January 30, 2010

My ancestors

You said
The Shudra is born from the feet of Brahma
And the Brahmin from his head
And they did not ask you
Where was Brahma born from?

You said
Service is the duty of the Shudra
They did not ask
What will you give for it?

You were happy
You now had slaves
They were happy too
Happy for you
They had put all their power
In your hands.

The body unclothed
The stomach unfed
Hurt, and yet
They smiled
For they saw you smiled.

They did not know
How to loot
The weak and the innocent!

Did not know
That murder
Is the badge of courage
That robbery is not a crime
It is but culture.

How innocent they were
My ancestors
Humane
Yet untouchable

- By Dalit poet and fiction writer, Omprakash Valmiki ; Translated from the Hindi by Pratik Kanjilal. [Source]

What would you do?

If you
Are thrown out of your village
Cannot draw water from the well
Are abused
In the screaming, echoing afternoon
Told to break stones
In place of real work
Are given leavings to eat
What would you do?


If you
Are told to drag away
Animal carcasses
And
Carry away the filth
Of a whole family
Given hand-me-downs to wear
What would you do?


If you
Are kept far from books
Far from the threshold
Of the temple of learning
If you are hung up like Jesus
On a blackened wall
In the light of an oil-lamp
What would you do?


If you
Have to live
In a hut of mud and straw
Which can be flattened by a breath
Or swept away in a night of rain
If you are told to sleep
In knee-deep water
What would you do?


If you
Have to swim against the current
To open the doors of pain
And do battle with hunger
Send your newlywed women
To the landlord’s mansion
On the first night
What would you do?


If you
Are denied in your own land
Made slave labour
Stripped of your rights
Your civilisation burned away
The pages of your glorious history
Torn to shreds
And thrown away
What would you do?


If you
Cannot vote
Are beaten bloody
Beaten in the name of democracy
And at every step reminded of
How insignificant your race is
If your life stinks
If your hands are raw
And yet they tell you
Dig canals, dig drains
What would you do?


If you
Are insulted in public
Your property is snatched away
In the name of religion
Your women told
To become devdasis
And made prostitutes
What would you do?


Your fair complexion
Would be burned black
Your eyes would be dry, dead
You could not write on paper
Satyam, Shivam, Sundaram.
Descendant of the gods, you
Would be lame, a cripple
If you had to live thus for ages
Like me
What would you do?

By Dalit poet and fiction writer, Omprakash Valmiki; Translated from the Hindi by Pratik Kanjilal. [Source]

January 21, 2010

भिक्षुक

वह आता--
दो टूक कलेजे के करता पछताता
पथ पर आता।

पेट पीठ दोनों मिलकर हैं एक,
चल रहा लकुटिया टेक,
मुट्ठी भर दाने को-- भूख मिटाने को
मुँह फटी पुरानी झोली का फैलाता--
दो टूक कलेजे के करता पछताता पथ पर आता।

साथ दो बच्चे भी हैं सदा हाथ फैलाये,
बायें से वे मलते हुए पेट को चलते,
और दाहिना दया दृष्टि-पाने की ओर बढ़ाये।
भूख से सूख ओठ जब जाते
दाता-भाग्य विधाता से क्या पाते?--
घूँट आँसुओं के पीकर रह जाते।
चाट रहे जूठी पत्तल वे सभी सड़क पर खड़े हुए,
और झपट लेने को उनसे कुत्ते भी हैं अड़े हुए!

- By Suryakant Tripathi Nirala

Longing for the south

If I had an eagle's wings
I would rise and fly with them
To our own shores, to our own climes,
To see Stamboul, to see Kukuš,
And to watch the sunrise: is it
Dismal there, as it is here?

If the sun still rises dimly,
If it meets me there as here,
I'll prepare for further travels,
I shall flee to other shores
Where the sunrise greets me brightly
And the sky is sewn with stars.

It is dark here, dark surrounds me,
Dark fog covers all the earth;
Here are frosts and snows and ashes,
Blizzards and harsh winds abound.
Fog everywhere, the earth is ice,
And in the breast are cold, dark thoughts.

No, I cannot stay here, no,
I cannot look upon these frosts.
Give me wings and I will don them;
I will fly to our own shores,
Go once more to our own places,
Go to Ohrid and to Struga.

There the sunrise warms the soul,
The sunset glows on wooded heights;
There are gifts in great profusion
Richly spread by nature's power.
Watch the clear lake stretching white
Or bluely darkened by the wind,
Look upon the plains or mountains:
Beauty's everywhere divine.

To pipe there to my heart's content!
Ah! let the sun set, let me die.

From "Longing for the south" by Konstantin Miladinov’s;(english translation by Graham W. Reid))

ArdhSatya

चक्रव्यूह मैं घुसने से पहले,
कौन था मैं और कैसा था,
यह मुझे याद ही न रहेगा.
चक्रव्यूह मैं घुसने के बाद,
मेरे और चक्रव्यूह के बीच,
सिर्फ एक जानलेवा निकट’ता थी,
इसका मुझे पता ही न चलेगा.
चक्रव्यूह से निकलने के बाद,
मैं मुक्त हूँ जाऊं भले ही,
फिर भी चक्रव्यूह की रचना मैं
फर्क ही न पड़ेगा.
मरुँ या मारून,
मारा जाऊं या जान से मार्डून.
इसका फैसला कभी न हूँ पायेगा.
सोया हुआ आदमी जब
नींद से उठकर चलना शुरू करता है,
तब सपनों का संसार उसे,
दोबारा दिख ही न पायेगा.
उस रौशनी मैं जो निर्णय की रौशनी है
सब कुछ स’मान होगा क्या?
एक पलड़े मैं नपुंसकता,
एक पलड़े मैं पौरुष,
और ठीक तराजू के कांटे पर
अर्ध सत्य।


Ardh Satya (Half Truth) is a 1983 film directed by Govind Nihalani. The English Translation of poem can be found on wikipedia.

January 17, 2010

Aadmi Nama

दुनिया मैं बादशाह है सो है वोह भी आदमी
और मुफलिस ओ गदा है सो है वोह भी आदमी
जार दर बे नवा है सो है वोह भी आदमी
नेमत जो खा रहा है सो है वोह भी आदमी
टुकड़े जो मांगता है सो है वोह भी आदमी

अब्दाल ओ कुतब ओ घुस ओ वाली आदमी हुई
मुनकर भी आदमी हुए और कुफ्र से भरे
क्या क्या करिश्मे कश्फ़ ओ करामत के किये
हद ता के अपने जोर ओ रियाज़त के जोर पे
खालिक से जा मिला है सो है वोह भी आदमी

फिर'औं ने किया था जो दावा खुदाई का
शाद्दाद भी बहिश्त बना कर हुआ खुदा
नमरूद भी खुदा ही कहाता था बार माला
यह बात है समझने की आगे कहूं मैं क्या
यां तक जो हूँ चूका है सो है वोह भी आदमी

यां आदमी ही नार है और आदमी ही नूर
यां आदमी ही पास है और आदमी ही दूर
कुल आदमी का हुस्न ओ काबा मिएँ है यान ज़हूर
शैतान भी आदमी है जो करता है मकर ओ जोर
और हादी, रहनुमा है सो है वोह भी आदमी

मस्जिद भी आदमी ने बने है यां मियां
बनते हैं आदमी ही इमाम और खुतबा ख्वान
पढ़ते हैं आदमी ही नमाज़ और कुरान यां
और आदमी ही उन की चुराते हैं जूतियाँ
उनको जो ताड़ता है सो है वोह भी आदमी

यां आदमी पे जान को वारे है आदमी
और आदमी ही तेग से मारे है आदमी
पगड़ी भी आदमी की उतारे है आदमी
चिल्ला के आदमी को पुकारे है आदमी
और सुन के दौड़ता है सो है वोह भी आदमी!

Here is an excerpt from "Aadmi Nama" ; Rediscovering Nazir Akbarabadi through Agra Bazaar.

सबसे ख़तरनाक होता है हमारे सपनों का मर जाना......

मेहनत की लूट सबसे ख़तरनाक नहीं होती
पुलिस की मार सबसे ख़तरनाक नहीं होती
ग़द्दारी और लोभ की मुट्ठी सबसे ख़तरनाक नहीं होती
बैठे-बिठाए पकड़े जाना बुरा तो है
सहमी-सी चुप में जकड़े जाना बुरा तो है
सबसे ख़तरनाक नहीं होता
कपट के शोर में सही होते हुए भी दब जाना बुरा तो है
जुगनुओं की लौ में पढ़ना
मुट्ठियां भींचकर बस वक्‍़त निकाल लेना बुरा तो है
सबसे ख़तरनाक नहीं होता

सबसे ख़तरनाक होता है मुर्दा शांति से भर जाना
तड़प का न होना
सब कुछ सहन कर जाना
घर से निकलना काम पर
और काम से लौटकर घर आना
" सबसे ख़तरनाक होता है
हमारे सपनों का मर जाना "

सबसे ख़तरनाक वो घड़ी होती है
आपकी कलाई पर चलती हुई भी जो
आपकी नज़र में रुकी होती है

सबसे ख़तरनाक वो आंख होती है
जिसकी नज़र दुनिया को मोहब्‍बत से चूमना भूल जाती है
और जो एक घटिया दोहराव के क्रम में खो जाती है

सबसे ख़तरनाक वो गीत होता है
जो मरसिए की तरह पढ़ा जाता है
आतंकित लोगों के दरवाज़ों पर
गुंडों की तरह अकड़ता है

सबसे ख़तरनाक वो चांद होता है
जो हर हत्‍याकांड के बाद
वीरान हुए आंगन में चढ़ता है
लेकिन आपकी आंखों में
मिर्चों की तरह नहीं पड़ता

सबसे ख़तरनाक वो दिशा होती है
जिसमें आत्‍मा का सूरज डूब जाए
और जिसकी मुर्दा धूप का कोई टुकड़ा
आपके जिस्‍म के पूरब में चुभ जाए

मेहनत की लूट सबसे ख़तरनाक नहीं होती
पुलिस की मार सबसे ख़तरनाक नहीं होती
ग़द्दारी और लोभ की मुट्ठी सबसे ख़तरनाक नहीं होती ।

-पाश

One can't fathom the experiences of a poet , who wrote the following lines. Adapted from Yaatri's Blog.

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