May 2, 2026
अथ नेता उवाच
देश को बाईसवीं सदी में पहुंचाया जाएगा.
अपना देश महान है, आप गर्व करेंगे सुन कर,
अभी आंकड़ों का गणित, समझाया जाएगा.
दुखदर्द, गरीबी सब हवा हो जाएंगी,
आप को आश्वासनों का जाम पिलाया जाएगा.
सुखे, बाढ़ की समस्या से चितित हैं हम,
अभी हवाई सर्वेक्षण करवाया जाएगा.
कुंआ खोदने की आप नाहक जिद न करें,
आग लगने तो दीजिए, फिर देखा जाएगा.
देशद्रोहियों को राह पर लाने की कोशिश करेंगे,
उन्हें देशभक्ति का रिकार्ड सुनवाया जाएगा.
कोई और परेशानी है तो पी. ए. को लिखवा दें,
आप के क्षेत्र में दोबारा पांच वर्ष बाद आया जाएगा.
- प्रदीप शर्मा
Apr 29, 2026
Title Song Lyrics of Daanasur (Denver the last Dinosaur)
छिपकली के नाना हैं,
छिपकली के हैं ससुर,
दानासुर दानासुर दानासुर!
छिपकली के नाना हैं,
छिपकली के हैं ससुर,
दानासुर दानासुर दानासुर!
तानपुरे के नीचे दो मंजीरे जैसे पाँव,
ना कुत्ते की भौं भौं, ना बिल्ली की म्याँऊ,
सुर है तराने में, धिन तन न ना,
दानासुर दानासुर दानासुर
दानासुर दानासुर दानासुर!
--- गुलज़ार
Apr 17, 2026
15 बेहतरीन शेर - 21 !!!
2. हमारे बस में था ही क्या हवा पे हम सवार थे, वहाँ वहाँ गए जहाँ हवा उड़ा के ले गई -अज़्म शाकिरी
3. क्या क्या हुआ है हम से जुनूँ में न पूछिए , उलझे कभी ज़मीं से कभी आसमाँ से हम - असरार-उल-हक़ मजाज़
4. अब तुमसे रुख़सत होता हूँ आओ सम्भालो साज़े-गज़ल नये तराने छेड़ो, मेरे नग्मों को नींद आती है - रघुपति सहाय 'फ़िराक़'
5. तुझे किस बात का ग़म है वो इतना पूछ लें मुझ से वो इतना पूछ लें मुझ से तो फिर किस बात का ग़म है मुझ से - मुशताक़ हुसैन ख़ान हाशमी मुश्ताक़
6. मुझको तो होश नहीं, तुमको ख़बर हो शायद, लोग कहते हैं कि तुमने मुझे बर्बाद किया - जोश मलीहाबादी
7. मैं तो ग़ज़ल सुना के अकेला खड़ा रहा, सब अपने अपने चाहने वालों में खो गए - कृष्ण बिहारी नूर
9. दाग़ दुनिया ने दिए ज़ख़्म ज़माने से मिले, हम को तोहफ़े ये तुम्हें दोस्त बनाने से मिले - कैफ़ भोपाली
10. ख़ुशियाँ देते देते अक्सर खुद ग़म में मर जाते हैं, रेशम बुनने वाले कीड़े रेशम में मर जाते हैं - ख़ुशबीर सिंह शाद
11. कुछ तो तेरे मौसम ही मुझे रास कम आये और कुछ मेरी मिट्टी में बग़ावत भी बहुत थी - परवीन शाकिर
12. रातें परदेस की डरता था कटेंगी कैसे, मगर आँगन में सितारे थे वही घर वाले - राही मासूम रजा़
13. हम को नीचे उतार लेंगे लोग, इश्क़ लटका रहेगा पंखे से - ज़िया मज़कूर
14. मैखाने के क़रीब थी मस्जिद भले को, दाग़ हर एक पूछता था कि “ हज़रत इधर कहाँ? - दाग़
Apr 8, 2026
सुभाषितानि - 5 (Subhashitani -5)
अर्थ: संकट या कठिनाइयों के समय व्यक्ति का असली स्वभाव सामने आ जाता है जो उसके सभी गुणों से बढ़कर होता है।
2. विद्या विवादाय धनं मदाय, शक्तिः परेषाम् परिपीडनाय | खलस्य, साधोः विपरीतं एतत्; ज्ञानाय दानाय च रक्षणाय ||
अर्थ: विद्या (ज्ञान) दुष्ट लोगों के लिए विवाद के लिए होती है, धन (धन संपत्ति) घमंड के लिए होता है, और शक्ति दूसरों को पीड़ित करने के लिए होती है। परंतु सज्जन लोगों के लिए विद्या ज्ञान प्राप्ति के लिए, धन दान करने के लिए, और शक्ति दूसरों की रक्षा करने के लिए होती है।
3. न तेन वृद्धो भवति येनास्य पलितं शिरः |
अर्थ: यह है कि केवल उम्र बढ़ने से या बाल सफेद होने से कोई व्यक्ति बड़ा या बुद्धिमान नहीं माना जाता। असली बढ़ेपन का पैमाना ज्ञान और बुद्धिमत्ता है। जो युवा होते हुए भी सीखते हैं, ज्ञान अर्जित करते हैं, वही सच्चे वृद्ध और सम्मानित माने जाते हैं।
4. काक: कृष्ण: पिक: अपि कृष्ण: को भेद: काकपिकयो: | वसंत काले सम्प्राप्ते काक: काक: पिक: पिक: ||
अर्थ: कौआ और कोयल दोनों काले रंग के होते हैं और देखने में समान लगते हैं, लेकिन जब वसंत ऋतु आ जाती है तो उनकी असली पहचान उनके स्वर से हो जाती है। कौआ अपनी कर्कश आवाज करता है जबकि कोयल मधुर गीत गाती है।
5. शैले शैले न माणिक्यम् मौक्तिकम् न गजे गजे।
अर्थ: हर पर्वत पर हीरा (माणिक्य) नहीं मिलता, हर हाथी के मस्तक में मोती (मौक्तिक) नहीं होता। सभी जगह सज्जन लोग (साधु) नहीं मिलते और हर वन में चंदन वृक्ष भी नहीं होते। ये चीजें दुर्लभ और मूल्यवान होती हैं।
6. मूर्खो अपि शोभते तावत् सभायां वस्त्रवेष्टित: ।
अर्थ: मूर्ख व्यक्ति भी अच्छे वस्त्र पहनकर सभा में तब तक शोभित होता है (अच्छा लगता है), जब तक वह कुछ नहीं बोलता। मूर्ख उसी समय तक शोभा पाता है, जब तक वह चुप रहता है.
7. यत्तदग्रे विषमिव परिणामे अमृतोपमम्,
अर्थ: जिस सुख का प्रारंभ विष (जहर) जैसा कष्टदायक होता है, पर परिणाम अमृत के समान सुखद होता है, वही सात्त्विक सुख कहलाता है। यह सुख आत्मबुद्धि के प्रसाद से उत्पन्न होता है। जो सुख विषय (इंद्रिय) के संयोजन से उत्पन्न होता है, उसका प्रारंभ तो अमृत के समान सुखद होता है, लेकिन परिणाम विष (जहर) के समान कष्टदायक होता है, उसे राजसिक सुख कहा गया है।
Apr 4, 2026
अभी साज़-ए-दिल में तराने बहुत हैं
अभी ज़िंदगी के बहाने बहुत हैं
ये दुनिया हक़ीक़त की क़ाइल नहीं है
फ़साने सुनाओ फ़साने बहुत हैं
तिरे दर के बाहर भी दुनिया पड़ी है
कहीं जा रहेंगे ठिकाने बहुत हैं
मिरा इक नशेमन जला भी तो क्या है
चमन में अभी आशियाने बहुत हैं
नए गीत पैदा हुए हैं उन्हीं से
जो पुर-सोज़ नग़्मे पुराने बहुत हैं
दर-ए-ग़ैर पर भीक माँगो न फ़न की
जब अपने ही घर में ख़ज़ाने बहुत हैं
हैं दिन बद-मज़ाक़ी के 'नौशाद' लेकिन
अभी तेरे फ़न के दिवाने बहुत हैं
Mar 31, 2026
हिंदी होने पर नाज़ जिसे कल तक था
अपनी महफ़िल का रिंद पुराना आज नमाज़ी बन बैठा।
महफ़िल में छुपा है कैसे—हज़्रत! दीवाना कोई सहरा में नहीं,
पैग़ाम-ए-जुनूँ जो लाता था, इक़बाल वो अब दुनिया में नहीं।
ऐ मुतरिब! तेरे तरानों में अगली-सी अब वो बात नहीं,
वो ताज़गी-ए-तख़य्युल नहीं, बेसाख़्तगी-ए-जज़्बात नहीं।
— आनंद नारायण ‘मुल्ला’ (शेर-ओ-शायरी से)
“अल्लामा इक़बाल जैसे परिपक्व और विशाल हृदय वाले व्यक्ति को अचानक साम्यवाद के दलदल में फँसते देखकर लोग दुख और चिंता से कराह उठे।”
Mar 27, 2026
बहादुर शाह ज़फ़र और हिंदुस्तान की तलवार: ऐतिहासिक शायरी की कहानी
कहा जाता है कि विद्रोह के बाद, जब अंग्रेज़ अधिकारी ज़फ़र को पकड़ने आए, उन्होंने उन्हें तंज़ के साथ कहा:
“दमदमे में दम नहीं है ख़ैर मांगो जान की.. ऐ ज़फ़र ठंडी हुई अब तेग हिंदुस्तान की।”
(अब तुम्हारे पास कोई ताक़त नहीं, ज़फ़र। हिंदुस्तान की तलवार भी अब नुकीली नहीं रही।)
लेकिन बहादुर शाह ज़फ़र की शायरी में छिपी जज़्बात और आत्मसम्मान ने जवाब में इतिहास रच दिया। उन्होंने शेर कहा:
“ग़ाज़ियों में बू रहेगी जब तलक ईमान की, तख़्त ऐ लंदन तक चलेगी तेग हिंदुस्तान की।”
(भारत की तलवार और उसका साहस कभी कम नहीं होगा, और ईमान की शक्ति के साथ यह London तक अपनी गूँज पहुंचाएगी।)
इस जवाब से साफ़ झलकता है कि ज़फ़र का मनोबल और उनका देशभक्ति का जज़्बा अंग्रेज़ों की धमकियों से कम नहीं हुआ। यह सिर्फ़ एक शेर नहीं, बल्कि उस युग की एक प्रेरणादायक कहानी है, जो यह बताती है कि कठिन परिस्थितियों में भी आत्मसम्मान और विश्वास कभी नहीं मरते।
Mar 23, 2026
15 बेहतरीन शेर - 20 !!!
1. सरजमीने-हिंद में अकवामे आलम के फ़िराक़, कारवां आते गए हिंदोस्ताँ बनता गया - फ़िराक़ गोरखपुरी
2. कुछ मेरे बाद और भी आएंगे क़ाफ़िले, कांटे ये रास्ते से हटा लूं तो चैन लूं। -तसव्वुर किरतपुरी
3. इन्हीं ज़र्रों से होंगे कल नये कुछ कारवां पैदा, जो ज़र्रे आज उड़ते हैं ग़ुबारे-कारवां हो कर। - शफ़क टौंकी
4. इस शहर में जीने के अंदाज़ निराले हैं, होठों पे लतीफे हैं आवाज़ में छाले हैं। - जावेद अख़्तर
5. जिनके आँगन में अमीरी का शजर लगता है, उसका हर ऐब ज़माने को हुनर लगता है - अंजुम रहबर
6. ऐ दिल वो आशिक़ी के फ़साने किधर गए, वो उम्र क्या हुई वो ज़माने किधर गए - अख़्तर शीरानी
7. सियाह रात नहीं लेती नाम ढलने का, यही तो वक़्त है सूरज तेरे निकलने का - शहरयार
8. नतीजा एक ही निकला, कि थी क़िस्मत में नाकामी, कभी कुछ कह के पछताये, कभी चुप रह के पछताये। - आरज़ू लखनवी
9. हमारी ज़िन्दगी के सानहे भी क्या अजब गुज़रे, उसी पर मर मिटे जिस से हमें बेज़ार होना था - मनीष शुक्ला
10. अब ज़मीं पर कोई गौतम न मोहम्मद न मसीह, आसमानों से नए लोग उतारे जाएँ - अहमद फ़राज़
11. हम वो हैं जो ख़ुदा को भूल गए तुम मेरी जान किस गुमान में हो - जौन एलिया
12. दफ़'अतन घटा की आड़ से चाँदनी कशीद हो गई, ज़ुल्फ़ उस के चेहरे से हटी और मेरी 'ईद हो गई - आलम निज़ामी
13. जुर्रत से हर नतीजे की परवाह किये बगैर, दरबार छोड़ आया हूँ सजदा किये बगैर ! - मुनव्वर राना
14. ये हमसे कौन दिन भर की कमाई छीन लेता है, उतर कर अपनी मसनद से चटाई छीन लेता है - सलाहउद्दीन नैयर
15. अपने बच्चों को मैं बातों में लगा लेता हूं, जब भी आवाज़ लगाता है खिलौने वाला - राशिद राही
Mar 20, 2026
तुलसीदास के 14 कालजयी दोहे
1. विनय न मानत जलधि जड़, गए तीनि दिन बीति।
बोले राम सकोप तब, भय बिनु होइ न प्रीति॥
भावार्थ: जब तीन दिन तक विनम्रता से कहने पर भी समुद्र नहीं माना, तब राम को क्रोध आया। तुलसीदास कहते हैं कि बिना भय के प्रेम और अनुशासन नहीं बनता।
2. तुलसी साथी विपत्ति के, विद्या विनय विवेक।
साहस सुकृति सुसत्यव्रत, राम भरोसे एक॥
भावार्थ: विपत्ति के समय विद्या, नम्रता, विवेक, साहस, अच्छे कर्म, सत्य और राम पर भरोसा—यही सच्चे साथी होते हैं।
3.परहित सरिस धरम नहि भाई, पर पीड़ा सम नहि अधमाई।
भावार्थ: दूसरों का भला करने जैसा कोई धर्म नहीं, और दूसरों को कष्ट देना सबसे बड़ा पाप है।
4. धीरज धरम मित्र अरु नारी, आपद काल परखिए चारी।
5. समरथ को नहिं दोष गोसाईं, रवि पावक सुरसरि की नाईं।
भावार्थ: जो समर्थ और महान होता है, उस पर दोष नहीं लगता—जैसे सूर्य, अग्नि और गंगा सबको शुद्ध करते हैं।
6. जाकी रही भावना जैसी, प्रभु मूरत देखी तिन तैसी।
भावार्थ: मनुष्य की भावना जैसी होती है, उसे भगवान भी वैसे ही दिखाई देते हैं।
7. हरि अनंत हरि कथा अनंता, कहहिं सुनहिं बहुविधि सब संता॥
8. होइहि सोइ जो राम रचि राखा, को करि तर्क बढ़ावै साखा॥
भावार्थ: जो राम ने रच दिया है, वही होकर रहता है। तर्क-वितर्क करके कोई भी सत्य को बदल नहीं सकता।
Mar 11, 2026
शेर-ओ-शायरी - गीताप्रेस की किताब "एक लोटा पानी"
1. आईना! मुँह पर ही कहता है—साफ-साफ। सच यह है-जो साफ होता है, सफा कहता है।।
2. सँभल कर बैठना, जलवा मुहब्बत देखने वाले। तमाशा खुद न बन जाना तमाशा देखने वाले॥
3. खुदाने हुस्न नादानोंको, बख्सा जर रजीलों को। अक्लमंदों को रोटी खुश्क, औ हलुवा वखीलों को ॥
4. एक बुतको चूमनेको शेखजी काबा गये। गरचे-हर बुत काबिले बोसा है इस बुतखानेमें॥
5. नजर से सर कलम कर दे, उसे शमशीर कहते हैं। निशाने में जो लग जाये, उसीको तीर कहते हैं॥
6. न कह गया, न सुन गया और न नाम बता गया। मैं क्या कहूँ कि मेरे दिल, किसने चुरा लिया
7. है इबादत की इबादत है, मुहब्बत की मुहब्बत है। मेरे माशूक की सूरत खुदा से मिलती जुलती है॥
8. शेखजीसे मैंने पूछी, मंजिल जब यार की। बुतकदे की और चुपकेसे, इशारा कर दिया॥
9. बहुत मुश्किल निभाना है मुहब्बत अपने दिलवर से। उधर मूरत अमीराना इधर हालत फकीराना॥
10. चाँद बदली में छिपा है मुझे मालूम न था। सकल इनसान में खुदा है, मुझे मालूम न था॥
11. बुतपरस्ती मेरे हकमें हकपरस्ती हो गयी। दे दिया तेरा पता कुछ, यारकी तसबीरने॥
12. मुहब्बत करो और निभा लो तब पूछना, कि दुश्चारियाँ हैं कि आसानियाँ हैं?
13. समझकर अपना दीवाना, वह मुझसे मुँह छिपाते हैं। हकीकत यों है, दरपरदा, मुहब्बत आजमाते हैं॥
14. शिकाइत किस जबाँसे मैं करूँ उनके न आनेकी। यही अहसान क्या कम है कि मेरे दिलमें रहते हैं॥
15. दुनियाँ इक इफसाना कहने को थे मगर सोचा। दुनियाँ है खुद इफसाना, इफसाने से क्या कहना?
16. रहमान के फिरश्ते' गो हैं बहुत मुकद्दस? शैतानही की जानिब, लेकिन मिजोरटी है॥
Mar 3, 2026
अल्लामा इक़बाल की शायरी: इस्लाम, जम्हूरियत और आत्मबल का दर्शन
अल्लामा मुहम्मद इक़बाल केवल शायर नहीं थे, वे एक विचारक, दार्शनिक और आत्मचेतना के कवि थे। उनकी शायरी व्यक्ति, समाज और सत्ता—तीनों से सवाल करती है। बाल-ए-जिब्रील में इक़बाल की आवाज़ सबसे अधिक बेबाक और वैचारिक रूप में सामने आती है।
Feb 13, 2026
अकबर इलाहाबादी और सर सैयद: व्यंग्य और सामाजिक सुधार की शायरी
शेर 1: ईमान बेचने को तो तैयार हैं हम भी, लेकिन, खरीद हो जो अलीगढ़ के भाव से।
व्याख्या: इस शेर में इलाहाबादी कहते हैं कि लाखों लोगों ने बाहरी रूप (जैसे दाढ़ी बढ़ाना) अपनाया, लेकिन असली असर वही नहीं हुआ जो मालवी मदन या असली दृष्टिकोण वाला व्यक्ति दर्शाता। यह शेर दिखावे और वास्तविकता के बीच अंतर को उजागर करता है।
शेर 3: तालीम–ए दुस्तुराँ से ये उम्मीद है ज़रा, नाचे दुल्हन ख़ुशी से ख़ुद अपनी बरात में।
व्याख्या: यह शेर शिक्षा और सुधार की उम्मीदों पर व्यंग्य करता है। इलाहाबादी कहते हैं कि शिक्षा का लक्ष्य सिर्फ़ दिखावा न बन जाए, बल्कि उसका असर वास्तविक जीवन में महसूस होना चाहिए।
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अकबर इलाहाबादी की शायरी यह दिखाती है कि आलोचना हमेशा विरोध नहीं होती, बल्कि यह सुधार और सुधारकों के दृष्टिकोण को समझने और परखने का माध्यम भी हो सकती है। उनकी शेरों में व्यंग्य, सामाजिक टिप्पणियाँ और गहरी समझ का सुंदर मिश्रण मिलता है।
Feb 9, 2026
15 बेहतरीन शेर - 19 !!!
2. मिरे लहू से वज़ू और फिर वज़ू पे वज़ू, डरा हुआ हूँ ज़माने तिरी नमाज़ से मैं - रफ़ी रज़ा
3. कुछ मेरे बाद और भी आएंगे क़ाफ़िले, कांटे ये रास्ते से हटा लूं तो चैन लूं। -तसव्वुर किरतपुरी
4. हमारे दिल में भी झांको अगर मिले फुर्सत, हम अपने चेहरे से उतने नजर नहीं आते..!! ~ वसीम बरेलवी
5. अब छोड़ साथ मेरा ऐ याद-ए-नौजवानी, इस उम्र का मुसाफ़िर तन्हाई चाहता है - क़तील शिफ़ाई
6. बुरा न मान अगर यार कुछ बुरा कह दे, दिलों के खेल में ख़ुद्दारियाँ नहीं चलतीं - कैफ़ भोपाली
7. मोहब्बत क्या बला है चैन लेना ही भुला दे है, ज़रा भी आँख झपके है तो बेताबी जगा दे है -कलीम आजिज़
8. मैं तो इस वास्ते चुप हूँ कि तमाशा न बने, तू समझता है मुझे तुझ से गिला कुछ भी नहीं - अख़्तर शुमार
9.सुब्ह हो जाएगी हाथ आ न सकेगा महताब, आप अगर ख़्वाब में चलते हैं तो चलते रहिए - मलिकज़ादा मंज़ूर अहमद
10. मैं मुद्दतों जिया हूँ किसी दोस्त के बग़ैर अब तुम भी साथ छोड़ने को कह रहे हो ख़ैर ~ फ़िराक़ गोरखपुरी
11. तुम पूछो और मैं न बताऊँ ऐसे तो हालात नहीं, एक ज़रा सा दिल टूटा है और तो कोई बात नहीं - क़तील शिफ़ाई
12. जाने ये कैसा ज़हर दिलों में उतर गया, परछाईं ज़िंदा रह गई, इंसान मर गया...!!! - उम्मीद फ़ाज़ली
13. लाई हयात आए क़ज़ा ले चली चले, अपनी ख़ुशी न आए न अपनी ख़ुशी चले - शेख़ इब्राहीम ज़ौक़
14. वो आए घर में हमारे ख़ुदा की क़ुदरत है, कभी हम उन को कभी अपने घर को देखते हैं - मिर्ज़ा ग़ालिब
15. देखिए पाते हैं उश्शाक़ बुतों से क्या फ़ैज़ इक बरहमन ने कहा है कि ये साल अच्छा है - मिर्ज़ा ग़ालिब
Jan 27, 2026
कबीरदास के दोहे: सरल हिंदी में अर्थ
1. दुर्बल को न सताइए, जाकी मोटी हाय।
मरी खाल की साँस से, लोहा भस्म हो जाय॥
मधुर वचन जो बोलिए, कटुक वचन मत तीर॥
जो दिल खोजा आपना, मुझसे बुरा न कोय॥
सार-सार को गहि रहे, थोथा देई उड़ाय॥
माली सींचे सौ घड़ा, ऋतु आए फल होय॥
पीछे-पीछे हरि फिरै , कहत कबीर कबीर
राजा मरि हैं, परजा मरि हैं, मरि हैं बैद और रोगी।
साधो ये मुरदों का गाँव !
8. बिरहा बुरहा जिनि कहौ, बिरहा है सुलतान।
जा घट बिरह न संचरै, सो घट सदा मसान॥
जो सुख साधू संग में, सो बैकुंठ न होय॥
10. मन मैला तन ऊजरा, बगुला कपटी अंग
तासों तो कौआ भला, तन मन एकही रंग
मीन सदा जल में रहे, धोए बास ना जाये।
मोल करो तरवार का, पड़ा रहन दो म्यान॥
ढाई आखर प्रेम का, पढ़े सो पंडित होय॥
पंछी को छाया नहीं, फल लागे अति दूर॥
दो पाटन के बीच में, सबूत बचा न कोए॥
पल में प्रलय भएगी, बहुरि करेगा कब॥
एक दिन ऐसा आएगा, मैं रौंंदूँ तोहे॥
बलिहारी गुरु आपने, गोविंद दियो बताय॥
ता चढ़ि मुल्ला बांग दे, क्या बहरा हुआ खुदाय॥
कर का मनका डार दे, मन का मनका फेर॥
मैं भी भूखा न रहूँ, साधु भी भूखा न जाय॥
Jan 21, 2026
वो मिट्टी के बेटे - (Mitti Ke Bete Lyrics in Hindi) - INS Vikrant
क्या मन मौजी बेफ़िक्रे थे..ए..
क्या मन मौजी बेफ़िक्रे थे
मौत पे अपने हँसते थे
दिल में वतन को रखने वाले
सर पे कफ़न भी रखते थे
हम जो तिरंगा लहराएँगे
हिचकी बनके याद आएँगे
वो मिट्टी के बेटे, जो वापस ना लौटे
जो वापस ना लौटे, वो मिट्टी के बेटे
वो माँ के अलबेले, जो वापस ना लौटे
जो वापस ना लौटे, वो मिट्टी के बेटे
इस मिट्टी के बेटे
ओ..ओ..ओ..ओ. वो मिट्टी के बेटे
ओ..ओ..ओ..ओ. वो मिट्टी के बेटे
इस मिट्टी के बेटे
जिसके लिए सरदार हमारा
झूल गया था फंदे पर
धूल नहीं लगने दी हमने
उस बेदाग तिरंगे पर
उस बेदाग तिरंगे पर..
उस बेदाग तिरंगे पर
तेरा दर्द तू जाने बाबा
तेरा दर्द तू जाने बाबा
मैं तो खुशी से पागल हूँ
जिसकी गोदी में खेला मैं
चला उसी के कंधे पर
लाडले जब सरहद जाएँगे
हिचकी बनके याद आएँगे
वो मिट्टी के बेटे, जो वापस ना लौटे
जो वापस ना लौटे, वो मिट्टी के बेटे
वो माँ के अलबेले, जो वापस ना लौटे
जो वापस ना लौटे, वो मिट्टी के बेटे
इस मिट्टी के बेटे
ओ छलिये कहाँ पता था?
तू यारों को छल जाएगा
जो चढ़ता सूरज था अपना
वो ऐसे ढल जाएगा,
वो ऐसे ढल जाएगा
वो ऐसे ढल जाएगा
तेरे बिन सरहद से हम भी
तेरे बिन सरहद से हम भी
आधे-अधूरे लौटेंगे
तेरी चिता में धीरे से
कुछ अपना भी जल जाएगा
यार गले जब लग जाएँगे
हिचकी बनके याद आएँगे
वो मिट्टी के बेटे, जो वापस ना लौटे
जो वापस ना लौटे, वो मिट्टी के बेटे
वो माँ के अलबेले, जो वापस ना लौटे
जो वापस ना लौटे, वो मिट्टी के बेटे
इस मिट्टी के बेटे
कुछ दर्द कभी सोते ही नहीं
वनवास ख़तम होते ही नहीं
चौखट पे दीये जलते ही रहे
कुछ राम कभी लौटे ही नहीं
कुछ राम कभी लौटे ही नहीं
कुछ राम कभी लौटे ही नहीं
मेरे नाम का प्याला भर के, हो..ओ..
मेरे नाम का प्याला भर के
बरसातों में पी लेना
बाबा मैं तो रहा नहीं
तू मेरी जवानी जी लेना
हम जब जन गण मन गाएँगे
हिचकी बनके याद आएँगे
वो मिट्टी के बेटे, जो वापस ना लौटे
जो वापस ना लौटे, वो मिट्टी के बेटे
वो माँ के अलबेले, जो वापस ना लौटे
जो वापस ना लौटे, वो मिट्टी के बेटे
इस मिट्टी के बेटे
ओ..ओ..ओ..ओ. वो मिट्टी के बेटे
ओ..ओ..ओ..ओ. वो मिट्टी के बेटे
इस मिट्टी के बेटे...!
--- मनोज मुन्तशिर
गीत का संदर्भ : "वो मिट्टी के बेटे" एक देशभक्ति गीत की पंक्ति है जो हाल ही में रिलीज़ हुई फिल्म बॉर्डर 2 से ली गई है। यह उन शहीद सैनिकों को श्रद्धांजलि है जो मातृभूमि की रक्षा में लौटकर नहीं आए।यह गीत सोनू निगम द्वारा गाया गया है, संगीत मिथून का है, और बोल मनोज मुंतशिर ने लिखे हैं। गीत सैनिकों के बलिदान, माँ के लालों की बेफिक्री और तिरंगे की रक्षा पर केंद्रित है।
Jan 18, 2026
घर लौट के रोएँगे माँ बाप अकेले में
मिट्टी के खिलौने भी सस्ते न थे मेले में
काँटों पे चले लेकिन होने न दिया ज़ाहिर
तलवों का लहू धोया छुप छुप के अकेले में
ऐ दावर-ए-महशर ले देख आए तिरी दुनिया
हम ख़ुद को भी खो बैठे वो भीड़ थी मेले में
Jan 12, 2026
पाँच साल
उग आता है
बाप की आँखों में मोतियाबिंद
जम जाती हैं
माँ के चेहरे पर झुर्रियाँ
चल बसता है दादा
बिस्तर पकड़ लेती है दादी
रिश्तेदार बदल लेते हैं घर
पाँच सालों में गुज़र जाते हैं
सैकड़ों हंगामे अख़बार सीखा देते हैं
लोगों को नुकीली ज़बान
लाशों के नज़ारे बढ़ा देते हैं
खून की प्यास
घरों के मलबों पर नाचने लगते हैं तमाशबीन
ज़हरीली चरस खींच कर
पाँच सालों में हो जाता है
पाँच सालों में
- हुसैन हैदरी
Jan 4, 2026
रहीम के 25 अमर दोहे: सरल भाषा में विस्तृत अर्थ
1. अब रहीम मुश्किल पड़ी, गाढ़े दोऊ काम।
सांचे से तो जग नहीं, झूठे मिलें न राम॥
विस्तृत अर्थ: जब मनुष्य पर कठिन समय आता है, तब सच्चाई का साथ देने वाला समाज नहीं मिलता और झूठ का सहारा लेने पर ईश्वर भी प्राप्त नहीं होते। अर्थात विपत्ति में मनुष्य अकेला पड़ जाता है।
2. वे रहीम नर धन्य हैं, पर उपकारी अंग।
बाटनवारे को लगे, ज्यों मेंहदी को रंग॥
विस्तृत अर्थ: उपकारी व्यक्ति चाहे कितना ही बाँट दिया जाए, उसका गुण और प्रभाव कभी कम नहीं होता, जैसे मेहंदी बाँटने पर भी अपना रंग छोड़ती है।
3. रहिमन पानी राखिए, बिन पानी सब सून।
पानी गए न ऊबरै, मोती, मानुष, चून॥
4. रहिमन निज मन की व्यथा, मन ही राखो गोय।
सुनि अठलैहैं लोग सब, बाँटि न लेहैं कोय॥
गिरधर मुरलीधर कहे, कछु दुख मानत नाह॥
विस्तृत अर्थ: महान व्यक्ति छोटे नाम या साधारण संबोधन से छोटा नहीं हो जाता, जैसे कृष्ण को कोई भी नाम कहे, उनकी महत्ता कम नहीं होती।
6. समय लाभ सम लाभ नहिं, समय चूक सम चूक।
चतुरन चित रहीम लगी, समय चूक कछु चूक॥
विस्तृत अर्थ: समय का सदुपयोग सबसे बड़ा लाभ है और समय चूक जाना सबसे बड़ा नुकसान, क्योंकि समय हाथ से निकल जाए तो अवसर लौटकर नहीं आते।
7. ए रहीम दर दर फिरहिं, माँगि मधुकरी खाहिं।
यारो यारी छोड़िये, वे रहीम अब नाहिं॥
विस्तृत अर्थ: जो व्यक्ति स्वाभिमान छोड़कर दर-दर भीख माँगता फिरता है, उससे मित्रता छोड़ देनी चाहिए, क्योंकि वह अपना आत्मसम्मान खो चुका होता है।
8. रहिमन वे नर मर चुके, जे कहुँ माँगन जाहिं।
उनते पहिले वे मुए, जिन मुख निकसत नाहिं॥
विस्तृत अर्थ:: माँगकर जीना आत्मसम्मान की मृत्यु है; पर उससे भी पहले वे मर चुके हैं जिनके मुख से ‘न’ शब्द नहीं निकलता।
9. जो रहीम उत्तम प्रकृति, का करि सकत कुसंग।
चन्दन विष व्यापत नहीं, लिपटे रहत भुजंग॥
विस्तृत अर्थ: अच्छे स्वभाव वाला व्यक्ति बुरी संगति में रहकर भी अपना गुण नहीं खोता, जैसे चंदन पर लिपटा साँप भी उसे विषैला नहीं बना पाता।
10. रहिमन प्रीति न कीजिए, जस खीरा ने कीन।
ऊपर से तो दिल मिला, भीतर फांकें तीन॥
विस्तृत अर्थ:: जो प्रेम केवल दिखावे का हो, उसमें भीतर से टूटन होती है; ऐसा प्रेम अंत में धोखा ही देता है।
11. तरुवर फल नहिं खात है, सरवर पियहि न पान।
कहि रहीम पर काज हित, संपति संचहि सुजान॥
विस्तृत अर्थ:: जैसे पेड़ अपने फल नहीं खाते और तालाब अपना पानी नहीं पीते, वैसे ही सज्जन व्यक्ति अपनी संपत्ति दूसरों के कल्याण के लिए संचित करता है।
12. रूठे सुजन मनाइए, जो रूठे सौ बार।
रहीमन फिरि फिरि पोइए, टूटे मुक्ता हार॥
विस्तृत अर्थ: अच्छे और सज्जन लोगों से संबंध टूटने न दें, क्योंकि वे टूटे मोती के हार जैसे होते हैं जिन्हें फिर से पिरोना चाहिए।
13. क्षमा बड़न को चाहिए, छोटन को उत्पात।
कह रहीम हरि का घट्यौ, जो भृगु मारी लात॥
विस्तृत अर्थ: क्षमा केवल महान लोगों का गुण है; क्रोध करना छोटे मन का लक्षण है | उदाहरण के रूप में वे कहते हैं कि जब महर्षि भृगु ने भगवान विष्णु को पैर मारा, तब भी भगवान ने क्रोध नहीं किया, बल्कि उनके पैर दबाने लगे।
14. रहिमन धागा प्रेम का, मत तोड़ो चटकाय।
टूटे से फिर ना जुड़े, जुड़े गाँठ पड़ जाय॥
विस्तृत अर्थ: प्रेम का संबंध बहुत नाज़ुक होता है; एक बार टूट जाए तो दोबारा जुड़ने पर भी उसमें गाँठ रह जाती है।
15. एकही साधे सब सधै, सब साधे सब जाय।
रहिमन मूल सींच बोये, फूल लहि अघाय॥
विस्तृत अर्थ: यदि मूल कारण पर ध्यान दिया जाए तो सभी कार्य सफल हो जाते हैं; इधर-उधर भटकने से सब कुछ नष्ट हो जाता है।
16. रहिमन ओछे नरन सो, बैर भली न कीत।
काटे चाटे स्वान के, दोऊ भाँति ती प्रतीत॥
विस्तृत अर्थ: नीच व्यक्ति से शत्रुता दोनों ही स्थितियों में नुकसानदायक होती है, चाहे वह नुकसान करे या दिखावटी प्रेम दिखाए।
17. जो रहीम गति दीप की, कुल कपूत गति सोय।
बारे उजियारो करे, बढ़े अँधेरो होय॥
विस्तृत अर्थ: कुपुत्र परिवार का नाम रोशन करने के बजाय बदनामी लाता है, जैसे दीपक बुझने पर अंधकार बढ़ जाता है।
18. रहिमन चुप हो बैठिए, देखि दिनन को फेर।
जब नीके दिन आइहैं, बनत न लागै बेर॥
विस्तृत अर्थ: बुरे समय में धैर्य और मौन रखना चाहिए, क्योंकि अच्छे दिन आने पर परिस्थितियाँ स्वयं सुधर जाती हैं।
19. रहिमन प्रेम न छाँड़िए, लघु जन जानि।
कूँजा पथिक न छोड़ई, देखि बावड़ी पानी॥
विस्तृत अर्थ: छोटे व्यक्ति या छोटे साधन को तुच्छ न समझें, क्योंकि संकट में वही सहारा बन सकता है।
20. रहिमन मीत बनाइए, कठिन समय के काम।
आपत्ति काज न आवहीं, संपत्ति साँचि सुजान॥
विस्तृत अर्थ: सच्चे मित्र वही होते हैं जो संकट में साथ दें; धन केवल सुरक्षित रखा जा सकता है, मदद नहीं कर सकता।
21. रहिमन गति अगम्य है, प्रेम की रीति अपार।
दादुर डूबे पंक में, मीन न उबरै पार॥
विस्तृत अर्थ: प्रेम की शक्ति और उसकी गति को समझना कठिन है; इसमें अयोग्य डूब जाते हैं और योग्य भी पार नहीं पा पाते।
22. रहिमन जिह्वा बावरी, कह गई सरग पाताल।
आप तो कह भीतर रही, जूता खात कपाल॥
विस्तृत अर्थ: असंयमित वाणी मनुष्य को अपमान और संकट में डाल देती है, जबकि बोलने वाली जिह्वा स्वयं सुरक्षित रहती है।
23. रहिमन हानि लाभ जीवन मरण, यश अपयश विधि हाथ।
जेति बने तित होइये, एहि विधि रहीम रीत॥
विस्तृत अर्थ: लाभ-हानि, जीवन-मरण और मान-अपमान सब विधि के हाथ में हैं; इसलिए जो मिले उसे स्वीकार करना चाहिए।
24. ओछो काम बड़े करैं तौ न बड़ाई होय।
विस्तृत अर्थ: यदि कोई छोटा या सामान्य व्यक्ति कोई बड़ा काम करता है, तो भी उसकी बड़ाई नहीं होती, जैसे हनुमान को कोई कृष्ण (गिरधर) नहीं कहता।
25. रहिमन यह तन विष की बेलरी, गुरु अमृत की खान।
सीस दिए जो गुरु मिले, तो भी सस्ता जान॥
विस्तृत अर्थ: यह शरीर नश्वर और विष के समान है, जबकि गुरु का ज्ञान अमृत तुल्य है; गुरु के लिए जीवन भी न्योछावर करना सस्ता सौदा है।





