Thursday, September 11, 2014

Today I am Modest

Today I am modest as an animal,
Spread flush as rainwashed fields.
With a small fat hand I lead
My life towards compassion and children.
Today each stranger, each sufferer
Comes to me.
My heart's little gifts
Patter rain-like about me.
And already I carry Tomorrow-
Its weight closed in
And again leaping out,
Without looking, toward all the unknown.

---Esther Raab
Translated by A.Z. Foreman

Wednesday, September 10, 2014

नहीं निगाह में मंज़िल तो जुस्तजू ही सही

नहीं निगाह में मंज़िल तो जुस्तजू[1] ही सही
नहीं विसाल मयस्सर[2] तो आरज़ू ही सही

न तन में ख़ून फ़राहम[3] न अश्क आँखों में
नमाज़-ए-शौक़ तो वाजिब[4] है बे-वज़ू ही सही

यही बहुत है केः सालिम है दिल का पैराहन
ये चाक-चाक गरेबान बेरफ़ू ही सही

किसी तरह तो जमे बज़्म मैकदे वालो
नहीं जो बादा-ओ-साग़र तो हा-ओ-हू ही सही

गर इन्तज़ार कठिन है तो जब तलक ऐ दिल
किसी के वादा-ए-फ़र्दा[5] से गुफ़्तगू ही सही

दयार-ए-ग़ैर[6] में महरम[7] अगर नहीं कोई
तो 'फ़ैज़' ज़िक्र-ए-वतन अपने रू-ब-रू[8] ही सही

---फ़ैज़ अहमद फ़ैज़

1- तलाश
2- उपलब्ध
3- मौजूद
4- आवश्यक
5- कल के वादे
6- पराई धरती
7- अपना
8- समक्ष

Friday, August 29, 2014

सर्जना के क्षण

एक क्षण भर और रहने दो मुझे अभिभूत :
फिर जहाँ मैंने सँजोकर और भी सब रखी हैं ज्योति:शिखाएँ
वहीं तुम भी चली जाना-शांत तेजोरूप।
एक क्षण भर और
लंबे सर्जना के क्षण कभी भी हो नहीं सकते।
बूँद स्वाती की भले हो, बेधती है मर्म सीपी का उसी निर्मम त्वरा से
वज्र जिससे फोड़ता चट्टान को
भले ही फिर व्यथा के तम में बरस कर बरस बीतें
एक मुक्ता-रूप को पकते।

--- अज्ञेय

Thursday, August 21, 2014

नहीं चुनी मैंने

नहीं चुनी मैंने ये ज़मीन जो वतन ठहरी
नहीं चुना मैंने वो घर जो खानदान बना
नहीं चुना मैंने वो मज़हब जो मुझे बख्शा गया
नहीं चुनी मैंने वो जुबां जिसमें माँ ने बोलना सिखाया
और अब मैं इन सब के लिए तैयार हूँ
मारने मरने पर !

--- फज़ल ताबिश

Saturday, August 16, 2014

यदि होता किन्नर नरेश मैं

यदि होता किन्नर नरेश मैं, राजमहल में रहता,
सोने का सिंहासन होता, सिर पर मुकुट चमकता।

बंदी जन गुण गाते रहते, दरवाजे पर मेरे,
प्रतिदिन नौबत बजती रहती, संध्या और सवेरे।

मेरे वन में सिह घूमते, मोर नाचते आँगन,
मेरे बागों में कोयलिया, बरसाती मधु रस-कण।

यदि होता किन्नर नरेश मैं, शाही वस्त्र पहनकर,
हीरे, पन्ने, मोती माणिक, मणियों से सजधज कर।

बाँध खडग तलवार सात घोड़ों के रथ पर चढ़ता,
बड़े सवेरे ही किन्नर के राजमार्ग पर चलता।

राज महल से धीमे धीमे आती देख सवारी,
रूक जाते पथ, दर्शन करने प्रजा उमड़ती सारी।

जय किन्नर नरेश की जय हो, के नारे लग जाते,
हर्षित होकर मुझ पर सारे, लोग फूल बरसाते।

सूरज के रथ सा मेरा रथ आगे बढ़ता जाता,
बड़े गर्व से अपना वैभव, निरख-निरख सुख पाता।

---द्वारिका प्रसाद माहेश्वरी

Thursday, August 14, 2014

Muhajir-nama

मुहाजिर हैं मगर एक दुनिया छोड़ आए हैं
तुम्हारे पास जितना है हम उतना छोड़ आए हैं

हँसी आती है अपनी अदाकारी पे खुद हमको
कि बने फिरते हैं यूसुफ़ और ज़ुलेख़ा छोड़ आए हैं

जो एक पतली सड़क उन्नाव से मोहान जाती थी
वहीं हसरत* के ख़्वाबों को भटकता छोड़ आए हैं

वजू** करने को जब भी बैठते हैं याद आता है
कि हम उजलत में जमना का किनारा छोड़ आए हैं

उतार आए मुरव्वत और रवादारी का हर चोला
जो एक साधू ने पहनाई थी माला छोड़ आए हैं

ख़याल आता है अक्सर धूप में बाहर निकलते ही
हम अपने गाँव में पीपल का साया छोड़ आए हैं

ज़मीं-ए-नानक-ओ-चिश्ती, ज़बान-ए-ग़ालिब-ओ-तुलसी
ये सब कुछ था पास अपने, ये सारा छोड़ आए हैं

दुआ के फूल पंडित जी जहां तकसीम करते थे
गली के मोड़ पे हम वो शिवाला छोड़ आए हैं

बुरे लगते हैं शायद इसलिए ये सुरमई बादल
किसी की ज़ुल्फ़ को शानों पे बिखरा छोड़ आए हैं

अब अपनी जल्दबाजी पर बोहत अफ़सोस होता है
कि एक खोली की खातिर राजवाड़ा छोड़ आए हैं

--- मुनव्वर राना

*[Hasrat Mohani, the legendary poet and freedom fighter]
**[wazu=ablutions before namaz,]

Tuesday, July 22, 2014

Running Orders

They call us now.
Before they drop the bombs.
The phone rings
and someone who knows my first name
calls and says in perfect Arabic
“This is David.”
And in my stupor of sonic booms and glass shattering symphonies
still smashing around in my head
I think "Do I know any Davids in Gaza?"
They call us now to say
Run.
You have 58 seconds from the end of this message.
Your house is next.
They think of it as some kind of
war time courtesy.
It doesn’t matter that
there is nowhere to run to.
It means nothing that the borders are closed
and your papers are worthless
and mark you only for a life sentence
in this prison by the sea
and the alleyways are narrow
and there are more human lives
packed one against the other
more than any other place on earth
Just run.
We aren’t trying to kill you.
It doesn’t matter that
you can’t call us back to tell us
the people we claim to want aren’t in your house
that there’s no one here
except you and your children
who were cheering for Argentina
sharing the last loaf of bread for this week
counting candles left in case the power goes out.
It doesn’t matter that you have children.
You live in the wrong place
and now is your chance to run
to nowhere.
It doesn’t matter
that 58 seconds isn’t long enough
to find your wedding album
or your son’s favorite blanket
or your daughter’s almost completed college application
or your shoes
or to gather everyone in the house.
It doesn’t matter what you had planned.
It doesn’t matter who you are
Prove you’re human.
Prove you stand on two legs.
Run.

--- Lena Khalaf Tuffaha

Tuesday, July 15, 2014

जिंदगी ऐसी नदी है

आज इस वक्त आप हैं,हम हैं
कल कहां होंगे कह नहीं सकते।
जिंदगी ऐसी नदी है जिसमें
देर तक साथ बह नहीं सकते।

वक्त मुश्किल है कुछ सरल बनिये
प्यास पथरा गई तरल बनिये।
जिसको पीने से कृष्ण मिलता हो,
आप मीरा का वह गरल बनिये।

जिसको जो होना है वही होगा,
जो भी होगा वही सही होगा।
किसलिये होते हो उदास यहाँ,
जो नहीं होना है नहीं होगा।।

आपने चाहा हम चले आये,
आप कह देंगे हम लौट जायेंगे।
एक दिन होगा हम नहीं होंगे,
आप चाहेंगे हम न आयेंगे॥

---रमानाथ अवस्थी

Wednesday, July 9, 2014

Time

This line is the present.

That line you just read is the past
(It fell behind after you read it)
The rest of the poem is the future,
existing outside your
awareness.

The words
are here, whether you read them
or not. And nothing in the world
can change that.

--- Joan Brossa, Translated by A.Z. Foreman.

Wednesday, July 2, 2014

THE SECOND COMING



Turning and turning in the widening gyre
The falcon cannot hear the falconer;
Things fall apart; the centre cannot hold;
Mere anarchy is loosed upon the world,
The blood-dimmed tide is loosed, and everywhere
The ceremony of innocence is drowned;
The best lack all conviction, while the worst
Are full of passionate intensity.

Surely some revelation is at hand;
Surely the Second Coming is at hand.
The Second Coming! Hardly are those words out
When a vast image out of Spiritus Mundi
Troubles my sight: a waste of desert sand;
A shape with lion body and the head of a man,
A gaze blank and pitiless as the sun,
Is moving its slow thighs, while all about it
Wind shadows of the indignant desert birds.

The darkness drops again but now I know
That twenty centuries of stony sleep
Were vexed to nightmare by a rocking cradle,
And what rough beast, its hour come round at last,
Slouches towards Bethlehem to be born?

--: W.B. Yeats

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