Showing posts with label Pakistan. Show all posts
Showing posts with label Pakistan. Show all posts

Aug 21, 2026

Urdu Shayari (Poetry) & Dialogues from Parizaad Serial

### **1. "Tum Toh Siyah Mein Bhi Jachti Ho" (University Scene)**


> **Devanagari (हिंदी):**

> जब धीमे-धीमे हँसती हो, उस बारिश जैसी लगती हो।

> थोड़ी दिल की कहती हो, ज़्यादा दिल में रखती हो।

> क्यों जाऊँ रंगरेज़ के पास, तुम तो सियाह में भी जचती हो।

> करने दो उन्हें सिंगार, तुम सादा भी सजती हो।


> **Urdu (اردو):**

> جب دھیمے دھیمے ہنستی ہو، اس بارش جیسی لگتی ہو۔

> تھوڑی دل کی کہتی ہو، زیادہ دل میں رکھتی ہو۔

> کیوں جاؤں رنگ ریز کے پاس، تم تو سیاہ میں بھی جچتی ہو۔

> کرنے دو انہیں سنگھار، تم سادہ بھی سجتی ہو۔


> **Roman Urdu:**

> *Jab dheeme dheeme hasti ho, us barish jaisi lagti ho.*

> *Thodi dil ki kehti ho, zyada dil mein rakhti ho.*

> *Kyun jaaon rangrez ke paas, tum toh siyah mein bhi jachti ho.*

> *Karne do unhein singaar, tum saada bhi sajti ho.*


---


### **2. "Sitare Jo Damakte Hain"**


> **Devanagari (हिंदी):**

> सितारे जो दमकते हैं, किसी की चश्म-ए-हैरान में

> मुलाक़ातें जो होती हैं, जमाल-ए-अब्र-ओ-बारान में

> ये ना-आबाद वक़्तों में, दिल-ए-नाशाद में होगी

> मोहब्बत अब नहीं होगी, ये कुछ दिन बाद में होगी

> गुज़र जाएँगे जब ये दिन, ये उन की याद में होगी


> **Urdu (اردو):**

> ستارے جو دمکتے ہیں، کسی کی چشمِ حَیراں میں

> ملاقاتیں جو ہوتی ہیں، جمالِ ابرِ باراں میں

> یہ نا آباد وقتوں میں، دلِ ناشاد میں ہوگی

> محبت اب نہیں ہوگی، یہ کچھ دن بعد میں ہوگی

> گزر جائیں گے جب یہ دن، یہ ان کی یاد میں ہوگی


> **Roman Urdu:**

> *Sitare jo damakte hain, kisi ki chashm-e-hairaan mein*

> *Mulaqatein jo hoti hain, jamaal-e-abr-o-baaraan mein*

> *Ye na-aabaad waqton mein, dil-e-naashaad mein hogi*

> *Mohabbat ab nahi होगी, ye kuch din baad mein hogi*

> *Guzar جائیں ge jab ye din, ye un ki yaad mein hogi*


---


### **3. "Qissay Meri Ulfat Ke"**


> **Devanagari (हिंदी):**

> क़िस्से मेरी उल्फ़त के जो मरक़ूम हैं सारे,

> आ देख तेरे नाम से मन्सूब हैं सारे।

> शायद ये ज़र्फ़ है जो ख़ामोश हूँ अब तक,

> वरना तो तेरे ऐब भी मालूम हैं सारे।

> सब जुर्म मेरी ज़ात से मन्सूब हुए,

> क्या मेरे सिवा इस शहर में मासूम हैं सारे?


> **Urdu (اردو):**

> قصے میری الفت کے جو مرقوم ہیں سارے

> آ دیکھ تیرے نام سے منسوب ہیں سارے

> شاید یہ ظرف ہے جو خاموش ہوں اب تک

> ورنہ تو تیرے عیب بھی معلوم ہیں سارے

> سب جرم میری ذات سے منسوب ہوئے

> کیا میرے سوا اس شہر میں معصوم ہیں سارے؟


> **Roman Urdu:**

> *Qissay meri ulfat ke jo marqoom hain saare,*

> *Aa dekh tere naam se mansoob hain saare.*

> *Shayad ye zarf hai jo khamosh hoon ab tak,*

> *Warna toh tere aib bhi maloom hain saare.*

> *Sub jurm meri zaat se mansoob hue,*

> *Kya mere siwa is shehar mein masoom hain saare?*


---


### **4. "Suno! Mujhse Aur Bas Mujhse Nafrat Karna"**


> **Devanagari (हिंदी):**

> सुनो! तुम्हारी वफ़ा पे मुझको गरचे पूरा यक़ीन है,

> मगर ज़माने के वार का कुछ भरोसा नहीं है।

> सो गर कभी ऐसा हो कि तुम्हें मुझसे नफ़रत हो जाए,

> तो कभी उन बातों से नफ़रत मत करना जो हमने एक दूसरे से की थीं,

> वो बेंच जहाँ हम बैठा करते थे, वो पहली बारिश,

> वो कॉफ़ी के ख़ाली मग, वो सिनेमा का पहला टिकट और आख़िरी दो सीटें,

> सबको याद रखना... कभी उनसे नफ़रत ना करना।

> सुनो, मुझसे... और बस मुझसे नफ़रत करना,

> क्योंकि सिर्फ़ मैं और फ़क़त मैं ही तुम्हारी उस नफ़रत के क़ाबिल हूँ।


> **Roman Urdu:**

> *Suno! Tumhari wafa pe mujhko garche poora yaqeen hai,*

> *Magar zamane ke waar ka kuch bharosa nahi hai.*

> *So gar kabhi aisa ho ki tumhein mujhse nafrat ho jaaye,*

> *Toh kabhi un baaton se nafrat mat karna jo humne ek doosre se ki thi,*

> *Wo bench jahaan hum baitha karte the, wo pehli baarish,*

> *Wo coffee ke khaali mug, wo cinema ka pehla ticket aur aakhri do seatein,*

> *Sabko yaad rakhna... kabhi unse nafrat na karna.*

> *Suno, mujhse... aur bas mujhse nafrat karna,*

> *Kyunki sirf main aur faqat main hi tumhari us nafrat ke qabil hoon.*


---


### **Iconic Dialogue:**


> **Devanagari (हिंदी):**

> "शक्ल-ओ-सूरज इंसान का पहला तआरुफ़ है। इंसान का दूसरा और असल तआरुफ़ उसके अल्फ़ाज़ हैं। अपना दूसरा तआरुफ़ इतना मुकम्मल कर लो कि लोग तुम्हारा पहला तआरुफ़ भूल जाएँ।"


> **Roman Urdu:**

> *"Shakl-o-soorat insaan ka pehla taaruf hai. Insaan ka doosra aur asal taaruf uske alfaaz hain. Apna doosra taaruf itna mukammal karlo ke log tumhara pehla taaruf bhool jaayen."*

Aug 15, 2026

वतन को कुछ नहीं ख़तरा निज़ाम-ए-ज़र है ख़तरे में

वतन को कुछ नहीं ख़तरा निज़ाम-ए-ज़र है ख़तरे में
हक़ीक़त में जो रहज़न है वही रहबर है ख़तरे में

जो बैठा है सफ़-ए-मातम बिछाए मर्ग-ए-ज़ुल्मत पर
वो नौहागर है ख़तरे में वो दानिश-वर है ख़तरे में

अगर तशवीश लाहक़ है तो सुलतानों को लाहक़ है
न तेरा घर है ख़तरे में न मेरा घर है ख़तरे में

जहाँ 'इक़बाल' भी नज़्र-ए-ख़त-ए-तनसीख़ हो 'जालिब'
वहाँ तुझ को शिकायत है तिरा जौहर है ख़तरे

--- हबीब जालिब

Jul 23, 2026

15 बेहतरीन शेर - 24 !!!

 1.नहीं नहीं हमें अब तेरी जुस्तुजू भी नहीं तुझे भी भूल गए हम तिरी ख़ुशी के लिए - ज़ेहरा निगाह

2.  मुस्तक़िल जूझना यादों से बहुत मुश्किल है, रफ़्ता रफ़्ता सभी घर-बार में खो जाते हैं। - .मुनव्वर राना

3. रंग ख़ुश्बू और मौसम का बहाना हो गया, अपनी ही तस्वीर में चेहरा पुराना हो गया - खालिद गनी 

4.ये दस्तूर-ए-ज़बाँ-बंदी है कैसा तेरी महफ़िल में , यहाँ तो बात करने को तरसती है ज़बाँ मेरी  - इक़बाल

5. ज़ाहिद शराब पीने दे मस्जिद में बैठ कर, या वो जगह बता दे जहाँ पर ख़ुदा न हो

6. न ख़ुदा ही मिला न विसाल-ए-सनम न इधर के हुए न उधर के हुए, रहे दिल में हमारे ये रंज-ओ-अलम न इधर के हुए न उधर के हुए

7. अगर फ़िरदौस बर-रू-ए-ज़मीं अस्त, हमीं अस्त ओ हमीं अस्त ओ हमीं अस्त

8. सलीक़े से हवाओं में जो ख़ुशबू घोल सकते हैं, अभी कुछ लोग बाक़ी हैं जो उर्दू बोल सकते हैं

9. आतिशे इश्क़ न बुझी, ज़माने ने इंतेहा लाख लिए, वो मयस्सर नहीं अभी, पर जीने को उसकी आरज़ू ही सही !

10. होश आए भी तो क्यों करें, तेरे दीवाने को, एक जाता है तो दो आते हैं समझाने को - होशियार मेरठी 

11.रफ़्ता रफ़्ता वो हमारे दिल के अरमाँ हो गए , पहले जाँ फिर जान-ए-जाँ फिर जान-ए-जानाँ हो गए  - क़मर जलालाबादी

12. तुम से सदियों की वफ़ाओ का कोई नाता था, तुम से मिलने की लकीरें थीं मेरे हाथों में - सईद राही

13.इक रात हर चराग़ की लौ काट दी गई, और वो भी चुप रहे जिन्हें प्यारी है रौशनी - नोमान शौक़

14.दूसरा मौक़ा सबको मिलता है ताबिश, पहली बाज़ी सबने हारी होती है -ज़ुबैर ताबिश

15.जो डूबना है तो इतने सुकून से डूबो, कि आस-पास की लहरों को भी पता न लगे - क़ैसर-उल जाफ़री

Jul 2, 2026

क्या ज़रूरी है मोहब्बत में तमाशा होना

क्या ज़रूरी है मोहब्बत में तमाशा होना

जिससे मिलना ही नहीं उससे जुदा क्या होना

ज़िंदा होना तो नहीं हिज्र में ज़िंदा होना

हम इसे कहते हैं होने के अलावा होना

तेरा सूरज के क़बीले से त'अल्लुक़ तो नहीं

ये कहाँ से तुझे आया है सभी का होना

तू ने आने में बहुत देर लगा दी वरना

मैं नहीं चाहता था हिज्र में बूढ़ा होना

क्या तमाशा है कि सब मुझको बुरा कहते हैं

और सब चाहते हैं मेरी तरह का होना

--- अब्बास ताबिश

Jun 18, 2026

15 बेहतरीन शेर - 23 !!!

1. उम्र-भर जी के भी जीने का न अन्दाज आया। जिन्दगी छोड़ दे पीछा मेरा मैं बाज आया ॥- मोहम्मद अली 'ताज'  

2.  ख़मोशी से मुसीबत और भी संगीन होती है,  तड़प ऐ दिल तड़पने से ज़रा तस्कीन होती है  - -शाद अज़ीमाबादी

3. जिसको ख़बर नहीं, उसे जोशो-ख़रोश है, जो पा गया है राज़, वो गुम है ख़मोश है  - पंडित ब्रजमोहन दत्तात्रेय 'कैफ़ी'

4.  इश्क़ नाज़ुक मिज़ाज है बेहद, अक़्ल का बोझ उठा नहीं सकता  - अकबर इलाहाबादी

5. 'हफ़ीज़' अपनी बोली मोहब्बत की बोलीन उर्दू, न हिंदी, न हिन्दोस्तानी - हफ़ीज़ जालंधरी

6. क़रार दिल को सदा जिसके नाम से आया, वो आया भी तो किसी और काम से आया - जमाल एहसानी

7 हयात ले के चलो, कायनात ले के चलो, चलो तो सारे ज़माने को साथ ले के चलो - मख़दूम मोहिउद्दीन
 
8. सब मिरे चाहने वाले हैं मिरा कोई नहीं, मैं भी इस मुल्क में उर्दू की तरह रहता हूँ  - हसन काज़मी

9. हम ऐसे ख़ुदपरस्त हैं कि खुदा को भी न मानें, और फिर भी उम्मीद रखते हैं कि लोग हमें खुदा माने। -अकबर इलाहाबादी

10. वहाँ जलेगा दिया कब तक आदमियत का, खुद आदमी हो जहाँ सर फिरि हवा की तरह - महशर बदायूनी 

11. ज़िंदगी ज़िंदा-दिली को जान ऐ रोशन, वरना कितने ही यहाँ रोज़ फ़ना होते हैं। -  ठाकुर रोशन सिंह 

12. बहाने और भी होते जो ज़िंदगी के लिए, हम एक बार तेरी आरज़ू भी खो देते  - ~ मजरूह सुल्तानपुरी

13. छत पे कमरा है मेरा कमरा भी कोने वाला, काम आसानी से हो जाता है रोने वाला - उमैर नजमी

14. लखनऊ तेरी गलियों में अभी भी महकती है वो शायरी, हर मोड़ पे बसता है एक पुराना इश्क़ का सिलसिला। - जोश मलीहाबादी 

15. ज़बाँ हमारी न समझा यहाँ कोई मजरूह, हम अजनबी की तरह अपने ही वतन में रहे - - मजरूह सुल्तानपुरी

May 5, 2026

15 बेहतरीन शेर - 22 !!!

1. ये नया शहर तो है ख़ूब बसाया तुमने, क्यूं पुराना हुआ वीरान ज़रा देख तो लो - जावेद अख़्तर

2. हज़ारों साल नर्गिस अपनी बे-नूरी पे रोती है, बड़ी मुश्किल से होता है चमन में दीदा-वर पैदा - अल्लामा इक़बाल

3. उस पे पत्थर खाके क्या बीती ज़फ़र देखेगा कौन, फल तो सब ले जाएँगे ज़ख़्मे-शजर देखेगा कौन - ज़फ़र गोरखपुरी

4. देख ज़िंदाँ से परे रंग-ए-चमन, रक़्स करना है तो फिर पाँव की ज़ंजीर न देख। - मजरूह सुल्तानपुरी

5. कलकत्ते का जो ज़िक्र किया तू ने हम-नशीं, इक तीर मेरे सीने में मारा कि हाए हाए - मिर्ज़ा ग़ालिब

6. फूल तो दो दिन बहारे-जा-फ़िज़ा दिखला गए, हसरत उन गुंचों पे हैं जो बिन खिले मुरझा गए - ज़ौक़

7. वो ज़हर देता तो सब की निगह में आ जाता, सो ये किया कि मुझे वक़्त पे दवाएं न दीं - अख़्तर नाज़मी

8. हवा को बहुत सर-कशी का नशा है, मगर ये न भूले दिया भी दिया है । - खुमार बाराबंकवी

9. एक से एक जुनूँ का मारा इस बस्ती में रहता है,  एक हमीं हुशियार थे यारो एक हमीं बद-नाम हुए - इब्न-ए-इंशा

10. किस तरह जमा कीजिए अब अपने आप को, काग़ज़ बिखर रहे हैं पुरानी किताब के - -आदिल मंसूरी

11. वो दुश्मनी से देखते हैं, देखते तो हैं, मैं शाद हूँ की हूँ तो किसी की निगाह में - अमीर मीनाई

12. बाद मुद्दत के ये ऐ 'दाग़' समझ में आया, वही दाना है कहा जिसने न माना दिल का - दाग़ देहलवी

13. गो बहुत कुछ रंज यारान ए वतन से था हमेंआँख में आंसू मगर वक़्त ए सफ़र आ ही गया - अकबर इलाहाबादी,

14.  फ़रिश्तों से भी अच्छा मैं बुरा होने से पहले था, वो मुझ से इन्तिहाई ख़ुश ख़फ़ा होने से पहले था - अनवर शुऊर

15. मिरा ज़मीर बहुत है मुझे सज़ा के लिए,  तू दोस्त है तो नसीहत न कर ख़ुदा के लिए - शाज़ तमकनत

Apr 17, 2026

15 बेहतरीन शेर - 21 !!!

1. आनेवाली नस्लें तुम पर फ़ख़्र करेंगी हम-असरो, जब भी उनको ध्यान आएगा तुमने 'फ़िराक़' को देखा है - फ़िराक़ गोरखपुरी

2. हमारे बस में था ही क्या हवा पे हम सवार थे, वहाँ वहाँ गए जहाँ हवा उड़ा के ले गई -अज़्म शाकिरी

3. क्या क्या हुआ है हम से जुनूँ में न पूछिए , उलझे कभी ज़मीं से कभी आसमाँ से हम - असरार-उल-हक़ मजाज़

4. अब तुमसे रुख़सत होता हूँ आओ सम्भालो साज़े-गज़ल नये तराने छेड़ो, मेरे नग्मों को नींद आती है - रघुपति सहाय 'फ़िराक़'

5. तुझे किस बात का ग़म है वो इतना पूछ लें मुझ से वो इतना पूछ लें मुझ से तो फिर किस बात का ग़म है मुझ से - मुशताक़ हुसैन ख़ान हाशमी मुश्ताक़

6.  मुझको तो होश नहीं, तुमको ख़बर हो शायद, लोग कहते हैं कि तुमने मुझे बर्बाद किया - जोश मलीहाबादी

7. मैं तो ग़ज़ल सुना के अकेला खड़ा रहा, सब अपने अपने चाहने वालों में खो गए - कृष्ण बिहारी नूर

8. न जाने कैसा मसीहा था चाहता क्या था, तमाम शहर को बीमार देख कर ख़ुश था  - अमीर क़ज़लबाश

9. दाग़ दुनिया ने दिए ज़ख़्म ज़माने से मिले, हम को तोहफ़े ये तुम्हें दोस्त बनाने से मिले - कैफ़ भोपाली

10.  ख़ुशियाँ देते देते अक्सर खुद ग़म में मर जाते हैं,  रेशम बुनने वाले कीड़े रेशम में मर जाते हैं - ख़ुशबीर सिंह शाद

11. कुछ तो तेरे मौसम ही मुझे रास कम आये और कुछ मेरी मिट्टी में बग़ावत भी बहुत थी - परवीन शाकिर

12. रातें परदेस की डरता था कटेंगी कैसे, मगर आँगन में सितारे थे वही घर वाले - राही मासूम रजा़

13. हम को नीचे उतार लेंगे लोग, इश्क़ लटका रहेगा पंखे से - ज़िया मज़कूर

14. मैखाने के क़रीब थी मस्जिद भले को, दाग़ हर एक पूछता था कि “ हज़रत इधर कहाँ? - दाग़

15. जब तुलू आफताब होता है, ग़म के सागर उछाल देता हूँ, तज़किरा जब वफ़ा का होता है, में तुम्हारी मिसाल देता हूँ.. 

Mar 23, 2026

15 बेहतरीन शेर - 20 !!!

 1. सरजमीने-हिंद में अकवामे आलम के फ़िराक़,  कारवां आते गए हिंदोस्ताँ बनता गया  - फ़िराक़ गोरखपुरी

2. कुछ मेरे बाद और भी आएंगे क़ाफ़िले, कांटे ये रास्ते से हटा लूं तो चैन लूं। -तसव्वुर किरतपुरी

3. इन्हीं ज़र्रों से होंगे कल नये कुछ कारवां पैदा,  जो ज़र्रे आज उड़ते हैं ग़ुबारे-कारवां हो कर। - शफ़क टौंकी

4. इस शहर में जीने के अंदाज़ निराले हैं, होठों पे लतीफे हैं आवाज़ में छाले हैं। - जावेद अख़्तर

5. जिनके आँगन में अमीरी का शजर लगता है, उसका हर ऐब ज़माने को हुनर लगता है - अंजुम रहबर

6. ऐ दिल वो आशिक़ी के फ़साने किधर गए, वो उम्र क्या हुई वो ज़माने किधर गए - अख़्तर शीरानी‬

7. सियाह रात नहीं लेती नाम ढलने का, यही तो वक़्त है सूरज तेरे निकलने का - शहरयार

8. नतीजा एक ही निकला, कि थी क़िस्मत में नाकामी, कभी कुछ कह के पछताये, कभी चुप रह के पछताये। - आरज़ू लखनवी

9. हमारी ज़िन्दगी के सानहे भी क्या अजब गुज़रे, उसी पर मर मिटे जिस से हमें बेज़ार होना था - मनीष शुक्ला

10. अब ज़मीं पर कोई गौतम न मोहम्मद न मसीह, आसमानों से नए लोग उतारे जाएँ - अहमद फ़राज़

11. हम वो हैं जो ख़ुदा को भूल गए तुम मेरी जान किस गुमान में हो - जौन एलिया

12. दफ़'अतन घटा की आड़ से चाँदनी कशीद हो गई, ज़ुल्फ़ उस के चेहरे से हटी और मेरी 'ईद हो गई - आलम निज़ामी

13. जुर्रत से हर नतीजे की परवाह किये बगैर, दरबार छोड़ आया हूँ सजदा किये बगैर ! - मुनव्वर राना

14. ये हमसे कौन दिन भर की कमाई छीन लेता है, उतर कर अपनी मसनद से चटाई छीन लेता है - सलाहउद्दीन नैयर

15. अपने बच्चों को मैं बातों में लगा लेता हूं, जब भी आवाज़ लगाता है खिलौने वाला - राशिद राही

Jul 25, 2025

15 बेहतरीन शेर - 17 !!!

 1. ये कैसी हवा-ए-तरक्की चली है , दिए तो दिए, दिल बुझे जा रहे हैं  -  ख़ुमार बाराबंकवी

2. ये इनायतें ग़ज़ब की ये बला की मेहरबानी,  मिरी ख़ैरियत भी पूछी किसी और की ज़बानी - नज़ीर बनारसी

3. हवाएँ ज़ोर कितना ही लगाएँ आँधियाँ बन कर, मगर जो घिर के आता है वो बादल छा ही जाता है -  जोश मलीहाबादी

4. खड़ा हूँ आज भी रोटी के चार हर्फ़ लिए, सवाल ये है किताबों ने क्या दिया मुझ को - नज़ीर बाकरी

5. मोहब्बत क्या बला है चैन लेना ही भुला दे है, ज़रा भी आँख झपके है तो बेताबी जगा दे है - कलीम आजिज़

6. सुब्ह हो जाएगी हाथ आ न सकेगा महताब, आप अगर ख़्वाब में चलते हैं तो चलते रहिए - मलिकज़ादा मंज़ूर अहमद

7. मैं तो इस वास्ते चुप हूँ कि तमाशा न बने, तू समझता है मुझे तुझ से गिला कुछ भी नहीं  - अख़्तर शुमार

8. हसरत पे उस मुसाफ़िर-ए-बे-कस की रोइए, जो थक गया हो बैठ के मंज़िल के सामने...!!! - मुसहफ़ी ग़ुलाम हमदानी

9. जाने ये कैसा ज़हर दिलों में उतर गया, परछाईं ज़िंदा रह गई, इंसान मर गया...!!!  - उम्मीद फ़ाज़ली

10.  अपने माज़ी से निकलना भी हुनर होता है, घर को छोड़ आइए पीछे, तो सफ़र होता है...!!! - वसीम बरेलवी

11.  किसे अपना बनाएँ कोई इस क़ाबिल नहीं मिलता, यहाँ पत्थर बहुत मिलते हैं लेकिन दिल नहीं मिलता - मख़मूर देहलवी

12.  चारागर यूँ तो बहुत हैं मगर ऐ जान-ए-'फ़राज़', जुज़ तेरे और कोई ज़ख़्म न जाने मेरे - अहमद फ़राज़

13. दिल गया, जान गई, यार के पैमॉं के साथ, घर से घर वाले भी रूख़सत हुए मेहमान के साथ 

14. उफ़ तलक करते नहीं ज़िल्ल-ए-इलाही के ख़िलाफ़, आप को दरबार की आदत है, दरबारी हैं आप - ~ अब्बास क़मर

15. मस्जिद तो बना दी शब भर में, ईमाँ की हरारत वालों ने, मन अपना पुराना पापी है, बरसों में नमाज़ी बन न सका। -अल्लामा इक़बाल

Jun 16, 2025

15 बेहतरीन शेर - 16 !!!

1. चराग़ों के बदले मकाँ जल रहे हैं नया है ज़माना नई रौशनी है - खुमार बाराबंकवी

2. ये अलग बात है कि ख़ामोश खड़े रहते हैं, फिर भी जो लोग बड़े हैं, वो बड़े रहते हैं ~राहत इंदौरी

3. पत्थर मुझे कहता है मिरा चाहने वाला, मैं मोम हूँ उस ने मुझे छू कर नहीं देखा -बशीर बद्र

4. और क्या था बेचने के लिए, अपनी आँखों के ख़्वाब बेचे हैं। -जौन एलिया

5. फ़क़ीराना आए सदा कर चले, मियाँ ख़ुश रहो दुआ कर चले - मीर तकि मीर

6. बाग़बाँ दिल से वतन को ये दुआ देता है, मैं रहूँ या न रहूँ ये चमन आबाद रहे। - बृजनारायण चकबस्त

7. उठाओ हाथ कि दस्त-ए-दुआ बुलंद करें, हमारी उम्र का एक और दिन तमाम हुआ - अख़्तरुल ईमान

8. हैं और भी दुनिया में सुखन्वर बहुत अच्छे, कहते हैं कि गालिब का है अन्दाज-ए-बयां और - मिर्ज़ा ग़ालिब

9. मैं इन दिनों हूँ ख़ुद से इतना बेख़बर, मैं बुझ चुका हूँ और मुझे पता नहीं -तहज़ीब हाफ़ी

10. वादा-ए-यार की बात न छेड़ो, ये धोखा भी खा रक्खा है. - नासिर काज़मी

11. कह दिया तू ने जो मा'सूम तो हम हैं मा'सूम, कह दिया तू ने गुनहगार गुनहगार हैं हम - फ़िराक़ गोरखपुरी

12. ये सर्द रात ये आवारगी ये नींद का बोझ, हम अपने शहर में होते तो घर चले जाते - उम्मीद फ़ाज़ली

13. कौन सीखा है सिर्फ बातों से सबको एक हादसा ज़रूरी है - जौन एलिया

14. रात ही रात में तमाम तय हुए उम्र के मक़ाम, हो गई ज़िंदगी की शाम अब मैं सहर को क्या करूं - हफ़ीज़ जालंधरी

15. फ़ारेहा क्या बहुत जरूरी है हर किसी शेरसाज़ को पढ़ना, मेरे ग़ुस्से के बाद भी तुमने नहीं छोड़ा मजाज़ को पढ़ना -जौन एलिया

May 28, 2025

भले दिनों की बात थी

भले दिनों की बात थी
भली सी एक शक्ल थी
ना ये कि हुस्ने ताम हो
ना देखने में आम सी

ना ये कि वो चले तो कहकशां सी रहगुजर लगे
मगर वो साथ हो तो फिर भला भला सफ़र लगे

कोई भी रुत हो उसकी छब
फ़जा का रंग रूप थी
वो गर्मियों की छांव थी
वो सर्दियों की धूप थी

ना मुद्दतों जुदा रहे
ना साथ सुबहो शाम हो
ना रिश्ता-ए-वफ़ा पे ज़िद
ना ये कि इज्ने आम हो

ना ऐसी खुश लिबासियां
कि सादगी हया करे
ना इतनी बेतकल्लुफ़ी
की आईना हया करे

ना इखतिलात में वो रम
कि बदमजा हो ख्वाहिशें
ना इस कदर सुपुर्दगी
कि ज़िच करे नवाजिशें

ना आशिकी ज़ुनून की
कि ज़िन्दगी अजाब हो
ना इस कदर कठोरपन
कि दोस्ती खराब हो

कभी तो बात भी खफ़ी
कभी सुकूत भी सुखन
कभी तो किश्ते ज़ाफ़रां
कभी उदासियों का बन

सुना है एक उम्र है
मुआमलाते दिल की भी
विसाले-जाँफ़िजा तो क्या
फ़िराके-जाँ-गुसल की भी

सो एक रोज क्या हुआ
वफ़ा पे बहस छिड़ गई
मैं इश्क को अमर कहूं
वो मेरी ज़िद से चिढ़ गई

मैं इश्क का असीर था
वो इश्क को कफ़स कहे
कि उम्र भर के साथ को
वो बदतर अज़ हवस कहे

शजर हजर नहीं कि हम
हमेशा पा ब गिल रहें
ना ढोर हैं कि रस्सियां
गले में मुस्तकिल रहें

मोहब्बतें की वुसअतें
हमारे दस्तो पा में हैं
बस एक दर से निस्बतें
सगाने-बावफ़ा में हैं

मैं कोई पेन्टिंग नहीं
कि एक फ़्रेम में रहूं
वही जो मन का मीत हो
उसी के प्रेम में रहूं

तुम्हारी सोच जो भी हो
मैं उस मिजाज की नहीं
मुझे वफ़ा से बैर है
ये बात आज की नहीं

न उसको मुझपे मान था
न मुझको उसपे ज़ोम ही
जो अहद ही कोई ना हो
तो क्या गमे शिकस्तगी

सो अपना अपना रास्ता
हंसी खुशी बदल दिया
वो अपनी राह चल पड़ी
मैं अपनी राह चल दिया

भली सी एक शक्ल थी
भली सी उसकी दोस्ती
अब उसकी याद रात दिन
नहीं, मगर कभी कभी

---  अहमद फ़राज़ 

हुस्न ताम - पूरा शबाब, कहकशां - आकाशगंगा, इज्ने आम - सभी को इजाजत

हया - शर्म, इखतिलात - दोस्ती, रम - वहशत, खफ़ी - छिपी हुई, चुप्पी

किश्ते ज़ाफ़राँ - केसर की क्यारी, विसाले जाँफ़िजा - प्राणवर्धक मिलन,

फ़िराके जाँ गुसिल - प्राण घातक दूरी, असीर - कैदी, कफ़स - पिन्जरा, कैद खाना,

अज हवस - हवस से भी खराब, शजर - पेड, हजर - पत्थर, पा-ब-गिल - विवश

मुस्तकिल - लगातार, वुसअतें - लम्बाई, चौड़ाई, दस्तो-पा - हाथ, पैर, निस्बतें - संबन्ध

सगाने-बावफ़ा - वफ़ादार कुत्ते, ज़ोम - गुमान, अहद - वचन बद्धता, गमे शिकस्तगी - टूटने का गम

Apr 20, 2025

15 बेहतरीन शेर - 15 !!!

1. क़रार दिल को सदा जिस के नाम से आया, वो आया भी तो किसी और काम से आया - ज़माल एहसानी

2. किस सलीक़े से मता-ए-होश हम खोते रहे, गर्द चेहरे पर जमी थी आइना धोते रहे - असर फ़ैज़ाबादी

3. वो इंतिक़ाम की आतिश थी मेरे सीने में, मिला न कोई तो ख़ुद को पछाड़ आया हूँ - जमाल एहसानी

4. तितलियाँ यूँ ही नहीं बैठ रही हैं तुम पर, बारहा तुमको भी फूलों में गिना जाता है - नासिर खान नासिर

5. जो देखता हूँ वही बोलने का आदी हूँ, मैं अपने शहर का सब से बड़ा फ़सादी हूँ - अज्ञात

6. सेंक देता था जो जाड़े में ग़रीबों के बदन, आज उस सूरज को इक दीवार उठ कर खा गई - नज़ीर बनारसी

7. उस शहर में कितने चेहरे थे कुछ याद नहीं सब भूल गए, इक शख़्स किताबों जैसा था वो शख़्स ज़बानी याद हुआ - नोशी गिलानी

8. हमारी बेबसी शहरों की दीवारों पे चिपकी है, हमें ढूँडेगी कल दुनिया पुराने इश्तिहारों में ~ अज़ीज़ बानो दाराब वफ़ा

9. मैं दोस्ती में हर एक बढ़ता हाथ चूमता हूँ, बस शर्त ये हैं कि बन्दा नमक हराम न हो - राकिब मुख़्तार 

10. अब नहीं कोई बात ख़तरे की, अब सभी को सभी से ख़तरा है। - जौन एलिया

11. नुक्स निकालते हैं लोग कुछ इस कदर हम में , जैसे उन्हें खुदा चाहिए था और हम इंसान मिल गए। - अज्ञात

12. उम्मीदें इंसान से लगा कर शिकवा खुदा से करते हो, तुम भी ग़ालिब कमाल करते हो... - अज्ञात

13. रियाज़ मौत है इस शर्त से हमें मंज़ूर, ज़मीं सताये ना मरने पे आसमान की तरह - रियाज़ ख़ैराबादी

14. ऐ दिल! न अक़ीदा है दवा पर, न दुआ पर कम-बख़्त तुझे छोड़ दिया हम ने ख़ुदा पर...!!! - सफ़ी औरंगाबादी

15. ज़ाहिद का दिल न ख़ातिर-ए-मय-ख़्वार तोड़िए, सौ बार तौबा कीजिए, सौ बार तोड़िए...!!! - जिगर मुरादाबादी

Mar 25, 2025

15 बेहतरीन शेर - 14 !!!

1-तमाम उम्र ख़ुशी की तलाश में गुज़री, तमाम उम्र तरसते रहे ख़ुशी के लिए - अबुल मुजाहिद ज़ाहिद

2- पत्ता पत्ता बूटा बूटा हाल हमारा जाने है, जाने न जाने गुल ही न जाने बाग़ तो सारा जाने है - मीर तक़ी मीर

3- नए दौर के नए ख़्वाब हैं नए मौसमों के गुलाब हैं, ये मोहब्बतों के चराग़ हैं इन्हें नफ़रतों की हवा न दे- बशीर बद्र

4-जो लोग मौत को ज़ालिम क़रार देते हैं, ख़ुदा मिलाए उन्हें ज़िंदगी के मारों से - नज़ीर सिद्दीक़ी

5- चमन में इख़्तिलात-ए-रंग-ओ-बू से बात बनती है, हम ही हम हैं तो क्या हम हैं तुम ही तुम हो तो क्या तुम - सरशार सैलानी

6- ये कोई क़त्ल थोड़ी है कि बात आई-गई हो, मैं और अपना नज़र-अंदाज़ होना भूल जाऊँ? - जव्वाद शेख़

7- अपना ज़माना आप बनाते हैं अहल-ए-दिल, हम वो नहीं कि जिन को ज़माना बना गया - जिगर मुरादाबादी

8- मैंने गिनती सिखाई थी जिसको, वो पहाड़ा पढ़ा रहा है मुझे। ~ फ़हमी बदायूँनी

9- मिले खाक में नौजवां कैसे कैसे, ज़मीं खा गई आसमां कैसे कैसे - प्रेम धवन

10- उस की बेटी ने उठा रक्खी है दुनिया सिर पर , ख़ैरियत गुज़री कि अंगूर के बेटा न हुआ...!!! - अकबर इलाहाबादी

11- साहिल के सुकूँ से किसे इंकार है लेकिन, तूफ़ान से लड़ने में मज़ा और ही कुछ है - आल-ए-अहमद सुरूर

12- लोग कहते हैं बदलता है ज़माना सब को, मर्द वो हैं जो ज़माने को बदल देते हैं - अकबर इलाहाबादी

13-देख ज़िंदाँ से परे रंग-ए-चमन जोश-ए-बहार, रक़्स करना है तो फिर पाँव की ज़ंजीर न देख - मजरूह सुल्तानपुरी

14- इश्क़ ने 'ग़ालिब' निकम्मा कर दिया, वर्ना हम भी आदमी थे काम के - मिर्ज़ा ग़ालिब

15- सात संदूक़ों में भर कर दफ़्न कर दो नफ़रतें, आज इंसाँ को मोहब्बत की ज़रूरत है बहुत - बशीर बद्र

Feb 7, 2025

फ़िरंगी का जो मैं दरबान होता

फ़िरंगी का जो मैं दरबान होता तो
जीना किस क़दर आसान होता

मेरे बच्चे भी अमरीका में पढ़ते
मैं हर गर्मी में इंग्लिस्तान होता

मेरी इंग्लिश बला की चुस्त होती
बला से जो न उर्दू दान होता

झुका के सर को हो जाता जो ‘सर’ मैं
तो लीडर भी अज़ीमुश्शान होता

ज़मीनें मेरी हर सूबें में होतीं
मैं वल्लाह सदर-ए पाकिस्तान होता

--- हबीब जालिब

Jan 17, 2025

ज़ुल्मत को ज़िया सरसर को सबा बंदे को ख़ुदा क्या लिखना

ज़ुल्मत को ज़िया सरसर को सबा बंदे को ख़ुदा क्या लिखना
पत्थर को गुहर दीवार को दर कर्गस को हुमा क्या लिखना

इक हश्र बपा है घर में दम घुटता है गुम्बद-ए-बे-दर में
इक शख़्स के हाथों मुद्दत से रुस्वा है वतन दुनिया-भर में
ऐ दीदा-वरो इस ज़िल्लत को क़िस्मत का लिखा क्या लिखना
ज़ुल्मत को ज़िया सरसर को सबा बंदे को ख़ुदा क्या लिखना

ये अहल-ए-हश्म ये दारा-ओ-जम सब नक़्श बर-आब हैं ऐ हमदम
मिट जाएँगे सब पर्वर्दा-ए-शब ऐ अहल-ए-वफ़ा रह जाएँगे हम
हो जाँ का ज़ियाँ पर क़ातिल को मासूम-अदा क्या लिखना
ज़ुल्मत को ज़िया सरसर को सबा बंदे को ख़ुदा क्या लिखना

लोगों पे ही हम ने जाँ वारी की हम ने ही उन्ही की ग़म-ख़्वारी
होते हैं तो हों ये हाथ क़लम शाएर न बनेंगे दरबारी
इब्लीस-नुमा इंसानों की ऐ दोस्त सना क्या लिखना
ज़ुल्मत को ज़िया सरसर को सबा बंदे को ख़ुदा क्या लिखना

हक़ बात पे कोड़े और ज़िंदाँ बातिल के शिकंजे में है ये जाँ
इंसाँ हैं कि सहमे बैठे हैं खूँ-ख़्वार दरिंदे हैं रक़्साँ
इस ज़ुल्म-ओ-सितम को लुत्फ़-ओ-करम इस दुख को दवा क्या लिखना
ज़ुल्मत को ज़िया सरसर को सबा बंदे को ख़ुदा क्या लिखना

हर शाम यहाँ शाम-ए-वीराँ आसेब-ज़दा रस्ते गलियाँ
जिस शहर की धुन में निकले थे वो शहर दिल-ए-बर्बाद कहाँ
सहरा को चमन बन कर गुलशन बादल को रिदा क्या लिखना
ज़ुल्मत को ज़िया सरसर को सबा बंदे को ख़ुदा क्या लिखना

ऐ मेरे वतन के फ़नकारो ज़ुल्मत पे न अपना फ़न वारो
ये महल-सराओं के बासी क़ातिल हैं सभी अपने यारो
विर्से में हमें ये ग़म है मिला इस ग़म को नया क्या लिखना
ज़ुल्मत को ज़िया सरसर को सबा बंदे को ख़ुदा क्या लिखना

--- हबीब जालिब

Jan 1, 2025

15 बेहतरीन शेर - 13 !!!

1. तीर खाने की हवस है तो जिगर पैदा कर, सरफ़रोशी की तमन्ना है तो सर पैदा कर - अमीर मीनाई

2.  जलाने वाले जलाते ही हैं चराग़ आख़िर, ये क्या कहा कि हवा तेज़ है ज़माने की - जमील मज़हरी

3. 'हफ़ीज़' अपनी बोली मोहब्बत की बोली, न उर्दू न हिन्दी न हिन्दोस्तानी - हफ़ीज़ जालंधरी

4. आबाद अगर न दिल हो तो बरबाद कीजिए, गुलशन न बन सके तो बयाबाँ बनाइए - जिगर मुरादाबादी

5. फूल कर ले निबाह काँटों से, आदमी ही न आदमी से मिले - ख़ुमार बाराबंकवी

6. एक ही मसला ताउम्र मेरा हल न हुआ, नींद पूरी न हुई, ख़्वाब मुकम्मल न हुआ ...!!! -  मुनव्वर हाशमी

7. बड़े घरों में रही है बहुत ज़माने तक, ख़ुशी का जी नहीं लगता ग़रीबख़ाने में...!!! - (नोमान शौक़)

8. इस सफ़र में नींद ऐसी खो गयी, हम न सोये रात थक कर सो गयी...!!! - राही मासूम रज़ा

9. जब तलक दूर है तू तेरी परस्तिश कर लें, हम जिसे छू न सकें उसको खुदा कहते हैं - अहमद फ़राज़

10. 'दुनिया से निराली है  नज़ीर अपनी कहानी, अंगारों से बच निकला हूँ, फूलों से जला हूँ' ~ नज़ीर बनारसी

11. 'हमने  तमाम  उम्र  अकेले  सफ़र  किया, हम पर किसी ख़ुदा की इनायत नहीं रही'  ~ दुष्यन्त कुमार

12.आदमी खुद को कभी यूं ही सजा देता है,  रौशनी के लिए शोलों को हवा देता है। -  गोपालदास 'नीरज'

13. मिरी निगाह में कुछ और ढूँडने वाले,  तिरी निगाह में कुछ और ढूँडता हूँ मैं - -महमूद ख़िज़ाँ

14.  तेरे बिछड़ने पर लिख रहा हूँ मैं ताज़ा ग़ज़लें, ये तेरा ग़म है जो मुझको मशहूर कर रहा है! - तहज़ीब हाफ़ी

15. और फिर एक दिन बैठे बैठे मुझे अपनी दुनिया बुरी लग गई, जिसको आबाद करते हुए मेरे मां-बाप की ज़िंदगी लग गई  - तहज़ीब हाफी

Oct 2, 2024

उम्र में उस से बड़ी थी

उम्र में उस से बड़ी थी लेकिन पहले टूट के बिखरी मैं 
साहिल साहिल जज़्बे थे और दरिया दरिया पहुँची मैं 

शहर में उस के नाम के जितने शख़्स थे सब ही अच्छे थे 
सुब्ह-ए-सफ़र तो धुँद बहुत थी धूपें बन कर निकली में 

उस की हथेली के दामन में सारे मौसम सिमटे थे 
उस के हाथ में जागी मैं और उस के हाथ से उजली मैं 

इक मुट्ठी तारीकी में था इक मुट्ठी से बढ़ कर प्यार 
लम्स के जुगनू पल्लू बाँधे ज़ीना ज़ीना उतरी मैं 

उस के आँगन में खुलता था शहर-ए-मुराद का दरवाज़ा 
कुएँ के पास से ख़ाली गागर हाथ में ले कर पलटी मैं 

मैं ने जो सोचा था यूँ तो उस ने भी वही सोचा था 
दिन निकला तो वो भी नहीं था और मौजूद नहीं थी मैं 

लम्हा लम्हा जाँ पिघलेगी क़तरा क़तरा शब होगी 
अपने हाथ लरज़ते देखे अपने-आप ही संभली मैं

-किश्वर नाहिद

Aug 3, 2024

15 बेहतरीन शेर - 11 !!!

1- लहू वतन के शहीदों का रंग लाया है, उछल रहा है ज़माने में नाम-ए-आज़ादी - फ़िराक़ गोरखपुरी

2- माना कि तेरी दीद के क़ाबिल नहीं हूँ मैं,  तू मेरा शौक़ देख मिरा इंतिज़ार देख - अल्लामा इक़बाल

3- शाम तक सुब्ह की नज़रों से उतर जाते हैं, इतने समझौतों पे जीते हैं कि मर जाते हैं - वसीम बरेलवी

4-  किया तबाह तो दिल्ली ने भी बहुत 'बिस्मिल', मगर ख़ुदा की क़सम लखनऊ ने लूट लिया - बिस्मिल सईदी

5- यक़ीन हो तो कोई रास्ता निकलता है,  हवा की ओट भी ले कर चराग़ जलता है - मंज़ूर हाशमी

6- ज़िंदगी दी है तो जीने का हुनर भी देना,  पाँव बख़्शें हैं तो तौफ़ीक़-ए-सफ़र भी देना - मेराज फ़ैज़ाबादी

7- मय-ख़ाने में क्यूँ याद-ए-ख़ुदा होती है अक्सर, मस्जिद में तो ज़िक्र-ए-मय-ओ-मीना नहीं होता - रियाज़ ख़ैराबादी

8- कुछ उसूलों का नशा था कुछ मुक़द्दस ख़्वाब थे, हर ज़माने में शहादत के यही अस्बाब थे - हसन नईम

9-  इंक़िलाबों की घड़ी है,  हर नहीं हाँ से बड़ी है - जाँ निसार अख़्तर

10- झुक कर सलाम करने में क्या हर्ज है मगर,  सर इतना मत झुकाओ कि दस्तार गिर पड़े - इक़बाल अज़ीम

11- साया है कम खजूर के ऊँचे दरख़्त का, उम्मीद बाँधिए न बड़े आदमी के साथ - कैफ़ भोपाली

12 - शाख़ें रहीं तो फूल भी पत्ते भी आएँगे, ये दिन अगर बुरे हैं तो अच्छे भी आएँगे - अज्ञात

13-  सामने है जो उसे लोग बुरा कहते हैं,  जिस को देखा ही नहीं उस को ख़ुदा कहते हैं - सुदर्शन फ़ाकिर

14-  छोड़ा नहीं ख़ुदी को दौड़े ख़ुदा के पीछे, आसाँ को छोड़ बंदे मुश्किल को ढूँडते हैं - अब्दुल हमीद अदम

15- इस तरह ज़िंदगी ने दिया है हमारा साथ,  जैसे कोई निबाह रहा हो रक़ीब से - साहिर लुधियानवी

Feb 14, 2024

15 बेहतरीन शेर - 9 !!!

1. कुछ खटकता तो है पहलू में मिरे रह रह कर, अब ख़ुदा जाने तिरी याद है या दिल मेरा - जिगर मुरादाबादी

2. जो अक़्ल के मारे थे, अपने भी काम ना आये , दीवानों ने दुनिया की तक़दीर बदल डाली.

3. मरीज़े इश्क़ पर रहमत ख़ुदा की, दर्द बढ़ता गया यूँ यूँ दवा की - मीर तक़ी मीर

4. कोई नयी ज़मीं हो, नया आसमाँ भी हो, ए दिल अब उसके पास चले, वो जहाँ भी हो! - फ़िराक़ गोरखपुरी

5. मदहोश ही रहा मैं जहाने ख़राब में, गूँथी गई थी क्या मेरी मिट्टी शराब में - मुज़तर ख़ैराबादी

6. गिरज़ा में, मन्दिरों में, अज़ानों में बँट गया, एक ही मूल का इन्सान, कई नामों में बँट गया । - निदा फ़ाज़ली

7. उग रहा है दर-ओ-दीवार से सब्ज़ा 'ग़ालिब', हम बयाबाँ में हैं और घर में बहार आई है - मिर्ज़ा ग़ालिब

8. तिरी मौजूदगी में तेरी दुनिया कौन देखेगा, तुझे मेले में सब देखेंगे मेला कौन देखेगा -नज़ीर बनारसी

9. गुल खिलेंगे नए फूलों की नुमाइश होगी, उस सितमगर की मुहब्बत में भी साज़िश होगी -ज़हीर रहमती

10. बच्चों के छोटे हाथों को चांद सितारे छूने दोचार किताबें पढ़ कर यह भी हम जैसे हो जाएंगे ~ निदा फ़ाज़ली

11- उनका जो फ़र्ज़ है वो अहल-ए-सियासत जानें, मेरा पैग़ाम मोहब्बत है जहाँ तक पहुँचे - जिगर मुरादाबादी

12- मिरे जुनूँ का नतीजा ज़रूर निकलेगा, इसी सियाह समुंदर से नूर निकलेगा - अमीर क़ज़लबाश

13- इशरत-ए-क़तरा है दरिया में फ़ना हो जाना, दर्द का हद से गुज़रना है दवा हो जाना - ग़ालिब

14- जब भी मिलती है मुझे अजनबी लगती क्यूँ है, ज़िंदगी रोज़ नए रंग बदलती क्यूँ है - शहरयार

15- दुनिया जिसे कहते हैं जादू का खिलौना है, मिल जाए तो मिट्टी है खो जाए तो सोना है -निदा फ़ाज़ली

Oct 9, 2023

ख़तरे में इस्लाम नहीं

ख़तरा है ज़रदारों को, गिरती हुई दीवारों को

सदियों के बीमारों को, ख़तरे में इस्लाम नहीं

सारी ज़मीं को घेरे हुए हैं आख़िर चंद घराने क्यों

नाम नबी का लेने वाले उल्फ़त से बेगाने क्यों

ख़तरा है खूंखारों को, रंग बिरंगी कारों को

अमरीका के प्यारों को, ख़तरे में इस्लाम नहीं

आज हमारे नारों से लज़ी है बया ऐवानों में

बिक न सकेंगे हसरतों अमां ऊंची सजी दुकानों में

ख़तरा है बटमारों को, मग़रिब के बाज़ारों को

चोरों को मक्कारों को, ख़तरे में इस्लाम नहीं

अम्न का परचम लेकर उठो, हर इंसां से प्यार करो

अपना तो मंशूर है ‘जालिब’, सारे जहां से प्यार करो

ख़तरा है दरबारों को, शाहों के ग़मख़ारों को

नव्वाबों ग़द्दारों को, ख़तरे में इस्लाम नहीं