November 14, 2017

'Wild Child'

'They caught all the wild children,
and put them in zoos,
They made them do sums
and wear sensible shoes.
They put them to bed
at the wrong time of day,
And made them sit still
when they wanted to play.
They scrubbed them with soap
and they made them eat peas.
They made them behave and
say pardon and please.
They took all their wisdom
and wildness away.

That's why there are none
in the forests today.'

--- Jeanne Willis

November 9, 2017

रोटी और संसद

एक आदमी
रोटी बेलता है
एक आदमी रोटी खाता है
एक तीसरा आदमी भी है
जो न रोटी बेलता है, न रोटी खाता है
वह सिर्फ रोटी से खेलता है
मैं पूछता हूँ -
'यह तीसरा आदमी कौन है ?'
मेरे देश की संसद मौन है l


October 8, 2017

जूठे पत्ते

क्या देखा है तुमने नर को, नर के आगे हाथ पसारे?

क्या देखे हैं तुमने उसकी, आँखों में खारे फव्वारे?

देखे हैं? फिर भी कहते हो कि तुम नहीं हो विप्लवकारी?

तब तो तुम पत्थर हो, या महाभयंकर अत्याचारी।

लपक चाटतै जूठे पत्ते, जिस दिन मैंने देखा नर को,

उस दिन सोचा क्यों न लगा दूँ, आज आग इस दुनिया भर को,

यह भी सोचा क्यों न टेंटुआ, घोटा जाय स्वयं जगपति का,

जिसने अपने ही स्वरूप को, रूप दिया इस घृणित विकृति का,

जगपति कहाँ? अरे, सदियों से, वह तो हुआ राख की ढेरी।

वरना समता संस्थापन, में लग जाती क्या इतनी देरी।

छोड़ आसरा अलख शक्ति का, रे नर, स्वयं जगपति तू है।

तू गर जूठे पत्ते चाटे, तो मुझ पर लानत हे, थू है।

कैसा बना रूप यह तेरा, घृणित, दलित, वीभत्स भयंकर,

नहीं याद क्या मुझको, तू है चिर सुन्दर, नवीन, प्रलयंकर,

भिक्षा-पात्र फक हाथों से, तरे स्नायु बड़े बलशाली,

अभी उठेगा प्रलय नींद से, जरा बजा तू अपनी ताली,

औ भिखमंगे, अरे पतित तू, मजलूम, अरे चिरदोहित।

तू अखंड भण्डार शक्ति का, जाग अरे निद्रा संमोहित।

प्राणों को तड़पाने वाली, हुँक्कारों से जल-थल भर दे,

अनाचार के अम्बारों में, अपना ज्वलित फलीता धर दे।

भूखा देख मुझे गर उमड़ें, आँसू नयनों में जग-जन के,

तो तू कह दे नहीं चाहिये, हमको रोने वाले जनखे,

तेरी भूख, जिहालत तेरी, यदि न उभाड़ सके क्रोधानल-

तो फिर समझूँगा कि हो गई, सारी दुनिया कायर, निर्बल,

---पंडित बालकृष्ण शर्मा “नवीन”

September 30, 2017

जो पुल बनाएंगे

जो पुल बनाएंगे
वे अनिवार्यत:
पीछे रह जाएंगे।
सेनाएँ हो जाएंगी पार
मारे जाएंगे रावण
जयी होंगे राम,
जो निर्माता रहे
इतिहास में
बन्दर कहलाएंगे


September 29, 2017


No monument stands over Babi Yar.
A steep cliff only, like the rudest headstone.
I am afraid.
Today, I am as old
As the entire Jewish race itself.

I see myself an ancient Israelite.
I wander o’er the roads of ancient Egypt
And here, upon the cross, I perish, tortured
And even now, I bear the marks of nails.

It seems to me that Dreyfus is myself. *1*
The Philistines betrayed me – and now judge.
I’m in a cage. Surrounded and trapped,
I’m persecuted, spat on, slandered, and
The dainty dollies in their Brussels frills
Squeal, as they stab umbrellas at my face.

I see myself a boy in Belostok *2*
Blood spills, and runs upon the floors,
The chiefs of bar and pub rage unimpeded
And reek of vodka and of onion, half and half.

I’m thrown back by a boot, I have no strength left,
In vain I beg the rabble of pogrom,
To jeers of “Kill the Jews, and save our Russia!”
My mother’s being beaten by a clerk.

O, Russia of my heart, I know that you
Are international, by inner nature.
But often those whose hands are steeped in filth
Abused your purest name, in name of hatred.

I know the kindness of my native land.
How vile, that without the slightest quiver
The antisemites have proclaimed themselves
The “Union of the Russian People!”

It seems to me that I am Anna Frank,
Transparent, as the thinnest branch in April,
And I’m in love, and have no need of phrases,
But only that we gaze into each other’s eyes.
How little one can see, or even sense!
Leaves are forbidden, so is sky,
But much is still allowed – very gently
In darkened rooms each other to embrace.

-“They come!”

-“No, fear not – those are sounds
Of spring itself. She’s coming soon.
Quickly, your lips!”

-“They break the door!”

-“No, river ice is breaking…”

Wild grasses rustle over Babi Yar,
The trees look sternly, as if passing judgement.
Here, silently, all screams, and, hat in hand,
I feel my hair changing shade to gray.

And I myself, like one long soundless scream
Above the thousands of thousands interred,
I’m every old man executed here,
As I am every child murdered here.

No fiber of my body will forget this.
May “Internationale” thunder and ring *3*
When, for all time, is buried and forgotten
The last of antisemites on this earth.

There is no Jewish blood that’s blood of mine,
But, hated with a passion that’s corrosive
Am I by antisemites like a Jew.
And that is why I call myself a Russian!

--- Yevgeny Yevtushenko
Translated by Benjamin Okopnik


—–1 – Alfred Dreyfus was a French officer, unfairly dismissed from service in 1894 due to trumped-up charges prompted by anti- Semitism.

2 – Belostok: the site of the first and most violent pogroms, the Russian version of KristallNacht.

3 – “Internationale”: The Soviet national anthem.

September 20, 2017

The Development Set

‘Excuse me, friends, I must catch my jet
I’m off to join the Development Set;
My bags are packed, and I’ve had all my shots
I have traveller’s checks and pills for the trots!

The Development Set is bright and noble
Our thoughts are deep and our vision global;
Although we move with the better classes
Our thoughts are always with the masses.

In Sheraton Hotels in scattered nations
We damn multi-national corporations;
injustice seems easy to protest
In such seething hotbeds of social rest.

We discuss malnutrition over steaks
And plan hunger talks during coffee breaks.
Whether Asian floods or African drought,
We face each issue with open mouth.

We bring in consultants whose circumlocution
Raises difficulties for every solution –
Thus guaranteeing continued good eating
By showing the need for another meeting.

The language of the Development Set
Stretches the English alphabet;
We use swell words like “epigenetic”
“Micro”, “macro”, and “logarithmetic”

It pleasures us to be esoteric –
It’s so intellectually atmospheric!
And although establishments may be unmoved,
Our vocabularies are much improved.

When the talk gets deep and you’re feeling numb,
You can keep your shame to a minimum:
To show that you, too, are intelligent
Smugly ask, “Is it really development?”

Or say, “That’s fine in practice, but don’t you see:
It doesn’t work out in theory!”
A few may find this incomprehensible,
But most will admire you as deep and sensible.

Development set homes are extremely chic,
Full of carvings, curios, and draped with batik.
Eye-level photographs subtly assure
That your host is at home with the great and the poor.

Enough of these verses – on with the mission!
Our task is as broad as the human condition!
Just pray god the biblical promise is true:
The poor ye shall always have with you.’

- Ross Coggins

September 5, 2017


अकवि क्या है:

वह, जो ताबूत और अस्थि-कलश की दलाली करता है?

एक जनरल, जो खुद के बारे में ही निश्चित नहीं है?

एक पादरी, जिसे किसी चीज पर आस्था नहीं है?

एक सैलानी, जिसके लिए हर चीज अजीब है; वृद्धावस्था और मृत्यु भी?

एक वक्ता, जिस पर आप विश्वास नहीं कर सकते?

खड़ी-चट्टान की कोर पर खड़ी एक नर्तकी ?

एक आत्ममुग्ध, जो हर किसी से प्यार करता है?

एक जोकर, जो गाल बजाता है

और बेवज़ह यूँ ही बुरा बनता है ?

एक कवि जो कुर्सी पर सोता है?

आधुनिक समय का एक कीमियागर?

एक आरामतलब क्रांतिकारी?

एक पेटी-बुर्जुआ?

एक जालसाज?

एक ईश्वर?

एक मासूम?

सैंटियागो, चिली का एक किसान?

सही उत्तर को रेखांकित करें.

अकविता क्या है:

चाय की प्याली में एक तूफ़ान?

चट्टान पर बर्फ का एक धब्बा?

मानव-मल से ऊपर तक भरा एक पतीला,

जैसा कि फादर साल्वेतियेरा मानता है?

एक आइना, जो झूठ नहीं बोलता?

लेखक-संगठन के अध्यक्ष के गाल पर पड़ा एक तमाचा?

(ईश्वर उनके आत्मा की रक्षा करे!)

युवा कवियों को एक चेतावनी?

जेट-चालित एक ताबूत?

एक ताबूत, जो वायुमंडलीय दायरे से बाहर परिक्रमा करता है?

एक ताबूत, जो कि केरोसिन से चलता है?

एक शवदाह-गृह, जहाँ कोई शव नहीं है?

सही उत्तर के सामने X चिन्हित करें.

---निकानोर पार्रा (उदय शंकर द्वारा अनुदित)

August 31, 2017

आओ, आज के दिन हम हो जाएं जला चेहरा

तुमने ठीक ही कहा
तुम बस्तर
और आदिवासी भारत का
जला हुआ चेहरा हो
पर यह चेहरा जुगनुओं की मानिंद
हत्यारों के स्याह चेहरों पर
टिमटिमा रहा है
सूरज की हजारों हजार किरणों की
गरमी और आभा लिए
अपने आंचल में सहेज रहा है देश
तुम्हारी गरमी तुम्हारा ऊर्जा
तुम अपने दीप्त खूबसूरत चेहरे के साथ
हमेशा उमड़ती रहोगी देश के ह्दय में
जब भी मुक्ति का प्रसंग आएगा
अणु अणु जुगनुओं सा मुस्कुराता तुम्हारा चेहरा
देश को बदल देगा एक पहाड़ में

- वंदना टेटे

August 15, 2017

संख्या के बच्चे

सच है ये शून्य हैं -
और तुम एक हो l
बड़े शक्तिशाली हो,
क्योंकि शून्य के पहले
उसके दुर्भाग्य-से खड़े हो l
अपनी आकांक्षा के क़ुतुब बने सांख्य !
मत भूलो -
तुम भी आंकड़े हो l

मत भूलो -
तुम केवल एक हो
शून्य ही दहाई हैं, शून्य ही असंख्य हैं l
शून्य नहीं धब्बे हैं,
आंसू की बूंदों-से,
लोहू के कतरों-से, शून्य ये सच्चे हैं l
संख्या के बच्चे हैं l

शून्यों से मुंह फेर खड़े होने वाले !
शून्य अगर हट जाएं
ठूठे की अंगुली से केवल रह जाओगे l
मत भूलो -
शून्य शक्ति है, शून्य प्रजा है l

---श्रीकांत वर्मा

August 9, 2017

हम जरूर जिएंगे ही, पठार की तरह निडर

पठारी क्षेत्र में तुमने
हमें (असुरों को) जन्म दिया
पर जिंदा रहने के लिए रास्ता नहीं बतलाया
पठारी क्षेत्र में तुमने
हमें (असुरों को) मजदूर बनाया
पर स्कूल जाने के लिए पैसा नहीं दिया
हमें आगे बढऩे के लिए रास्ता नहीं बतलाया

अब तो हमारे पास भाषा नहीं है
अब तो हमारे पास संस्कृति नहीं है
हम तुम्हें कैसे पुकारें
हम तुम्हें किस विधि से याद करें

हे धरती के पुरखो, हे आसमान के पुरखो
ओ हमारे माता-पिता, ओ सभी असुर बूढ़े-बूढिय़ो
तुम्हारे भोजन की जिम्मेवारी जंगल की थी
तुम्हारी मजूरी खेत की जिम्मेवारी थी
यहां से वहां तक फैला पठार ही तुम्हारी पाठशाला थी
पहाड़-झरने तुम्हें रास्ता बताते थे

हे धरती के पुरखो, हे आसमान के पुरखो
ओ हमारे माता-पिता, ओ सभी असुर बूढ़े-बूढिय़ो
तुम सब नहीं जानते थे कचिया-ढिबा (रुपया-पैसा)
तुम सब नहीं जानते थे परजीविता

हम तुम्हें दोष नहीं देते
हम तुम्हें अपनी असहायता के लिए
कोर्ट-कचहरी नहीं करते
पर जब कंपनी धम-धम आती है
पर जब सरकार दम-दम बेदम करती है
हम किसको गोहराएं
हम किस छाती में आसरा ढूंढे

हे धरती के पुरखो, हे आसमान के पुरखो
ओ हमारे माता-पिता, ओ सभी असुर बूढ़े-बूढिय़ो
हम सीखेंगे तुम्हारी तरह बोलना
हम सीखेंगे तुम्हारी तरह नाचना
हम करेंगे शिकार तुम्हारी तरह
उन सभी जानवरों का
जो असुरों के घर खोद रहे हैं
जो हमारे झरनों को फुसला-बहला रहे हैं
जिन्हें धरती और इंसान खाने की लत है
हम जरूर जिएंगे तुम्हारी तरह ही
पठार की तरह निश्चिंत-निश्छल
तुम्हारे रचे इस असुर दिसुम में

--- सुषमा असुर

August 5, 2017

यह 1857 की तोप

कम्पनी बाग़ के मुहाने पर
धर रखी गई है यह 1857 की तोप
इसकी होती है बड़ी सम्हाल
विरासत में मिले
कम्पनी बाग की तरह
साल में चमकायी जाती है दो बार
सुबह-शाम कम्पनी बाग में आते हैं बहुत से सैलानी
उन्हें बताती है यह तोप
कि मैं बड़ी जबर
उड़ा दिये थे मैंने
अच्छे-अच्छे सूरमाओं के छज्जे
अपने ज़माने में
अब तो बहरहाल
छोटे लड़कों की घुड़सवारी से अगर यह फारिग हो
तो उसके ऊपर बैठकर
चिड़ियाँ ही अकसर करती हैं गपशप
कभी-कभी शैतानी में वे इसके भीतर भी घुस जाती हैं
ख़ासकर गौरैयें
वे बताती हैं कि दरअसल कितनी भी बड़ी हो तोप
एक दिन तो होना ही है उनका मुँह बन्द !

---वीरेंद्र डंगवाल

July 29, 2017

Making Peace

A voice from the dark called out,
“The poets must give us
imagination of peace, to oust the intense, familiar
imagination of disaster. Peace, not only
the absence of war.”
But peace, like a poem,
is not there ahead of itself,
can’t be imagined before it is made,
can’t be known except
in the words of its making,
grammar of justice,
syntax of mutual aid.
A feeling towards it,
dimly sensing a rhythm, is all we have
until we begin to utter its metaphors,
learning them as we speak.
A line of peace might appear
if we restructured the sentence our lives are making,
revoked its reaffirmation of profit and power,
questioned our needs, allowed
long pauses. . . .
A cadence of peace might balance its weight
on that different fulcrum; peace, a presence,
an energy field more intense than war,
might pulse then,
stanza by stanza into the world,
each act of living
one of its words, each word
a vibration of light–facets
of the forming crystal.

--- Denise Levertov

May 1, 2017


हर किसी को नहीं आते
बेजान बारूद के कणों में
सोई आग के सपने नहीं आते
बदी के लिए उठी हुयी
हथेली को पसीने नहीं आते
शेल्फों में पड़े
इतिहास के ग्रंथो को सपने नहीं आते
सपनों के लिए लाज़मी है
झेलनेवाले दिलों का होना
नींद की नज़र होनी लाज़मी है
सपने इसलिए हर किसी को नहीं आते|

--- अवतार सिंह संधू "पाश"

April 21, 2017

उर्दू है मेरा नाम

उर्दू है मेरा नाम, मैं ख़ुसरो की पहेली
मैं मीर की हमराज़ हूं, ग़ालिब की सहेली

दक्‍कन के वली ने मुझे गोदी में खिलाया
सौदा के क़सीदों ने मेरा हुस्‍न बढ़ाया
है मीर की अज़्मत कि मुझे चलना सिखाया
मैं दाग़ के आंगन में खिली बन के चमेली

उर्दू है मेरा नाम, मैं ख़ुसरो की पहेली
मैं मीर की हमराज़ हूं, ग़ालिब की सहेली

ग़ालिब ने बुलंदी का सफ़र मुझको सिखाया
हाली ने मुरव्‍वत का सबक़ याद दिलाया
इक़बाल ने आईना-ए-हक़ मुझको दिखाया
मोमिन ने सजायी मेरे ख्‍़वाबों की हवेली

उर्दू है मेरा नाम, मैं ख़ुसरो की पहेली
मैं मीर की हमराज़ हूं, ग़ालिब की सहेली

है ज़ौक़ की अज़्मत कि दिये मुझको सहारे
चकबस्‍त की उल्‍फ़त ने मेरे ख्‍़वाब संवारे
फ़ानी ने सजाये मेरी पलकों पे सितारे
अकबर ने रचायी मेरी बेरंग हथेली

उर्दू है मेरा नाम, मैं ख़ुसरो की पहेली
मैं मीर की हमराज़ हूं, ग़ालिब की सहेली

क्‍यूं मुझको बनाते हो तआस्‍सुब का निशाना
मैंने तो कभी ख़ुद को मुसलमां नहीं माना
देखा था कभी मैंने भी ख़ुशियों का ज़माना
अपने ही वतन में हूं मगर आज अकेली

उर्दू है मेरा नाम, मैं ख़ुसरो की पहेली
मैं मीर की हमराज़ हूं, ग़ालिब की सहेली

✒ इक़बाल अशहर

February 28, 2017


We work too hard
We’re too tired
to fall in love.
Therefore we must
overthrow the government.

We work too hard
We’re too tired
to overthrow the government.
Therefore we must
fall in love.

Rod Smith

February 14, 2017

The Graveyard By The Sea

This quiet roof, where dove-sails saunter by,
Between the pines, the tombs, throbs visibly.
Impartial noon patterns the sea in flame --
That sea forever starting and re-starting.
When thought has had its hour, oh how rewarding
Are the long vistas of celestial calm!
What grace of light, what pure toil goes to form
The manifold diamond of the elusive foam!
What peace I feel begotten at that source!
When sunlight rests upon a profound sea,
Time's air is sparkling, dream is certainty --
Pure artifice both of an eternal Cause.

Sure treasure, simple shrine to intelligence,
Palpable calm, visible reticence,
Proud-lidded water, Eye wherein there wells
Under a film of fire such depth of sleep --
O silence! . . . Mansion in my soul, you slope
Of gold, roof of a myriad golden tiles.

Temple of time, within a brief sigh bounded,
To this rare height inured I climb, surrounded
By the horizons of a sea-girt eye.
And, like my supreme offering to the gods,
That peaceful coruscation only breeds
A loftier indifference on the sky.

Even as a fruit's absorbed in the enjoying,
Even as within the mouth its body dying
Changes into delight through dissolution,
So to my melted soul the heavens declare
All bounds transfigured into a boundless air,
And I breathe now my future's emanation.

Beautiful heaven, true heaven, look how I change!
After such arrogance, after so much strange
Idleness -- strange, yet full of potency --
I am all open to these shining spaces;
Over the homes of the dead my shadow passes,
Ghosting along -- a ghost subduing me.
My soul laid bare to your midsummer fire,
O just, impartial light whom I admire,

Whose arms are merciless, you have I stayed
And give back, pure, to your original place.
Look at yourself . . . But to give light implies
No less a somber moiety of shade.

Oh, for myself alone, mine, deep within
At the heart's quick, the poem's fount, between
The void and its pure issue, I beseech
The intimations of my secret power.
O bitter, dark, and echoing reservoir
Speaking of depths always beyond my reach.

But know you -- feigning prisoner of the boughs,
Gulf which cats up their slender prison-bars,
Secret which dazzles though mine eyes are closed --
What body drags me to its lingering end,
What mind draws it to this bone-peopled ground?
A star broods there on all that I have lost.

Closed, hallowed, full of insubstantial fire,
Morsel of earth to heaven's light given o'er --
This plot, ruled by its flambeaux, pleases me --
A place all gold, stone, and dark wood, where shudders
So much marble above so many shadows:
And on my tombs, asleep, the faithful sea.

Keep off the idolaters, bright watch-dog, while --
A solitary with the shepherd's smile --
I pasture long my sheep, my mysteries,
My snow-white flock of undisturbed graves!
Drive far away from here the careful doves,
The vain daydreams, the angels' questioning eyes!

Now present here, the future takes its time.
The brittle insect scrapes at the dry loam;
All is burnt up, used up, drawn up in air
To some ineffably rarefied solution . . .
Life is enlarged, drunk with annihilation,
And bitterness is sweet, and the spirit clear.

The dead lie easy, hidden in earth where they
Are warmed and have their mysteries burnt away.
Motionless noon, noon aloft in the blue
Broods on itself -- a self-sufficient theme.
O rounded dome and perfect diadem,

I am what's changing secretly in you.

I am the only medium for your fears.
My penitence, my doubts, my baulked desires --
These are the flaw within your diamond pride . . .
But in their heavy night, cumbered with marble,
Under the roots of trees a shadow people
Has slowly now come over to your side.
To an impervious nothingness they're thinned,
For the red clay has swallowed the white kind;
Into the flowers that gift of life has passed.
Where are the dead? -- their homely turns of speech,
The personal grace, the soul informing each?
Grubs thread their way where tears were once composed.

The bird-sharp cries of girls whom love is teasing,
The eyes, the teeth, the eyelids moistly closing,
The pretty breast that gambles with the flame,
The crimson blood shining when lips are yielded,
The last gift, and the fingers that would shield it --
All go to earth, go back into the game.

And you, great soul, is there yet hope in you
To find some dream without the lying hue
That gold or wave offers to fleshly eyes?
Will you be singing still when you're thin air?
All perishes. A thing of flesh and pore
Am I. Divine impatience also dies.

Lean immortality, all crêpe and gold,
Laurelled consoler frightening to behold,
Death is a womb, a mother's breast, you feign
The fine illusion, oh the pious trick!
Who does not know them, and is not made sick
That empty skull, that everlasting grin?

Ancestors deep down there, 0 derelict heads
Whom such a weight of spaded earth o'erspreads,
Who are the earth, in whom our steps are lost,
The real flesh-eater, worm unanswerable
Is not for you that sleep under the table:
Life is his meat, and I am still his host.

'Love,' shall we call him? 'Hatred of self,' maybe?
His secret tooth is so intimate with me
That any name would suit him well enough,
Enough that he can see, will, daydream, touch --
My flesh delights him, even upon my couch
I live but as a morsel of his life.

Zeno, Zeno, cruel philosopher Zeno,
Have you then pierced me with your feathered arrow
That hums and flies, yet does not fly! The sounding
Shaft gives me life, the arrow kills. Oh, sun! --
Oh, what a tortoise-shadow to outrun
My soul, Achilles' giant stride left standing!

No, no! Arise! The future years unfold.
Shatter, O body, meditation's mould!
And, O my breast, drink in the wind's reviving!
A freshness, exhalation of the sea,
Restores my soul . . . Salt-breathing potency!
Let's run at the waves and be hurled back to living!

Yes, mighty sea with such wild frenzies gifted
(The panther skin and the rent chlamys), sifted
All over with sun-images that glisten,
Creature supreme, drunk on your own blue flesh,
Who in a tumult like the deepest hush
Bite at your sequin-glittering tail -- yes, listen!

The wind is rising! . . . We must try to live!
The huge air opens and shuts my book: the wave
Dares to explode out of the rocks in reeking
Spray. Fly away, my sun-bewildered pages!
Break, waves! Break up with your rejoicing surges
This quiet roof where sails like doves were pecking.

---Paul Valery
-Translation by C. Day Lewis

January 26, 2017

बड़ी उलझन में पड़ जाता हूँ मेरे देश,

बड़ी उलझन में पड़ जाता हूँ मेरे देश,
देखता हूँ जब भी तुम्हें मुख़्तलिफ़ शक्लों,रंगों और नारों में!

तुम्हें ढोता हूँ अब अपने माथे पर
मेरे लहू और मेरी मौत के बीच:
तुम गुलाब हो या क़ब्रगाह?

तुम्हें देखता हूँ बच्चों की तरह
अपने पेट को घसीटते गुड़कते हुए
आज्ञाकारी,दण्डवत अपनी खुद की पहनाई हुई बेड़ियों में
हर चाबुक के लिए अलग चमड़ी पहनते हुए...
तुम गुलाब हो या क़ब्रगाह?

तुमने मेरी हत्या की
तुमने मेरे गीतों की हत्या की
तुम सिर्फ जनसंहार हो
या कोई क्रांति?

बड़ी उलझन में पड़ जाता हूँ मेरे देश जब भी
देखता हूँ तुम्हें मुख़्तलिफ़ शक्लों,रंगों और नारों में...

रूपांतर:‪#‎सुधांशु‬ फ़िरदौस

January 23, 2017

अंत में

अंत में
हमें पैदा नहीं होना था
हमें लड़ना नहीं था
हमें तो हेमकुंठ पर बैठ कर
भक्ति करनी थी
लेकिन जब सतलुज के पानी से भाप उठी
जब क़ाज़ी नज़रुल इस्लाम की जुबाान रुकी
जब लड़को के पास देखा 'जेम्स बांड'
तो मैं कह उठा, चल भाई संत संधू*
नीचे धरती पर चले
पापों का बोझ तो बढ़ता जाता हैं
और अब हम आएं है
यह लो हमारा ज़फरनामा
हमारे हिस्से की कटार हमें दे दो
हमारा पेट हाज़िर हैं……।
(संत संधू* =पाश के कवि मित्र )


January 3, 2017


Your unhappy and silly youth.
Your arrival from the provinces in the city.
Misted-over windowpanes of streetcars,
Restless misery of the crowd.
Your dread when you entered a place too expensive.
But everything was too expensive. Too high.
Those people must have noticed your crude manners,
Your outmoded clothes, and your awkwardness.

There were none who would stand by you and say,

You are a handsome boy,
You are strong and healthy,
Your misfortunes are imaginary.

You would not have envied a tenor in an overcoat of camel hair
Had you guessed his fear and known how he would die.

She, the red-haired, because of whom you suffer tortures,
So beautiful she seems to you, is a doll in fire.
You don’t understand what she screams with her lips of a clown.

The shapes of hats, the cut of robes, faces in the mirrors,
You will remember all that unclearly, as something from long ago,
Or as what remains from a dream.

The house you approach trembling,
The apartment that dazzles you—
Look, on this spot the cranes clear the rubble.

In your turn you will have, possess, secure,
Able to be proud at last, when there is no reason.

Your wishes will be fulfilled, you will gape then
At the essence of time, woven of smoke and mist,

An iridescent fabric of lives that last one day,
Which rises and falls like an unchanging sea.

Books you have read will be of use no more.
You searched for an answer but lived without answer.

You will walk in the streets of southern cities,
Restored to your beginnings, seeing again in rapture
The whiteness of a garden after the first night of snow.

--- Czeslaw Milosz

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