Aug 21, 2026

Urdu Shayari (Poetry) & Dialogues from Parizaad Serial

### **1. "Tum Toh Siyah Mein Bhi Jachti Ho" (University Scene)**


> **Devanagari (हिंदी):**

> जब धीमे-धीमे हँसती हो, उस बारिश जैसी लगती हो।

> थोड़ी दिल की कहती हो, ज़्यादा दिल में रखती हो।

> क्यों जाऊँ रंगरेज़ के पास, तुम तो सियाह में भी जचती हो।

> करने दो उन्हें सिंगार, तुम सादा भी सजती हो।


> **Urdu (اردو):**

> جب دھیمے دھیمے ہنستی ہو، اس بارش جیسی لگتی ہو۔

> تھوڑی دل کی کہتی ہو، زیادہ دل میں رکھتی ہو۔

> کیوں جاؤں رنگ ریز کے پاس، تم تو سیاہ میں بھی جچتی ہو۔

> کرنے دو انہیں سنگھار، تم سادہ بھی سجتی ہو۔


> **Roman Urdu:**

> *Jab dheeme dheeme hasti ho, us barish jaisi lagti ho.*

> *Thodi dil ki kehti ho, zyada dil mein rakhti ho.*

> *Kyun jaaon rangrez ke paas, tum toh siyah mein bhi jachti ho.*

> *Karne do unhein singaar, tum saada bhi sajti ho.*


---


### **2. "Sitare Jo Damakte Hain"**


> **Devanagari (हिंदी):**

> सितारे जो दमकते हैं, किसी की चश्म-ए-हैरान में

> मुलाक़ातें जो होती हैं, जमाल-ए-अब्र-ओ-बारान में

> ये ना-आबाद वक़्तों में, दिल-ए-नाशाद में होगी

> मोहब्बत अब नहीं होगी, ये कुछ दिन बाद में होगी

> गुज़र जाएँगे जब ये दिन, ये उन की याद में होगी


> **Urdu (اردو):**

> ستارے جو دمکتے ہیں، کسی کی چشمِ حَیراں میں

> ملاقاتیں جو ہوتی ہیں، جمالِ ابرِ باراں میں

> یہ نا آباد وقتوں میں، دلِ ناشاد میں ہوگی

> محبت اب نہیں ہوگی، یہ کچھ دن بعد میں ہوگی

> گزر جائیں گے جب یہ دن، یہ ان کی یاد میں ہوگی


> **Roman Urdu:**

> *Sitare jo damakte hain, kisi ki chashm-e-hairaan mein*

> *Mulaqatein jo hoti hain, jamaal-e-abr-o-baaraan mein*

> *Ye na-aabaad waqton mein, dil-e-naashaad mein hogi*

> *Mohabbat ab nahi होगी, ye kuch din baad mein hogi*

> *Guzar جائیں ge jab ye din, ye un ki yaad mein hogi*


---


### **3. "Qissay Meri Ulfat Ke"**


> **Devanagari (हिंदी):**

> क़िस्से मेरी उल्फ़त के जो मरक़ूम हैं सारे,

> आ देख तेरे नाम से मन्सूब हैं सारे।

> शायद ये ज़र्फ़ है जो ख़ामोश हूँ अब तक,

> वरना तो तेरे ऐब भी मालूम हैं सारे।

> सब जुर्म मेरी ज़ात से मन्सूब हुए,

> क्या मेरे सिवा इस शहर में मासूम हैं सारे?


> **Urdu (اردو):**

> قصے میری الفت کے جو مرقوم ہیں سارے

> آ دیکھ تیرے نام سے منسوب ہیں سارے

> شاید یہ ظرف ہے جو خاموش ہوں اب تک

> ورنہ تو تیرے عیب بھی معلوم ہیں سارے

> سب جرم میری ذات سے منسوب ہوئے

> کیا میرے سوا اس شہر میں معصوم ہیں سارے؟


> **Roman Urdu:**

> *Qissay meri ulfat ke jo marqoom hain saare,*

> *Aa dekh tere naam se mansoob hain saare.*

> *Shayad ye zarf hai jo khamosh hoon ab tak,*

> *Warna toh tere aib bhi maloom hain saare.*

> *Sub jurm meri zaat se mansoob hue,*

> *Kya mere siwa is shehar mein masoom hain saare?*


---


### **4. "Suno! Mujhse Aur Bas Mujhse Nafrat Karna"**


> **Devanagari (हिंदी):**

> सुनो! तुम्हारी वफ़ा पे मुझको गरचे पूरा यक़ीन है,

> मगर ज़माने के वार का कुछ भरोसा नहीं है।

> सो गर कभी ऐसा हो कि तुम्हें मुझसे नफ़रत हो जाए,

> तो कभी उन बातों से नफ़रत मत करना जो हमने एक दूसरे से की थीं,

> वो बेंच जहाँ हम बैठा करते थे, वो पहली बारिश,

> वो कॉफ़ी के ख़ाली मग, वो सिनेमा का पहला टिकट और आख़िरी दो सीटें,

> सबको याद रखना... कभी उनसे नफ़रत ना करना।

> सुनो, मुझसे... और बस मुझसे नफ़रत करना,

> क्योंकि सिर्फ़ मैं और फ़क़त मैं ही तुम्हारी उस नफ़रत के क़ाबिल हूँ।


> **Roman Urdu:**

> *Suno! Tumhari wafa pe mujhko garche poora yaqeen hai,*

> *Magar zamane ke waar ka kuch bharosa nahi hai.*

> *So gar kabhi aisa ho ki tumhein mujhse nafrat ho jaaye,*

> *Toh kabhi un baaton se nafrat mat karna jo humne ek doosre se ki thi,*

> *Wo bench jahaan hum baitha karte the, wo pehli baarish,*

> *Wo coffee ke khaali mug, wo cinema ka pehla ticket aur aakhri do seatein,*

> *Sabko yaad rakhna... kabhi unse nafrat na karna.*

> *Suno, mujhse... aur bas mujhse nafrat karna,*

> *Kyunki sirf main aur faqat main hi tumhari us nafrat ke qabil hoon.*


---


### **Iconic Dialogue:**


> **Devanagari (हिंदी):**

> "शक्ल-ओ-सूरज इंसान का पहला तआरुफ़ है। इंसान का दूसरा और असल तआरुफ़ उसके अल्फ़ाज़ हैं। अपना दूसरा तआरुफ़ इतना मुकम्मल कर लो कि लोग तुम्हारा पहला तआरुफ़ भूल जाएँ।"


> **Roman Urdu:**

> *"Shakl-o-soorat insaan ka pehla taaruf hai. Insaan ka doosra aur asal taaruf uske alfaaz hain. Apna doosra taaruf itna mukammal karlo ke log tumhara pehla taaruf bhool jaayen."*

Aug 19, 2026

I Ask Percy How I Should Live My Life

Love, love, love, says Percy.
And hurry as fast as you can
along the shining beach, or the rubble, or the dust.

Then, go to sleep.
Give up your body heat, your beating heart.
Then, trust.

--- Mary Oliver

Aug 15, 2026

वतन को कुछ नहीं ख़तरा निज़ाम-ए-ज़र है ख़तरे में

वतन को कुछ नहीं ख़तरा निज़ाम-ए-ज़र है ख़तरे में
हक़ीक़त में जो रहज़न है वही रहबर है ख़तरे में

जो बैठा है सफ़-ए-मातम बिछाए मर्ग-ए-ज़ुल्मत पर
वो नौहागर है ख़तरे में वो दानिश-वर है ख़तरे में

अगर तशवीश लाहक़ है तो सुलतानों को लाहक़ है
न तेरा घर है ख़तरे में न मेरा घर है ख़तरे में

जहाँ 'इक़बाल' भी नज़्र-ए-ख़त-ए-तनसीख़ हो 'जालिब'
वहाँ तुझ को शिकायत है तिरा जौहर है ख़तरे

--- हबीब जालिब

Aug 11, 2026

समय ने जब भी अंधेरो से दोस्ती की है

समय ने जब भी अंधेरो से दोस्ती की है
जला के अपना ही घर हमने रोशनी की है

सबूत है मेरे घर में धुएं के ये धब्बे
कभी यहाँ पे उजालों ने ख़ुदकुशी की है

ना लड़खडायाँ कभी और कभी ना बहका हूँ
मुझे पिलाने में फिर तुमने क्यूँ कमी की है

कभी भी वक़्त ने उनको नहीं मुआफ़ किया
जिन्होंने दुखियों के अश्कों से दिल्लगी की है

किसी के ज़ख़्म को मरहम दिया है गर तूने
समझ ले तूने ख़ुदा की ही बंदगी की है

--- गोपालदास नीरज

Aug 7, 2026

चुंबन

मैं आज शाम को बिलकुल फ़्री हूं, आओगी मिलने?
मैंने चाची से मिन्नतें की
वो जानती थीं, तुम मेरे होने वाले शौहर हो
तो मान गयीं
मैंने पर्स उठाया, ठीक-ठाक कपड़े पहने, ऑटो बुक किया और पार्क के गेट पर पहुंच गयी
तुम गेट पर ही खड़े थे...

तुम्हारे बगल में एक मूंगफली बेचने वाला दस-बारह साल का लड़का खड़ा था
जो तुमसे बार-बार मूंगफली ख़रीदने का निवेदन कर रहा था
मेरे कहने पर तुमने 10 ₹ की मूंगफली तुलवा ली

हम पार्क मैं बैठे रहे
बैठे-बैठे मूंगफली छीलते रहे

मैं मुस्कराती रही, तुम हंसते रहे
मैं क़िस्से सुनाती रही, तुम क़िस्से सुनते रहे
फिर अचानक से तुमने मुझे चूम लिया

मैं अंगुली से मिट्टी खोदने लगी...
फिर न जाने किस उम्मीद में, मैं उठकर ओट में आ गयी
फिर हम दोनों एक-दूसरे को आलिंगन में भरकर चूमने लगे

तभी एक लड़का आया
उसके चेहरे पर घृणा का भाव था —
'ये सब यहां नहीं चलेगा'

तुम सकपका गये
मैं डर गयी...
तुमने लड़के से कहा — 'सॉरी'

पांच मिनट पहले मुझे पता चला था — 'चुंबन किसे कहते हैं'
पांच मिनट बाद मुझे पता चला — 'चुंबन लेना ज़ुर्म है'

मैं मुंडी नीचे झुकाये पार्क से बाहर आ गयी...
मेरे बदन पर कपड़े थे पर यूं लगा जैसे मैं बिलकुल नंगी हूं

मेरे कानों में तुम्हारी कोई आवाज़ नहीं आयी...
महीनों तक कैसेट की तरह कानों में बस यही बजता रहा —
ये सब यहां नहीं चलेगा...

तुम फ़ोन पर फ़ोन करते रहे
मैं फ़ोन काटती रही...

तुमने मैसेज किया —
'सॉरी ! हम जल्दी शादी कर लेंगे'
फिर हमारी शादी हो गयी

हमारे हिस्से में एक बिस्तर और एक छोटा-सा कमरा आ गया
काम से थके-ऊबे हम कमरे में आते तो मैं रोशनी बुझा देती
आहिस्ता-आहिस्ता तुम्हारे होंठ मेरे होंठो की तरफ़ बढ़ते
तभी वह लड़का मेरे कानों में जोर से चीख़ता,
“ये सब यहां नहीं चलेगा!”

उस अनजान लड़के ने सिर्फ़ एक वाक्य बोलकर
उस एहसास को कुचल दिया
जिससे मैं ज़िन्दगीभर चुम्बन लेती और देती...

-नेहा नरुका