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May 28, 2026

Samandar Serial Title Song Lyrics (समंदर सीरियल टाइटल सॉन्ग)


समंदर की हसीन लहरों
के कामिल हुक्मराँ हैं हम
समंदर की हसीन लहरों
के कामिल हुक्मराँ हैं हम
नज़र है जिनकी बाने अर्श पर वो
पासबान हैं हम

समंदर की हसीन लहरों
के कामिल हुक्मराँ हैं हम
समंदर की हसीन लहरों
के कामिल हुक्मराँ हैं हम

वतन के ज़र्रे ज़र्रे से मोहब्बत
हमको है ऐ दोस्त
वतन के ज़र्रे ज़र्रे से मोहब्बत
हमको है ऐ दोस्त

है मंज़िल जिनकी ठोकर में
वो मीलें कारवाँ हैं हम
है मंज़िल जिनकी ठोकर में
वो मीलें कारवाँ हैं हम
नज़र है जिनकी बाने अर्श पर वो
पासबान हैं हम

समंदर की हसीन लहरों
के कामिल हुक्मराँ हैं हम
समंदर की हसीन लहरों
के कामिल हुक्मराँ हैं हम

---बाय कर्नल सुल्तान सिंह मलिक

दूरदर्शन पर भारतीय नौसेना पर आधारित सीरियल बहुत दुर्लभ थे, और समंदर (१९९५–१९९६) उसके लिए सबसे प्रसिद्ध और अद्वितीय उदाहरण है। यह २५ एपिसोड वाला हिंदी सीरियल १९९५ से १९९६ तक दूरदर्शन (DD Metro) पर प्रसारित हुआ था, जो भारतीय नौसेना के अधिकारियों के जीवन, उनकी समर्पण भावना, युद्ध में संघर्ष और साथियों के साथ मिलजुलकर रहने की भावना को दर्शाता था। इसका निर्माण सेवानिवृत्त विंग कमांडर अनुप सिंह बेदी वीएसएम ने किया था, जिनकी मदद सेना के सेवानिवृत्त कर्नल (डॉ.) सुल्तान सिंह मलिक (जिन्हें संगीतकार/गायक के रूप में भी जाना जाता है) ने की थी। सीरियल में समीर सोनी, अमन वर्मा, वीनाता मलिक, और गिरिश मलिक जैसे प्रसिद्ध अभिनेताओं ने मुख्य भूमिकाएँ निभाई थीं, साथ ही असली भारतीय नौसेना के अधिकारियों ने भी विशेष अभिनय किया था। इसमें भारतीय नौसेना के बेड़े के वास्तविक मैन्युवर और तस्वीरें भी दिखाई गई थीं। सीरियल का गीत "समंदर की हसीन लेहरों के कामील हुकूमरान हैं हम" से शुरू होता था, जिसकी रचना और गायन कर्नल एसएस मलिक ने किया था, और यह गीत बहुत लोकप्रिय हुआ था। इस सीरियल ने १९९५-९६ में बहुत उच्च TRP प्राप्त किया और ९० के दशक के नॉस्टल्जिक सीरियल के रूप में आज भी प्रेम किया जाता है।

May 24, 2026

वाल्मीकि रामायण का प्रथम श्लोक

मां निषाद प्रतिष्ठां त्वमगमः शाश्वतीः समाः।

 यत्क्रौंचमिथुनादेकम् अवधीः काममोहितम्॥

अर्थ:  हे निषाद (वनवासी या शिकारी), तुम्हें कभी भी प्रतिष्ठा या सम्मान प्राप्त नहीं होगा, क्योंकि तुमने प्रेम-मोह में क्रौंच पक्षी के जोड़े में से एक को मार डाला है।

यह संस्कृत श्लोक वाल्मीकि रामायण के प्रथम सर्ग (बालकाण्ड, श्लोक 15) का है | यह श्लोक महर्षि वाल्मीकि के मुख से एक प्रकार का श्राप स्वरूप निकला था, जब उन्होंने प्रेमी पक्षियों के बीच खिलवाड़ किया गया देखा था। इस श्लोक को रामायण के प्रथम श्लोक के रूप में मान्यता मिली है। 

May 21, 2026

मन कस्तूरी रे (Mann Kasturi Re)


पाट ना पाया मीठा पानी

पाट ना पाया मीठा पानी

ओर-छोर की दूरी रे


मन कस्तूरी रे, जग दस्तूरी रे


मन कस्तूरी रे, जग दस्तूरी रे

बात हुई ना पूरी रे


खोजे अपनी गंध ना पावे

चादर का पैबंद ना पावे


खोजे अपनी गंध ना पावे

चादर का पैबंद ना पावे

बिखरे बिखरे छंद सा टहले

दो होवें यह बांध ना पावें


नाचे होके फिरकी लट्टू ओह


नाचे होके फिरकी लट्टू

खोजे अपनी रूड़ी रे


मन कस्तूरी रे, जग दस्तूरी रे


मन कस्तूरी रे, जग दस्तूरी रे

बात हुई ना पूरी रे


उम्र की गिनती हाथ ना आई

पुरखों ने यह बात बताई


उल्टा करके देख सके तो

अंबर भी है गहरी खाई

रेखाओं के पार नज़र को

जिसने फेंका अंधे मन से

सतरंगी बेज़ार का खोला

दरवाज़ा बिन ज़ोर जतन के हे


फिर तो झूमा पागल होके

फिर तो झूमा पागल होके

सर पे डाल फितूरी रे


मन कस्तूरी रे, जग दस्तूरी रे

बात हुई ना पूरी रे


मन कस्तूरी रे, जग दस्तूरी रे

बात हुई ना, बात हुई ना

बात हुई ना पूरी रे

मन कस्तूरी रे, जग दस्तूरी रे

- वरूण ग्रोवर 

नोट:  मसान फिल्म समीक्षा 

May 19, 2026

Lyrics Raja Shivaji Anthem 'Chhatrapati'

हे, हर-हर-हर महादेव शिवशंकर

सह्यगिरी शिखरावर आले

हे, सळ-सळ-सळ रणकंटक तलवारी

वज्रमूठ सरसावून भाले

तू तेजःपुंज झुंजार, चेतवून अंगार

भेदलास अंधार सारा

तू अर्थ रामराज्याचा, हिंदवी स्वराज्याचा

एकमेव आराध्य झाला

दुष्ट दुर्जनांसी संहारले (हे)

पातशाहीला तू ललकारले (हे)

एक नव्या पर्वाची एकजूट करण्यासी

एक छत्र छाया आधार दे

एक शस्त्र, एक अस्त्र शूरवीर छत्रपती

धैर्यशील, सत्वशील, धर्मनिष्ठ छत्रपती

लाख मराठ्यांची तू आग रे (हे-हे)

माय भवानीचा तू वाघ रे

कीर्तीवंत, पुण्यवंत, नीतीवंत छत्रपती

अद्वितीय क्षत्रियकुलावतंस छत्रपती

लाख मराठ्यांची तू आग रे

माय भवानीचा तू वाघ रे

देव, देश, धर्माची, सर्वश्रेष्ठ कर्माची

आन घेतली रक्त सांडले जरी

अंधकार शतकांचा भस्मसात करण्यासी

एक तप्त ज्वाला ही पेटली उरी

भक्ती रूप संतांचा, साधू अन महंतांचा

हात जोडूनी मान राखलास तू

जर कुणी स्वराज्यावर वाकडी नजर केली

हात-पाय चौरंगी छाटलास तू

मोडून जात-पात रयतेसी देई साथ

त्यांचा सदैव कैवारी झाला

झाले बहुत राजे, जगतात नाव गाजे

लाखात एक शिवराय माझा

हात तुझा पाठीशी, वार झेलू छातीशी

ढाल तुझी होण्याचा मान दे

एक शस्त्र, एक अस्त्र शूरवीर छत्रपती

धैर्यशील, सत्वशील, धर्मनिष्ठ छत्रपती

लाख मराठ्यांची तू आग रे (हे-हे)

माय भवानीचा तू वाघ रे

कीर्तीवंत, पुण्यवंत, नीतीवंत छत्रपती

अद्वितीय क्षत्रियकुलावतंस छत्रपती

लाख मराठ्यांची तू आग रे

माय भवानीचा तू वाघ रे

मावळ-मावळ, पाठीशी बारा मावळ

देवाला शोधाया धावून आलं राऊळ

देवा रं देवा, सारं पावन झालं रं

आरती ओवाळा माझं राजं आलं रं

तोरण बांधून साजरं हे करू औक्षण कुंकुम भाळावर

शिवबांना डोळा पाहीन अन डोळ सारं पाणावलं

साष्टांग दर्शनाचा ह्या देवपूजनाचा

हा दैवयोग भाग्यात यावा

ध्वज उंच-उंच भगवा हा, वंदनीय भगवा हा

आसमंत भगवा कराया

जन्म सार्थ करण्यासी प्रार्थना ही चरणासी

प्राण अर्पण्याचा सन्मान दे

एक शस्त्र, एक अस्त्र शूरवीर छत्रपती

धैर्यशील, सत्वशील, धर्मनिष्ठ छत्रपती

लाख मराठ्यांची तू आग रे (हे-हे)

माय भवानीचा तू वाघ रे

कीर्तीवंत, पुण्यवंत, नीतीवंत छत्रपती

अद्वितीय क्षत्रियकुलावतंस छत्रपती

लाख मराठ्यांची तू आग रे

माय भवानीचा तू वाघ रे

--- अजय-अतुल 

Hindi Translation 

हे, हर-हर-हर महादेव शिवशंकर  

सह्यगिरि की शिखर-भूमि पर आए  


हे, सुस्सलाती रणकंटक तलवारें  

वज्रमूठ कसकर भाले  


तुम तेजस्वी, पराक्रमी, अंगार-सा जोश जगाने वाले  

तुमने सारा अंधकार चीर दिया  


तुम रामराज्य के अर्थ हो, हिंदवी स्वराज्य के प्रतीक हो  

और तुम ही एकमात्र आराध्य बन गए  


दुष्टों और दुराचारियों का संहार किया  

सत्ता को ललकार दिया  


एक नए युग को एकजुट करने के लिए  

एक ही छत्र की छाया और सहारा दो  


एक ही शस्त्र, एक ही अस्त्र, वीर छत्रपति  

धैर्यवान, सत्वशील, धर्मनिष्ठ छत्रपति  


लाखों मराठों की तुम ज्वाला हो  

माँ भवानी के तुम शेर हो  


कीर्तिवान, पुण्यवान, नीतिवान छत्रपति  

अद्वितीय क्षत्रिय कुल के आभूषण छत्रपति  


लाखों मराठों की तुम ज्वाला हो  

माँ भवानी के तुम शेर हो  


देव, देश और धर्म के लिए  

सर्वश्रेष्ठ कर्म के लिए  


यदि रक्त भी बहाना पड़ा, तो भी स्वीकार किया  

अंधकार के शतकों को भस्म करने के लिए  


एक तपती ज्वाला हृदय में प्रज्वलित हुई  

भक्ति-रूप संतों, साधुओं और महंतों का  


तुमने हाथ जोड़कर सम्मान रखा  

यदि किसी ने स्वराज्य पर टेढ़ी नजर डाली  


तो तुमने उसके हाथ-पाँव काट दिए  

जात-पात तोड़कर रयत का साथ दिया  


और सदा उनका रक्षक बन गया  

बहुत से राजा हुए, जिनका नाम दुनिया में गूंजा  


मेरे शिवराय तो लाखों में एक हैं  

तुम्हारा हाथ मेरी पीठ पर रहे, मैं सीना तानकर वार सह लूँ  


तुम्हारी ढाल बनने का मुझे सम्मान दो  

एक ही शस्त्र, एक ही अस्त्र, वीर छत्रपति  


धैर्यवान, सत्वशील, धर्मनिष्ठ छत्रपति  

लाखों मराठों की तुम ज्वाला हो  


माँ भवानी के तुम शेर हो  

कीर्तिवान, पुण्यवान, नीतिवान छत्रपति  


अद्वितीय क्षत्रिय कुल के आभूषण छत्रपति  

लाखों मराठों की तुम ज्वाला हो  


माँ भवानी के तुम शेर हो  


मावळ-मावळ, पीछे बारह मावळ  

देव को खोजने दौड़कर रावल आया  


हे देव, सब कुछ पावन हो गया  

मेरे राजा आए, उनकी आरती उतारो  


तोरण बाँधकर इसे उत्सव बनाएं, 

माथे पर कुंकुम से औक्षण करें  

शिवबाओं को आँखों से देखूँ तो

सब कुछ आँसुओं से भर जाए  


इस साष्टांग दर्शन और देवपूजन का  

यह सौभाग्य मेरे भाग्य में आए  


यह ऊँचा-ऊँचा भगवा ध्वज, यह वंदनीय भगवा  

आसमाँ तक भगवा कर दे  


जन्म को सार्थक करने के लिए चरणों में प्रार्थना है  

प्राण अर्पण करने का सम्मान दो  


एक ही शस्त्र, एक ही अस्त्र, वीर छत्रपति  

धैर्यवान, सत्वशील, धर्मनिष्ठ छत्रपति  


लाखों मराठों की तुम ज्वाला हो  

माँ भवानी के तुम शेर हो  


कीर्तिवान, पुण्यवान, नीतिवान छत्रपति  

अद्वितीय क्षत्रिय कुल के आभूषण छत्रपति  


लाखों मराठों की तुम ज्वाला हो  

माँ भवानी के तुम शेर हो  

L


May 17, 2026

क्यों खोये खोये चांद की (Kyon khoye khoye chand ki)


आज शब जो चांद ने है रूठने की थान ली
गर्दिशो में है सितारे बात हमने मान ली
अंधेरी शाम जिंदगी को समझ थी नहीं कहीं
कि एक आज हाथ थमलो की एक हाथ की कमी खाली
क्यों खोए खोए चांद की फिराक में तलाश में उदास है दिल
क्यों अपने आप से खफा खफा जरा ज़रा सा नाराज़ है दिल


ये मंज़िलें भी खुद ही तय करें,
ये फ़सलें भी खुद ही तय करें,
क्यूं तो रस्तों पे फिर सहम सहम
संभल संभल ले चलता है ये दिल
क्यों खोये चाँद की फिराक में तलाश में उदास है दिल


जिंदगी सवालो के जवाब ढूंढने चली
जवाब में सवालों की एक लंबी सी लड़ी मिली
सवाल ही सवाल है सूझती नहीं गली
कि आज हाथ थाम लो एक हाथ की कमी खाली


जी में आता है
मुर्दा सितारा नोच लो
इधर भी नोच लो
उधर भी नोचलो

एक दो का जिक्र क्या
में सारे नोच लो


 2 [इधर भी नोच लो
उधर भी नोच लो
सितारे नोच लो
में सारे नोच लो]2

क्यों तू आज
इतना वैसा है मिजाज में मजा है ऐ गम-ए-दिल
क्यों अपने आप से खफा खफा जरा जरा सा नाराज है दिल


ये मंजिलें भी खुद ही ताई करें,
ये फ़सलें भी खुद ही ताई करें,
क्यूं तो रस्तों पे फिर सहम सहम
संभल ले चलता है ये दिल


दिल को समझना है तो क्या आसान है
दिल तो फितरत से सुन लो ना बेईमान है
ये खुश नहीं है जो मिला
बस मांगता ही है चला


जानता है हर लगी का
दर्द ही है बस एक सिला


[जब कभी ये दिल लगा
दर्द ही हमें मिला
दिल की हर लगी का
सुनलो दर्द ही एक सिला]2


क्यों नए नए से दर्द की फिराक में तलाश उदास है दिल
क्यों अपने ऐप से खफा खफा जरा जरा सा नाराज है दिल


ये मंजिल भी खुद ही ताई करें
ये फासले भी खुद ही ताई करें
क्यों तो रस्तों पे फिर सहम सहम
संभल ले चलता है ये दिल


क्यों खोए खोए चांद की फिराक में तलाश में उदास है दिल
क्यों अपने आप से खफा खफा जरा जरा सा नाराज है दिल


ये मंजिलें भी खुद ही ताई करें, ये फासले भी खुद ही तय करें,
ये फासले भी खुद ही तय करें
क्यों तो रस्तों पे फिर सहम सहम
संभल ले चलता है ये दिल


--- स्वादानंद किरकिरे

May 13, 2026

भारत की वीर‑परंपरा: राजस्थानी, मराठी और बुंदेली लोक‑दोहों का अद्भुत संग्रह

भारत का इतिहास केवल युद्धों का वर्णन नहीं, बल्कि वीरता, शौर्य और आत्मसम्मान का अनंत स्रोत है। राजपूताना, मराठा और बुंदेलखंड की धरती पर पले‑बढ़े अनगिनत योद्धाओं ने अपनी तलवार और अपने वचन से ऐसी गाथाएँ रचीं, जो सदियों बाद भी आज उतनी ही प्रेरक हैं। इस ब्लॉग में आप लोक‑प्रचलित दोहे/उक्तियाँ उनके भावार्थ के साथ पढ़ेंगे  - जो भारतीय वीरता की ज्वाला को फिर से जगाते हैं।

1. घास की रोटी खाय ली, पर माथो न झुकाय; मेवाड़ रै राणा प्रताप, अकबर सूं न डराय।
भावार्थ: महाराणा प्रताप ने कठिन जीवन स्वीकार कर लिया, लेकिन पराधीनता नहीं—वे भूखे रह सकते थे, पर शत्रु के सामने आत्मसमर्पण नहीं।

2. हठ तो राव हमीर को, ओर रावन की टेक; सत राजा हरिचंद को, अरजन वान अनेक।
भावार्थ: कुछ लोगों का साहस और हठ ऐसा होता है कि वे मृत्यु को भी चुनौती दे देते हैं। जैसे हमीर का अटल संकल्प और रावण की जिद—एक बार ठान लेने पर वे पीछे नहीं हटते।

3. सिंह सुवन, सत्पुरुष वचन, कदली फलै इक बार; तिरिया तेल, हमीर हठ, चढ़ै न दूजी बार।
भावार्थ: कुछ अवसर और मूल्य ऐसी दुर्लभ चीजें हैं जो केवल एक बार घटित होती हैं—सज्जन का दिया वचन, सिंह का जन्म, केला का फल, राणा हमीर का अडिग संकल्प,—इन्हें दूसरी बार पाने की अपेक्षा व्यर्थ है; इसलिए समय रहते पहचानना आवश्यक है।

4. चमर हुळे नह सीह सिरै, छत्र न धारे सीह; हांथळ रा बळ सू हुवौ, ओ मृगराज अबीह।
भावार्थसच्चा सामर्थ्य बाहरी प्रतीकों से नहीं आता। शेर बिना चंवर‑छत्र के भी राजा है—उसकी शक्ति ही उसका राजचिह्न है।

5. स्थापूनी हिंदी स्वराज्य आपुले, शौर्याने लिहिली इतिहास‑गाथा;
असा हा जाणता राजा माझा, तयाच्या चरणी झुकवितो माथा.
भावार्थ: शिवाजी महाराज ने अपने साहस और नेतृत्व से हिंदवी स्वराज्य की स्थापना की और इतिहास में अमर गाथा लिखी। अनुभव, न्याय और बुद्धि से राज्य चलाने वाले इस महान “जाणत्या राजा” को माथा झुकाकर प्रणाम करने का मन करता है।

6. सह्याद्रीची साथ होती, घोड्यांच्या टापांचा नाद;  कडेकपारी फिरत होता, मर्द मराठ्यांचा वाघ.
भावार्थसह्याद्री के पर्वत शिवराय के साथ थे और उनके मावळों के घोड़ों की टापें रणभूमि में गूँजती थीं। सह्याद्री के कड़े‑कड़े पहाड़ों पर घूमने वाला यह मराठों का शेर—शिवाजी—हर घाटी में गर्जना करता था।

7. छत्ता तेरे राज में, धक‑धक धरती होय; जित‑जित घोड़ा मुख करे, उत‑उत फतह होय।
भावार्थछत्रसाल के काल में उनका पराक्रम इतना व्यापक था कि सेना जहाँ भी कदम बढ़ाती, विजय वहीं चलकर आ जाती—यह उनकी वीरता और न्यायप्रिय शासन की छवि है।

8. इत यमुना उत नर्मदा, इत चंबल उत टोंस; छत्रसाल सो लरन की, रही न काहू हौंस।
भावार्थ: छत्रसाल का राज्य इतना विस्तृत और बलशाली था कि उस पूरे क्षेत्र में किसी में इतना साहस नहीं कि उनसे युद्ध करने का विचार भी करे।

9. जो गति गजराज की, सो गति भई है आज। बाजी जात बुंदेल की, राखो बाजी लाज॥
भावार्थ: छत्रसाल अपनी स्थिति की तुलना गजेंद्र‑मोक्ष कथा के गजराज से करते हैं। जैसे गजराज ने संकट में भगवान को पुकारा, वैसी ही पुकार छत्रसाल बाजीराव से कर रहे थे।

10. चार बांस, चौबीस गज, अंगुल अष्ट प्रमान; ता ऊपर सुल्तान है, मत चूको चौहान।
भावार्थचार बांस, चौबीस गज दूरी और आठ अंगुल ऊँचाई के बराबर आगे–ऊपर ही सुल्तान (मोहम्मद गोरी) बैठा है। पृथ्वीराज चौहान, अब निशाना मत चूकना — यही सही क्षण है।

11. सिरसा सरोवर डोल्या, रण में उठी पुकार; डरे धरम के द्रोही सब, आल्हा‑ऊदल जूझे जब बार‑बार।
भावार्थजब आल्हा और ऊदल युद्धभूमि में उतरते थे, तो सिरसा झील तक कांप उठती थी। धर्मद्रोही भय से काँप जाते थे, क्योंकि आल्हा‑ऊदल का साहस, शक्ति और प्रतिशोध अजेय था।

इन दोहों और वीर‑उक्तियों में स्वाभिमान, स्वतंत्रता, त्याग और अडिग संकल्प की वह आग जलती है जिसने भारत की मिट्टी को गौरव सौंपा।

May 5, 2026

15 बेहतरीन शेर - 22 !!!

1. ये नया शहर तो है ख़ूब बसाया तुमने, क्यूं पुराना हुआ वीरान ज़रा देख तो लो - जावेद अख़्तर

2. हज़ारों साल नर्गिस अपनी बे-नूरी पे रोती है, बड़ी मुश्किल से होता है चमन में दीदा-वर पैदा - अल्लामा इक़बाल

3. उस पे पत्थर खाके क्या बीती ज़फ़र देखेगा कौन, फल तो सब ले जाएँगे ज़ख़्मे-शजर देखेगा कौन - ज़फ़र गोरखपुरी

4. देख ज़िंदाँ से परे रंग-ए-चमन, रक़्स करना है तो फिर पाँव की ज़ंजीर न देख। - मजरूह सुल्तानपुरी

5. कलकत्ते का जो ज़िक्र किया तू ने हम-नशीं, इक तीर मेरे सीने में मारा कि हाए हाए - मिर्ज़ा ग़ालिब

6. फूल तो दो दिन बहारे-जा-फ़िज़ा दिखला गए, हसरत उन गुंचों पे हैं जो बिन खिले मुरझा गए - ज़ौक़

7. वो ज़हर देता तो सब की निगह में आ जाता, सो ये किया कि मुझे वक़्त पे दवाएं न दीं - अख़्तर नाज़मी

8. हवा को बहुत सर-कशी का नशा है, मगर ये न भूले दिया भी दिया है । - खुमार बाराबंकवी

9. एक से एक जुनूँ का मारा इस बस्ती में रहता है,  एक हमीं हुशियार थे यारो एक हमीं बद-नाम हुए - इब्न-ए-इंशा

10. किस तरह जमा कीजिए अब अपने आप को, काग़ज़ बिखर रहे हैं पुरानी किताब के - -आदिल मंसूरी

11. वो दुश्मनी से देखते हैं, देखते तो हैं, मैं शाद हूँ की हूँ तो किसी की निगाह में - अमीर मीनाई

12. बाद मुद्दत के ये ऐ 'दाग़' समझ में आया, वही दाना है कहा जिसने न माना दिल का - दाग़ देहलवी

13. गो बहुत कुछ रंज यारान ए वतन से था हमेंआँख में आंसू मगर वक़्त ए सफ़र आ ही गया - अकबर इलाहाबादी,

14.  फ़रिश्तों से भी अच्छा मैं बुरा होने से पहले था, वो मुझ से इन्तिहाई ख़ुश ख़फ़ा होने से पहले था - अनवर शुऊर

15. मिरा ज़मीर बहुत है मुझे सज़ा के लिए,  तू दोस्त है तो नसीहत न कर ख़ुदा के लिए - शाज़ तमकनत

May 2, 2026

अथ नेता उवाच

फिर कोई मास्टर प्लान बनाया जाएगा,
देश को बाईसवीं सदी में पहुंचाया जाएगा.
अपना देश महान है, आप गर्व करेंगे सुन कर,
अभी आंकड़ों का गणित, समझाया जाएगा.

दुखदर्द, गरीबी सब हवा हो जाएंगी,
आप को आश्वासनों का जाम पिलाया जाएगा.
सुखे, बाढ़ की समस्या से चितित हैं हम,
अभी हवाई सर्वेक्षण करवाया जाएगा.

कुंआ खोदने की आप नाहक जिद न करें,
आग लगने तो दीजिए, फिर देखा जाएगा.
देशद्रोहियों को राह पर लाने की कोशिश करेंगे,
उन्हें देशभक्ति का रिकार्ड सुनवाया जाएगा.

कोई और परेशानी है तो पी. ए. को लिखवा दें,
आप के क्षेत्र में दोबारा पांच वर्ष बाद आया जाएगा.

- प्रदीप शर्मा

Apr 29, 2026

Title Song Lyrics of Daanasur (Denver the last Dinosaur)

छिपकली के नाना हैं,

छिपकली के हैं ससुर,

दानासुर दानासुर दानासुर! 

छिपकली के नाना हैं,

छिपकली के हैं ससुर,

दानासुर दानासुर दानासुर! 

तानपुरे के नीचे दो मंजीरे जैसे पाँव,

ना कुत्ते की भौं भौं, ना बिल्ली की म्याँऊ,

सुर है तराने में, धिन तन न ना,

दानासुर दानासुर दानासुर

दानासुर दानासुर दानासुर!

--- गुलज़ार 

Apr 17, 2026

15 बेहतरीन शेर - 21 !!!

1. आनेवाली नस्लें तुम पर फ़ख़्र करेंगी हम-असरो, जब भी उनको ध्यान आएगा तुमने 'फ़िराक़' को देखा है - फ़िराक़ गोरखपुरी

2. हमारे बस में था ही क्या हवा पे हम सवार थे, वहाँ वहाँ गए जहाँ हवा उड़ा के ले गई -अज़्म शाकिरी

3. क्या क्या हुआ है हम से जुनूँ में न पूछिए , उलझे कभी ज़मीं से कभी आसमाँ से हम - असरार-उल-हक़ मजाज़

4. अब तुमसे रुख़सत होता हूँ आओ सम्भालो साज़े-गज़ल नये तराने छेड़ो, मेरे नग्मों को नींद आती है - रघुपति सहाय 'फ़िराक़'

5. तुझे किस बात का ग़म है वो इतना पूछ लें मुझ से वो इतना पूछ लें मुझ से तो फिर किस बात का ग़म है मुझ से - मुशताक़ हुसैन ख़ान हाशमी मुश्ताक़

6.  मुझको तो होश नहीं, तुमको ख़बर हो शायद, लोग कहते हैं कि तुमने मुझे बर्बाद किया - जोश मलीहाबादी

7. मैं तो ग़ज़ल सुना के अकेला खड़ा रहा, सब अपने अपने चाहने वालों में खो गए - कृष्ण बिहारी नूर

8. न जाने कैसा मसीहा था चाहता क्या था, तमाम शहर को बीमार देख कर ख़ुश था  - अमीर क़ज़लबाश

9. दाग़ दुनिया ने दिए ज़ख़्म ज़माने से मिले, हम को तोहफ़े ये तुम्हें दोस्त बनाने से मिले - कैफ़ भोपाली

10.  ख़ुशियाँ देते देते अक्सर खुद ग़म में मर जाते हैं,  रेशम बुनने वाले कीड़े रेशम में मर जाते हैं - ख़ुशबीर सिंह शाद

11. कुछ तो तेरे मौसम ही मुझे रास कम आये और कुछ मेरी मिट्टी में बग़ावत भी बहुत थी - परवीन शाकिर

12. रातें परदेस की डरता था कटेंगी कैसे, मगर आँगन में सितारे थे वही घर वाले - राही मासूम रजा़

13. हम को नीचे उतार लेंगे लोग, इश्क़ लटका रहेगा पंखे से - ज़िया मज़कूर

14. मैखाने के क़रीब थी मस्जिद भले को, दाग़ हर एक पूछता था कि “ हज़रत इधर कहाँ? - दाग़

15. जब तुलू आफताब होता है, ग़म के सागर उछाल देता हूँ, तज़किरा जब वफ़ा का होता है, में तुम्हारी मिसाल देता हूँ.. 

Apr 8, 2026

सुभाषितानि - 5 (Subhashitani -5)

1. सर्वस्य ही परीक्ष्यन्ते स्वभावो नेतरे गुणाः| अतीत्य हि गुणान् सर्वान् स्वभावो मूर्धनि वर्तते ||

अर्थ: संकट या कठिनाइयों के समय व्यक्ति का असली स्वभाव सामने आ जाता है जो उसके सभी गुणों से बढ़कर होता है।

2. विद्या विवादाय धनं मदाय, शक्तिः परेषाम् परिपीडनाय | खलस्य, साधोः विपरीतं एतत्; ज्ञानाय दानाय च रक्षणाय ||

अर्थ: विद्या (ज्ञान) दुष्ट लोगों के लिए विवाद के लिए होती है, धन (धन संपत्ति) घमंड के लिए होता है, और शक्ति दूसरों को पीड़ित करने के लिए होती है। परंतु सज्जन लोगों के लिए विद्या ज्ञान प्राप्ति के लिए, धन दान करने के लिए, और शक्ति दूसरों की रक्षा करने के लिए होती है।

3. न तेन वृद्धो भवति येनास्य पलितं शिरः | 
 यो वै युवापि अधीयानस्तं देवाः स्थविरं विदुः ||

अर्थ: यह है कि केवल उम्र बढ़ने से या बाल सफेद होने से कोई व्यक्ति बड़ा या बुद्धिमान नहीं माना जाता। असली बढ़ेपन का पैमाना ज्ञान और बुद्धिमत्ता है। जो युवा होते हुए भी सीखते हैं, ज्ञान अर्जित करते हैं, वही सच्चे वृद्ध और सम्मानित माने जाते हैं।

4.  काक: कृष्ण: पिक: अपि कृष्ण: को भेद: काकपिकयो: | वसंत काले सम्प्राप्ते काक: काक: पिक: पिक: ||

अर्थ: कौआ और कोयल दोनों काले रंग के होते हैं और देखने में समान लगते हैं, लेकिन जब वसंत ऋतु आ जाती है तो उनकी असली पहचान उनके स्वर से हो जाती है। कौआ अपनी कर्कश आवाज करता है जबकि कोयल मधुर गीत गाती है।

5. शैले शैले न माणिक्यम् मौक्तिकम् न गजे गजे।
 साधवो न हि सर्वत्र चन्दनम् न वने वने।।

अर्थ: हर पर्वत पर हीरा (माणिक्य) नहीं मिलता, हर हाथी के मस्तक में मोती (मौक्तिक) नहीं होता। सभी जगह सज्जन लोग (साधु) नहीं मिलते और हर वन में चंदन वृक्ष भी नहीं होते। ये चीजें दुर्लभ और मूल्यवान होती हैं।

6. मूर्खो अपि शोभते तावत् सभायां वस्त्रवेष्टित: ।
 तावत् शोभते मूर्खो यावत् किंचित् न भाषते ॥

अर्थ: मूर्ख व्यक्ति भी अच्छे वस्त्र पहनकर सभा में तब तक शोभित होता है (अच्छा लगता है), जब तक वह कुछ नहीं बोलता। मूर्ख उसी समय तक शोभा पाता है, जब तक वह चुप रहता है.

7. यत्तदग्रे विषमिव परिणामे अमृतोपमम्, 
तत्सुखम् सात्त्विकं प्रोक्तम् आत्मबुद्धि प्रसादजम् | 
विषयेंद्रिय संयोगात् यत्तदग्रे अमृतोपमम्, 
परिणामे विषमिव तत्सुखं राजसं स्मृतम् ||

अर्थ जिस सुख का प्रारंभ विष (जहर) जैसा कष्टदायक होता है, पर परिणाम अमृत के समान सुखद होता है, वही सात्त्विक सुख कहलाता है। यह सुख आत्मबुद्धि के प्रसाद से उत्पन्न होता है। जो सुख विषय (इंद्रिय) के संयोजन से उत्पन्न होता है, उसका प्रारंभ तो अमृत के समान सुखद होता है, लेकिन परिणाम विष (जहर) के समान कष्टदायक होता है, उसे राजसिक सुख कहा गया है।

Apr 4, 2026

अभी साज़-ए-दिल में तराने बहुत हैं

अभी साज़-ए-दिल में तराने बहुत हैं
अभी ज़िंदगी के बहाने बहुत हैं

ये दुनिया हक़ीक़त की क़ाइल नहीं है
फ़साने सुनाओ फ़साने बहुत हैं

तिरे दर के बाहर भी दुनिया पड़ी है
कहीं जा रहेंगे ठिकाने बहुत हैं

मिरा इक नशेमन जला भी तो क्या है
चमन में अभी आशियाने बहुत हैं

नए गीत पैदा हुए हैं उन्हीं से
जो पुर-सोज़ नग़्मे पुराने बहुत हैं

दर-ए-ग़ैर पर भीक माँगो न फ़न की
जब अपने ही घर में ख़ज़ाने बहुत हैं

हैं दिन बद-मज़ाक़ी के 'नौशाद' लेकिन
अभी तेरे फ़न के दिवाने बहुत हैं

Mar 31, 2026

हिंदी होने पर नाज़ जिसे कल तक था

हिंदी होने पर नाज़ जिसे कल तक था, हिज़ाज़ी बन बैठा,

अपनी महफ़िल का रिंद पुराना आज नमाज़ी बन बैठा।

महफ़िल में छुपा है कैसे—हज़्रत! दीवाना कोई सहरा में नहीं,

पैग़ाम-ए-जुनूँ जो लाता था, इक़बाल वो अब दुनिया में नहीं।

ऐ मुतरिब! तेरे तरानों में अगली-सी अब वो बात नहीं,

वो ताज़गी-ए-तख़य्युल नहीं, बेसाख़्तगी-ए-जज़्बात नहीं।

— आनंद नारायण ‘मुल्ला’ (शेर-ओ-शायरी से)

“अल्लामा इक़बाल जैसे परिपक्व और विशाल हृदय वाले व्यक्ति को अचानक साम्यवाद के दलदल में फँसते देखकर लोग दुख और चिंता से कराह उठे।”

Mar 27, 2026

बहादुर शाह ज़फ़र और हिंदुस्तान की तलवार: ऐतिहासिक शायरी की कहानी

1857 का भारतीय विद्रोह, जिसे आज़ादी की पहली क्रांति भी कहा जाता है, सिर्फ़ युद्ध की लड़ाई तक सीमित नहीं था। इस विद्रोह के दौरान आखिरी मुग़ल सम्राट बहादुर शाह ज़फ़र की शख्सियत और उनकी शायरी ने भी इतिहास में अपनी अलग छाप छोड़ी।

कहा जाता है कि विद्रोह के बाद, जब अंग्रेज़ अधिकारी ज़फ़र को पकड़ने आए, उन्होंने उन्हें तंज़ के साथ कहा:

“दमदमे में दम नहीं है ख़ैर मांगो जान की.. ऐ ज़फ़र ठंडी हुई अब तेग हिंदुस्तान की।”
(अब तुम्हारे पास कोई ताक़त नहीं, ज़फ़र। हिंदुस्तान की तलवार भी अब नुकीली नहीं रही।)

लेकिन बहादुर शाह ज़फ़र की शायरी में छिपी जज़्बात और आत्मसम्मान ने जवाब में इतिहास रच दिया। उन्होंने शेर कहा:

“ग़ाज़ियों में बू रहेगी जब तलक ईमान की, तख़्त ऐ लंदन तक चलेगी तेग हिंदुस्तान की।”
 (भारत की तलवार और उसका साहस कभी कम नहीं होगा, और ईमान की शक्ति के साथ यह London तक अपनी गूँज पहुंचाएगी।)

इस जवाब से साफ़ झलकता है कि ज़फ़र का मनोबल और उनका देशभक्ति का जज़्बा अंग्रेज़ों की धमकियों से कम नहीं हुआ। यह सिर्फ़ एक शेर नहीं, बल्कि उस युग की एक प्रेरणादायक कहानी है, जो यह बताती है कि कठिन परिस्थितियों में भी आत्मसम्मान और विश्वास कभी नहीं मरते।

Mar 23, 2026

15 बेहतरीन शेर - 20 !!!

 1. सरजमीने-हिंद में अकवामे आलम के फ़िराक़,  कारवां आते गए हिंदोस्ताँ बनता गया  - फ़िराक़ गोरखपुरी

2. कुछ मेरे बाद और भी आएंगे क़ाफ़िले, कांटे ये रास्ते से हटा लूं तो चैन लूं। -तसव्वुर किरतपुरी

3. इन्हीं ज़र्रों से होंगे कल नये कुछ कारवां पैदा,  जो ज़र्रे आज उड़ते हैं ग़ुबारे-कारवां हो कर। - शफ़क टौंकी

4. इस शहर में जीने के अंदाज़ निराले हैं, होठों पे लतीफे हैं आवाज़ में छाले हैं। - जावेद अख़्तर

5. जिनके आँगन में अमीरी का शजर लगता है, उसका हर ऐब ज़माने को हुनर लगता है - अंजुम रहबर

6. ऐ दिल वो आशिक़ी के फ़साने किधर गए, वो उम्र क्या हुई वो ज़माने किधर गए - अख़्तर शीरानी‬

7. सियाह रात नहीं लेती नाम ढलने का, यही तो वक़्त है सूरज तेरे निकलने का - शहरयार

8. नतीजा एक ही निकला, कि थी क़िस्मत में नाकामी, कभी कुछ कह के पछताये, कभी चुप रह के पछताये। - आरज़ू लखनवी

9. हमारी ज़िन्दगी के सानहे भी क्या अजब गुज़रे, उसी पर मर मिटे जिस से हमें बेज़ार होना था - मनीष शुक्ला

10. अब ज़मीं पर कोई गौतम न मोहम्मद न मसीह, आसमानों से नए लोग उतारे जाएँ - अहमद फ़राज़

11. हम वो हैं जो ख़ुदा को भूल गए तुम मेरी जान किस गुमान में हो - जौन एलिया

12. दफ़'अतन घटा की आड़ से चाँदनी कशीद हो गई, ज़ुल्फ़ उस के चेहरे से हटी और मेरी 'ईद हो गई - आलम निज़ामी

13. जुर्रत से हर नतीजे की परवाह किये बगैर, दरबार छोड़ आया हूँ सजदा किये बगैर ! - मुनव्वर राना

14. ये हमसे कौन दिन भर की कमाई छीन लेता है, उतर कर अपनी मसनद से चटाई छीन लेता है - सलाहउद्दीन नैयर

15. अपने बच्चों को मैं बातों में लगा लेता हूं, जब भी आवाज़ लगाता है खिलौने वाला - राशिद राही

Mar 20, 2026

तुलसीदास के 14 कालजयी दोहे


1. विनय न मानत जलधि जड़, गए तीनि दिन बीति।
बोले राम सकोप तब, भय बिनु होइ न प्रीति॥

भावार्थ: जब तीन दिन तक विनम्रता से कहने पर भी समुद्र नहीं माना, तब राम को क्रोध आया। तुलसीदास कहते हैं कि बिना भय के प्रेम और अनुशासन नहीं बनता।

2. तुलसी साथी विपत्ति के, विद्या विनय विवेक।
साहस सुकृति सुसत्यव्रत, राम भरोसे एक॥

भावार्थ: विपत्ति के समय विद्या, नम्रता, विवेक, साहस, अच्छे कर्म, सत्य और राम पर भरोसा—यही सच्चे साथी होते हैं।

3.परहित सरिस धरम नहि भाई, पर पीड़ा सम नहि अधमाई।

भावार्थ: दूसरों का भला करने जैसा कोई धर्म नहीं, और दूसरों को कष्ट देना सबसे बड़ा पाप है।

4. धीरज धरम मित्र अरु नारी, आपद काल परखिए चारी।

भावार्थ: धैर्य, धर्म, मित्र और पत्नी—इन चारों की असली परीक्षा कठिन समय में ही होती है।

5. समरथ को नहिं दोष गोसाईं, रवि पावक सुरसरि की नाईं।

भावार्थ: जो समर्थ और महान होता है, उस पर दोष नहीं लगता—जैसे सूर्य, अग्नि और गंगा सबको शुद्ध करते हैं।

6. जाकी रही भावना जैसी, प्रभु मूरत देखी तिन तैसी।

भावार्थ: मनुष्य की भावना जैसी होती है, उसे भगवान भी वैसे ही दिखाई देते हैं।

7. हरि अनंत हरि कथा अनंता, कहहिं सुनहिं बहुविधि सब संता॥

भावार्थ: भगवान अनंत हैं और उनकी कथाएँ भी अनंत हैं; संत उन्हें अनेक रूपों में कहते और सुनते हैं।

8. होइहि सोइ जो राम रचि राखा, को करि तर्क बढ़ावै साखा॥

भावार्थ: जो राम ने रच दिया है, वही होकर रहता है। तर्क-वितर्क करके कोई भी सत्य को बदल नहीं सकता।

9. बिनु हरि कृपा मिलहिं नहि संता, बिनु संत कृपा मिलहिं नहि हरि॥

भावार्थ: भगवान की कृपा बिना संत नहीं मिलते, और संतों की कृपा बिना भगवान नहीं।

10. जाको प्रिय न राम वैदेही, त्यागहु ताहि कोटि बैरी सम।

भावार्थ: जिसे राम और सीता प्रिय नहीं, उसे शत्रु के समान समझकर त्याग देना चाहिए।

11. जहां सुमति तहं संपति नाना, जहां कुमति तहं विपति निदाना।

भावार्थ: जिस घर में आपसी प्रेम और सद्भाव होता है वहां सारे सुखी होते हैं और जहाँ आपस में द्वेष और वैमनष्य होता है उस घर के वासी दुखी जाते हैं.

12. आवत ही हरसै नही, नैनन नही सनेह
तुलसी तहां न जाईये कंचन बरसे मेह ।

भावार्थ : जिस स्थान पर लोग आपके आने से खुश न हों और उनकी नजरों में आपके प्रति स्नेह न हो, वहाँ कभी न जाएँ ।

13. रघुकुल रीति सदा चलि आई। प्राण जाहि बरु बचनु न जाई॥ 

भावार्थ: रघुकुल की परंपरा यही रही है कि प्राण त्याग दिए जाएँ, लेकिन दिया गया वचन कभी नहीं तोड़ा जाए

14. इहाँ कुम्हड़बतिया कोउ नाहिं। जे तरजनी देखि मरि जाहिं॥

भावार्थ: रामचरितमानस (अयोध्या कांड) में लक्ष्मण परशुराम के फरसे को देखकर कहते हैं कि मैं कोई कुम्हड़े का कोमल फल नहीं जो उंगली दिखाने से मर जाऊँ। यहां कोई कमजोर, नाजुक चीज नहीं है जो उंगली के इशारे से ही नष्ट हो जाए। 

Mar 11, 2026

शेर-ओ-शायरी - गीताप्रेस की किताब "एक लोटा पानी"


1. आईना! मुँह पर ही कहता है—साफ-साफ। सच यह है-जो साफ होता है, सफा कहता है।।

2.  सँभल कर बैठना, जलवा मुहब्बत देखने वाले। तमाशा खुद न बन जाना तमाशा देखने वाले॥

3. खुदाने हुस्न नादानोंको, बख्सा जर रजीलों को। अक्लमंदों को रोटी खुश्क, औ हलुवा वखीलों को ॥

4. एक बुतको चूमनेको शेखजी काबा गये। गरचे-हर बुत काबिले बोसा है इस बुतखानेमें॥

5. नजर से सर कलम कर दे, उसे शमशीर कहते हैं। निशाने में जो लग जाये, उसीको तीर कहते हैं॥

6.  न कह गया, न सुन गया और न नाम बता गया। मैं क्या कहूँ कि मेरे दिल, किसने चुरा लिया

7. है इबादत की इबादत है, मुहब्बत की मुहब्बत है। मेरे माशूक की सूरत खुदा से मिलती जुलती है॥

8. शेखजीसे मैंने पूछी, मंजिल जब यार की। बुतकदे की और चुपकेसे, इशारा कर दिया॥

9. बहुत मुश्किल निभाना है मुहब्बत अपने दिलवर से। उधर मूरत अमीराना इधर हालत फकीराना॥

10. चाँद बदली में छिपा है मुझे मालूम न था। सकल इनसान में खुदा है, मुझे मालूम न था॥

11. बुतपरस्ती मेरे हकमें हकपरस्ती हो गयी। दे दिया तेरा पता कुछ, यारकी तसबीरने॥

12. मुहब्बत करो और निभा लो तब पूछना, कि दुश्चारियाँ हैं कि आसानियाँ हैं?

13.  समझकर अपना दीवाना, वह मुझसे मुँह छिपाते हैं। हकीकत यों है, दरपरदा, मुहब्बत आजमाते हैं॥

14. शिकाइत किस जबाँसे मैं करूँ उनके न आनेकी। यही अहसान क्या कम है कि मेरे दिलमें रहते हैं॥

15. दुनियाँ इक इफसाना कहने को थे मगर सोचा। दुनियाँ है खुद इफसाना, इफसाने से क्या कहना?

16. रहमान के फिरश्ते' गो हैं बहुत मुकद्दस? शैतानही की जानिब, लेकिन मिजोरटी है॥

17..तमन्ना दर्ददिल में हो, तो कर खिदमत फकीरों की । नहीं वह “लाल” मिलता है अमीरों के खजानेमें॥

--- श्रीपारसनाथ सरस्वती 

(गीताप्रेस गोरखपुर द्वारा प्रकाशित "एक लोटा पानी" पुस्तक में एक नैतिक कहानी है, जिसका शीर्षक है "हिंदू राज्य कैसे गया?"। शेर-ओ-शायरी उसी कहानी से लिये गये हैं।)

Mar 3, 2026

अल्लामा इक़बाल की शायरी: इस्लाम, जम्हूरियत और आत्मबल का दर्शन


अल्लामा मुहम्मद इक़बाल केवल शायर नहीं थे, वे एक विचारक, दार्शनिक और आत्मचेतना के कवि थे। उनकी शायरी व्यक्ति, समाज और सत्ता—तीनों से सवाल करती है। बाल-ए-जिब्रील में इक़बाल की आवाज़ सबसे अधिक बेबाक और वैचारिक रूप में सामने आती है।
 
शेर 1: (बाल-ए-जिब्रील से)

सोचा भी है ऐ मद-ए-मुसलमाँ कभी तूने,
क्या चीज़ है फ़ौलाद की शमशीर-ए-जिगरदार?
इस बैत का ये मिस्रअ-ए-अव्वल है कि जिसमें,
पोशीदा चले आते हैं तौहीद के असरार।

भावार्थ:  इक़बाल मुसलमान से पूछते हैं - क्या तुमने कभी सोचा है कि सच्चे ईमान और आत्मबल से बनी फ़ौलाद की तलवार वास्तव में क्या होती है?  इस शेर की पहली ही पंक्ति में एकेश्वरवाद (तौहीद) के गहरे रहस्य छिपे हुए हैं।

संदेश: असली शक्ति हथियार में नहीं, ईमान और आत्मचेतना में होती है।
 
शेर 2: (बाल-ए-जिब्रील से)

इस राज़ को इक मद-ए-फ़िरंगी ने किया फ़ाश,
हरचंद कि दाना इसे खोला नहीं करते।
जम्हूरियत इक तर्ज़-ए-हुकूमत है कि जिसमें,
बंदों को गिना करते हैं, तोला नहीं करते।

भावार्थ:  इक़बाल कहते हैं कि इस सच्चाई को एक पश्चिमी विचारक ने उजागर किया - हालाँकि बुद्धिमान लोग भी इसे खुलकर नहीं कहते। लोकतंत्र एक ऐसी शासन-प्रणाली है जिसमें इंसानों को गिना तो जाता है, पर परखा नहीं जाता।

संदेश: संख्या-बल से चलने वाली व्यवस्था हमेशा न्याय और गुण की गारंटी नहीं देती।
 
शेर 3:

वा न करना फ़रक़ाबदी के लिए अपनी ज़ुबां,
छिपके है बैठा आ हंगाम-ए-महशर यहाँ।
वफ़्ल के सामान पैदा है तेरी तहरीर से,
देखे कोई दिल न दुख जाए तेरी तक़रीर से।
महफ़ले-नव में पुरानी दास्तानों को न छेड़,
रंग पर जो अब न आएँ उन फ़सानों को न छेड़।
 
भावार्थ:  इक़बाल चेतावनी देते हैं - अपनी ज़ुबान का इस्तेमाल फ़िरक़ाबंदी के लिए मत करो। तेरी लिखावट और तक़रीर से फसाद के बीज पैदा हो सकते हैं। नई महफ़िलों में पुराने, बेमानी झगड़ों को मत उछालो।

संदेश: शब्दों की जिम्मेदारी भी उतनी ही बड़ी है जितनी कर्म की।

 शेर 4:

वो दीने-हिजाज़ी का बेबाक बेड़ा-निशाँ,
जिसका अक्सा-ए-आलम में पहुँचा।
न था जिसको ख़तरा न उम्म में, न क़ुलज़ुम में,
झिझका किये बे-सपर जिसने सातों समंदर—
वो डूबा दहाने में गंगा के आकर।


भावार्थ:  इक़बाल उस इस्लामी सभ्यता को याद करते हैं जिसका जहाज़ पूरी दुनिया में बेख़ौफ़ चला, जिसे न समंदरों से डर लगा, न तूफ़ानों से। लेकिन वही सभ्यता गंगा के किनारे आकर डूब गई - यानी अपने मूल उद्देश्य और आत्मा से दूर होकर।

संदेश: सभ्यताएँ बाहरी शक्ति से नहीं, आंतरिक पतन से गिरती हैं।

Feb 13, 2026

अकबर इलाहाबादी और सर सैयद: व्यंग्य और सामाजिक सुधार की शायरी

अकबर इलाहाबादी केवल आलोचक नहीं थे; वे सर सैयद के सामाजिक सुधारों के समर्थक भी थे। उनके दृष्टिकोण में सर सैयद के प्रयासों का सम्मान था, लेकिन कुछ बातें उनके तरीक़े और शैली में उन्हें कमज़ोर या असंगत प्रतीत होती थीं। यही संतुलित दृष्टि इलाहाबादी की शायरी में झलकती है। यहाँ कुछ उद्धृत शेर और उनका विश्लेषण प्रस्तुत है:

शेर 1: ईमान बेचने को तो तैयार हैं हम भी, लेकिन, खरीद हो जो अलीगढ़ के भाव से।

व्याख्या: यहाँ इलाहाबादी व्यंग्य करते हैं कि लोग तो ईमान भी बेच सकते हैं, पर यदि इसे अलीगढ़ (जहाँ सर सैयद ने आधुनिक शिक्षा को बढ़ावा दिया) के तर्ज़ पर खरीदा जाए, तभी यह स्वीकार्य होगा। यह हल्का-फुल्का व्यंग्य अलीगढ़ मूवमेंट पर है।

शेर 2: हजार शेख ने डाढ़ी बढ़ाई सन की – सी, मगर, वो बात कहाँ मालवी मदन की – सी।

व्याख्या: इस शेर में इलाहाबादी कहते हैं कि लाखों लोगों ने बाहरी रूप (जैसे दाढ़ी बढ़ाना) अपनाया, लेकिन असली असर वही नहीं हुआ जो मालवी मदन या असली दृष्टिकोण वाला व्यक्ति दर्शाता। यह शेर दिखावे और वास्तविकता के बीच अंतर को उजागर करता है।

शेर 3: तालीम–ए दुस्तुराँ से ये उम्मीद है ज़रा, नाचे दुल्हन ख़ुशी से ख़ुद अपनी बरात में।

व्याख्या: यह शेर शिक्षा और सुधार की उम्मीदों पर व्यंग्य करता है। इलाहाबादी कहते हैं कि शिक्षा का लक्ष्य सिर्फ़ दिखावा न बन जाए, बल्कि उसका असर वास्तविक जीवन में महसूस होना चाहिए।

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अकबर इलाहाबादी की शायरी यह दिखाती है कि आलोचना हमेशा विरोध नहीं होती, बल्कि यह सुधार और सुधारकों के दृष्टिकोण को समझने और परखने का माध्यम भी हो सकती है। उनकी शेरों में व्यंग्य, सामाजिक टिप्पणियाँ और गहरी समझ का सुंदर मिश्रण मिलता है।

Feb 9, 2026

15 बेहतरीन शेर - 19 !!!

1. हमें तो ख़ैर कोई दूसरा अच्छा नहीं लगता, उन्हें ख़ुद भी कोई अपने सिवा अच्छा नहीं लगता -मोहसिन ज़ैदी

2. मिरे लहू से वज़ू और फिर वज़ू पे वज़ू, डरा हुआ हूँ ज़माने तिरी नमाज़ से मैं - रफ़ी रज़ा

3. कुछ मेरे बाद और भी आएंगे क़ाफ़िले, कांटे ये रास्ते से हटा लूं तो चैन लूं। -तसव्वुर किरतपुरी

4. हमारे दिल में भी झांको अगर मिले फुर्सत, हम अपने चेहरे से उतने नजर नहीं आते..!! ~ वसीम बरेलवी

5. अब छोड़ साथ मेरा ऐ याद-ए-नौजवानी, इस उम्र का मुसाफ़िर तन्हाई चाहता है - क़तील शिफ़ाई

6. बुरा न मान अगर यार कुछ बुरा कह दे, दिलों के खेल में ख़ुद्दारियाँ नहीं चलतीं - कैफ़ भोपाली

7. मोहब्बत क्या बला है चैन लेना ही भुला दे है, ज़रा भी आँख झपके है तो बेताबी जगा दे है -कलीम आजिज़

8. मैं तो इस वास्ते चुप हूँ कि तमाशा न बने, तू समझता है मुझे तुझ से गिला कुछ भी नहीं - अख़्तर शुमार

9.सुब्ह हो जाएगी हाथ आ न सकेगा महताब, आप अगर ख़्वाब में चलते हैं तो चलते रहिए - मलिकज़ादा मंज़ूर अहमद

10. मैं मुद्दतों जिया हूँ किसी दोस्त के बग़ैर अब तुम भी साथ छोड़ने को कह रहे हो ख़ैर ~ फ़िराक़ गोरखपुरी

11. तुम पूछो और मैं न बताऊँ ऐसे तो हालात नहीं, एक ज़रा सा दिल टूटा है और तो कोई बात नहीं - क़तील शिफ़ाई

12. जाने ये कैसा ज़हर दिलों में उतर गया, परछाईं ज़िंदा रह गई, इंसान मर गया...!!! - उम्मीद फ़ाज़ली

13. लाई हयात आए क़ज़ा ले चली चले, अपनी ख़ुशी न आए न अपनी ख़ुशी चले - शेख़ इब्राहीम ज़ौक़

14. वो आए घर में हमारे ख़ुदा की क़ुदरत है, कभी हम उन को कभी अपने घर को देखते हैं - मिर्ज़ा ग़ालिब

15. देखिए पाते हैं उश्शाक़ बुतों से क्या फ़ैज़ इक बरहमन ने कहा है कि ये साल अच्छा है - मिर्ज़ा ग़ालिब