Sep 28, 2026

अग्निपथ



वृक्ष हों भले खड़े,
हों घने, हों बड़े,
एक पत्र छाँह भी
मांग मत! मांग मत! मांग मत!
अग्निपथ! अग्निपथ! अग्निपथ!

तू न थकेगा कभी,
तू न थमेगा कभी,
तू न मुड़ेगा कभी,
कर शपथ! कर शपथ! कर शपथ!
अग्निपथ! अग्निपथ! अग्निपथ!

यह महान दृश्य है,
चल रहा मनुष्य है,
अश्रु, स्वेद, रक्त से
लथ-पथ, लथ-पथ, लथ-पथ,
अग्निपथ! अग्निपथ! अग्निपथ!

Sep 24, 2026

Was It Necessary?

Was it necessary
For my heart to drop like an unripe apple
From the orphan branch on the family tree
So they can discover the law of love?

Was it necessary
For the pest to spread,
With its manicured nails
And its glamorous necktie,
To bury the newborn babies
Before they are given suitable names?

Was it necessary to have
All this beastly terror,
Flooding like the moon,
All this lunar silence?

Was it necessary
For us to turn backwards
To all these centuries?

--- Samih Al-Qasim

Sep 21, 2026

तू भी है राणा का वंशज फेंक जहां तक भाला जाए

कब तक बोझ संभाला जाए
द्वंद्व कहां तक पाला जाए
दूध छीन बच्चों के मुख से
क्यों नागों को पाला जाए
दोनों ओर लिखा हो भारत
सिक्का वही उछाला जाए
तू भी है राणा का वंशज
फेंक जहां तक भाला जाए

इस बिगड़ैल पड़ोसी को तो
फिर शीशे में ढाला जाए
तेरे मेरे दिल पर ताला
राम करें ये ताला जाए
वाहिद के घर दीप जले तो
मंदिर तलक उजाला जाए

--- वाहिद अली वाहिद

Sep 19, 2026

ब्रम्हांड Serial Title Song - Doordarshan


 

आकाश बहुत ऊंचा है 

और दूर बहुत हैं तारे 


फिरते हुए सैकड़ों सूरज 

ब्रह्मांड के ये बंजारे


सदियों के भंवर बहते हैं 

अनगिनत हैं समय के धारे 


और नीला सा एक मोती

कहते हैं ज़मीं, हम सारे 


छोटी सी बूंद सी धरती 

सागर से कहीं गहरी है 


आकाश की गंगा में ये बजरे की तरह बहती है

आकाश बहुत ऊंचा है 

- गुलज़ार 

#Gulzar #SureshWadkar #RaghunathSeth

Sep 15, 2026

आंधियां आती थीं लेकिन कभी ऐसा न हुआ...

आँधियाँ आती थीं लेकिन कभी ऐसा न हुआ

ख़ौफ़ के मारे जुदा शाख़ से पत्ता न हुआ

रूह ने पैरहन-ए-जिस्म बदल भी डाला

ये अलग बात किसी बज़्म में चर्चा न हुआ

 रात को दिन से मिलाने की हवस थी हम को

काम अच्छा न था अंजाम भी अच्छा न हुआ

वक़्त की डोर को थामे रहे मज़बूती से

और जब छूटी तो अफ़्सोस भी इस का न हुआ 

ख़ूब दुनिया है कि सूरज से रक़ाबत थी जिन्हें

उन को हासिल किसी दीवार का साया न हुआ


रईस अमरोह