Oct 9, 2026

"गीतावचनामृतान" अर्थात् श्रीमद्भगवद्गीता के अमृतमय श्लोक और हिन्दी अर्थ


1. त्वमादिदेवः पुरुषः पुराणः। त्वमस्य विश्वस्य परं निदानम्।
    वेत्तासि वेद्यं च परं च धाम, त्वया तं विश्वमनन्तरूपं॥११॥

हिन्दी अर्थ:  हे भगवान! आप आदिदेव, पुरातन पुरुष हैं। यह सृष्टि आपसे ही उत्पन्न होती है। आप ही सबका जानने वाले और परम उद्देश्य हैं। आपसे ही यह विश्व अनंत रूप में व्याप्त है।

2.  यदा यदा हि धर्मस्य ग्लानिर्भवति भारत।  अभ्युत्थानमधर्मस्य तदात्मानं सृजाम्यहम्॥
     परित्राणाय साधूनां विनाशाय च दुष्कृताम्। धर्मसंस्थापनार्थाय संभवामि युगे युगे॥

हिन्दी अर्थ: हे अर्जुन! जब-जब धरती पर धर्म की कमी और अधर्म का उदय होता है, तब-तब मैं अपने आपको अवतरित करता हूं।  सदाचारियों की रक्षा, दुष्टों के विनाश और धर्म की पुनः स्थापना के लिए मैं हर युग में जन्म लेता हूं।

3. यद्यदाचरति श्रेष्ठस्तत्तदेवेतरो जनः। स यत् प्रमाणं कुरुते लोकस्तदनुवर्तते॥

हिन्दी अर्थ: जो श्रेष्ठ व्यक्ति जैसा आचरण करते हैं, अन्य लोग भी वैसा ही करते हैं; वे जो उदाहरण प्रस्तुत करते हैं, समस्त संसार उसका अनुसरण करता है।

4. सुखदुःखे समे कृत्वा, लाभालाभौ जयाजयौ।  ततो युद्धाय युज्यस्व नैवं पापमवाप्स्यसि॥ 

हिन्दी अर्थ:  सुख-दुख, लाभ-हानि और जय-पराजय को समान मानकर सिर्फ अपने कर्तव्य के लिए युद्ध कर, तब तू पाप का भागी नहीं होगा।

5. वासांसि जीर्णानि यथा विहाय, नवानि गृह्णाति नरोऽपराणि। 
तथा शरीराणि विहाय जीर्ण - न्यानि संयाति नवानि देही॥

हिन्दी अर्थ: जैसे मनुष्य पुराने वस्त्र उतारकर नए वस्त्र धारण करता है, वैसे ही आत्मा पुराने शरीर को त्यागकर नया शरीर धारण करती है।

6. नैनं छिन्दन्ति शस्त्राणि नैनं दहति पावकः।  न चैनं क्लेदयन्त्यापो न शोषयति मारुतः॥

हिन्दी अर्थ
: इस आत्मा को शस्त्र काट नहीं सकते, अग्नि जला नहीं सकती, जल गला नहीं सकता और वायु सुखा नहीं सकती।

7. कर्मण्येवाधिकारस्ते मा फलेषु कदाचन। मा कर्मफलहेतुर्भूः मा ते सङ्गोऽस्त्वकर्मणि॥१७॥

हिन्दी अर्थ: तेरा अधिकार केवल कर्म करने में है, उसके फल में कभी नहीं। कर्म का फल पाने की इच्छा न कर और अकर्म में भी तेरा आकर्षण न हो।

8.  चञ्चलं हि मन: कृष्ण! प्रमाथि बलवद्दृढम्। तस्याहं निग्रहं मन्ये वायोरिव सुदुष्करम्॥

हिन्दी अर्थ:  हे कृष्ण! यह मन अत्यंत चंचल, बलशाली और हठी है, इसे वश में करना वायु को वश में करने के समान कठिन है।

9. काम एष क्रोध एष रजोगुणसमुद्भव:।  महाशनो महापाप्मा विद्ध्येनमिह वैरिणम्॥

हिन्दी अर्थ:  यह काम (इच्छा) और क्रोध रजोगुण से उत्पन्न होते हैं। ये महान भक्षक और महान पाप हैं, इन्हें इसी जीवन में अपना शत्रु समझो।

10.  त्रिविधं नरकस्येदं द्वारं नाशनमात्मन:। काम: क्रोधस्तथा लोभस्तस्मात् एतत्त्रयं त्यजेत्॥

हिन्दी अर्थ: काम, क्रोध और लोभ — ये तीन नरक के द्वार हैं, जो आत्मा का नाश करते हैं। अत: व्यक्ति को इनका त्याग करना चाहिए।

11.  सर्वधर्मान् परित्यज्य मामेकं शरणं व्रज। अहं त्वां सर्वपापेभ्यो मोक्षयिष्यामि मा शुच:॥

हिन्दी अर्थ: सभी कर्तव्यों को छोड़ कर केवल मेरी (भगवान की) शरण में आ जाओ, मैं तुम्हें सभी पापों से मुक्त कर दूँगा, चिंता मत करो। 

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