1. मानुष हौं तो वही रसखान, बसौं ब्रज गोकुल गाँव।
जो पशु हौं तो कहा बसु, चरौं नित नंद की धेनु॥
जो खग हौं तो बसेरो करौं, मिलि कालिंदी कूल कदंब की डार।
जो नाग हौं तो बसेरो करौं, करौं सदा ही गिरिराज की छाँह॥
भावार्थ: रसखान कहते हैं—यदि मैं मनुष्य बनूँ तो ब्रज-गोकुल में रहूँ, पशु बनूँ तो नंद की गायों के साथ चरूँ, पक्षी बनूँ तो यमुना किनारे कदंब वृक्ष पर वास करूँ, और नाग बनूँ तो गोवर्धन पर्वत की छाया में रहूँ—क्योंकि जहाँ कृष्ण हैं, वही मेरा लोक है।
👉 संदेश: जीवन का रूप कोई भी हो, पर कृष्ण और ब्रज से दूर होना स्वीकार्य नहीं।
2. सेस गनेस महेस दिनेस, सुरेसहु जाहि निरंतर गावैं
जाहि अनादि अनंत अखंड, अछेद अभेद सुबेद बतावैं
नारद से सुक व्यास रटें, पचिहारे तऊ पुनि पार न पावैं
ताहि अहीर की छोहरियां, छछिया भरि छाछ पै नाच नचावैं
भावार्थ: जिस भगवान के गुणों का गान शेषनाग, गणेश, शिव, सूर्य और इंद्र निरंतर करते रहते हैं;
जिसे वेद अनादि, अनंत, अखंड, अछेद और अभेद बताते हैं;
जिसका स्मरण नारद, शुक और व्यास जैसे महाज्ञानी करते हैं, फिर भी उसका पूर्ण रहस्य नहीं जान पाते—
उसी परमेश्वर को ब्रज की ग्वालिनें एक कटोरी छाछ के बदले नचा देती हैं।
👉 भाव यह है कि कृष्ण की महिमा भक्ति में है, ज्ञान या शक्ति में नहीं।
3. बैन वही उन गुन गाइ औ कान वही उन बैन सों सानी।
हाथ वही उन गात सरे अँपाई वही जु उरि अनुजानी॥
जान वही उन आनन संग औ मान वही जु करै मनमानी।
याँ रसखान वही रसखान जु है रसखान सो रसखानी॥
भावार्थ: वही वाणी धन्य है जो कृष्ण के गुण गाए, वही कान धन्य हैं जो उनकी बातें सुनें।
वही हाथ सफल हैं जो उनके शरीर की सेवा करें, वही छाती सार्थक है जिसमें उनका प्रेम बसे।
वही जीवन सच्चा है जो उनके चेहरे से जुड़ा हो, और वही सम्मान योग्य है जो उनके प्रेम में मनमानी करे।
रसखान कहते हैं—जो कृष्ण-रस में डूब गया, वही सच्चा रसखान है।
नारद से सुक व्यास रटें, पचिहारे तऊ पुनि पार न पावैं
ताहि अहीर की छोहरियां, छछिया भरि छाछ पै नाच नचावैं
भावार्थ: जिस भगवान के गुणों का गान शेषनाग, गणेश, शिव, सूर्य और इंद्र निरंतर करते रहते हैं;
जिसे वेद अनादि, अनंत, अखंड, अछेद और अभेद बताते हैं;
जिसका स्मरण नारद, शुक और व्यास जैसे महाज्ञानी करते हैं, फिर भी उसका पूर्ण रहस्य नहीं जान पाते—
उसी परमेश्वर को ब्रज की ग्वालिनें एक कटोरी छाछ के बदले नचा देती हैं।
👉 भाव यह है कि कृष्ण की महिमा भक्ति में है, ज्ञान या शक्ति में नहीं।
3. बैन वही उन गुन गाइ औ कान वही उन बैन सों सानी।
हाथ वही उन गात सरे अँपाई वही जु उरि अनुजानी॥
जान वही उन आनन संग औ मान वही जु करै मनमानी।
याँ रसखान वही रसखान जु है रसखान सो रसखानी॥
भावार्थ: वही वाणी धन्य है जो कृष्ण के गुण गाए, वही कान धन्य हैं जो उनकी बातें सुनें।
वही हाथ सफल हैं जो उनके शरीर की सेवा करें, वही छाती सार्थक है जिसमें उनका प्रेम बसे।
वही जीवन सच्चा है जो उनके चेहरे से जुड़ा हो, और वही सम्मान योग्य है जो उनके प्रेम में मनमानी करे।
रसखान कहते हैं—जो कृष्ण-रस में डूब गया, वही सच्चा रसखान है।
👉 यहाँ कृष्ण-भक्ति को जीवन की सर्वोच्च सिद्धि बताया गया है।
4. या लकुटी अरु कामरिया पर राज तजौं पुर को तज डारूँ।
आठौं सिद्धि नवौं निधि के सुख नंद के गाइ चराइ बिसारूँ॥
रसखान कबौं इन आँखिन सों ब्रज के बन-बाग तड़ाग निहारूँ।
कोटिक है कलधौत के धाम करील के कुंजन ऊपर वारूँ॥
भावार्थ: कृष्ण की लाठी और कंबल के लिए, मैं राज-पाट और नगरों का वैभव त्याग दूँ।
आठ सिद्धियाँ और नौ निधियों के सुख छोड़कर, नंद बाबा की गायें चराना स्वीकार कर लूँ।
रसखान कहते हैं—काश! इन आँखों से ब्रज के वन, बाग और तालाब निहार सकूँ।
मैं सोने के करोड़ों महलों को ब्रज की काँटेदार कुंजों पर न्योछावर कर दूँ।
👉 यह पद बताता है कि ब्रज और कृष्ण का प्रेम हर सांसारिक वैभव से ऊपर है।
आठौं सिद्धि नवौं निधि के सुख नंद के गाइ चराइ बिसारूँ॥
रसखान कबौं इन आँखिन सों ब्रज के बन-बाग तड़ाग निहारूँ।
कोटिक है कलधौत के धाम करील के कुंजन ऊपर वारूँ॥
भावार्थ: कृष्ण की लाठी और कंबल के लिए, मैं राज-पाट और नगरों का वैभव त्याग दूँ।
आठ सिद्धियाँ और नौ निधियों के सुख छोड़कर, नंद बाबा की गायें चराना स्वीकार कर लूँ।
रसखान कहते हैं—काश! इन आँखों से ब्रज के वन, बाग और तालाब निहार सकूँ।
मैं सोने के करोड़ों महलों को ब्रज की काँटेदार कुंजों पर न्योछावर कर दूँ।
👉 यह पद बताता है कि ब्रज और कृष्ण का प्रेम हर सांसारिक वैभव से ऊपर है।