December 25, 2010

जुनून-ए-शौक़ अब भी कम नहीं है

जुनून-ए-शौक़ अब भी कम नहीं है|
मगर वो आज भी बर्हम नहीं है|

बहुत मुश्किल है दुनिया का सँवरना,
तेरी ज़ुल्फ़ों के पेच-ओ-ख़म नहीं है|

बहुत कुछ और भी है जहाँ में,
ये दुनिया महज़ ग़म ही ग़म नहीं है|

मेरी बर्बादियों के हम्नशिनों,
तुम्हें क्या ख़ुद मुझे भी ग़म नहीं है|

अभी बज़्म-ए-तरब से क्या उठूँ मैं,
अभी तो आँख भी पुर्नम नहीं है|

'मज़ाज़' एक बादाकश तो है यक़ीनन,
जो हम सुनते थे वो आलम नहीं है|

---मजाज़ लखनवी

शहर की रात और मैं, नाशाद-ओ-नाकारा फिरूँ

शहर की रात और मैं, नाशाद-ओ-नाकारा फिरूँ
जगमगाती जागती, सड़कों पे आवारा फिरूँ
ग़ैर की बस्ती है, कब तक दर-ब-दर मारा फिरूँ
ऐ ग़म-ए-दिल क्या करूँ, ऐ वहशत-ए-दिल क्या करूँ

झिलमिलाते कुमकुमों की, राह में ज़ंजीर सी
रात के हाथों में, दिन की मोहिनी तस्वीर सी
मेरे सीने पर मगर, चलती हुई शमशीर सी
ऐ ग़म-ए-दिल क्या करूँ, ऐ वहशत-ए-दिल क्या करूँ

ये रुपहली छाँव, ये आकाश पर तारों का जाल
जैसे सूफ़ी का तसव्वुर, जैसे आशिक़ का ख़याल
आह लेकिन कौन समझे, कौन जाने जी का हाल
ऐ ग़म-ए-दिल क्या करूँ, ऐ वहशत-ए-दिल क्या करूँ

फिर वो टूटा एक सितारा, फिर वो छूटी फुलझड़ी
जाने किसकी गोद में, आई ये मोती की लड़ी
हूक सी सीने में उठी, चोट सी दिल पर पड़ी
ऐ ग़म-ए-दिल क्या करूँ, ऐ वहशत-ए-दिल क्या करूँ

रात हँस – हँस कर ये कहती है, कि मयखाने में चल
फिर किसी शहनाज़-ए-लालारुख के, काशाने में चल
ये नहीं मुमकिन तो फिर, ऐ दोस्त वीराने में चल
ऐ ग़म-ए-दिल क्या करूँ, ऐ वहशत-ए-दिल क्या करूँ

हर तरफ़ बिखरी हुई, रंगीनियाँ रानाइयाँ
हर क़दम पर इशरतें, लेती हुई अंगड़ाइयां
बढ़ रही हैं गोद फैलाये हुये रुस्वाइयाँ
ऐ ग़म-ए-दिल क्या करूँ, ऐ वहशत-ए-दिल क्या करूँ

रास्ते में रुक के दम लूँ, ये मेरी आदत नहीं
लौट कर वापस चला जाऊँ, मेरी फ़ितरत नहीं
और कोई हमनवा मिल जाये, ये क़िस्मत नहीं
ऐ ग़म-ए-दिल क्या करूँ, ऐ वहशत-ए-दिल क्या करूँ

मुंतज़िर है एक, तूफ़ान-ए-बला मेरे लिये
अब भी जाने कितने, दरवाज़े है वहां मेरे लिये
पर मुसीबत है मेरा, अहद-ए-वफ़ा मेरे लिए
ऐ ग़म-ए-दिल क्या करूँ, ऐ वहशत-ए-दिल क्या करूँ

जी में आता है कि अब, अहद-ए-वफ़ा भी तोड़ दूँ
उनको पा सकता हूँ मैं ये, आसरा भी छोड़ दूँ
हाँ मुनासिब है ये, ज़ंजीर-ए-हवा भी तोड़ दूँ
ऐ ग़म-ए-दिल क्या करूँ, ऐ वहशत-ए-दिल क्या करूँ

एक महल की आड़ से, निकला वो पीला माहताब
जैसे मुल्ला का अमामा, जैसे बनिये की किताब
जैसे मुफलिस की जवानी, जैसे बेवा का शबाब
ऐ ग़म-ए-दिल क्या करूँ, ऐ वहशत-ए-दिल क्या करूँ

दिल में एक शोला भड़क उठा है, आख़िर क्या करूँ
मेरा पैमाना छलक उठा है, आख़िर क्या करूँ
ज़ख्म सीने का महक उठा है, आख़िर क्या करूँ
ऐ ग़म-ए-दिल क्या करूँ, ऐ वहशत-ए-दिल क्या करूँ

मुफ़लिसी और ये मज़ाहिर, हैं नज़र के सामने
सैकड़ों चंगेज़-ओ-नादिर, हैं नज़र के सामने
सैकड़ों सुल्तान-ओ-ज़बर, हैं नज़र के सामने
ऐ ग़म-ए-दिल क्या करूँ, ऐ वहशत-ए-दिल क्या करूँ

ले के एक चंगेज़ के, हाथों से खंज़र तोड़ दूँ
ताज पर उसके दमकता, है जो पत्थर तोड़ दूँ
कोई तोड़े या न तोड़े, मैं ही बढ़कर तोड़ दूँ
ऐ ग़म-ए-दिल क्या करूँ, ऐ वहशत-ए-दिल क्या करूँ

बढ़ के इस इंदर-सभा का, साज़-ओ-सामाँ फूँक दूँ
इस का गुलशन फूँक दूँ, उस का शबिस्ताँ फूँक दूँ
तख्त-ए-सुल्ताँ क्या, मैं सारा क़स्र-ए-सुल्ताँ फूँक दूँ
ऐ ग़म-ए-दिल क्या करूँ, ऐ वहशत-ए-दिल क्या करूँ

जी में आता है, ये मुर्दा चाँद-तारे नोंच लूँ
इस किनारे नोंच लूँ, और उस किनारे नोंच लूँ
एक दो का ज़िक्र क्या, सारे के सारे नोंच लूँ
ऐ ग़म-ए-दिल क्या करूँ, ऐ वहशत-ए-दिल क्या करूँ

---मजाज़ लखनवी

December 15, 2010

Be Nobody’s Darling

Be nobody’s darling;

Be an outcast.

Take the contradictions

Of your life

And wrap around

You like a shawl,

To parry stones

To keep you warm.

Watch the people succumb

To madness

With ample cheer;

Let them look askance at you

And you askance reply.

Be an outcast;

Be pleased to walk alone

(Uncool)

Or line the crowded

River beds

With other impetuous

Fools.

Make a merry gathering

On the bank

Where thousands perished

For brave hurt words

They said.

But be nobody’s darling;

Be an outcast.

Qualified to live

Among your dead.

--- Dedicated to Julian Assange, Co-founder of Wikileaks From Revolutionary Petunias and Other Poems, Harcourt Brace Jovanovich 1986 by Alice Walker.

December 4, 2010

The Bridge Poem

I’ve had enough
I’m sick of seeing and touching
Both sides of things
Sick of being the damn bridge for everybody
Nobody
Can talk to anybody
Without me
Right?

I explain my mother to my father
my father to my little sister
My little sister to my brother
my brother to the white feminists
The white feminists to the Black church folks
the Black church folks to the ex-hippies
the ex-hippies to the Black separatists
the Black separatists to the artists
the artists to my friends’ parents…

Then
I’ve got to explain myself
To everybody

I do more translating
Than the Gawdamn U.N.

Forget it
I’m sick of it.

I’m sick of filling in your gaps

Sick of being your insurance against
the isolation of your self-imposed limitations

Sick of being the crazy at your holiday dinners

Sick of being the odd one at your Sunday Brunches

Sick of being the sole Black friend to 34 individual white people

Find another connection to the rest of the world
Find something else to make you legitimate
Find some other way to be political and hip

I will not be the bridge to your womanhood
Your manhood
Your humanness

I’m sick of reminding you not to
Close off too tight for too long

I’m sick of mediating with your worst self
On behalf of your better selves

I am sick
Of having to remind you
To breathe
Before you suffocate
Your own fool self

Forget it
Stretch or drown
Evolve or die

The bridge I must be
Is the bridge to my own power
I must translate
My own fears
Mediate
My own weaknesses

I must be the bridge to nowhere
But my true self
And then
I will be useful

---by Donna Kate Rushin

From This Bridge Called My Back: Writings by Radical Women of Color by Cherrie Moraga & Gloria Anzaldua, New York: Kitchen Table Press, 1983.

Popular Posts

Total Pageviews