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Oct 30, 2026

रसखान की भक्ति कविता: ब्रज, कृष्ण और प्रेम का अनुपम दर्शन

रसखान हिंदी भक्ति काव्य की उस परंपरा के प्रमुख कवि हैं, जहाँ ईश्वर को ज्ञान और शक्ति से नहीं, बल्कि प्रेम और आत्मीयता से पाया जाता है। उनके पदों में भक्ति, समर्पण और वैराग्य का अनूठा संगम दिखाई देता है।

1. मानुष हौं तो वही रसखान, बसौं ब्रज गोकुल गाँव।
जो पशु हौं तो कहा बसु, चरौं नित नंद की धेनु॥
जो खग हौं तो बसेरो करौं, मिलि कालिंदी कूल कदंब की डार।
जो नाग हौं तो बसेरो करौं, करौं सदा ही गिरिराज की छाँह॥

भावार्थ:  रसखान कहते हैं—यदि मैं मनुष्य बनूँ तो ब्रज-गोकुल में रहूँ, पशु बनूँ तो नंद की गायों के साथ चरूँ, पक्षी बनूँ तो यमुना किनारे कदंब वृक्ष पर वास करूँ, और नाग बनूँ तो गोवर्धन पर्वत की छाया में रहूँ—क्योंकि जहाँ कृष्ण हैं, वही मेरा लोक है।

👉 संदेश: जीवन का रूप कोई भी हो, पर कृष्ण और ब्रज से दूर होना स्वीकार्य नहीं।

2. सेस गनेस महेस दिनेस, सुरेसहु जाहि निरंतर गावैं
जाहि अनादि अनंत अखंड, अछेद अभेद सुबेद बतावैं
नारद से सुक व्यास रटें, पचिहारे तऊ पुनि पार न पावैं
ताहि अहीर की छोहरियां, छछिया भरि छाछ पै नाच नचावैं

भावार्थ:  जिस भगवान के गुणों का गान शेषनाग, गणेश, शिव, सूर्य और इंद्र निरंतर करते रहते हैं;
जिसे वेद अनादि, अनंत, अखंड, अछेद और अभेद बताते हैं;
जिसका स्मरण नारद, शुक और व्यास जैसे महाज्ञानी करते हैं, फिर भी उसका पूर्ण रहस्य नहीं जान पाते—
उसी परमेश्वर को ब्रज की ग्वालिनें एक कटोरी छाछ के बदले नचा देती हैं।

👉 भाव यह है कि कृष्ण की महिमा भक्ति में है, ज्ञान या शक्ति में नहीं।

3. बैन वही उन गुन गाइ औ कान वही उन बैन सों सानी।
हाथ वही उन गात सरे अँपाई वही जु उरि अनुजानी॥
जान वही उन आनन संग औ मान वही जु करै मनमानी।
याँ रसखान वही रसखान जु है रसखान सो रसखानी॥

भावार्थ:  वही वाणी धन्य है जो कृष्ण के गुण गाए, वही कान धन्य हैं जो उनकी बातें सुनें।
वही हाथ सफल हैं जो उनके शरीर की सेवा करें, वही छाती सार्थक है जिसमें उनका प्रेम बसे।
वही जीवन सच्चा है जो उनके चेहरे से जुड़ा हो, और वही सम्मान योग्य है जो उनके प्रेम में मनमानी करे।
रसखान कहते हैं—जो कृष्ण-रस में डूब गया, वही सच्चा रसखान है। 

👉 यहाँ कृष्ण-भक्ति को जीवन की सर्वोच्च सिद्धि बताया गया है।

4. या लकुटी अरु कामरिया पर राज तजौं पुर को तज डारूँ।
आठौं सिद्धि नवौं निधि के सुख नंद के गाइ चराइ बिसारूँ॥
रसखान कबौं इन आँखिन सों ब्रज के बन-बाग तड़ाग निहारूँ।
कोटिक है कलधौत के धाम करील के कुंजन ऊपर वारूँ॥

भावार्थ:  कृष्ण की लाठी और कंबल के लिए, मैं राज-पाट और नगरों का वैभव त्याग दूँ।
आठ सिद्धियाँ और नौ निधियों के सुख छोड़कर, नंद बाबा की गायें चराना स्वीकार कर लूँ।
रसखान कहते हैं—काश! इन आँखों से ब्रज के वन, बाग और तालाब निहार सकूँ।
मैं सोने के करोड़ों महलों को ब्रज की काँटेदार कुंजों पर न्योछावर कर दूँ।

👉 यह पद बताता है कि ब्रज और कृष्ण का प्रेम हर सांसारिक वैभव से ऊपर है।

Oct 27, 2026

15 बेहतरीन शेर - 26 !!!

1. जिस धज से कोई मक़्तल में गया वो शान सलामत रहती है,
ये जान तो आनी जानी है इस जान की तो कोई बात नहीं -- फ़ैज़

2. आईये हाथ उठायें हम भी, हम जिन्हें रस्म-ए-दुआ याद नहीं
हम जिंहें सोज़-ए-मोहब्बत के सिवा कोई बुत, कोई ख़ुदा याद नहीं --- फ़ैज़

3. .सामने वाले को हल्का जान कर भारी हैं आप आपका मेयार देखा कितने मेयारी हैं
उफ़ तलक करते नहीं ज़िल्ले इलाही के ख़िलाफ़ आपको दरबार की आदत है दरबारी हैं आप 
--- अब्बास क़मर

4. केहू कहत है खाय का दाना नाय मिलत, केहू के शिकायत है ठेकाना नाय मिलत
येहि दौर से रफ़ीक हैं, हमहूं का शिकायत है, दिल लेहे घूमित है, निशाना नाय मिलत...!!!
--- रफ़ीक शादानी

5. जमीं बेच देंगे, गगन बेच देंगे, कली बेच देंगे, चमन बेच देंगे,
कलम के सिपाही अगर सो गए तो, वतन के मसीहा वतन बेच देंगे।

6. जहाँ रहेगा वहीं रौशनी लुटाएगा किसी चराग़ का अपना मकाँ नहीं होता ~वसीम बरेलवी

7. वो तो खुशबू है, हवाओं में बिखर जाएगा मसला फूल का है, वो किधर जाएगा - परवीन शाकिर 

8. यूँही आबाद रहेगी दुनिया, हम न होंगे कोई हम सा होगा -  नासिर काज़मी

9. ये जो कुछ देखते हैं हम फ़रेब-ए-ख़्वाब-ए-हस्ती है। तख़य्युल के करिश्मे हैं बुलंदी है न पस्ती है।। - बेदम शाह वारसी

10.  लगी जो आँख तो मंज़र था आइने जैसा, खुली जो आँख तो बाहर शदीद कोहरा था ~रशीदी

11.  मुल्ला को जो है हिंद में सजदे की इजाज़त, नादान ये समझता है कि इस्लाम है आजाद -  अल्लामा इकबाल

12. जौक़-ए-निगाह के सिवा शौक़-ए-गुनाह के सिवा , मुझ को बुतों से क्या मिला मुझ को ख़ुदा ने क्या दिया -  'हफ़ीज़' जालंधरी

13. बाज़ीचा-ए-अतफ़ाल है दुनिया मिरे आगे,  होता है शब-ओ-रोज़ तमाशा मिरे आगे - मिर्ज़ा ग़ालिब

14. चराग़-ए-शाम-ए-तन्हाई भी रौशन रख नहीं पाए, अब और आगे हवा की दोस्ती से चाहते क्या हो - ज़फ़र गोरखपुरी

15. चलते चलिए, ये हमें लेकर जिधर जाते हैं , ख़्वाब, आंखों ही में रहते हैं, तो मर जाते हैं। -  जावेद अख़्तर

Oct 17, 2026

इतने भले नहीं बन जाना साथी

इतने भले नहीं बन जाना साथी
जितने भले हुआ करते हैं
सरकस के हाथी

गदहा बनने में लगा दी
अपनी सारी कूवत सारी प्रतिभा
किसी से कुछ लिया नहीं
न किसी को कुछ दिया
ऐसा भी जिया जीवन तो क्या जिया?

इतने दुर्गम मत बन जाना
संभव ही रह जाए न तुम तक
कोई राह बनाना
अपने ऊंचे सन्नाटे में सर धुनते रह गये

लेकिन किंचित भी जीवन का मर्म नहीं जाना
इतने चालू मत हो जाना
सुन-सुन कर हरकतें तुम्हारी पड़े हमें शरमाना
बग़ल दबी हो बोतल मुंह में जनता का अफ़साना
ऐसे घाघ नहीं हो जाना

ऐसे कठमुल्ले मत बनना
बात नहीं जो मन की तो बस
तन जाना
दुनिया देख चुके हो यारो
एक नज़र थोड़ा-सा अपने जीवन पर भी मारो
पोथी-पतरा-ज्ञान-कपट से बहुत बड़ा है मानव
कठमुल्लापन छोड़ो, उस पर भी तो तनिक विचारो

काफ़ी बुरा समय है साथी
गरज रहे हैं घन घमंड के नभ की फटती है छाती
अंधकार की सत्ता चिल-बिल
चिल-बिल मानव-जीवन
जिस पर बिजली रह-रह अपना चाबुक चमकाती
संस्कृति के दर्पण में ये जो शक्लें हैं मुस्काती
इनकी असल समझना साथी
अपनी समझ बदलना साथी

--- वीरेन डंगवाल

Oct 12, 2026

किस अपराध पर उठीं थीं लाठियां...


किस अपराध में उठी थीं वे लाठियाँ...?

क्या इसलिए

कि कुछ लड़के-लड़कियाँ

अपनी बरबाद होती उम्र का हिसाब माँग रहे थे...?

या इसलिए

कि उन्होंने पूछ लिया था—कि 

अगर प्रश्नपत्र बाज़ार में बिक सकता है

तो फिर ईमानदारी 

किस विश्वविद्यालय में पढ़ाई जाती है...?

बताओ...

जिस हाथ में कलम होनी चाहिए थी

उसी हाथ पर लाठी के निशान क्यों हैं...?

वे नौकरी नहीं माँग रहे थे

न्याय माँग रहे थे...

वे कुर्सी नहीं माँग रहे थे

विश्वास माँग रहे थे...

वे किसी का अधिकार नहीं छीन रहे थे

वे अपना भविष्य वापस माँग रहे थे....

तुम कहते हो

देश युवाओं का है

फिर युवा अपना ही भविष्य माँगने

आज सड़कों पर क्यों खड़े हैं...?

जंतर-मंतर पर खड़े छात्र

सिर्फ़ छात्र नहीं थे...

वे अपने कंधों पर भविष्य का बस्ता नहीं 

पूरे देश की उम्मीद उठाए खड़े थे...

उनके हाथों में पत्थर नहीं थे

कुछ माँगें ,कुछ प्रश्न , कुछ सपनों के काग़ज़ थे

जो संविधान की रोशनी में पढ़े जाना चाहते थे...

लेकिन सत्ता ने

प्रश्नों की भाषा नहीं पढ़ी...

उसने उनकी

आवाज़ों को शोर लिख दिया

और सपनों को अपराध...

जंतर-मंतर

जहाँ कभी लोकतंत्र 

अपनी धड़कन सुनता था

वहीं आज

लाठी की आवाज़ नारों से ऊँची कर दी गई....

कैसा समय है यह...?

जहाँ

हक़ की आवाज़ अपराध है

और चुप रहना सबसे बड़ा पुरस्कार...

याद रखना...

जब-जब

किताबों से डरने लगती हैं सत्ताएँ

तब-तब इतिहास नई वर्णमाला लिखता है...

ज़ख्मों की स्याही कभी सूखती नहीं

वह एक घायल उँगली से निकलकर

सैकड़ों उँगलियों में फैल जाती है...

उँगलियाँ काँप सकती हैं

मगर इरादे नहीं...

और जिस दिन

इन उँगलियों की स्याही सड़कों पर फैल गई

उस दिन

तुम्हारी ऊँची कुर्सियों के पाए

अपने आप काँपने लगेंगे...

क्योंकि

छात्र भीड़ नहीं होते...

वे आने वाले समय की पहली पंक्ति होते हैं..

लाठियाँ

सिर्फ़ शरीरों को घायल कर सकती हैं

विचारों को नहीं...

स्याही पर पहरा नहीं लगाया जा सकता

सपनों को हथकड़ियाँ नहीं पहनाई जा सकतीं...

जिस दिन

युवा अपने प्रश्नों के साथ

इतिहास के दरवाज़े पर दस्तक देने लगें

उस दिन

सिंहासन नहीं बोलते

समय अपना फैसला सुनाता है....

#हरकीरत_हीर


Oct 9, 2026

"गीतावचनामृतान" अर्थात् श्रीमद्भगवद्गीता के अमृतमय श्लोक और हिन्दी अर्थ


1. त्वमादिदेवः पुरुषः पुराणः। त्वमस्य विश्वस्य परं निदानम्।
    वेत्तासि वेद्यं च परं च धाम, त्वया तं विश्वमनन्तरूपं॥११॥

हिन्दी अर्थ:  हे भगवान! आप आदिदेव, पुरातन पुरुष हैं। यह सृष्टि आपसे ही उत्पन्न होती है। आप ही सबका जानने वाले और परम उद्देश्य हैं। आपसे ही यह विश्व अनंत रूप में व्याप्त है।

2.  यदा यदा हि धर्मस्य ग्लानिर्भवति भारत।  अभ्युत्थानमधर्मस्य तदात्मानं सृजाम्यहम्॥
     परित्राणाय साधूनां विनाशाय च दुष्कृताम्। धर्मसंस्थापनार्थाय संभवामि युगे युगे॥

हिन्दी अर्थ: हे अर्जुन! जब-जब धरती पर धर्म की कमी और अधर्म का उदय होता है, तब-तब मैं अपने आपको अवतरित करता हूं।  सदाचारियों की रक्षा, दुष्टों के विनाश और धर्म की पुनः स्थापना के लिए मैं हर युग में जन्म लेता हूं।

3. यद्यदाचरति श्रेष्ठस्तत्तदेवेतरो जनः। स यत् प्रमाणं कुरुते लोकस्तदनुवर्तते॥

हिन्दी अर्थ: जो श्रेष्ठ व्यक्ति जैसा आचरण करते हैं, अन्य लोग भी वैसा ही करते हैं; वे जो उदाहरण प्रस्तुत करते हैं, समस्त संसार उसका अनुसरण करता है।

4. सुखदुःखे समे कृत्वा, लाभालाभौ जयाजयौ।  ततो युद्धाय युज्यस्व नैवं पापमवाप्स्यसि॥ 

हिन्दी अर्थ:  सुख-दुख, लाभ-हानि और जय-पराजय को समान मानकर सिर्फ अपने कर्तव्य के लिए युद्ध कर, तब तू पाप का भागी नहीं होगा।

5. वासांसि जीर्णानि यथा विहाय, नवानि गृह्णाति नरोऽपराणि। 
तथा शरीराणि विहाय जीर्ण - न्यानि संयाति नवानि देही॥

हिन्दी अर्थ: जैसे मनुष्य पुराने वस्त्र उतारकर नए वस्त्र धारण करता है, वैसे ही आत्मा पुराने शरीर को त्यागकर नया शरीर धारण करती है।

6. नैनं छिन्दन्ति शस्त्राणि नैनं दहति पावकः।  न चैनं क्लेदयन्त्यापो न शोषयति मारुतः॥

हिन्दी अर्थ
: इस आत्मा को शस्त्र काट नहीं सकते, अग्नि जला नहीं सकती, जल गला नहीं सकता और वायु सुखा नहीं सकती।

7. कर्मण्येवाधिकारस्ते मा फलेषु कदाचन। मा कर्मफलहेतुर्भूः मा ते सङ्गोऽस्त्वकर्मणि॥१७॥

हिन्दी अर्थ: तेरा अधिकार केवल कर्म करने में है, उसके फल में कभी नहीं। कर्म का फल पाने की इच्छा न कर और अकर्म में भी तेरा आकर्षण न हो।

8.  चञ्चलं हि मन: कृष्ण! प्रमाथि बलवद्दृढम्। तस्याहं निग्रहं मन्ये वायोरिव सुदुष्करम्॥

हिन्दी अर्थ:  हे कृष्ण! यह मन अत्यंत चंचल, बलशाली और हठी है, इसे वश में करना वायु को वश में करने के समान कठिन है।

9. काम एष क्रोध एष रजोगुणसमुद्भव:।  महाशनो महापाप्मा विद्ध्येनमिह वैरिणम्॥

हिन्दी अर्थ:  यह काम (इच्छा) और क्रोध रजोगुण से उत्पन्न होते हैं। ये महान भक्षक और महान पाप हैं, इन्हें इसी जीवन में अपना शत्रु समझो।

10.  त्रिविधं नरकस्येदं द्वारं नाशनमात्मन:। काम: क्रोधस्तथा लोभस्तस्मात् एतत्त्रयं त्यजेत्॥

हिन्दी अर्थ: काम, क्रोध और लोभ — ये तीन नरक के द्वार हैं, जो आत्मा का नाश करते हैं। अत: व्यक्ति को इनका त्याग करना चाहिए।

11.  सर्वधर्मान् परित्यज्य मामेकं शरणं व्रज। अहं त्वां सर्वपापेभ्यो मोक्षयिष्यामि मा शुच:॥

हिन्दी अर्थ: सभी कर्तव्यों को छोड़ कर केवल मेरी (भगवान की) शरण में आ जाओ, मैं तुम्हें सभी पापों से मुक्त कर दूँगा, चिंता मत करो। 

Oct 3, 2026

सकल हंस में राम बिराजे


 टेक:

सकल हंस में राम बिराजे, राम बिना कोई धाम नहीं।

सब ब्रह्माण्ड में जोत का वासा, राम को सुमरू दूजा नहीं।।

1.

तीन गुण पर तेज हमारा, पांच तत्व पर जोत जले

जिनका उजाला चौदह लोक में, सूरत डोर आकास चढ़े।

सकल हंस में राम बिराजे, राम बिना कोई धाम नहीं।

सब ब्रह्माण्ड में जोत का वासा, राम को सुमरू दूजा नहीं।।

2.

नाभि कमल से परख लेना, हिरदे कमल बिच फिरे मणी

अनहद बाजा बाजे शहर में, ब्रह्माण्ड पर आवाज हुई।

सकल हंस में राम बिराजे, राम बिना कोई धाम नहीं।

सब ब्रह्माण्ड में जोत का वासा, राम को सुमरू दूजा नहीं।।

3.

हीरा मोती लाल जवारत, प्रेम पदारथ परखों यहीं

साँचा मोती सुमर लेना, राम धणी से म्हारी डोर लगी।।

सकल हंस में राम बिराजे, राम बिना कोई धाम नहीं।

सब ब्रह्माण्ड में जोत का वासा, राम को सुमरू दूजा नहीं।।

4.

गुरू जन होय तो हेरी लो घट में, बाहर शहर में भटको मति

गुरू प्रताप नानक सा का वरणे, भीतर बोले कोई दूजो नहीं।

सकल हंस में राम बिराजे, राम बिना कोई धाम नहीं।

सब ब्रह्माण्ड में जोत का वासा, राम को सुमरू दूजा नहीं।।

Sep 30, 2026

15 बेहतरीन शेर - 25 !!!

1. यहाँ सबको दरारों में झाँकने की आदत है, दरवाज़ा खोल दो तो हाल भी पूछने नहीं आएगा। - मुनव्वर राना

2. वह सबकी सुन रहे हैं, सबको दाद-ए-शौक़ देते हैं, कहीं ऐसे में मेरा क़िस्सा-ए-ग़म भी बयाँ होता। — कैफ़ी आज़मी

3. इतनी शिद्दत से मैंने तुम्हें पाने की कोशिश की है, कि हर ज़र्रे ने मुझे तुमसे मिलाने की साज़िश की है। - मयूर पुरी

4. ना तलवार की धार से, ना गोलियों की बौछार से, बंदा डरता है तो सिर्फ़ परवरदिगार से। - संतोष आनन्द

5. इतनी भी बद-मिज़ाजी हर लहज़ा ‘मीर’ तुम को, उलझाव है ज़मीं से, झगड़ा है आसमाँ से। — मीर तकी मीर

6. किसी ने आग लगाई है ठहरे पानी में, सुलग रहा है समुंदर, किनारे रौशन हैं। — बाबर ज़ुहराब

7. कौन आएगा यहाँ, कोई न आया होगा, मेरा दरवाज़ा हवाओं ने हिलाया होगा। — कैफ़ भोपाली

8.  पोंछ कर अश्क अपनी आँखों से मुस्कुराओ तो कोई बात बने, सर झुकाने से कुछ नहीं होता, सर उठाओ तो कोई बात बने। — साहिर लुधियानवी

9. फ़लसफ़ी को बहस के अंदर ख़ुदा मिलता नहीं, डोर को सुलझा रहा है और सिरा मिलता नहीं। — अकबर इलाहाबादी

10. नहीं कि मुझ को क़यामत का ए'तिक़ाद नहीं, शब-ए-फ़िराक़ से रोज़-ए-जज़ा ज़ियाद नहीं। — मिर्ज़ा ग़ालिब

11. कीजै न ज़मील उर्दू का सिंगार, अब ईरानी तल्मीहों से, पहनेगी विदेशी गहने क्यों यह बेटी भारतमाता की - जमील मज़हरी

12. इस तरह इंसान और शिद्दत करे इंसान पर, तुफ़ है तेरे दीन पर, लानत तेरे ईमान पर। - मक़तल-ए-कानपुर

13. सर-ए-महशर यही पूछूँगा ख़ुदा से पहले, तू ने रोका भी था बंदे को ख़ता से पहले  -- आनंद नारायण ‘मुल्ला’

14. अक़्ल के भटके होऊँ को राह दिखलाते हुए, हम ने काटी ज़िंदगी दीवाना कहलाते हुए -- आनंद नारायण ‘मुल्ला’
 
15. मिट्टी की मूरतों में समझा है तू ख़ुदा है, ख़ाक-ए-वतन का मुझको हर ज़र्रा देवता है। — अल्लामा इक़बाल, 






Sep 28, 2026

अग्निपथ! अग्निपथ! अग्निपथ!



वृक्ष हों भले खड़े,
हों घने, हों बड़े,
एक पत्र छाँह भी
मांग मत! मांग मत! मांग मत!
अग्निपथ! अग्निपथ! अग्निपथ!

तू न थकेगा कभी,
तू न थमेगा कभी,
तू न मुड़ेगा कभी,
कर शपथ! कर शपथ! कर शपथ!
अग्निपथ! अग्निपथ! अग्निपथ!

यह महान दृश्य है,
चल रहा मनुष्य है,
अश्रु, स्वेद, रक्त से
लथ-पथ, लथ-पथ, लथ-पथ,
अग्निपथ! अग्निपथ! अग्निपथ!

Sep 21, 2026

तू भी है राणा का वंशज फेंक जहां तक भाला जाए

कब तक बोझ संभाला जाए
द्वंद्व कहां तक पाला जाए
दूध छीन बच्चों के मुख से
क्यों नागों को पाला जाए
दोनों ओर लिखा हो भारत
सिक्का वही उछाला जाए
तू भी है राणा का वंशज
फेंक जहां तक भाला जाए

इस बिगड़ैल पड़ोसी को तो
फिर शीशे में ढाला जाए
तेरे मेरे दिल पर ताला
राम करें ये ताला जाए
वाहिद के घर दीप जले तो
मंदिर तलक उजाला जाए

--- वाहिद अली वाहिद

Sep 19, 2026

ब्रम्हांड Serial Title Song - Doordarshan


 

आकाश बहुत ऊंचा है 

और दूर बहुत हैं तारे 


फिरते हुए सैकड़ों सूरज 

ब्रह्मांड के ये बंजारे


सदियों के भंवर बहते हैं 

अनगिनत हैं समय के धारे 


और नीला सा एक मोती

कहते हैं ज़मीं, हम सारे 


छोटी सी बूंद सी धरती 

सागर से कहीं गहरी है 


आकाश की गंगा में ये बजरे की तरह बहती है

आकाश बहुत ऊंचा है 

- गुलज़ार 

#Gulzar #SureshWadkar #RaghunathSeth

Sep 15, 2026

आंधियां आती थीं लेकिन कभी ऐसा न हुआ...

आँधियाँ आती थीं लेकिन कभी ऐसा न हुआ

ख़ौफ़ के मारे जुदा शाख़ से पत्ता न हुआ

रूह ने पैरहन-ए-जिस्म बदल भी डाला

ये अलग बात किसी बज़्म में चर्चा न हुआ

 रात को दिन से मिलाने की हवस थी हम को

काम अच्छा न था अंजाम भी अच्छा न हुआ

वक़्त की डोर को थामे रहे मज़बूती से

और जब छूटी तो अफ़्सोस भी इस का न हुआ 

ख़ूब दुनिया है कि सूरज से रक़ाबत थी जिन्हें

उन को हासिल किसी दीवार का साया न हुआ


रईस अमरोह

Sep 4, 2026

मैं जिसे ओढ़ता-बिछाता हूँ

मैं जिसे ओढ़ता-बिछाता हूँ
वो ग़ज़ल आपको सुनाता हूँ

एक जंगल है तेरी आँखों में
मैं जहाँ राह भूल जाता हूँ

तू किसी रेल-सी गुज़रती है
मैं किसी पुल-सा थरथराता हूँ

हर तरफ़ ऐतराज़ होता है
मैं अगर रौशनी में आता हूँ

एक बाज़ू उखड़ गया जबसे
और ज़्यादा वज़न उठाता हूँ

मैं तुझे भूलने की कोशिश में
आज कितने क़रीब पाता हूँ

कौन ये फ़ासला निभाएगा
मैं फ़रिश्ता हूँ सच बताता हूँ

--- दुष्यंत कुमार

Aug 31, 2026

माँ

सच है कि माँ
कभी छोड़कर
जाती नहीं

जाती है तो
आँसुओं में
रह जाती है

जब तक दुख
बचा है मुझमें
कविता बची है
माँ है

--- पंकज चतुर्वेदी

Aug 23, 2026

वो ज़माना गुज़र गया कब का

वो ज़माना गुज़र गया कब का
था जो दीवाना मर गया कब का

ढूंढ़ता था जो इक नई दुनिया
लूट के अपने घर गया कब का

वो जो लाया था हम को दरिया तक
पार अकेले उतर गया कब का

उस का जो हाल है वही जाने
अपना तो ज़ख़्म भर गया कब का

ख़्वाब-दर-ख़्वाब था जो शीराज़ा
अब कहां है बिखर गया कब का

--- जावेद अख़्तर

Aug 11, 2026

समय ने जब भी अंधेरो से दोस्ती की है

समय ने जब भी अंधेरो से दोस्ती की है
जला के अपना ही घर हमने रोशनी की है

सबूत है मेरे घर में धुएं के ये धब्बे
कभी यहाँ पे उजालों ने ख़ुदकुशी की है

ना लड़खडायाँ कभी और कभी ना बहका हूँ
मुझे पिलाने में फिर तुमने क्यूँ कमी की है

कभी भी वक़्त ने उनको नहीं मुआफ़ किया
जिन्होंने दुखियों के अश्कों से दिल्लगी की है

किसी के ज़ख़्म को मरहम दिया है गर तूने
समझ ले तूने ख़ुदा की ही बंदगी की है

--- गोपालदास नीरज

Aug 7, 2026

चुंबन

मैं आज शाम को बिलकुल फ़्री हूं, आओगी मिलने?
मैंने चाची से मिन्नतें की
वो जानती थीं, तुम मेरे होने वाले शौहर हो
तो मान गयीं
मैंने पर्स उठाया, ठीक-ठाक कपड़े पहने, ऑटो बुक किया और पार्क के गेट पर पहुंच गयी
तुम गेट पर ही खड़े थे...

तुम्हारे बगल में एक मूंगफली बेचने वाला दस-बारह साल का लड़का खड़ा था
जो तुमसे बार-बार मूंगफली ख़रीदने का निवेदन कर रहा था
मेरे कहने पर तुमने 10 ₹ की मूंगफली तुलवा ली

हम पार्क मैं बैठे रहे
बैठे-बैठे मूंगफली छीलते रहे

मैं मुस्कराती रही, तुम हंसते रहे
मैं क़िस्से सुनाती रही, तुम क़िस्से सुनते रहे
फिर अचानक से तुमने मुझे चूम लिया

मैं अंगुली से मिट्टी खोदने लगी...
फिर न जाने किस उम्मीद में, मैं उठकर ओट में आ गयी
फिर हम दोनों एक-दूसरे को आलिंगन में भरकर चूमने लगे

तभी एक लड़का आया
उसके चेहरे पर घृणा का भाव था —
'ये सब यहां नहीं चलेगा'

तुम सकपका गये
मैं डर गयी...
तुमने लड़के से कहा — 'सॉरी'

पांच मिनट पहले मुझे पता चला था — 'चुंबन किसे कहते हैं'
पांच मिनट बाद मुझे पता चला — 'चुंबन लेना ज़ुर्म है'

मैं मुंडी नीचे झुकाये पार्क से बाहर आ गयी...
मेरे बदन पर कपड़े थे पर यूं लगा जैसे मैं बिलकुल नंगी हूं

मेरे कानों में तुम्हारी कोई आवाज़ नहीं आयी...
महीनों तक कैसेट की तरह कानों में बस यही बजता रहा —
ये सब यहां नहीं चलेगा...

तुम फ़ोन पर फ़ोन करते रहे
मैं फ़ोन काटती रही...

तुमने मैसेज किया —
'सॉरी ! हम जल्दी शादी कर लेंगे'
फिर हमारी शादी हो गयी

हमारे हिस्से में एक बिस्तर और एक छोटा-सा कमरा आ गया
काम से थके-ऊबे हम कमरे में आते तो मैं रोशनी बुझा देती
आहिस्ता-आहिस्ता तुम्हारे होंठ मेरे होंठो की तरफ़ बढ़ते
तभी वह लड़का मेरे कानों में जोर से चीख़ता,
“ये सब यहां नहीं चलेगा!”

उस अनजान लड़के ने सिर्फ़ एक वाक्य बोलकर
उस एहसास को कुचल दिया
जिससे मैं ज़िन्दगीभर चुम्बन लेती और देती...

-नेहा नरुका

Jul 26, 2026

वो भी क्या दिन थे

 वो भी क्या दिन थे कि जब इश्क़ लड़ा लेते थे,

प्यार की डोर को चर्ख़ी पे चढ़ा लेते थे,

नौजवानी की पतंगों को उड़ा लेते थे,

धड़क के कंकड़ियाँ संभाल लेते थे,

होंठों पे हंसी, आंखों में आस थी,

हर ग़म को हंसी में उड़ाया करते थे।

--- सागर खय्यामी

Jul 23, 2026

15 बेहतरीन शेर - 24 !!!

 1.नहीं नहीं हमें अब तेरी जुस्तुजू भी नहीं तुझे भी भूल गए हम तिरी ख़ुशी के लिए - ज़ेहरा निगाह

2.  मुस्तक़िल जूझना यादों से बहुत मुश्किल है, रफ़्ता रफ़्ता सभी घर-बार में खो जाते हैं। - .मुनव्वर राना

3. रंग ख़ुश्बू और मौसम का बहाना हो गया, अपनी ही तस्वीर में चेहरा पुराना हो गया - खालिद गनी 

4.ये दस्तूर-ए-ज़बाँ-बंदी है कैसा तेरी महफ़िल में , यहाँ तो बात करने को तरसती है ज़बाँ मेरी  - इक़बाल

5. ज़ाहिद शराब पीने दे मस्जिद में बैठ कर, या वो जगह बता दे जहाँ पर ख़ुदा न हो

6. न ख़ुदा ही मिला न विसाल-ए-सनम न इधर के हुए न उधर के हुए, रहे दिल में हमारे ये रंज-ओ-अलम न इधर के हुए न उधर के हुए

7. अगर फ़िरदौस बर-रू-ए-ज़मीं अस्त, हमीं अस्त ओ हमीं अस्त ओ हमीं अस्त

8. सलीक़े से हवाओं में जो ख़ुशबू घोल सकते हैं, अभी कुछ लोग बाक़ी हैं जो उर्दू बोल सकते हैं

9. आतिशे इश्क़ न बुझी, ज़माने ने इंतेहा लाख लिए, वो मयस्सर नहीं अभी, पर जीने को उसकी आरज़ू ही सही !

10. होश आए भी तो क्यों करें, तेरे दीवाने को, एक जाता है तो दो आते हैं समझाने को - होशियार मेरठी 

11.रफ़्ता रफ़्ता वो हमारे दिल के अरमाँ हो गए , पहले जाँ फिर जान-ए-जाँ फिर जान-ए-जानाँ हो गए  - क़मर जलालाबादी

12. तुम से सदियों की वफ़ाओ का कोई नाता था, तुम से मिलने की लकीरें थीं मेरे हाथों में - सईद राही

13.इक रात हर चराग़ की लौ काट दी गई, और वो भी चुप रहे जिन्हें प्यारी है रौशनी - नोमान शौक़

14.दूसरा मौक़ा सबको मिलता है ताबिश, पहली बाज़ी सबने हारी होती है -ज़ुबैर ताबिश

15.जो डूबना है तो इतने सुकून से डूबो, कि आस-पास की लहरों को भी पता न लगे - क़ैसर-उल जाफ़री

Jul 15, 2026

उम्र जल्वों में बसर हो

 उम्र जल्वों में बसर हो ये ज़रूरी तो नहीं 

हर शब-ए-ग़म की सहर हो ये ज़रूरी तो नहीं 

चश्म-ए-साक़ी से पियो या लब-ए-साग़र से पियो 

बे-ख़ुदी आठों पहर हो ये ज़रूरी तो नहीं 

नींद तो दर्द के बिस्तर पे भी आ सकती है 

उन की आग़ोश में सर हो ये ज़रूरी तो नहीं 

शैख़ करता तो है मस्जिद में ख़ुदा को सज्दे 

उस के सज्दों में असर हो ये ज़रूरी तो नहीं 

सब की नज़रों में हो साक़ी ये ज़रूरी है मगर 

सब पे साक़ी की नज़र हो ये ज़रूरी तो नहीं 

मय-कशी के लिए ख़ामोश भरी महफ़िल में 

सिर्फ़ ख़य्याम का घर हो ये ज़रूरी तो नहीं 

- ख़ामोश ग़ाज़ीपुरी

Jul 11, 2026

"अंजानी राहों में" — मेरी जान हिन्दुस्तान एलबम से।

अंजानी राहों में तू क्या ढूँढता फिरे

दूर जिसे समझा वो तो पास है तेरे

साँस में हवा, जान में ज़मीन

दिल में खुला आसमान

प्यार है खुदा, प्यार है ख़ुशी

प्यार से है दोनों जहाँ

तेरा यह आशियाना, मेरा भी आशियाना


घूमता रहा दूर तू कहीं, उड़ते बादलों की तरह

कहीं से तुझे आई है सदा, लौट के आ अब ज़रा

तेरा यह आशियाना, मेरा भी आशियाना


वो झिलमिलाती आँखें, वो भोली सी अदा

वो धीरे-धीरे चल के लहराती हवाएँ

हमको ले जाएँ वहाँ, जहाँ हो घर अपना

मेरी यादों में पाया है

आज तो मिलने का दिन है आया, आया...

- पी. के. मिश्रा