Aug 11, 2026

समय ने जब भी अंधेरो से दोस्ती की है

समय ने जब भी अंधेरो से दोस्ती की है
जला के अपना ही घर हमने रोशनी की है

सबूत है मेरे घर में धुएं के ये धब्बे
कभी यहाँ पे उजालों ने ख़ुदकुशी की है

ना लड़खडायाँ कभी और कभी ना बहका हूँ
मुझे पिलाने में फिर तुमने क्यूँ कमी की है

कभी भी वक़्त ने उनको नहीं मुआफ़ किया
जिन्होंने दुखियों के अश्कों से दिल्लगी की है

किसी के ज़ख़्म को मरहम दिया है गर तूने
समझ ले तूने ख़ुदा की ही बंदगी की है

--- गोपालदास नीरज

Aug 7, 2026

चुंबन

मैं आज शाम को बिलकुल फ़्री हूं, आओगी मिलने?
मैंने चाची से मिन्नतें की
वो जानती थीं, तुम मेरे होने वाले शौहर हो
तो मान गयीं
मैंने पर्स उठाया, ठीक-ठाक कपड़े पहने, ऑटो बुक किया और पार्क के गेट पर पहुंच गयी
तुम गेट पर ही खड़े थे...

तुम्हारे बगल में एक मूंगफली बेचने वाला दस-बारह साल का लड़का खड़ा था
जो तुमसे बार-बार मूंगफली ख़रीदने का निवेदन कर रहा था
मेरे कहने पर तुमने 10 ₹ की मूंगफली तुलवा ली

हम पार्क मैं बैठे रहे
बैठे-बैठे मूंगफली छीलते रहे

मैं मुस्कराती रही, तुम हंसते रहे
मैं क़िस्से सुनाती रही, तुम क़िस्से सुनते रहे
फिर अचानक से तुमने मुझे चूम लिया

मैं अंगुली से मिट्टी खोदने लगी...
फिर न जाने किस उम्मीद में, मैं उठकर ओट में आ गयी
फिर हम दोनों एक-दूसरे को आलिंगन में भरकर चूमने लगे

तभी एक लड़का आया
उसके चेहरे पर घृणा का भाव था —
'ये सब यहां नहीं चलेगा'

तुम सकपका गये
मैं डर गयी...
तुमने लड़के से कहा — 'सॉरी'

पांच मिनट पहले मुझे पता चला था — 'चुंबन किसे कहते हैं'
पांच मिनट बाद मुझे पता चला — 'चुंबन लेना ज़ुर्म है'

मैं मुंडी नीचे झुकाये पार्क से बाहर आ गयी...
मेरे बदन पर कपड़े थे पर यूं लगा जैसे मैं बिलकुल नंगी हूं

मेरे कानों में तुम्हारी कोई आवाज़ नहीं आयी...
महीनों तक कैसेट की तरह कानों में बस यही बजता रहा —
ये सब यहां नहीं चलेगा...

तुम फ़ोन पर फ़ोन करते रहे
मैं फ़ोन काटती रही...

तुमने मैसेज किया —
'सॉरी ! हम जल्दी शादी कर लेंगे'
फिर हमारी शादी हो गयी

हमारे हिस्से में एक बिस्तर और एक छोटा-सा कमरा आ गया
काम से थके-ऊबे हम कमरे में आते तो मैं रोशनी बुझा देती
आहिस्ता-आहिस्ता तुम्हारे होंठ मेरे होंठो की तरफ़ बढ़ते
तभी वह लड़का मेरे कानों में जोर से चीख़ता,
“ये सब यहां नहीं चलेगा!”

उस अनजान लड़के ने सिर्फ़ एक वाक्य बोलकर
उस एहसास को कुचल दिया
जिससे मैं ज़िन्दगीभर चुम्बन लेती और देती...

-नेहा नरुका

Aug 4, 2026

Gods

In the year of ’88

All the gods

Could see

The villagers’ bodies

Spitting as they burned,

But none moved.

Only to light

The cigarettes on their lips

Did they incline their heads

To those fires.

--- Sherko Bekas

translated by Alana Marie Levinson-LaBrosse & Halo Fariq

Translator’s note: On March 16, 1988, as part of Anfal, Saddam Hussein’s military campaign against the Kurds of Iraq, Halabja withstood a chemical-weapons attack. The largest directed against a civilian population in history, it has been recognized as an act of genocide by the Iraqi High Criminal Court

Jul 30, 2026

Palestine

As Arab men fall like
grapes from a vine
under late afternoon

summer's shine women
watch their bridal beds
crumble under bombs.

Separated on earth by
different pressures they
will meet again only in
a promised paradise.

They will not be the same.
Shadows will meet shadows.
The new Jerusalem will be
of no consolation for
the one they lost.

Jul 26, 2026

वो भी क्या दिन थे

 वो भी क्या दिन थे कि जब इश्क़ लड़ा लेते थे,

प्यार की डोर को चर्ख़ी पे चढ़ा लेते थे,

नौजवानी की पतंगों को उड़ा लेते थे,

धड़क के कंकड़ियाँ संभाल लेते थे,

होंठों पे हंसी, आंखों में आस थी,

हर ग़म को हंसी में उड़ाया करते थे।

--- सागर खय्यामी