1. विनय न मानत जलधि जड़, गए तीनि दिन बीति।
बोले राम सकोप तब, भय बिनु होइ न प्रीति॥
भावार्थ: जब तीन दिन तक विनम्रता से कहने पर भी समुद्र नहीं माना, तब राम को क्रोध आया। तुलसीदास कहते हैं कि बिना भय के प्रेम और अनुशासन नहीं बनता।
2. तुलसी साथी विपत्ति के, विद्या विनय विवेक।
साहस सुकृति सुसत्यव्रत, राम भरोसे एक॥
भावार्थ: विपत्ति के समय विद्या, नम्रता, विवेक, साहस, अच्छे कर्म, सत्य और राम पर भरोसा—यही सच्चे साथी होते हैं।
3.परहित सरिस धरम नहि भाई, पर पीड़ा सम नहि अधमाई।
भावार्थ: दूसरों का भला करने जैसा कोई धर्म नहीं, और दूसरों को कष्ट देना सबसे बड़ा पाप है।
4. धीरज धरम मित्र अरु नारी, आपद काल परखिए चारी।
भावार्थ: धैर्य, धर्म, मित्र और पत्नी—इन चारों की असली परीक्षा कठिन समय में ही होती है।
5. समरथ को नहिं दोष गोसाईं, रवि पावक सुरसरि की नाईं।
भावार्थ: जो समर्थ और महान होता है, उस पर दोष नहीं लगता—जैसे सूर्य, अग्नि और गंगा सबको शुद्ध करते हैं।
6. जाकी रही भावना जैसी, प्रभु मूरत देखी तिन तैसी।
भावार्थ: मनुष्य की भावना जैसी होती है, उसे भगवान भी वैसे ही दिखाई देते हैं।
7. हरि अनंत हरि कथा अनंता, कहहिं सुनहिं बहुविधि सब संता॥
5. समरथ को नहिं दोष गोसाईं, रवि पावक सुरसरि की नाईं।
भावार्थ: जो समर्थ और महान होता है, उस पर दोष नहीं लगता—जैसे सूर्य, अग्नि और गंगा सबको शुद्ध करते हैं।
6. जाकी रही भावना जैसी, प्रभु मूरत देखी तिन तैसी।
भावार्थ: मनुष्य की भावना जैसी होती है, उसे भगवान भी वैसे ही दिखाई देते हैं।
7. हरि अनंत हरि कथा अनंता, कहहिं सुनहिं बहुविधि सब संता॥
भावार्थ: भगवान अनंत हैं और उनकी कथाएँ भी अनंत हैं; संत उन्हें अनेक रूपों में कहते और सुनते हैं।
8. होइहि सोइ जो राम रचि राखा, को करि तर्क बढ़ावै साखा॥
भावार्थ: जो राम ने रच दिया है, वही होकर रहता है। तर्क-वितर्क करके कोई भी सत्य को बदल नहीं सकता।
8. होइहि सोइ जो राम रचि राखा, को करि तर्क बढ़ावै साखा॥
भावार्थ: जो राम ने रच दिया है, वही होकर रहता है। तर्क-वितर्क करके कोई भी सत्य को बदल नहीं सकता।
9. बिनु हरि कृपा मिलहिं नहि संता, बिनु संत कृपा मिलहिं नहि हरि॥
भावार्थ: भगवान की कृपा बिना संत नहीं मिलते, और संतों की कृपा बिना भगवान नहीं।
10. जाको प्रिय न राम वैदेही, त्यागहु ताहि कोटि बैरी सम।
भावार्थ: जिसे राम और सीता प्रिय नहीं, उसे शत्रु के समान समझकर त्याग देना चाहिए।
11. जहां सुमति तहं संपति नाना, जहां कुमति तहं विपति निदाना।
भावार्थ: जिस घर में आपसी प्रेम और सद्भाव होता है वहां सारे सुखी होते हैं और जहाँ आपस में द्वेष और वैमनष्य होता है उस घर के वासी दुखी जाते हैं.
12. आवत ही हरसै नही, नैनन नही सनेह
तुलसी तहां न जाईये कंचन बरसे मेह ।
भावार्थ : जिस स्थान पर लोग आपके आने से खुश न हों और उनकी नजरों में आपके प्रति स्नेह न हो, वहाँ कभी न जाएँ ।
13. रघुकुल रीति सदा चलि आई। प्राण जाहि बरु बचनु न जाई॥
भावार्थ: रघुकुल की परंपरा यही रही है कि प्राण त्याग दिए जाएँ, लेकिन दिया गया वचन कभी नहीं तोड़ा जाए
14. इहाँ कुम्हड़बतिया कोउ नाहिं। जे तरजनी देखि मरि जाहिं॥
भावार्थ: रामचरितमानस (अयोध्या कांड) में लक्ष्मण परशुराम के फरसे को देखकर कहते हैं कि मैं कोई कुम्हड़े का कोमल फल नहीं जो उंगली दिखाने से मर जाऊँ। यहां कोई कमजोर, नाजुक चीज नहीं है जो उंगली के इशारे से ही नष्ट हो जाए।

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