Apr 8, 2026

सुभाषितानि - 5 (Subhashitani -5)

1. सर्वस्य ही परीक्ष्यन्ते स्वभावो नेतरे गुणाः| अतीत्य हि गुणान् सर्वान् स्वभावो मूर्धनि वर्तते ||

अर्थ: संकट या कठिनाइयों के समय व्यक्ति का असली स्वभाव सामने आ जाता है जो उसके सभी गुणों से बढ़कर होता है।

2. विद्या विवादाय धनं मदाय, शक्तिः परेषाम् परिपीडनाय | खलस्य, साधोः विपरीतं एतत्; ज्ञानाय दानाय च रक्षणाय ||

विद्या (ज्ञान) दुष्ट लोगों के लिए विवाद के लिए होती है, धन (धन संपत्ति) घमंड के लिए होता है, और शक्ति दूसरों को पीड़ित करने के लिए होती है। परंतु सज्जन लोगों के लिए विद्या ज्ञान प्राप्ति के लिए, धन दान करने के लिए, और शक्ति दूसरों की रक्षा करने के लिए होती है।

3. न तेन वृद्धो भवति येनास्य पलितं शिरः | यो वै युवापि अधीयानस्तं देवाः स्थविरं विदुः ||

अर्थ: यह है कि केवल उम्र बढ़ने से या बाल सफेद होने से कोई व्यक्ति बड़ा या बुद्धिमान नहीं माना जाता। असली बढ़ेपन का पैमाना ज्ञान और बुद्धिमत्ता है। जो युवा होते हुए भी सीखते हैं, ज्ञान अर्जित करते हैं, वही सच्चे वृद्ध और सम्मानित माने जाते हैं।

4.  काक: कृष्ण: पिक: अपि कृष्ण: को भेद: काकपिकयो: | वसंत काले सम्प्राप्ते काक: काक: पिक: पिक: ||

अर्थ: कौआ और कोयल दोनों काले रंग के होते हैं और देखने में समान लगते हैं, लेकिन जब वसंत ऋतु आ जाती है तो उनकी असली पहचान उनके स्वर से हो जाती है। कौआ अपनी कर्कश आवाज करता है जबकि कोयल मधुर गीत गाती है।

5. शैले शैले न माणिक्यम् मौक्तिकम् न गजे गजे। साधवो न हि सर्वत्र चन्दनम् न वने वने।।

अर्थ: हर पर्वत पर हीरा (माणिक्य) नहीं मिलता, हर हाथी के मस्तक में मोती (मौक्तिक) नहीं होता। सभी जगह सज्जन लोग (साधु) नहीं मिलते और हर वन में चंदन वृक्ष भी नहीं होते। ये चीजें दुर्लभ और मूल्यवान होती हैं।

6. मूर्खो अपि शोभते तावत् सभायां वस्त्रवेष्टित: । तावत् शोभते मूर्खो यावत् किंचित् न भाषते ॥

अर्थ: मूर्ख व्यक्ति भी अच्छे वस्त्र पहनकर सभा में तब तक शोभित होता है (अच्छा लगता है), जब तक वह कुछ नहीं बोलता। मूर्ख उसी समय तक शोभा पाता है, जब तक वह चुप रहता है.

7. यत्तदग्रे विषमिव परिणामे अमृतोपमम्, तत्सुखम् सात्त्विकं प्रोक्तम् आत्मबुद्धि प्रसादजम् | 
विषयेंद्रिय संयोगात् यत्तदग्रे अमृतोपमम्, परिणामे विषमिव तत्सुखं राजसं स्मृतम् ||

अर्थ:  जिस सुख का प्रारंभ विष (जहर) जैसा कष्टदायक होता है, पर परिणाम अमृत के समान सुखद होता है, वही सात्त्विक सुख कहलाता है। यह सुख आत्मबुद्धि के प्रसाद से उत्पन्न होता है। जो सुख विषय (इंद्रिय) के संयोजन से उत्पन्न होता है, उसका प्रारंभ तो अमृत के समान सुखद होता है, लेकिन परिणाम विष (जहर) के समान कष्टदायक होता है, उसे राजसिक सुख कहा गया है।

Apr 4, 2026

अभी साज़-ए-दिल में तराने बहुत हैं

अभी साज़-ए-दिल में तराने बहुत हैं
अभी ज़िंदगी के बहाने बहुत हैं

ये दुनिया हक़ीक़त की क़ाइल नहीं है
फ़साने सुनाओ फ़साने बहुत हैं

तिरे दर के बाहर भी दुनिया पड़ी है
कहीं जा रहेंगे ठिकाने बहुत हैं

मिरा इक नशेमन जला भी तो क्या है
चमन में अभी आशियाने बहुत हैं

नए गीत पैदा हुए हैं उन्हीं से
जो पुर-सोज़ नग़्मे पुराने बहुत हैं

दर-ए-ग़ैर पर भीक माँगो न फ़न की
जब अपने ही घर में ख़ज़ाने बहुत हैं

हैं दिन बद-मज़ाक़ी के 'नौशाद' लेकिन
अभी तेरे फ़न के दिवाने बहुत हैं