3 जुलाई 2020

जागो प्यारे

उठो लाल अब आँखें खोलो,
पानी लायी हूँ मुंह धो लो।

बीती रात कमल दल फूले,
उसके ऊपर भँवरे झूले।

चिड़िया चहक उठी पेड़ों पे,
बहने लगी हवा अति सुंदर।

नभ में प्यारी लाली छाई,
धरती ने प्यारी छवि पाई।

भोर हुई सूरज उग आया,
जल में पड़ी सुनहरी छाया।

नन्ही नन्ही किरणें आई,
फूल खिले कलियाँ मुस्काई।

इतना सुंदर समय मत खोओ,
मेरे प्यारे अब मत सोओ।

---अयोध्या सिंह उपाध्याय ‘हरिऔध’

25 जून 2020

भरोसा रखना

वॉन गॉग हर खत में
अपने भाई थियो को लिखता था
मुझ पर भरोसा रखना
एक सदी से ज़्यादा हो गए हैं
दोनों भाईयों को इस धरती से कूच किए
लेकिन धरती के कोने कोने में हजारों कटे-अधकटे हाथ आज भी
किसी न किसी थियो को लिख रहे हैं
मुझ पर भरोसा रखना...

––-सुधांशु फिरदौस

17 जून 2020

The stench of sanity

There is something rotten - inside of
You, in your flesh, the stench of
Sanity. It breathes in your
Eyes, this thing…

Something decadent, in your
Flesh, decaying…

It will be too late – you will
Die of it!

This thing that sleeps with you
Night after night, like
An aging wanton woman,
Spent, but not quite spent –

And she waits for you to
Dump her, in some dark street
Corner… yet follows you,
Drunken whore!

There’s no getting away for you
You will die of it, this thing
That breathes…

Inside of you, in your flesh
The stench of sanity

 ---Deepti Naval

14 जून 2020

नौहा

रहने को सदा दहर में आता नहीं कोई
तुम जैसे गए ऐसे भी जाता नहीं कोई

डरता हूँ कहीं ख़ुश्क न हो जाए समुंदर
राख अपनी कभी आप बहाता नहीं कोई

इक बार तो ख़ुद मौत भी घबरा गई होगी
यूँ मौत को सीने से लगाता नहीं कोई

माना कि उजालों ने तुम्हें दाग़ दिए थे
बे-रात ढले शम्अ बुझाता नहीं कोई

साक़ी से गिला था तुम्हें मय-ख़ाने से शिकवा
अब ज़हर से भी प्यास बुझाता नहीं कोई

हर सुब्ह हिला देता था ज़ंजीर ज़माना
क्यूँ आज दिवाने को जगाता नहीं कोई

अर्थी तो उठा लेते हैं सब अश्क बहा के
नाज़-ए-दिल-ए-बेताब उठाता नहीं कोई

--- कैफ़ी आज़मी

Confronting Brahminical complacency

This movement has no short cuts,
It’s a caravan that sets its own course
as if following a law of nature.
Once, there was a deep chasm in this path
it would leave you stunned, just to imagine
how many sacrifices it took to fill it up;
We, the oppressed,
have the highest kind of love for these sacrifices.
We,
crores of people, know
from every lived moment
How to endure
To cower
To live
To fight
To die, quietly,
To raise our fists and wave them in the air, sometimes,
To cherish life.
All these filled, layer by layer,
the deep foundations of our path -
At some spots, blossoming like a flower
at others, dissolving into lava.
The histories of each word in the texts
recounting these experiences
are as deep as our sighs -
Does this text need any ‘introduction’?
I don’t think so.
But what I don’t understand is
this one thing -
In the name of ‘solidarity’
Will you do just anything you like?
Using the parachute of your social privileges
Will you land and install yourself ahead of this caravan too?
And tell us
How to walk?
How to think?
At a time when our agitating people, across the nation,
are using words as flaming sparks
to challenge the darkness your vile community has spread -
You want to tell us
How these sparks should blaze?
Don’t jump on our heads in the name of solidarity!
Interrogate your own oppressor community first,
put yourself in our shoes, walk with us
in our pain, in our sighs, quietly suffer with us
look at the mirror each time!
After all, solidarity demands certain ethics!

As for Gandhi This movement has surged far ahead of him
Please update yourself!

~ Gurinder Azad
Translated from Hindi by Akshay Pathak and Naren Bedide

13 जून 2020

प्रेमपत्र

प्रेत आएगा
किताब से निकाल ले जायेगा प्रेमपत्र
गिद्ध उसे पहाड़ पर नोच-नोच खायेगा

चोर आयेगा तो प्रेमपत्र ही चुरायेगा
जुआरी प्रेमपत्र ही दाँव लगाएगा
ऋषि आयेंगे तो दान में माँगेंगे प्रेमपत्र

बारिश आयेगी तो प्रेमपत्र ही गलाएगी
आग आयेगी तो जलाएगी प्रेमपत्र
बंदिशें प्रेमपत्र पर ही लगाई जाएँगी

साँप आएगा तो डसेगा प्रेमपत्र
झींगुर आयेंगे तो चाटेंगे प्रेमपत्र
कीड़े प्रेमपत्र ही काटेंगे

प्रलय के दिनों में सप्तर्षि मछली और मनु
सब वेद बचायेंगे
कोई नहीं बचायेगा प्रेमपत्र

कोई रोम बचायेगा कोई मदीना
कोई चाँदी बचायेगा कोई सोना

मै निपट अकेला कैसे बचाऊँगा तुम्हारा प्रेमपत्र

--- बद्रीनारायण

5 जून 2020

फ़र्क़ और फ़र्क़

क्या फ़र्क़ है बूढ़े और बालक में?
 फ़र्क़ ही फ़र्क़ है,
 यह भी कोई प्रश्न है!

बूढ़ा उठता भी है तो गिरते-२
बालक गिरता भी है तो उठते-२
एक में जिस जगह भविष्य का समापन है
दूसरे में उसी जगह शुभागमन।

 ---श्रीकान्त जोशी