November 14, 2017

'Wild Child'

'They caught all the wild children,
and put them in zoos,
They made them do sums
and wear sensible shoes.
They put them to bed
at the wrong time of day,
And made them sit still
when they wanted to play.
They scrubbed them with soap
and they made them eat peas.
They made them behave and
say pardon and please.
They took all their wisdom
and wildness away.

That's why there are none
in the forests today.'

--- Jeanne Willis

November 9, 2017

रोटी और संसद

एक आदमी
रोटी बेलता है
एक आदमी रोटी खाता है
एक तीसरा आदमी भी है
जो न रोटी बेलता है, न रोटी खाता है
वह सिर्फ रोटी से खेलता है
मैं पूछता हूँ -
'यह तीसरा आदमी कौन है ?'
मेरे देश की संसद मौन है l


---धूमिल

October 8, 2017

जूठे पत्ते

क्या देखा है तुमने नर को, नर के आगे हाथ पसारे?

क्या देखे हैं तुमने उसकी, आँखों में खारे फव्वारे?

देखे हैं? फिर भी कहते हो कि तुम नहीं हो विप्लवकारी?

तब तो तुम पत्थर हो, या महाभयंकर अत्याचारी।

लपक चाटतै जूठे पत्ते, जिस दिन मैंने देखा नर को,

उस दिन सोचा क्यों न लगा दूँ, आज आग इस दुनिया भर को,

यह भी सोचा क्यों न टेंटुआ, घोटा जाय स्वयं जगपति का,

जिसने अपने ही स्वरूप को, रूप दिया इस घृणित विकृति का,

जगपति कहाँ? अरे, सदियों से, वह तो हुआ राख की ढेरी।

वरना समता संस्थापन, में लग जाती क्या इतनी देरी।

छोड़ आसरा अलख शक्ति का, रे नर, स्वयं जगपति तू है।

तू गर जूठे पत्ते चाटे, तो मुझ पर लानत हे, थू है।

कैसा बना रूप यह तेरा, घृणित, दलित, वीभत्स भयंकर,

नहीं याद क्या मुझको, तू है चिर सुन्दर, नवीन, प्रलयंकर,

भिक्षा-पात्र फक हाथों से, तरे स्नायु बड़े बलशाली,

अभी उठेगा प्रलय नींद से, जरा बजा तू अपनी ताली,

औ भिखमंगे, अरे पतित तू, मजलूम, अरे चिरदोहित।

तू अखंड भण्डार शक्ति का, जाग अरे निद्रा संमोहित।

प्राणों को तड़पाने वाली, हुँक्कारों से जल-थल भर दे,

अनाचार के अम्बारों में, अपना ज्वलित फलीता धर दे।

भूखा देख मुझे गर उमड़ें, आँसू नयनों में जग-जन के,

तो तू कह दे नहीं चाहिये, हमको रोने वाले जनखे,

तेरी भूख, जिहालत तेरी, यदि न उभाड़ सके क्रोधानल-

तो फिर समझूँगा कि हो गई, सारी दुनिया कायर, निर्बल,

---पंडित बालकृष्ण शर्मा “नवीन”

September 30, 2017

जो पुल बनाएंगे

जो पुल बनाएंगे
वे अनिवार्यत:
पीछे रह जाएंगे।
सेनाएँ हो जाएंगी पार
मारे जाएंगे रावण
जयी होंगे राम,
जो निर्माता रहे
इतिहास में
बन्दर कहलाएंगे

---अज्ञेय

September 29, 2017

BABI YAR

No monument stands over Babi Yar.
A steep cliff only, like the rudest headstone.
I am afraid.
Today, I am as old
As the entire Jewish race itself.

I see myself an ancient Israelite.
I wander o’er the roads of ancient Egypt
And here, upon the cross, I perish, tortured
And even now, I bear the marks of nails.

It seems to me that Dreyfus is myself. *1*
The Philistines betrayed me – and now judge.
I’m in a cage. Surrounded and trapped,
I’m persecuted, spat on, slandered, and
The dainty dollies in their Brussels frills
Squeal, as they stab umbrellas at my face.

I see myself a boy in Belostok *2*
Blood spills, and runs upon the floors,
The chiefs of bar and pub rage unimpeded
And reek of vodka and of onion, half and half.

I’m thrown back by a boot, I have no strength left,
In vain I beg the rabble of pogrom,
To jeers of “Kill the Jews, and save our Russia!”
My mother’s being beaten by a clerk.

O, Russia of my heart, I know that you
Are international, by inner nature.
But often those whose hands are steeped in filth
Abused your purest name, in name of hatred.

I know the kindness of my native land.
How vile, that without the slightest quiver
The antisemites have proclaimed themselves
The “Union of the Russian People!”

It seems to me that I am Anna Frank,
Transparent, as the thinnest branch in April,
And I’m in love, and have no need of phrases,
But only that we gaze into each other’s eyes.
How little one can see, or even sense!
Leaves are forbidden, so is sky,
But much is still allowed – very gently
In darkened rooms each other to embrace.

-“They come!”

-“No, fear not – those are sounds
Of spring itself. She’s coming soon.
Quickly, your lips!”

-“They break the door!”

-“No, river ice is breaking…”

Wild grasses rustle over Babi Yar,
The trees look sternly, as if passing judgement.
Here, silently, all screams, and, hat in hand,
I feel my hair changing shade to gray.

And I myself, like one long soundless scream
Above the thousands of thousands interred,
I’m every old man executed here,
As I am every child murdered here.

No fiber of my body will forget this.
May “Internationale” thunder and ring *3*
When, for all time, is buried and forgotten
The last of antisemites on this earth.

There is no Jewish blood that’s blood of mine,
But, hated with a passion that’s corrosive
Am I by antisemites like a Jew.
And that is why I call myself a Russian!

--- Yevgeny Yevtushenko
Translated by Benjamin Okopnik


**************************************************

NOTES
—–1 – Alfred Dreyfus was a French officer, unfairly dismissed from service in 1894 due to trumped-up charges prompted by anti- Semitism.

2 – Belostok: the site of the first and most violent pogroms, the Russian version of KristallNacht.

3 – “Internationale”: The Soviet national anthem.

September 20, 2017

The Development Set

‘Excuse me, friends, I must catch my jet
I’m off to join the Development Set;
My bags are packed, and I’ve had all my shots
I have traveller’s checks and pills for the trots!

The Development Set is bright and noble
Our thoughts are deep and our vision global;
Although we move with the better classes
Our thoughts are always with the masses.

In Sheraton Hotels in scattered nations
We damn multi-national corporations;
injustice seems easy to protest
In such seething hotbeds of social rest.

We discuss malnutrition over steaks
And plan hunger talks during coffee breaks.
Whether Asian floods or African drought,
We face each issue with open mouth.

We bring in consultants whose circumlocution
Raises difficulties for every solution –
Thus guaranteeing continued good eating
By showing the need for another meeting.

The language of the Development Set
Stretches the English alphabet;
We use swell words like “epigenetic”
“Micro”, “macro”, and “logarithmetic”

It pleasures us to be esoteric –
It’s so intellectually atmospheric!
And although establishments may be unmoved,
Our vocabularies are much improved.

When the talk gets deep and you’re feeling numb,
You can keep your shame to a minimum:
To show that you, too, are intelligent
Smugly ask, “Is it really development?”

Or say, “That’s fine in practice, but don’t you see:
It doesn’t work out in theory!”
A few may find this incomprehensible,
But most will admire you as deep and sensible.

Development set homes are extremely chic,
Full of carvings, curios, and draped with batik.
Eye-level photographs subtly assure
That your host is at home with the great and the poor.

Enough of these verses – on with the mission!
Our task is as broad as the human condition!
Just pray god the biblical promise is true:
The poor ye shall always have with you.’

- Ross Coggins

September 5, 2017

प्रश्नपत्र

अकवि क्या है:

वह, जो ताबूत और अस्थि-कलश की दलाली करता है?

एक जनरल, जो खुद के बारे में ही निश्चित नहीं है?

एक पादरी, जिसे किसी चीज पर आस्था नहीं है?

एक सैलानी, जिसके लिए हर चीज अजीब है; वृद्धावस्था और मृत्यु भी?

एक वक्ता, जिस पर आप विश्वास नहीं कर सकते?

खड़ी-चट्टान की कोर पर खड़ी एक नर्तकी ?

एक आत्ममुग्ध, जो हर किसी से प्यार करता है?

एक जोकर, जो गाल बजाता है

और बेवज़ह यूँ ही बुरा बनता है ?

एक कवि जो कुर्सी पर सोता है?

आधुनिक समय का एक कीमियागर?

एक आरामतलब क्रांतिकारी?

एक पेटी-बुर्जुआ?

एक जालसाज?

एक ईश्वर?

एक मासूम?

सैंटियागो, चिली का एक किसान?

सही उत्तर को रेखांकित करें.

अकविता क्या है:

चाय की प्याली में एक तूफ़ान?

चट्टान पर बर्फ का एक धब्बा?

मानव-मल से ऊपर तक भरा एक पतीला,

जैसा कि फादर साल्वेतियेरा मानता है?

एक आइना, जो झूठ नहीं बोलता?

लेखक-संगठन के अध्यक्ष के गाल पर पड़ा एक तमाचा?

(ईश्वर उनके आत्मा की रक्षा करे!)

युवा कवियों को एक चेतावनी?

जेट-चालित एक ताबूत?

एक ताबूत, जो वायुमंडलीय दायरे से बाहर परिक्रमा करता है?

एक ताबूत, जो कि केरोसिन से चलता है?

एक शवदाह-गृह, जहाँ कोई शव नहीं है?

सही उत्तर के सामने X चिन्हित करें.

---निकानोर पार्रा (उदय शंकर द्वारा अनुदित)

August 31, 2017

आओ, आज के दिन हम हो जाएं जला चेहरा

तुमने ठीक ही कहा
तुम बस्तर
और आदिवासी भारत का
जला हुआ चेहरा हो
पर यह चेहरा जुगनुओं की मानिंद
हत्यारों के स्याह चेहरों पर
टिमटिमा रहा है
सूरज की हजारों हजार किरणों की
गरमी और आभा लिए
अपने आंचल में सहेज रहा है देश
तुम्हारी गरमी तुम्हारा ऊर्जा
तुम अपने दीप्त खूबसूरत चेहरे के साथ
हमेशा उमड़ती रहोगी देश के ह्दय में
जब भी मुक्ति का प्रसंग आएगा
अणु अणु जुगनुओं सा मुस्कुराता तुम्हारा चेहरा
देश को बदल देगा एक पहाड़ में

- वंदना टेटे

August 15, 2017

संख्या के बच्चे

सच है ये शून्य हैं -
और तुम एक हो l
बड़े शक्तिशाली हो,
क्योंकि शून्य के पहले
उसके दुर्भाग्य-से खड़े हो l
अपनी आकांक्षा के क़ुतुब बने सांख्य !
मत भूलो -
तुम भी आंकड़े हो l

मत भूलो -
तुम केवल एक हो
शून्य ही दहाई हैं, शून्य ही असंख्य हैं l
शून्य नहीं धब्बे हैं,
आंसू की बूंदों-से,
लोहू के कतरों-से, शून्य ये सच्चे हैं l
संख्या के बच्चे हैं l

शून्यों से मुंह फेर खड़े होने वाले !
शून्य अगर हट जाएं
ठूठे की अंगुली से केवल रह जाओगे l
मत भूलो -
शून्य शक्ति है, शून्य प्रजा है l

---श्रीकांत वर्मा

August 9, 2017

हम जरूर जिएंगे ही, पठार की तरह निडर

पठारी क्षेत्र में तुमने
हमें (असुरों को) जन्म दिया
पर जिंदा रहने के लिए रास्ता नहीं बतलाया
पठारी क्षेत्र में तुमने
हमें (असुरों को) मजदूर बनाया
पर स्कूल जाने के लिए पैसा नहीं दिया
हमें आगे बढऩे के लिए रास्ता नहीं बतलाया

अब तो हमारे पास भाषा नहीं है
अब तो हमारे पास संस्कृति नहीं है
हम तुम्हें कैसे पुकारें
हम तुम्हें किस विधि से याद करें

हे धरती के पुरखो, हे आसमान के पुरखो
ओ हमारे माता-पिता, ओ सभी असुर बूढ़े-बूढिय़ो
तुम्हारे भोजन की जिम्मेवारी जंगल की थी
तुम्हारी मजूरी खेत की जिम्मेवारी थी
यहां से वहां तक फैला पठार ही तुम्हारी पाठशाला थी
पहाड़-झरने तुम्हें रास्ता बताते थे

हे धरती के पुरखो, हे आसमान के पुरखो
ओ हमारे माता-पिता, ओ सभी असुर बूढ़े-बूढिय़ो
तुम सब नहीं जानते थे कचिया-ढिबा (रुपया-पैसा)
तुम सब नहीं जानते थे परजीविता

हम तुम्हें दोष नहीं देते
हम तुम्हें अपनी असहायता के लिए
कोर्ट-कचहरी नहीं करते
पर जब कंपनी धम-धम आती है
पर जब सरकार दम-दम बेदम करती है
हम किसको गोहराएं
हम किस छाती में आसरा ढूंढे

हे धरती के पुरखो, हे आसमान के पुरखो
ओ हमारे माता-पिता, ओ सभी असुर बूढ़े-बूढिय़ो
हम सीखेंगे तुम्हारी तरह बोलना
हम सीखेंगे तुम्हारी तरह नाचना
हम करेंगे शिकार तुम्हारी तरह
उन सभी जानवरों का
जो असुरों के घर खोद रहे हैं
जो हमारे झरनों को फुसला-बहला रहे हैं
जिन्हें धरती और इंसान खाने की लत है
हम जरूर जिएंगे तुम्हारी तरह ही
पठार की तरह निश्चिंत-निश्छल
तुम्हारे रचे इस असुर दिसुम में

--- सुषमा असुर

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