26 अगस्त 2021

I Am Syrian

I am a Syrian. Exiled,
in and out of my homeland,
and
on knife blades with swollen feet I walk.
I am a Syrian: Shiite, Druze, Kurd,
Christian, and I am Alawite, Sunni, and Circassian.

Syria is my land.
Syria is my identity. My sect is the scent of my homeland,
the soil after the rain,
and my Syria is my only religion.
I am a son of this land, like the olives
apples pomegranates chicory cacti mint grapes figs ...
So what use are your thrones,
your Arabism,
your poems,
and your elegies?
Will your words bring back my home
and those who were killed accidentally?
Will they erase tears shed on this soil?
 
I am a son of that green paradise,
my hometown,
but today,
I am dying from hunger and thirst.
Barren tents in Lebanon and Amman are now my refuge,
but no land except my homeland
will nourish me with its grains,
nor will all the cloudsin this universe quench my thirst.

---Youssef Abu Yihea, Translated by Ghada Alatrash

20 अगस्त 2021

हम को मिटा सके ये ज़माने में दम नहीं

हम को मिटा सके ये ज़माने में दम नहीं
हम से ज़माना ख़ुद है ज़माने से हम नहीं

बे-फ़ाएदा अलम नहीं बे-कार ग़म नहीं
तौफ़ीक़ दे ख़ुदा तो ये नेमत भी कम नहीं

मेरी ज़बाँ पे शिकवा-ए-अहल-ए-सितम नहीं
मुझ को जगा दिया यही एहसान कम नहीं

या रब हुजूम-ए-दर्द को दे और वुसअ'तें
दामन तो क्या अभी मिरी आँखें भी नम नहीं

शिकवा तो एक छेड़ है लेकिन हक़ीक़तन
तेरा सितम भी तेरी इनायत से कम नहीं

अब इश्क़ उस मक़ाम पे है जुस्तुजू-नवर्द
साया नहीं जहाँ कोई नक़्श-ए-क़दम नहीं

मिलता है क्यूँ मज़ा सितम-ए-रोज़गार में
तेरा करम भी ख़ुद जो शरीक-ए-सितम नहीं

मर्ग-ए-'जिगर' पे क्यूँ तिरी आँखें हैं अश्क-रेज़
इक सानेहा सही मगर इतना अहम नहीं

--- जिगर मुरादाबादी

15 अगस्त 2021

पढ़ना-लिखना सीखो

पढ़ना-लिखना सीखो ओ मेहनत करने वालो
पढ़ना-लिखना सीखो ओ भूख से मरने वालो

क ख ग घ को पहचानो
अलिफ़ को पढ़ना सीखो
अ आ इ ई को हथियार
बनाकर लड़ना सीखो

ओ सड़क बनाने वालो, ओ भवन उठाने वालो
खुद अपनी किस्मत का फैसला अगर तुम्हें करना है
ओ बोझा ढोने वालो ओ रेल चलने वालो
अगर देश की बागडोर को कब्ज़े में करना है

क ख ग घ को पहचानो
अलिफ़ को पढ़ना सीखो
अ आ इ ई को हथियार
बनाकर लड़ना सीखो

पूछो, मजदूरी की खातिर लोग भटकते क्यों हैं?
पढ़ो,तुम्हारी सूखी रोटी गिद्ध लपकते क्यों हैं?
पूछो, माँ-बहनों पर यों बदमाश झपटते क्यों हैं?
पढ़ो,तुम्हारी मेहनत का फल सेठ गटकते क्यों हैं?

पढ़ो, लिखा है दीवारों पर मेहनतकश का नारा
पढ़ो, पोस्टर क्या कहता है, वो भी दोस्त तुम्हारा
पढ़ो, अगर अंधे विश्वासों से पाना छुटकारा
पढ़ो, किताबें कहती हैं – सारा संसार तुम्हारा

पढ़ो, कि हर मेहनतकश को उसका हक दिलवाना है
पढ़ो, अगर इस देश को अपने ढंग से चलवाना है

पढ़ना-लिखना सीखो ओ मेहनत करने वालो
पढ़ना-लिखना सीखो ओ भूख से मरने वालो

--- सफ़दर हाशमी

12 अगस्त 2021

चोला माटी के हे राम

चोला माटी के हे राम
एकर का भरोसा, चोला माटी के हे रे

चोला माटी के हे हो
हाय चोला माटी के हे राम
एकर का भरोसा, चोला माटी के हे रे

द्रोणा जइसे गुरू चले गे
करन जइसे दानी संगी, करन जइसे दानी
बाली जइसे बीर चले गे, रावन कस अभिमानी
चोला माटी के हे राम
एकर का भरोसा, चोला माटी के हे रे

कोनो रिहिस ना कोनो रहय भई आही सब के पारी
एक दिन आही सब के पारी
काल कोनो ल छोंड़े नहीं राजा रंक भिखारी
चोला माटी के हे राम
एकर का भरोसा, चोला माटी के हे रे

भव से पार लगे बर हे ते हरि के नाम सुमर ले संगी
हरि के नाम सुमर ले
ए दुनिया मा आके रे पगला जीवन मुक्ती कर ले
चोला माटी के हे राम
एकर का भरोसा, चोला माटी के हे रे

चोला माटी के हे हो
हाय चोला माटी के हे राम
एकर का भरोसा, चोला माटी के हे रे
हाय चोला माटी के हे राम
एकर का भरोसा, चोला माटी के हे रे

---गंगाराम शिवारे

9 अगस्त 2021

युवा कवि !

लिखो जैसा तुम चाहो 
जिस भी अंदाज़ में। 

पुल के नीचे बहुत सारा रक्त 
बह चुका है सिर्फ़ यह साबित करता हुआ 
कि एक ही रास्ता सही है। 
कविता में सब कुछ जायज़ है 
तुम्हें सिर्फ़ एक कोरे 
काग़ज़ को बेहतर बनाना है। 

 ~ निकानोर पार्रा {अनुवाद: मंगलेश डबराल}

4 अगस्त 2021

The Diameter Of The Bomb

The diameter of the bomb was thirty centimeters
and the diameter of its effective range about seven meters,
with four dead and eleven wounded.
And around these, in a larger circle
of pain and time, two hospitals are scattered
and one graveyard. But the young woman
who was buried in the city she came from,
at a distance of more than a hundred kilometers,
enlarges the circle considerably,
and the solitary man mourning her death
at the distant shores of a country far across the sea
includes the entire world in the circle.
And I won’t even mention the crying of orphans
that reaches up to the throne of God and
beyond, making a circle with no end and no God.

30 जुलाई 2021

Apolitical Intellectuals

One day
the apolitical
intellectuals
of my country
will be interrogated
by the simplest
of our people.

They will be asked
what they did
when their nation died out
slowly,
like a sweet fire
small and alone.

No one will ask them
about their dress,
their long siestas
after lunch,
no one will want to know
about their sterile combats
with “the idea
of the nothing”
no one will care about
their higher financial learning.

They won’t be questioned
on Greek mythology,
or regarding their self-disgust
when someone within them
begins to die
the coward’s death.

They’ll be asked nothing
about their absurd
justifications,
born in the shadow
of the total lie.

On that day
the simple men will come.
Those who had no place
in the books and poems
of the apolitical intellectuals,
but daily delivered
their bread and milk,
their tortillas and eggs,
those who drove their cars,
who cared for their dogs and gardens
and worked for them,
and they’ll ask:

“What did you do when the poor
suffered, when tenderness
and life
burned out of them?”

Apolitical intellectuals
of my sweet country,
you will not be able to answer.

A vulture of silence
will eat your gut.

Your own misery
will pick at your soul.

And you will be mute in your shame.

--- Otto Rene Castillo