1. यहाँ सबको दरारों में झाँकने की आदत है, दरवाज़ा खोल दो तो हाल भी पूछने नहीं आएगा। - मुनव्वर राना
2. वह सबकी सुन रहे हैं, सबको दाद-ए-शौक़ देते हैं, कहीं ऐसे में मेरा क़िस्सा-ए-ग़म भी बयाँ होता। — कैफ़ी आज़मी
3. इतनी शिद्दत से मैंने तुम्हें पाने की कोशिश की है, कि हर ज़र्रे ने मुझे तुमसे मिलाने की साज़िश की है। - मयूर पुरी
4. ना तलवार की धार से, ना गोलियों की बौछार से, बंदा डरता है तो सिर्फ़ परवरदिगार से। - संतोष आनन्द
5. इतनी भी बद-मिज़ाजी हर लहज़ा ‘मीर’ तुम को, उलझाव है ज़मीं से, झगड़ा है आसमाँ से। — मीर तकी मीर
6. किसी ने आग लगाई है ठहरे पानी में, सुलग रहा है समुंदर, किनारे रौशन हैं। — बाबर ज़ुहराब
7. कौन आएगा यहाँ, कोई न आया होगा, मेरा दरवाज़ा हवाओं ने हिलाया होगा। — कैफ़ भोपाली
8. पोंछ कर अश्क अपनी आँखों से मुस्कुराओ तो कोई बात बने, सर झुकाने से कुछ नहीं होता, सर उठाओ तो कोई बात बने। — साहिर लुधियानवी
9. फ़लसफ़ी को बहस के अंदर ख़ुदा मिलता नहीं, डोर को सुलझा रहा है और सिरा मिलता नहीं। — अकबर इलाहाबादी
10. नहीं कि मुझ को क़यामत का ए'तिक़ाद नहीं, शब-ए-फ़िराक़ से रोज़-ए-जज़ा ज़ियाद नहीं। — मिर्ज़ा ग़ालिब
11. कीजै न ज़मील उर्दू का सिंगार, अब ईरानी तल्मीहों से, पहनेगी विदेशी गहने क्यों यह बेटी भारतमाता की - जमील मज़हरी
12. इस तरह इंसान और शिद्दत करे इंसान पर, तुफ़ है तेरे दीन पर, लानत तेरे ईमान पर। - मक़तल-ए-कानपुर
13. सर-ए-महशर यही पूछूँगा ख़ुदा से पहले, तू ने रोका भी था बंदे को ख़ता से पहले -- आनंद नारायण ‘मुल्ला’
14. अक़्ल के भटके होऊँ को राह दिखलाते हुए, हम ने काटी ज़िंदगी दीवाना कहलाते हुए -- आनंद नारायण ‘मुल्ला’
15. मिट्टी की मूरतों में समझा है तू ख़ुदा है, ख़ाक-ए-वतन का मुझको हर ज़र्रा देवता है। — अल्लामा इक़बाल,
