रात यों कहने लगा मुझसे गगन का चाँद,
आदमी भी क्या अनोखा जीव होता है!
उलझनें अपनी बनाकर आप ही फँसता,
और फिर बेचैन हो जगता, न सोता है।
जानता है तू कि मैं कितना पुराना हूँ?
मैं चुका हूँ देख मनु को जनमते-मरते;
और लाखों बार तुझ-से पागलों को भी
चाँदनी में बैठ स्वप्नों पर सही करते।
आदमी का स्वप्न? है वह बुलबुला जल का;
आज उठता और कल फिर फूट जाता है;
किन्तु, फिर भी धन्य; ठहरा आदमी ही तो?
बुलबुलों से खेलता, कविता बनाता है।
मैं न बोला, किन्तु, मेरी रागिनी बोली,
देख फिर से, चाँद! मुझको जानता है तू?
स्वप्न मेरे बुलबुले हैं? है यही पानी?
आग को भी क्या नहीं पहचानता है तू?
मैं न वह जो स्वप्न पर केवल सही करते,
आग में उसको गला लोहा बनाती हूँ,
और उस पर नींव रखती हूँ नये घर की,
इस तरह दीवार फौलादी उठाती हूँ।
मनु नहीं, मनु-पुत्र है यह सामने, जिसकी
कल्पना की जीभ में भी धार होती है,
वाण ही होते विचारों के नहीं केवल,
स्वप्न के भी हाथ में तलवार होती है।
स्वर्ग के सम्राट को जाकर खबर कर दे,
"रोज ही आकाश चढ़ते जा रहे हैं वे,
रोकिये, जैसे बने इन स्वप्नवालों को,
स्वर्ग की ही ओर बढ़ते आ रहे हैं वे।"
--- रामधारी सिंह "दिनकर"
About Me
- Himanshu Rai
- दो लम्हे का जीवन है, एक क्षण उन्माद का, एक क्षण आह्लाद का, बस इतना ही जियूँगा!
Tuesday, May 21, 2013
Wednesday, May 1, 2013
ये चाह कब है मुझे सब का सब जहान मिले
ये चाह कब है मुझे सब का सब जहान मिले
मुझे तो बस मेरी ज़मीं मेरा आसमान मिले
कमी नहीं है सजावट की इन मकानों में
सुकून भी तो कभी इनके दरमियान मिले
अजीब वक़्त है सबके लबों पे ताले हैं
नज़र नज़र में मगर अनगिनत बयान मिले
जवां हैं ख़्वाब क़फ़स में भी जिन परिंदों के
मेरी दुआ है उन्हें फिर नई उड़ान मिले
हमारा शहर या ख़्वाबों का कोई मक़्तल है
क़दम क़दम पे लहू के यहाँ निशान मिले
हो जिसमें प्यार की ख़ुशबू मिठास चाहत की
हमारे दौर को ऐसी भी इक ज़ुबान मिले.
--- देवमणि पांडेय
मुझे तो बस मेरी ज़मीं मेरा आसमान मिले
कमी नहीं है सजावट की इन मकानों में
सुकून भी तो कभी इनके दरमियान मिले
अजीब वक़्त है सबके लबों पे ताले हैं
नज़र नज़र में मगर अनगिनत बयान मिले
जवां हैं ख़्वाब क़फ़स में भी जिन परिंदों के
मेरी दुआ है उन्हें फिर नई उड़ान मिले
हमारा शहर या ख़्वाबों का कोई मक़्तल है
क़दम क़दम पे लहू के यहाँ निशान मिले
हो जिसमें प्यार की ख़ुशबू मिठास चाहत की
हमारे दौर को ऐसी भी इक ज़ुबान मिले.
--- देवमणि पांडेय
Tuesday, April 23, 2013
किसी भी शहर में जाओ
किसी भी शहर में जाओ कहीं क़याम करो
कोई फ़ज़ा कोई मंज़र किसी के नाम करो.
दुआ सलाम ज़रूरी है शहर वालों से
मगर अकेले में अपना भी एहतराम करो.
हमेशा अमन नहीं होता फ़ाख़्ताओं में
कभी कभार ओक़ाबों से भी कलाम करो.
हर एक बस्ती बदलती है रंग रूप कई
जहाँ भी सुब्ह गुज़ारो उधर ही शाम करो.
ख़ुदा के हुक्म से शैतान भी है आदम भी
वो अपना काम करेगा तुम अपना काम करो.
--- निदा फ़ाज़ली
कोई फ़ज़ा कोई मंज़र किसी के नाम करो.
दुआ सलाम ज़रूरी है शहर वालों से
मगर अकेले में अपना भी एहतराम करो.
हमेशा अमन नहीं होता फ़ाख़्ताओं में
कभी कभार ओक़ाबों से भी कलाम करो.
हर एक बस्ती बदलती है रंग रूप कई
जहाँ भी सुब्ह गुज़ारो उधर ही शाम करो.
ख़ुदा के हुक्म से शैतान भी है आदम भी
वो अपना काम करेगा तुम अपना काम करो.
--- निदा फ़ाज़ली
Thursday, April 11, 2013
इतने ऊँचे उठो कि जितना उठा गगन है।
देखो इस सारी दुनिया को एक दृष्टि से
सिंचित करो धरा, समता की भाव वृष्टि से
जाति भेद की, धर्म-वेश की
काले गोरे रंग-द्वेष की
ज्वालाओं से जलते जग में
इतने शीतल बहो कि जितना मलय पवन है॥
नये हाथ से, वर्तमान का रूप सँवारो
नयी तूलिका से चित्रों के रंग उभारो
नये राग को नूतन स्वर दो
भाषा को नूतन अक्षर दो
युग की नयी मूर्ति-रचना में
इतने मौलिक बनो कि जितना स्वयं सृजन है॥
लो अतीत से उतना ही जितना पोषक है
जीर्ण-शीर्ण का मोह मृत्यु का ही द्योतक है
तोड़ो बन्धन, रुके न चिन्तन
गति, जीवन का सत्य चिरन्तन
धारा के शाश्वत प्रवाह में
इतने गतिमय बनो कि जितना परिवर्तन है।
चाह रहे हम इस धरती को स्वर्ग बनाना
अगर कहीं हो स्वर्ग, उसे धरती पर लाना
सूरज, चाँद, चाँदनी, तारे
सब हैं प्रतिपल साथ हमारे
दो कुरूप को रूप सलोना
इतने सुन्दर बनो कि जितना आकर्षण है॥
--- द्वारिका प्रसाद माहेश्वरी
सिंचित करो धरा, समता की भाव वृष्टि से
जाति भेद की, धर्म-वेश की
काले गोरे रंग-द्वेष की
ज्वालाओं से जलते जग में
इतने शीतल बहो कि जितना मलय पवन है॥
नये हाथ से, वर्तमान का रूप सँवारो
नयी तूलिका से चित्रों के रंग उभारो
नये राग को नूतन स्वर दो
भाषा को नूतन अक्षर दो
युग की नयी मूर्ति-रचना में
इतने मौलिक बनो कि जितना स्वयं सृजन है॥
लो अतीत से उतना ही जितना पोषक है
जीर्ण-शीर्ण का मोह मृत्यु का ही द्योतक है
तोड़ो बन्धन, रुके न चिन्तन
गति, जीवन का सत्य चिरन्तन
धारा के शाश्वत प्रवाह में
इतने गतिमय बनो कि जितना परिवर्तन है।
चाह रहे हम इस धरती को स्वर्ग बनाना
अगर कहीं हो स्वर्ग, उसे धरती पर लाना
सूरज, चाँद, चाँदनी, तारे
सब हैं प्रतिपल साथ हमारे
दो कुरूप को रूप सलोना
इतने सुन्दर बनो कि जितना आकर्षण है॥
--- द्वारिका प्रसाद माहेश्वरी
Saturday, March 23, 2013
An Elegy on the Death of a Mad Dog
Good people all, of every sort,
Give ear unto my song;
And if you find it wondrous short,
It cannot hold you long.
In Islington there was a man,
Of whom the world might say
That still a godly race he ran,
Whene'er he went to pray.
A kind and gentle heart he had,
To comfort friends and foes;
The naked every day he clad,
When he put on his clothes.
And in that town a dog was found,
As many dogs there be,
Both mongrel, puppy, whelp and hound,
And curs of low degree.
This dog and man at first were friends;
But when a pique began,
The dog, to gain some private ends,
Went mad and bit the man.
Around from all the neighbouring streets
The wondering neighbours ran,
And swore the dog had lost his wits,
To bite so good a man.
The wound it seemed both sore and sad
To every Christian eye;
And while they swore the dog was mad,
They swore the man would die.
But soon a wonder came to light,
That showed the rogues they lied:
The man recovered of the bite,
The dog it was that died.
--- Oliver Goldsmith
Give ear unto my song;
And if you find it wondrous short,
It cannot hold you long.
In Islington there was a man,
Of whom the world might say
That still a godly race he ran,
Whene'er he went to pray.
A kind and gentle heart he had,
To comfort friends and foes;
The naked every day he clad,
When he put on his clothes.
And in that town a dog was found,
As many dogs there be,
Both mongrel, puppy, whelp and hound,
And curs of low degree.
This dog and man at first were friends;
But when a pique began,
The dog, to gain some private ends,
Went mad and bit the man.
Around from all the neighbouring streets
The wondering neighbours ran,
And swore the dog had lost his wits,
To bite so good a man.
The wound it seemed both sore and sad
To every Christian eye;
And while they swore the dog was mad,
They swore the man would die.
But soon a wonder came to light,
That showed the rogues they lied:
The man recovered of the bite,
The dog it was that died.
--- Oliver Goldsmith
Friday, March 15, 2013
नयी तरह से निभाने की दिल ने ठानी है
नयी तरह से निभाने की दिल ने ठानी है
वगरना उससे मोहब्बत बहुत पुरानी है
ख़ुदा वो दिन न दिखाए कि मैं किसी से सुनूं
कि तूने भी गमे दुनिया से हार मानी है
ज़मीन पे रह के सितारे शिकार करते हैं
मिजाज़ अहले-मोहब्बत का आसमानी है
हमें अज़ीज़ हो क्योंकर न शामे-गम कि यही
बिछड़ने वाले तेरी आखिरी निशानी है
उतर पड़े हो तो दरया से पूछना कैसा
के साहिलों से उधर कितना तेज़ पानी है
बहुत दिनों में तेरी याद ओढ़ कर उतरी
ये शाम कितनी सुनहरी है क्या सुहानी है
साभार: हस्बे-हाल
वगरना उससे मोहब्बत बहुत पुरानी है
ख़ुदा वो दिन न दिखाए कि मैं किसी से सुनूं
कि तूने भी गमे दुनिया से हार मानी है
ज़मीन पे रह के सितारे शिकार करते हैं
मिजाज़ अहले-मोहब्बत का आसमानी है
हमें अज़ीज़ हो क्योंकर न शामे-गम कि यही
बिछड़ने वाले तेरी आखिरी निशानी है
उतर पड़े हो तो दरया से पूछना कैसा
के साहिलों से उधर कितना तेज़ पानी है
बहुत दिनों में तेरी याद ओढ़ कर उतरी
ये शाम कितनी सुनहरी है क्या सुहानी है
साभार: हस्बे-हाल
Thursday, January 10, 2013
10 बेहतरीन शेर !!!
1) खुद से चल कर नहीं ये तर्ज ए सुखन आया है ,
पाँव दाबे हैं बुजुर्गों के , तो फ़न आया है .....!"
2) लोहे का स्वाद
लोहार से मत पूछो
घोड़े से पूछो
जिसके मुंह में लगाम है।
---धूमिल
3) हवा का रुख ही काफी बहाना होता है,
अगर चिराग किसी को जलाना होता है,
जुबानी दावे तो बहुत लोग करते रहते हैं
जुनू के काम को करके दिखाना होता है।
--- ‘शहरयार’
4) मैं अकेला ही चला था जानिब-ए-मंजिल मगर
लोग साथ आते गये कारवां बनता गया
--- मजरूह सुल्तानपुरी
5) यूँ ही रक्खा था किसी ने, संग इक दीवार पर,
सर झुकाए मैं खड़ा था, वो ख़ुदा बनता गया ।.
कौन है वो, पाक दामन जो हर इक लहजे से है,
गलतियां होती गईं और ये जहां बनता गया ।
6) वे हर अन्याय को चुपचाप सहते हैं
और पेट की आग से डरते हैं
जबकि मैं जानता हूँ कि ‘इन्कार से भरी हुई एक चीख़’
और ‘एक समझदार चुप’
दोनों का मतलब एक है-
भविष्य गढ़ने में ,’चुप’ और ‘चीख’
अपनी-अपनी जगह एक ही किस्म से
अपना-अपना फ़र्ज अदा करते हैं।
---धूमिल
7) बहक कर बाग-ए-जन्नत से चला आया था दुनिया में,
सुना है बाद महशर फिर उसी जन्नत की दावत है,
चला तो जाओं जन्नत मे मगर यह सोच कर चुप हु,
मैं आदमज़द हु मुझको बहक जाने की आदत है |
8) जितना दर्द दे सकता है देदे ऐ खुदा ,
मैं तेरी ही इबदाद से उनपर फ़तेह करूंगा|
9)मिल जाये दुनिया की उलझनों से फुर्सत, तो सोचना ...
की क्या सिर्फ फुरसतों में याद करने का रिश्ता बनाया था हम से ..
10)जाते हुए उस शक्स ने एक अजीब बददुआ सी दी....
तुझे मिले दो जहाँ की खुशियाँ पर कोई मुझ सा न मिले..
पाँव दाबे हैं बुजुर्गों के , तो फ़न आया है .....!"
2) लोहे का स्वाद
लोहार से मत पूछो
घोड़े से पूछो
जिसके मुंह में लगाम है।
---धूमिल
3) हवा का रुख ही काफी बहाना होता है,
अगर चिराग किसी को जलाना होता है,
जुबानी दावे तो बहुत लोग करते रहते हैं
जुनू के काम को करके दिखाना होता है।
--- ‘शहरयार’
4) मैं अकेला ही चला था जानिब-ए-मंजिल मगर
लोग साथ आते गये कारवां बनता गया
--- मजरूह सुल्तानपुरी
5) यूँ ही रक्खा था किसी ने, संग इक दीवार पर,
सर झुकाए मैं खड़ा था, वो ख़ुदा बनता गया ।.
कौन है वो, पाक दामन जो हर इक लहजे से है,
गलतियां होती गईं और ये जहां बनता गया ।
6) वे हर अन्याय को चुपचाप सहते हैं
और पेट की आग से डरते हैं
जबकि मैं जानता हूँ कि ‘इन्कार से भरी हुई एक चीख़’
और ‘एक समझदार चुप’
दोनों का मतलब एक है-
भविष्य गढ़ने में ,’चुप’ और ‘चीख’
अपनी-अपनी जगह एक ही किस्म से
अपना-अपना फ़र्ज अदा करते हैं।
---धूमिल
7) बहक कर बाग-ए-जन्नत से चला आया था दुनिया में,
सुना है बाद महशर फिर उसी जन्नत की दावत है,
चला तो जाओं जन्नत मे मगर यह सोच कर चुप हु,
मैं आदमज़द हु मुझको बहक जाने की आदत है |
8) जितना दर्द दे सकता है देदे ऐ खुदा ,
मैं तेरी ही इबदाद से उनपर फ़तेह करूंगा|
9)मिल जाये दुनिया की उलझनों से फुर्सत, तो सोचना ...
की क्या सिर्फ फुरसतों में याद करने का रिश्ता बनाया था हम से ..
10)जाते हुए उस शक्स ने एक अजीब बददुआ सी दी....
तुझे मिले दो जहाँ की खुशियाँ पर कोई मुझ सा न मिले..
Friday, January 4, 2013
ख्वाबे सहर
मेहर सदियों से चमकता ही रहा अफलाक पर,
रात ही तारी रही इंसान की अदराक पर।
अक्ल के मैदान में जुल्मत का डेरा ही रहा,
दिल में तारिकी दिमागों में अंधेरा ही रहा।
आसमानों से फरिश्ते भी उतरते ही रहे,
नेक बंदे भी खुदा का काम करते ही रहे।
इब्ने मरियम भी उठे मूसाए उमराँ भी उठे,
राम व गौतम भी उठे, फिरऔन व हामॉ भी उठे।
मस्जिदों में मौलवी खुतवे सुनाते ही रहे,
मन्दिरों में बरहमन श्लोक गाते ही रहे।
एक न एक दर पर जबींए शौक घिसटती ही रही,
आदमियत जुल्म की चक्की में पिसती ही रही।
रहबरी जारी रही, पैगम्बरी जारी रही,
दीन के परदे में, जंगे जरगरी जारी रही।
अहले बातिन इल्म के सीनों को गरमाते ही रहे,
जहल के तारीक साये हाथ फैलाते ही रहे।
जहने इंसानी ने अब, औहाम के जुल्मान में,
जिंदगी की सख्त तूफानी अंधेरी रात में।
कुछ नहीं तो कम से कम ख्वाबे सहर देखा तो है,
जिस तरफ देखा न था अब तक उधर देखा तो है।
---मजाज़ लखनवी
रात ही तारी रही इंसान की अदराक पर।
अक्ल के मैदान में जुल्मत का डेरा ही रहा,
दिल में तारिकी दिमागों में अंधेरा ही रहा।
आसमानों से फरिश्ते भी उतरते ही रहे,
नेक बंदे भी खुदा का काम करते ही रहे।
इब्ने मरियम भी उठे मूसाए उमराँ भी उठे,
राम व गौतम भी उठे, फिरऔन व हामॉ भी उठे।
मस्जिदों में मौलवी खुतवे सुनाते ही रहे,
मन्दिरों में बरहमन श्लोक गाते ही रहे।
एक न एक दर पर जबींए शौक घिसटती ही रही,
आदमियत जुल्म की चक्की में पिसती ही रही।
रहबरी जारी रही, पैगम्बरी जारी रही,
दीन के परदे में, जंगे जरगरी जारी रही।
अहले बातिन इल्म के सीनों को गरमाते ही रहे,
जहल के तारीक साये हाथ फैलाते ही रहे।
जहने इंसानी ने अब, औहाम के जुल्मान में,
जिंदगी की सख्त तूफानी अंधेरी रात में।
कुछ नहीं तो कम से कम ख्वाबे सहर देखा तो है,
जिस तरफ देखा न था अब तक उधर देखा तो है।
---मजाज़ लखनवी
Thursday, January 3, 2013
जिन्हें एतमाद-ए-बहार था, वो ही फूल रंग बदल गए
जो ग़मे हबीब से दूर थे, वो ख़ुद अपनी आग में जल गए
जो ग़मे हबीब को पा गए, वो ग़मों से हंस के निकल गए
जो थके थके से थे हौसले, वो शबाब बन के मचल गए
वो नज़र-नज़र से गले मिले, तो बुझे चिराग़ भी जल गए
ये शिकस्त-ए-दीद की करवटें भी बड़ी लतीफ़-ओ-जमील थीं
मैं नज़र झुका के तड़प गया, वो नज़र बचा के निकल गए
न ख़िज़ा में है कोई तीरगी, न बहार में कोई रोशनी
ये नज़र-नज़र के चिराग़ हैं, कहीं बुझ गए कहीं जल गए
जो संभल-संभल के बहक गए, वो फ़रेब ख़ुर्द-ए-राह थे
वो मक़ाम-ए-इश्क़ को पा गए, जो बहक-बहक के संभल गए
जो खिले हुए हैं रविश-रविश, वो हज़ार हुस्न-ए-चमन सही
मगर उन गुलों का जवाब क्या जो कदम-कदम पे कुचल गए
न है शायर अब ग़म-ए-नौ-ब-नौ न वो दाग़-ए-दिल न आरज़ू
जिन्हें एतमाद-ए-बहार था, वो ही फूल रंग बदल गए
(हबीब: मेहबूब, शिकस्त-ए-दीद: नज़र की हार, लतीफ़-ओ-जमील: आकर्षक और आनन्ददायक, खिज़ा: पतझड़, तीरगी: अन्धेरा, ख़ुर्द: सूक्ष्म, रविश: बग़ीचे के बीच छोटे-छोटे रास्ते, नौ-ब-नौ: ताज़ा, एतमाद: पक्का यक़ीन)
---शायर लखनवी
जो ग़मे हबीब को पा गए, वो ग़मों से हंस के निकल गए
जो थके थके से थे हौसले, वो शबाब बन के मचल गए
वो नज़र-नज़र से गले मिले, तो बुझे चिराग़ भी जल गए
ये शिकस्त-ए-दीद की करवटें भी बड़ी लतीफ़-ओ-जमील थीं
मैं नज़र झुका के तड़प गया, वो नज़र बचा के निकल गए
न ख़िज़ा में है कोई तीरगी, न बहार में कोई रोशनी
ये नज़र-नज़र के चिराग़ हैं, कहीं बुझ गए कहीं जल गए
जो संभल-संभल के बहक गए, वो फ़रेब ख़ुर्द-ए-राह थे
वो मक़ाम-ए-इश्क़ को पा गए, जो बहक-बहक के संभल गए
जो खिले हुए हैं रविश-रविश, वो हज़ार हुस्न-ए-चमन सही
मगर उन गुलों का जवाब क्या जो कदम-कदम पे कुचल गए
न है शायर अब ग़म-ए-नौ-ब-नौ न वो दाग़-ए-दिल न आरज़ू
जिन्हें एतमाद-ए-बहार था, वो ही फूल रंग बदल गए
(हबीब: मेहबूब, शिकस्त-ए-दीद: नज़र की हार, लतीफ़-ओ-जमील: आकर्षक और आनन्ददायक, खिज़ा: पतझड़, तीरगी: अन्धेरा, ख़ुर्द: सूक्ष्म, रविश: बग़ीचे के बीच छोटे-छोटे रास्ते, नौ-ब-नौ: ताज़ा, एतमाद: पक्का यक़ीन)
---शायर लखनवी
Tuesday, January 1, 2013
सौ में सत्तर आदमी
सौ में सत्तर आदमी
फिलहाल जब नाशाद है
दिल पे रखकर हाथ कहिये
देश क्या आजाद है। सौ में सत्तर …
कोठियों से मुल्क के
मेयार को मत आंकिये
असली हिंदुस्तान तो
फुटपाथ पर आबाद है । सौ में सत्तर आदमी ….
सत्ताधारी लड़ पड़े है
आज कुत्तों की तरह
सूखी रोटी देखकर
हम मुफ्लिसों के हाथ में ! सौ में सत्तर आदमी …
जो मिटा पाया न अब तक
भूख के अवसाद को
दफन कर दो आज उस
मफ्लूश पूंजीवाद को । सौ में सत्तर आदमी…
बुढा बरगद साक्षी है
गावं की चौपाल पर
रमसुदी की झोपडी भी
ढह गई चौपाल में । सौ में सत्तर आदमी…
जिस शहर के मुन्तजिम
अंधे हों जलवामाह के
उस शहर में रोशनी की
बात बेबुनियाद है । सौ में सत्तर आदमी…
जो उलझ कर रह गई है
फाइलों के जाल में
रोशनी वो गांव तक
पहुँचेगी कितने साल में । सौ में सत्तर आदमी…
लेखक ----- अदम गोंडवी
फिलहाल जब नाशाद है
दिल पे रखकर हाथ कहिये
देश क्या आजाद है। सौ में सत्तर …
कोठियों से मुल्क के
मेयार को मत आंकिये
असली हिंदुस्तान तो
फुटपाथ पर आबाद है । सौ में सत्तर आदमी ….
सत्ताधारी लड़ पड़े है
आज कुत्तों की तरह
सूखी रोटी देखकर
हम मुफ्लिसों के हाथ में ! सौ में सत्तर आदमी …
जो मिटा पाया न अब तक
भूख के अवसाद को
दफन कर दो आज उस
मफ्लूश पूंजीवाद को । सौ में सत्तर आदमी…
बुढा बरगद साक्षी है
गावं की चौपाल पर
रमसुदी की झोपडी भी
ढह गई चौपाल में । सौ में सत्तर आदमी…
जिस शहर के मुन्तजिम
अंधे हों जलवामाह के
उस शहर में रोशनी की
बात बेबुनियाद है । सौ में सत्तर आदमी…
जो उलझ कर रह गई है
फाइलों के जाल में
रोशनी वो गांव तक
पहुँचेगी कितने साल में । सौ में सत्तर आदमी…
लेखक ----- अदम गोंडवी
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