावली, जो दुनिया की सबसे प्राचीन पर्वतमाला है, दिल्ली-एनसीआर को रेगिस्तान से बचाती है, भूजल रिचार्ज करती है और जैव विविधता का केंद्र है, लेकिन पिछले दो दशक में 25-35% हिस्सा खनन से नष्ट हो चुका।ग्रामीणों, पर्यावरणविदों और आदिवासी समुदायों ने जयपुर, अलवर, उदयपुर जैसे क्षेत्रों में बड़े प्रदर्शन शुरू कर दिए, जहाँ गुर्जर-मेव किसान उपवास, जनसभाएँ और हस्ताक्षर अभियान चला रहे हैं।"अरावली विरासत जन अभियान" के तहत चार राज्यों के प्रतिनिधि खनन माफियाओं के खिलाफ एकजुट हुए, मांग की कि पूरी 692 किमी रेंज को पारिस्थितिक क्षेत्र घोषित कर नई खदानों पर पूर्ण रोक लगे।कार्यकर्ता राजेंद्र सिंह और नीलम अहुवालिया जैसे नेता चेतावनी दे रहे हैं कि यह फैसला मरुस्थलीकरण, जल संकट और प्रदूषण को बढ़ेगा, जबकि कोर्ट ने सस्टेनेबल माइनिंग प्लान तक नई लीज पर रोक का निर्देश दिया है।यह संघर्ष पर्यावरण रक्षा से आगे लोकतांत्रिक अधिकारों की लड़ाई बन गया है।

Dec 19, 2025

यह वह बनारस नहीं गिंसबर्ग

'हाउल' नहीं गिंसबर्ग
परवर्ती पीढ़ी हमारी

नहीं मालूम जिसे क्यों कब
किसने लिखा कुछ पढ़कर सो कुछ लिखकर सो

देख रही बिकती बोटियाँ जिगर कीं
छह दो सात पाँच बोली न्यूयॉर्क-टोक्यो की

हाँ ऐलेन क्यों आए थे बनारस
यहाँ तो छूटा फॉर्टी सेकंड स्ट्रीट बहुत पीछे

कुत्तों ने किया हमेशा सड़कों पर संभोग यहाँ
रंग-बिरंगी नंगी रंभाएँ बेच रहा ईश्वर ख़ुराक आज़ादी के मसीहे की

चीत्कार इस पीढ़ी की नहीं बनेगी लंबी कविता नहीं बजेंगे ढोल
यह वह बनारस नहीं बीटनिक बहुत बड़ा गड्ढा है

रेंग रहा कीड़ा जिसमें
नहीं किसी और ग्रह का, मेरा ही दिमाग़ है लिंग है

हे भगवान चली गोलियाँ छत्तीसगढ़
भाई मेरा भूमिगत मैं क्यों गड्ढे में फिर

पाखंडी पीढ़ी मेरी
जाँघियों में खटमल-सी

भूखी बहुत भूखी
बनारस ले गए कहाँ तुम

जाएँ कहाँ हम छिपकर इन ख़ाली-ख़ाली तक़दीरों से
इन नंगे राजाओं से

कहाँ वह औरत वह मोक्षदात्री
बहुत प्यार है उससे

चाहा मैंने भी विवस्त्र उसे हे सिद्धार्थ
भूखे मरते मजूर वह क्यों फैलाती जाँघें

कहते कोई डर नहीं उसे एड्स का
बहुत दुखी इस पीढ़ी का पीछे छूटा यह बीमार

कई शीशों के बीच खड़ा ढोता लाशें अनगिनत
उठो औरतों प्यार करो हमसे

बना दो दीवार बाँध की हमें
कहो गिंसबर्ग कहो हमें गाने को यह गीत

बनारस नहीं आवाज़ हमारी अंतिम कविता
कहो।

--- लाल्टू

Dec 10, 2025

खेले मसाने में होरी दिगम्बर

खेले मसाने में होरी दिगम्बर
भुत पिसाच बटोरी दिगंबर खेले मसाने में होरी,

लखि सूंदर फागुनी झता के,
मन से रंग गुलाल हटा के,
चिता बसम की झोरी दिगंबर खेले मसाने में होरी,

नाचत गावत डमरू धारी,
छोडत सर पे गर्ल पिचकारी,
बीते प्रेत थपोरी दिगंबर खेले मसाने में होरी,

भुत नाथ की मंगल होरी,
देख सिहाये ब्रिज की छोरी,
धन धन नाथ अगोहरी,
दिगंबर खेले मसाने में होरी,

गोप न गोपी श्याम न राधा,
ना कोई रोक न कोहनू वाधा
न साजन न गोरी, दिगंबर खेले मसाने में होरी |

"खेले मसाने में होरी दिगम्बर" एक प्रसिद्ध भजन और लोकगीत है जो खासकर काशी (वाराणसी) के मणिकर्णिका घाट पर होली के त्योहार के दौरान गाया जाता है। इस गीत में भगवान शिव की महिमा का वर्णन होता है, जो श्मशान (मसाना) की पवित्रता और शक्ति को दर्शाता है।

Dec 6, 2025

हिंदू मुस्लिम करने वाले देश के दुश्मन

उजले कपड़े, मन के काले देश के दुश्मन
हिंदू मुस्लिम करने वाले देश के दुश्मन

दूर दूर तक देख न पाने की मजबूरी
हिलते से आंखों के जाले देश के दुश्मन

बंद पड़े दरवाज़े, आख़िर कैसे खोलें
ज़हनों पर लटके से ताले देश के दुश्मन

ज़हर भरा सा राग लिये अपने होठों पर
बहुत बेसुरे, ये बेताले देश के दुश्मन

एक बार फिर चिता पे रोटी सेंक रहे हैं
बहते से नफ़रत के नाले देश के दुश्मन

दो पग चलना मुश्किल, बोलें तो क्या बोलें
पैरों और ज़बान के छाले देश के दुश्मन

देखो जमकर करें सियासत संकट में भी
तरह तरह के गड़बड़झाले देश के दुश्मन

फ़सल वोट की, रक्त सनी धरती की छाती
खादी पहने ये परकाले देश के दुश्मन

मां का आंचल तार तार करने में आगे
भारत मां के ये रखवाले देश के दुश्मन

धज्जी धज्जी उड़ा रहे हैं मर्यादा की
राम नाम के ये मतवाले देश के दुश्मन

बड़ी आपदा इनकी ख़ातिर अवसर जैसी
बड़े अनोखे बड़े निराले देश के दुश्मन

--- यश मालवीय

Nov 26, 2025

इश्क़ जलाकर - Ishq Jalakar | Karvaan - Hindi Lyrics– Dhurandhar Movie

धूप टूट के
कांच की तरह
चुभ गई तो क्या
अब देखा जाएगा आंधियां कई
दिल में है मेरे
चुभ गई तो क्या
अब देखा जाएगा दिल है टूटा
मेरा मैं इश्क जला कर आ गया...

दिल है टूटा
मेरा मैं इश्क जला कर आ गया
आंधी बन के आया हूं
मेरा हौसला भी अय्याश है...
ना तो कारवां की तलाश है
ना तो कारवां की तलाश है
ना तो हमसफर की तलाश है
ना तो कारवां की तलाश है

आधी बातें आँखें बोले
आधी बातें आँखें बोले
बाकी आधी खामोशी कह दे...
हमजुबान की तलाश है
ना तो कारवां की तलाश है
ना तो कारवां की तलाश है
ना तो हमसफर की तलाश है
मेरा शौक तेरा दीदार है
यही उम्र भर की तलाश है

- इरशाद कामिल और साहिर लुधियानवी



Nov 24, 2025

ये एक मेला है वादा किसी से क्या लेगा

मैं इस उम्मीद पे डूबा के तू बचा लेगा
अब इसके बाद मेरा इम्तेहान क्या लेगा

ये एक मेला है वादा किसी से क्या लेगा
ढलेगा दिन तो हर एक अपना रास्ता लेगा

मैं बुझ गया तो हमेशा को बुझ ही जाऊंगा
कोई चराग़ नहीं हूं जो फिर जला लेगा

कलेजा चाहिए दुश्मन से दुश्मनी के लिए
जो बे-अमल है वो बदला किसी से क्या लेगा

मैं उसका हो नहीं सकता बता न देना उसे
सुनेगा तो लकीरें हाथ की अपनी जला लेगा

हज़ार तोड़ के आ जाऊं उस से रिश्ता वसीम
मैं जानता हूं वो जब चाहेगा बुला लेगा

--- वसीम बरेलवी

Nov 6, 2025

बुद्ध भगवान

बुद्ध भगवान,

अमीरों के ड्राइंगरूम,

रईसों के मकान

तुम्हारे चित्र, तुम्हारी मूर्ति से शोभायमान।

पर वे हैं तुम्हारे दर्शन से अनभिज्ञ,

तुम्हारे विचारों से अनजान,

सपने में भी उन्हें इसका नहीं आता ध्यान।

--- हरिवंश राय 'बच्चन'

Oct 31, 2025

15 बेहतरीन शेर - 18 !!!

1. चला था ज़िक्र मेरी खामियों का महफ़िल में, जो लोग बहरे थे उनको सुनाई देने लगे - सलीम सिद्दीक़ी

2. रहता है सिर्फ एक ही कमरे में आदमी उसका गुरूर रहता है बाकी मकान में। - महशर अफरीदी

3. उसके फ़रोग़-ए-हुस्न से झमके है सब में नूर, शमा-ए-हरम हो या कि दिया सोमनाथ का - मीर

4. अब्र था कि ख़ुशबू था, कुछ ज़रूर था एक शख़्स, हाथ भी नहीं आया, पास भी रहा एक शख़्स - ज़फ़र गोरखपुरी

5. ज़िक्र जब होगा मोहब्बत में तबाही का कहीं, याद हम आएँगे दुनिया को हवालों की तरह - सुदर्शन फ़ाक़िर

6. जिन की यादें हैं अभी दिल में निशानी की तरह, वो हमें भूल गए एक कहानी की तरह -वाली आसी

7. काबिल तो हैं कामयाब़ भी हो जाएंगे, ये ज़ुगनू ही एक दिन, आफ़ताब हो ज़ाएंगे। - ~प्रह्लाद पाठक

8. हमने तमाम उम्र अकेले सफ़र किया, हमपर किसी खुदा की इनायत नहीं रही। - दुष्यंत कुमार

9. कम हैं सिपाही फ़ौज में सरदार बहुत हैं, यह जंग हार जाने के आसार बहुत हैं  - अज्ञात

10. इस सफ़र में नींद ऐसी खो गई,  हम न सोए रात थक कर सो गई - -राही मासूम रज़ा

11. तुम्हें नींद नहीं आती तो कोई और वजह होगी, अब हर ऐब के लिए कसूरवार इश्क़ तो नहीं..! - अज्ञात

12. बच्चों की फ़ीस उन की किताबें क़लम दवात, मेरी ग़रीब आँखों में स्कूल चुभ गया - मुनव्वर राना

13. अपने बच्चों को मैं बातों में लगा लेता हूं,  जब भी आवाज़ लगाता है खिलौने वाला -राशिद राही

14. आने वाले जाने वाले हर ज़माने के लिए आदमी मज़दूर है राहें बनाने के लिए -हफ़ीज़ जालंधरी

15. कुचल कुचल के न फ़ुटपाथ को चलो इतना, यहाँ पे रात को मज़दूर ख़्वाब देखते हैं - अहमद सलमान

Oct 27, 2025

आनेवाला ख़तरा

इस लज्जित और पराजित युग में
कहीं से ले आओ वह दिमाग़
जो ख़ुशामद आदतन नहीं करता

कहीं से ले आओ निर्धनता
जो अपने बदले में कुछ नहीं माँगती

और उसे एक बार आँख से आँख मिलाने दो
जल्दी कर डालो कि फलते-फूलनेवाले हैं लोग

औरतें पिएँगी आदमी खाएँगे—रमेश
एक दिन इसी तरह आएगा—रमेश
कि किसी की कोई राय न रह जाएगी—रमेश
क्रोध होगा पर विरोध न होगा
अर्ज़ियों के सिवाय—रमेश

ख़तरा होगा ख़तरे की घंटी होगी
और उसे बादशाह बजाएगा—रमेश

--- रघुवीर सहाय 
पुस्तक : प्रतिनिधि कविताएँ 

Oct 8, 2025

गाज़ा का कुत्ता

वह जो कुर्सी पर बैठा
अख़बार पढ़ने का ढोंग कर रहा है
जासूस की तरह
वह दरअसल मृत्यु का फ़रिश्ता है ।

क्या शानदार डॉक्टरों जैसी बेदाग़ सफ़ेद पोशाक है उसकी
दवाओं की स्वच्छ गंध से भरी
मगर अभी जब उबासी लेकर अख़बार फड़फड़ाएगा,
जो दरअसल उसके पंख हैं
तो भयानक बदबू से भर जायेगा यह कमरा
और ताजा खून के गर्म छींटे
तुम्हारे चेहरे और बालों को भी लथपथ कर देंगे
हालांकि बैठा है वह समुद्रों के पार
और तुम जो उसे देख प् रहे हो

वह सिर्फ तकनीक है
ताकि तुम उसकी सतत उपस्तिथि को विस्मृत न कर सको

बालू पर चलते हैं अविश्वसनीय रफ़्तार से सरसराते हुए भारी-भरकम टैंक
घरों पर बुलडोजर
बस्तियों पर बम बरसते हैं
बच्चों पर गोलियां

एक कुत्ता भागा जा रहा है
धमाकों की आवाज़ के बीच
मुंह में किसी बच्चे की उखड़ी बची हुई भुजा दबाये
कान पूँछ हलके से दबे हुए
उसे किसी परिकल्पित
सुरक्षित ठिकाने की तलाश है
जहाँ वह इत्मीनान से
खा सके अपना शानदार भोज
वह ठिकाना उसे कभी मिलेगा नहीं ।

--- वीरेन डंगवाल

Oct 5, 2025

किसान की आवाज़ | The Voice of the Farmer - Poem in Jolly LLB 3 Movie

छप्पर टपकता रहा मेरा फिर भी

मैंने बारिश की दुआ की

मेरे दादा को परदादा से

पिता को दादा से

और मुझे पिता से जो विरासत मिली

वही सौंपना चाहता था मैं अपने बेटे को

देना चाहता था थोड़ी-सी ज़मीन

और एक मुट्ठी बीज कि

सबकी भूख मिटाई जा सके

इसलिए मैंने यकीन किया

उनकी हर एक बात पर

भाषण में कहे जज्बात पर

मैं मुग्ध होकर देखता रहा

आसमान की तरफ उठे उनके सर

और उन्होंने मेरे पैरों के नीचे से जमीन खींच ली

मुझे अन्नदाता होने का अभिमान था

यही अपराध था मेरा कि

मैं एक किसान था।

संदर्भ:कविता हिंदी के यथार्थवादी कवि गजानन माधव मुक्तिबोध से प्रेरित है। फिल्म "जॉली एलएलबी 3" में किसान की आत्मकथा की तरह सुनाई गई वह कविता हिंदी साहित्य के महान कवि गजानन माधव मुक्तिबोध की प्रेरणा से बनायी गई है। यह कविता किसान की भावनाओं और संघर्ष को गहरे और मार्मिक ढंग से प्रस्तुत करती है।

प्रश्नोत्तर तरह के जोगीरा (Jogira sa ra ra )

1. कय हाथ के धोती पेन्हा,  कय हाथ लपेटा?

कय पान का बीरा खाया,  कय बाप के बेटा?

सात हाथ का धोती पेन्हा, पाँच हाथ लपेटा ।

चार पान का बीड़ा खाया,  एक बाप का बेटा ।

जोगीरा सा रा रा रा।

2. कोन समय में धरती फाटल, कोन समय असमान,

कोन समय में सिया हरण भेल खोजै छथि भगवान

सतयुग में धरती फाटल, द्वापर में असमान

त्रेता युग में  सिया हरण भेल, खोजै छथि भगवान!
 
जोगीरा सा रा रा रा।

फगुआ रंग, तरंग आ उमंग आनय।

3.  कौन काठ के बनी खड़ौआ, कौन यार बनाया है?

कौन गुरु की सेवा कीन्हो, कौन खड़ौआ पाया?

चनन काठ के बनी खड़ौआ, बढ़यी यार बनाया हो।

हम गुरु की सेवा कीन्हा, हम खड़ौआ पाया है।

जोगी जी वाह वाह, जोगी जी सारा रा रा।


4.  किसके बेटा राजा रावण किसके बेटा बाली?

किसके बेटा हनुमान जी जे लंका जारी?

विसेश्रवा के राजा रावण बाणासुर का बाली।

पवन के बेटा हनुमान जी, ओहि लंका के जारी।

जोगी जी वाह वाह, जोगी जी सारा रा रा।


5. किसके मारे अर्जुन मर गए किसके मारे भीम?

किसके मारे बालि मर गये, कहाँ रहा सुग्रीव?

कृष्ण मारे आर्जुन मर गए कृष्ण के मारे भीम।

राम के मारे बालि मर गए लड़ता था सुग्रीव।

जोगी जी वाह वाह, जोगी जी सारा रा रा।

Oct 1, 2025

बनारस की गली / नज़ीर बनारसी

हर गाम पे हुशियार बनारस की गली में
फ़ितने भी हैं बेदार बनारस की गली में

ऐसा भी है बाज़ार बनारस की गली में
बिक जायें ख़रीदार बनारस की गली में

हुशियारी से रहना नहीं आता जिन्हें इस पार
हो जाते हैं उस पार बनारस की गली में

सड़कों पे दिखाओगे अगर अपनी रईसी
लुट जाओगे सरकार, बनारस की गली में

दूकान पे रूकिएगा तो फिर आपके पीछे
लग जायेंगे दो-चार बनारस की गली में

हैरत का यह आलम है कि हर देखने वाला
है ऩक्श ब दीवार बनारस की गली में

मिलता है निगाहों को सुकूँ हृदय को आराम
क्या प्रेम है क्या प्यार बनारस की गली में

हर सन्त के, साधू के, ऋषि और मुनि के
सपने हुए साकार बनारस की गली में

शंकर की जटाओं की तरह साया फ़िगन
साया करने वाला, सरपरस्ती छाँह देने वाला है

हर साया-ए-दीवार बनारस की गली में
गर स्वर्ग में जाना हो तो जी खोल के ख़रचो
मुक्ति का है व्योपार बनारस की गली में

Sep 29, 2025

निराला की कविता में संगीत

ताक कमसिनवारि,
ताक कम सिनवारि,
ताक कम सिन वारि,
सिनवारि सिनवारि।
ता ककमसि नवारि,
ताक कमसि नवारि,
ताक कमसिन वारि,
कमसिन कमसिनवारि।

इरावनि समक कात्,
इरावनि सम ककात्,
इराव निसम ककात्,
सम ककात् सिनवारि।


यह पोस्ट निराला के जीवन के अंतिम वर्षों में लिखा गया एक अनोखा और ध्वन्यात्मक गीत प्रस्तुत करता है, जो उनकी मृत्यु के बाद "सान्ध्य काकली" में संकलित हुआ। यह गीत पारंपरिक ध्रुपद गायन की शैली के समान शब्दों के उलटफेर और पुनरावृत्ति से भरा है, जिसे रामविलास शर्मा ने निराला की "क्लासिकी" संगीत रचना बताया है।

Sep 26, 2025

प्यार की गंगा बहे (Pyar Kee Ganga Bahe)

सुन सुन सुन मेरे नन्हे सुन,
सुन सुन सुन मेरे मुन्ने सुन,
प्यार की गंगा बहे, देश में एकता रहे।

सुन सुन सुन मेरी नन्ही सुन,
सुन सुन सुन मेरी मुन्नी सुन,
प्यार की गंगा बहे, देश में एकता रहे।

ख़त्म काली रात हो, रोशनी की बात हो,
दोस्ती की बात हो, ज़िन्दगी की बात हो।
बात हो इंसान की, बात हो हिन्दुस्तान की,
सारा भारत ये कहे –
प्यार की गंगा बहे, प्यार की गंगा बहे,
देश में एकता रहे।

अब ना दुश्मनी पाले, अब ना कोई घर जले,
अब नहीं उजड़े सुहाग, अब नहीं फैले ये आग।
अब ना हों बच्चे अनाथ, अब ना हो नफ़रत की घाट,
सारा भारत ये कहे –
प्यार की गंगा बहे, प्यार की गंगा बहे,
देश में एकता रहे।

सारे बच्चे बच्चियाँ, सारे बूढ़े और जवाँ,
यानि सब हिन्दुस्तान।
एक मंज़िल पर मिलें, एक साथ फिर चलें,
एक साथ फिर रहें, एक साथ फिर कहें।
एक साथ फिर कहें, फिर कहें –
प्यार की गंगा बहे, प्यार की गंगा बहे,
देश में एकता रहे,
देश में एकता रहे, सारा भारत ये कहे,
सारा भारत ये कहे –
देश में एकता रहे।  

गीत “प्यार की गंगा बहे” 1993 में निर्देशक सुभाष घई ने सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय के आग्रह पर बनाया, जब बाबरी मस्जिद विध्वंस के बाद देश में साम्प्रदायिक तनाव था। गीतकार जावेद अख्तर और संगीतकार लक्ष्मीकांत–प्यारेलाल ने इसे रचा। इसमें बॉलीवुड सितारे सलमान खान, आमिर खान, अनिल कपूर, गोविंदा, जैकी श्रॉफ, ऋषि कपूर, नसीरुद्दीन शाह तथा दक्षिण और क्षेत्रीय सितारे रजनीकांत, मम्मूटी, चिरंजीवी, प्रसेंजीत, सचिन पिलगांवकर आदि शामिल हुए। सभी कलाकारों ने बिना पारिश्रमिक भाग लेकर अपने बच्चों को भी इसमें शामिल किया। गीत का उद्देश्य था देश में प्रेम, भाईचारा और एकता का संदेश फैलाना।

Sep 7, 2025

Alif Laila - Title Song Lyrics - Doordarshan

अलिफ लैला ओ ओ…

अलिफ लैला, अलिफ लैला, अलिफ लैला ओ ओ

अलिफ लैला, अलिफ लैला, अलिफ लैला

हर शब नई कहानी

दिलचस्प है बयानी

सदियाँ गुज़र गयी है

लेकिन न हो पुरानी

परियों को जीत लाये

जीनो को भी हराए

इंसान में वो ताकत

सब पे करे हुकूमत

अलिफ लैला ओ ओ ओ….

Aug 28, 2025

Baje sargam har taraf se goonj bankar...

बजे सरगम हर तरफ से, 
गूँज बनकर देश राग, देश राग। 
ताल कदमों पे जागे जाय, 
लब पे जागे गीत ऐसा, 
गूँजे बनकर देश राग।

इस गीत का मतलब है कि देश की समृद्ध सांस्कृतिक विरासत की धुन हर तरफ बज रही है, जो सभी को जोड़ती है और आगे बढ़ने की ताकत देती है। इसमें भारत के मशहूर गायक, वादक और नर्तकी देश की मुख्य परंपरागत कलाओं का सुंदर प्रदर्शन करते हैं। राग जो कि शास्त्रीय संगीत की आत्मा है, के साथ तबला, संतूर, सरोद, सितार, कथक, भरतनाट्यम, मणिपुरी और ओड़िसी जैसे कई नृत्य और संगीत शैलियाँ इस वीडियो में एक ही संगति में भारत की एकता और खूबसूरती को दर्शाती हैं।


   

Aug 21, 2025

ऐ उम्र..! कुछ कहा मैंने

ऐ उम्र..!

कुछ कहा मैंने,
पर शायद तूने सुना नहीं..
तू छीन सकती है बचपन मेरा,
पर बचपना नहीं..!!

हर बात का कोई जवाब नहीं होता
हर इश्क का नाम खराब नहीं होता…
यूं तो झूम लेते है नशे में पीनेवाले
मगर हर नशे का नाम शराब नहीं होता…

खामोश चेहरे पर हजारों पहरे होते हैं
हंसती आँखों में भी जख्म गहरे होते हैं
जिनसे अक्सर रूठ जाते हैं हम,
असल में उनसे ही रिश्ते गहरे होते हैं…

किसी ने खुदा से दुआ मांगी
दुआ में अपनी मौत मांगी,
खुदा ने कहा, मौत तो तुझे दे दूँ मगर,
उसे क्या कहूं जिसने तेरी जिंदगी की दुआ मांगी…

हर इन्सान का दिल बुरा नहीं होता
हर एक इन्सान बुरा नहीं होता
बुझ जाते है दीये कभी तेल की कमी से…
हर बार कुसूर हवा का नहीं होता !!!