Jan 12, 2026

पाँच साल

पाँच सालों में
उग आता है
बाप की आँखों में मोतियाबिंद
जम जाती हैं
माँ के चेहरे पर झुर्रियाँ
चल बसता है दादा
बिस्तर पकड़ लेती है दादी
रिश्तेदार बदल लेते हैं घर

पाँच सालों में गुज़र जाते हैं
सैकड़ों हंगामे अख़बार सीखा देते हैं
लोगों को नुकीली ज़बान
लाशों के नज़ारे बढ़ा देते हैं
खून की प्यास
घरों के मलबों पर नाचने लगते हैं तमाशबीन

ज़हरीली चरस खींच कर 
समाज हो जाता है सुन्न 
अंदर और बाहर से 
देश हो जाता हैं ठूंठ

पाँच सालों में हो जाता है 
बहुत कहने को 
सब कुछ ही हो जाता है 
हंगामों की अफ़रा-तफ़री में बस... 

नहीं होता अदालत में
एक ख़ास मुक़दमा
या किसी हाक़िम की हिम्मत
कि वो दे सके ज़मानत

पाँच सालों में 
सिर्फ़ ये ही नहीं हो पाता
हमेशा बस होते-होते रह जाता है

- हुसैन हैदरी

Jan 8, 2026

WHAT TO SAY TO THOSE WHO THINK YOU’RE A FOOL FOR CHOOSING POETRY

Tell them yes.
Tell them poetry is what chose you.
Tell them
you had a night, once,
just as they did,
when you knelt alone on the cold tiles
and asked the night
to give you a reason for being.
Tell them the answer was your life.
Tell them we are nothing, nothing
without passion,
the wild dark flock
that fills our rooms with joy.
Tell them
you will give the rest of your blazing days
to try to give another life
that moment,
that moment when you opened
to the coldness
and found that the music of your ruin
was too beautiful to ever be destroyed.

--- Joseph Fasano

Jan 4, 2026

रहीम के 25 अमर दोहे: सरल भाषा में विस्तृत अर्थ


1. अब रहीम मुश्किल पड़ी, गाढ़े दोऊ काम।
सांचे से तो जग नहीं, झूठे मिलें न राम॥

विस्तृत अर्थ: जब मनुष्य पर कठिन समय आता है, तब सच्चाई का साथ देने वाला समाज नहीं मिलता और झूठ का सहारा लेने पर ईश्वर भी प्राप्त नहीं होते। अर्थात विपत्ति में मनुष्य अकेला पड़ जाता है।

2. वे रहीम नर धन्य हैं, पर उपकारी अंग।
बाटनवारे को लगे, ज्यों मेंहदी को रंग॥

विस्तृत अर्थ: उपकारी व्यक्ति चाहे कितना ही बाँट दिया जाए, उसका गुण और प्रभाव कभी कम नहीं होता, जैसे मेहंदी बाँटने पर भी अपना रंग छोड़ती है।

3. रहिमन पानी राखिए, बिन पानी सब सून।
पानी गए न ऊबरै, मोती, मानुष, चून॥

विस्तृत अर्थ:: यहाँ ‘पानी’ का अर्थ मर्यादा, लज्जा और आत्मसम्मान से है। इनके बिना मनुष्य, मोती और चूना—सबका मूल्य नष्ट हो जाता है।

4. रहिमन निज मन की व्यथा, मन ही राखो गोय।
सुनि अठलैहैं लोग सब, बाँटि न लेहैं कोय॥

विस्तृत अर्थ: अपनी पीड़ा सबको बताने से लोग मज़ाक तो उड़ाते हैं, पर दुख बाँटने या सहायता करने कोई आगे नहीं आता।

5. जो बड़ेन को लघु कहे, नहिं रहीम घट जाय।
गिरधर मुरलीधर कहे, कछु दुख मानत नाह॥

विस्तृत अर्थ: महान व्यक्ति छोटे नाम या साधारण संबोधन से छोटा नहीं हो जाता, जैसे कृष्ण को कोई भी नाम कहे, उनकी महत्ता कम नहीं होती।

6. समय लाभ सम लाभ नहिं, समय चूक सम चूक।
चतुरन चित रहीम लगी, समय चूक कछु चूक॥

विस्तृत अर्थ: समय का सदुपयोग सबसे बड़ा लाभ है और समय चूक जाना सबसे बड़ा नुकसान, क्योंकि समय हाथ से निकल जाए तो अवसर लौटकर नहीं आते।

7. ए रहीम दर दर फिरहिं, माँगि मधुकरी खाहिं।
यारो यारी छोड़िये, वे रहीम अब नाहिं॥

विस्तृत अर्थ: जो व्यक्ति स्वाभिमान छोड़कर दर-दर भीख माँगता फिरता है, उससे मित्रता छोड़ देनी चाहिए, क्योंकि वह अपना आत्मसम्मान खो चुका होता है।

8. रहिमन वे नर मर चुके, जे कहुँ माँगन जाहिं।
उनते पहिले वे मुए, जिन मुख निकसत नाहिं॥

विस्तृत अर्थ:: माँगकर जीना आत्मसम्मान की मृत्यु है; पर उससे भी पहले वे मर चुके हैं जिनके मुख से ‘न’ शब्द नहीं निकलता।

9. जो रहीम उत्तम प्रकृति, का करि सकत कुसंग।
चन्दन विष व्यापत नहीं, लिपटे रहत भुजंग॥

विस्तृत अर्थ: अच्छे स्वभाव वाला व्यक्ति बुरी संगति में रहकर भी अपना गुण नहीं खोता, जैसे चंदन पर लिपटा साँप भी उसे विषैला नहीं बना पाता।

10. रहिमन प्रीति न कीजिए, जस खीरा ने कीन।
ऊपर से तो दिल मिला, भीतर फांकें तीन॥

विस्तृत अर्थ:: जो प्रेम केवल दिखावे का हो, उसमें भीतर से टूटन होती है; ऐसा प्रेम अंत में धोखा ही देता है।

11. तरुवर फल नहिं खात है, सरवर पियहि न पान।
कहि रहीम पर काज हित, संपति संचहि सुजान॥

विस्तृत अर्थ:: जैसे पेड़ अपने फल नहीं खाते और तालाब अपना पानी नहीं पीते, वैसे ही सज्जन व्यक्ति अपनी संपत्ति दूसरों के कल्याण के लिए संचित करता है।

12. रूठे सुजन मनाइए, जो रूठे सौ बार।
रहीमन फिरि फिरि पोइए, टूटे मुक्ता हार॥

विस्तृत अर्थ: अच्छे और सज्जन लोगों से संबंध टूटने न दें, क्योंकि वे टूटे मोती के हार जैसे होते हैं जिन्हें फिर से पिरोना चाहिए।

13. क्षमा बड़न को चाहिए, छोटन को उत्पात।
कह रहीम हरि का घट्यौ, जो भृगु मारी लात॥

विस्तृत अर्थ: क्षमा केवल महान लोगों का गुण है; क्रोध करना छोटे मन का लक्षण है | उदाहरण के रूप में वे कहते हैं कि जब महर्षि भृगु ने भगवान विष्णु को पैर मारा, तब भी भगवान ने क्रोध नहीं किया, बल्कि उनके पैर दबाने लगे। 

14. रहिमन धागा प्रेम का, मत तोड़ो चटकाय।
टूटे से फिर ना जुड़े, जुड़े गाँठ पड़ जाय॥

विस्तृत अर्थ: प्रेम का संबंध बहुत नाज़ुक होता है; एक बार टूट जाए तो दोबारा जुड़ने पर भी उसमें गाँठ रह जाती है।

15. एकही साधे सब सधै, सब साधे सब जाय।
रहिमन मूल सींच बोये, फूल लहि अघाय॥

विस्तृत अर्थ: यदि मूल कारण पर ध्यान दिया जाए तो सभी कार्य सफल हो जाते हैं; इधर-उधर भटकने से सब कुछ नष्ट हो जाता है।

16. रहिमन ओछे नरन सो, बैर भली न कीत।
काटे चाटे स्वान के, दोऊ भाँति ती प्रतीत॥

विस्तृत अर्थ: नीच व्यक्ति से शत्रुता दोनों ही स्थितियों में नुकसानदायक होती है, चाहे वह नुकसान करे या दिखावटी प्रेम दिखाए।

17. जो रहीम गति दीप की, कुल कपूत गति सोय।
बारे उजियारो करे, बढ़े अँधेरो होय॥

विस्तृत अर्थ: कुपुत्र परिवार का नाम रोशन करने के बजाय बदनामी लाता है, जैसे दीपक बुझने पर अंधकार बढ़ जाता है।

18.  रहिमन चुप हो बैठिए, देखि दिनन को फेर।
जब नीके दिन आइहैं, बनत न लागै बेर॥

विस्तृत अर्थ: बुरे समय में धैर्य और मौन रखना चाहिए, क्योंकि अच्छे दिन आने पर परिस्थितियाँ स्वयं सुधर जाती हैं।

19. रहिमन प्रेम न छाँड़िए, लघु जन जानि।
कूँजा पथिक न छोड़ई, देखि बावड़ी पानी॥

विस्तृत अर्थ: छोटे व्यक्ति या छोटे साधन को तुच्छ न समझें, क्योंकि संकट में वही सहारा बन सकता है।

20. रहिमन मीत बनाइए, कठिन समय के काम।
आपत्ति काज न आवहीं, संपत्ति साँचि सुजान॥

विस्तृत अर्थ: सच्चे मित्र वही होते हैं जो संकट में साथ दें; धन केवल सुरक्षित रखा जा सकता है, मदद नहीं कर सकता।

21. रहिमन गति अगम्य है, प्रेम की रीति अपार।
दादुर डूबे पंक में, मीन न उबरै पार॥

विस्तृत अर्थ: प्रेम की शक्ति और उसकी गति को समझना कठिन है; इसमें अयोग्य डूब जाते हैं और योग्य भी पार नहीं पा पाते।

22. रहिमन जिह्वा बावरी, कह गई सरग पाताल।
आप तो कह भीतर रही, जूता खात कपाल॥

विस्तृत अर्थ: असंयमित वाणी मनुष्य को अपमान और संकट में डाल देती है, जबकि बोलने वाली जिह्वा स्वयं सुरक्षित रहती है।

23. रहिमन हानि लाभ जीवन मरण, यश अपयश विधि हाथ।
जेति बने तित होइये, एहि विधि रहीम रीत॥

विस्तृत अर्थ: लाभ-हानि, जीवन-मरण और मान-अपमान सब विधि के हाथ में हैं; इसलिए जो मिले उसे स्वीकार करना चाहिए।

24. 
ओछो काम बड़े करैं तौ न बड़ाई होय।
ज्‍यों रहीम हनुमंत को, गिरधर कहै न कोय॥

विस्तृत अर्थ: यदि कोई छोटा या सामान्य व्यक्ति कोई बड़ा काम करता है, तो भी उसकी बड़ाई नहीं होती, जैसे हनुमान को कोई कृष्ण (गिरधर) नहीं कहता।

25. रहिमन यह तन विष की बेलरी, गुरु अमृत की खान।
सीस दिए जो गुरु मिले, तो भी सस्ता जान॥

विस्तृत अर्थ: यह शरीर नश्वर और विष के समान है, जबकि गुरु का ज्ञान अमृत तुल्य है; गुरु के लिए जीवन भी न्योछावर करना सस्ता सौदा है।


“बचपन में पिता जी ने ये दोहे सिखाए थे—आज समझ आता है कि ये सिर्फ़ कविता नहीं, जीवन के सबसे गहरे पाठ थे।”

Dec 31, 2025

UP Board Hindi Book "महान व्यक्तित्व" (पूर्व नाम – हमारे पूर्वज) के प्रेरक दोहे

1. चढ़ै टरै सूरज टरै, टरै जगत व्यवहार। पै दृढ़ हरिचंद को, टरै न सत्य विचार।।

2. नौ लख पातर आगे नाचै, पीछे सहज अखाड़ा।  ऐसो मन लै जोगी खेलै तव अंतर बसै भंडारा।।   गोरखनाथ

3. गोरी सोवे सेज पर, मुख पर डारै केस। चल खुसरो घर आपल्या, साँझ भई चहुँ देस।। – अमीर खुसरो

4. परहित सरिस धरम नहि भाई। पर पीड़ा सम नहि अधमाई।। – तुलसीदास

5. सुरतिय, नरतिय, नागतिय, यह चाहत सब कोय। गोद लिए लली फिरै, तुलसी सो सुत होय।। – तुलसीदास

6. हे री! मैं तो प्रेम दिवानी, मेरो दरद न जाने कोय।  सूली ऊपर सेज हमारी, सोवण कोन विध होय।। – मीराबाई

7. मेरे तो गिरधर गोपाल, दूसरो न कोई। जाके सिर मोर मुकुट, मेरो पति सोई।।-  मीराबाई

8. चकित में रहिमन रहै, रहिमन जब पर विपदा पड़े। अवध नरेस वह आवत यह देस।। – रहीम

9. जो गरीब सहत कर, कहाँ सुदामा‑धन रहीम? वे बापुरे लोग, कृष्ण मथाई जोग। – रहीम

10. कबिरा हर के ठाठ ते, गु के सरन न जाइ। गु के ठाठ नित नवें, हर ठाढ़ रहें सहाइ॥ - कबीरदास

11. निंदक नियरे राखिए, आँगन कुटी छवाय।  बिन पानी, साबुन बिना, निर्मल करे सुभाय॥ -  कबीरदास

12. आजु जो हरिहि नहिं दुःख गहाऊँ, तौ लाज गंगा जननी को; शान्तनु सुत न कहाऊँ। -भीष्म प्रतिज्ञा

13. भला भयो विधि ना धियो शेषनाग के कान धरा मेरु सब डोलते तानसेन की तान ।

14. विद्या बिना मति गई, मति बिना गति गई, गति बिना नीति गई, नीति बिना वित्त गया, वित्त बिना शूद्र खचले।

15. अब न अहले वलवले हैं और न अरमानों की भीड़। एक मिट जाने की हसरत अब दिल-ए-बिस्मिल में है ।

16. कुछ आरजू नहीं है, है आरजू तो यह। रख दे कोई ज़रा सी ख़ाक़े वतन कफ़न में।

हमारे पूर्वज" (Hamare Purvaj) नाम की किताबें यूपी बोर्ड में पहले पढ़ाई जाती थीं, खासकर जूनियर कक्षाओं (जैसे कक्षा 6 - 8) में, लेकिन अब ये किताबों के नाम बदल गए हैं या इनका पाठ्यक्रम बदल गया है, और अब ये किताबें 'महान व्यक्तित्व' (Mahan Vyaktitva) जैसे नामों से या अन्य विषयों के तहत मिल सकती हैं, जो शुरुआती भारतीय इतिहास और पूर्वजों के बारे में जानकारी देती हैं

Dec 29, 2025

Picture - Kurdish Poem

Four children

a Turk, a Persian

an Arab and a Kurd were collectively drawing the picture of a man.

The first drew his head

The second drew his hands and upper limbs

The third drew his legs and torso

The fourth drew a gun on his shoulder

--- Sherko Bekas [1979]

Dec 27, 2025

Pind Apne Nu Jaanwa - Lyrics - Dharmendra Poem from Ikkis Movie

आज वी जी करदा पिंड अपने नू जावां
डोबे विच भड़कें मझियां नवावां

लेके दाती पैयां विचों पत्ते वी ल्यावां
मिटीयां च खेलना कबड्डी वाला खेल

पिंड वाली ज़िंदगी दा किहड़े नाल मेल
पंज दरियावां दा मीठा मीठा पानी

वगदी हवावां विच गुरूआं दी वाणी
ओ कदे बेबे वाली बुक्कल चित्त चे ਭੁਲੋणी

हां नी मायिये मेरिये मैं सदके तेरे जावां
आज वी जी करदा पिंड अपने नू जावां

आज वी जी करदा पिंड अपने नू जावां....


यह कविता धर्मेंद्र द्वारा स्वयं लिखी गई है, जो उनकी आखिरी फिल्म 'इक्कीस' (परम वीर चक्र विजेता अरुण खेतारपाल पर बायोपिक) में प्रस्तुत की गई। धर्मेंद्र का निधन 24 नवंबर 2025 को हो गया।कविता पिंड की मिट्टी, नदी के पानी, कबड्डी और मां के प्यार के प्रति गहरी लालसा व्यक्त करती है। 
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Aaj vi jee karda pind apne nu jaava
Dobbe vich bhadke majhiyan nawava

Leke daati paiyan vichon patthe v lyava
Mitiyan ch khedna kabadi wala khed

Pind wali zindagi da kihde naal mel
Panj dariyawan da mitha mitha pani

Vagdi hawaan vich guruan di vaani
O kade bebe wali bukkal chitt che bhuloni

Han ni maaye meriye mai sadke tere jaava
Aaj vi jee karda pind apne nu jaava

Aaj vi jee karda pind apne nu jaava....

Dec 24, 2025

अरावली के आख़िरी दिन

एक मधुमक्खी परागकणों के साथ

उड़ते-उड़ते थक जाएगी।

सभी बहेलिए जाल को देखकर

उलझन में पड़ जाएँगे।

एक नन्हा ख़रगोश लू की बौछार में

हाँफते-हाँफते थक जाएगा।

चेतना आकुलित बघेरे कहीं नहीं दिखेंगे

इस निरीह-निर्वसन धरती पर।

अरावली के आख़िरी दिन

युवतियाँ छाता लेकर सैर करने जाएँगी

और लॉन में टहलकर लौट आएँगी।

एक शराबी चंद्रमा की रोशनी में

बहेलिए बस्तियों की ओर लौटते नज़र आएँगे।

कुछ पीले चेहरे सब्ज़ियों के ठेले लेकर

मुहल्लों में रेंगते हुए आवाज़ें देंगे।

बिना तारों वाली सघन अँधेरी रात में

रावण-हत्थे की आवाज़ के साथ तैरेगी

बच रह गए एक गीदड़ की टीस।

और जिन्हें नीले नभ में बिजलियाँ चमकने,

बादल गरजने और वर्षा की बूँदों का इंतिज़ार है,

सूखे काले अँधेरे में आँख मिचमिचाते और

कानों में कनिष्ठिकाएँ हिलाते थक जाएँगे।

और जिन्हें किताबें पढ़ने का शौक होगा,

शब्दकोश में साँप का अर्थ ढूँढ़कर

अपने बच्चों को कालबेलिया जोगियों की कथा सुनाएँगे

और सुनहरे केंचुल ओढ़े कोई देवता

सितारों की ओट में धरती को भरी आँख से निर्निमेष निहारेगा।

हालाँकि बात ऐसी है


अरावली की कोई एक तस्वीर देखकर

सूरज और चाँद के नीचे सुन नहीं पाता कोई

कभी ख़त्म न होने वाली बिलख, जो हर

इमारत की नींव तले दबी फूटती रहती है।

बड़ी आलीशान इमारतों में खिलते रहते हैं

ख़ूबसूरत गुलाबों जैसे नन्हे शिशु

और इसीलिए किसी को विश्वास नहीं होता कि

अरावली के आख़िरी दिन अरावली ऐसी होगी?

अरावली के आख़िरी दिन ऐसा ज़रूर होगा

एक अवतारी पुरुष आएँगे

एक नबी पुकारेगा

लेकिन बात ऐसी है कि वे दोनों आईफ़ोन पर व्यस्त होंगे

उन्हें न धनिए, न हरी मिर्च, न मेथी, न आलू,

न टमाटर, न ज़ीरे और न हरे चने की ज़रूरत होगी,

क्योंकि उनके बैग में

मैक्डॉनल्ड के बर्गर, मैकपफ़ और सालसा रैप होंगे।

अरावली का इसके अलावा यहाँ और क्या अंत होगा?

अरावली का इसके अलावा वहाँ और क्या अंत होगा?

स्रोत :रचनाकार : त्रिभुवन

प्रकाशन : हिन्दवी के लिए लेखक द्वारा चयनित

सौरभ द्विवेदी ने कविता “अरावली के आख़िरी दिन” अपने अंदाज़ में पढ़ी है और इसे आज के अरावली के दर्द से जोड़ दिया है। 

संदर्भ : सुप्रीम कोर्ट ने नवंबर 2025 में अरावली पहाड़ियों की नई परिभाषा को मंजूरी दी, जिसमें 100 मीटर ऊंचाई से कम की पहाड़ियों को बाहर रखा गया, जिससे राजस्थान के 91% से अधिक क्षेत्र असुरक्षित हो गए। यह फैसला पर्यावरण मंत्रालय की सिफारिश पर आधारित था, लेकिन सुप्रीम कोर्ट की ही समिति (सीईसी) और भारतीय वन सर्वेक्षण (एफएसआई) ने इसका विरोध किया, क्योंकि इससे अवैध खनन को बढ़ावा मिलेगा।अरावली, जो दुनिया की सबसे प्राचीन पर्वतमाला है, दिल्ली-एनसीआर को रेगिस्तान से बचाती है, भूजल रिचार्ज करती है और जैव विविधता का केंद्र है, लेकिन पिछले दो दशक में 25-35% हिस्सा खनन से नष्ट हो चुका।ग्रामीणों, पर्यावरणविदों और आदिवासी समुदायों ने जयपुर, अलवर, उदयपुर जैसे क्षेत्रों में बड़े प्रदर्शन शुरू कर दिए, जहाँ गुर्जर-मेव किसान उपवास, जनसभाएँ और हस्ताक्षर अभियान चला रहे हैं।"अरावली विरासत जन अभियान" के तहत चार राज्यों के प्रतिनिधि खनन माफियाओं के खिलाफ एकजुट हुए, मांग की कि पूरी 692 किमी रेंज को पारिस्थितिक क्षेत्र घोषित कर नई खदानों पर पूर्ण रोक लगे।कार्यकर्ता राजेंद्र सिंह और नीलम अहुवालिया जैसे नेता चेतावनी दे रहे हैं कि यह फैसला मरुस्थलीकरण, जल संकट और प्रदूषण को बढ़ेगा, जबकि कोर्ट ने सस्टेनेबल माइनिंग प्लान तक नई लीज पर रोक का निर्देश दिया है।यह संघर्ष पर्यावरण रक्षा से आगे लोकतांत्रिक अधिकारों की लड़ाई बन गया है।

Dec 22, 2025

I am Kurdish ( أنا كردي )

I challenge poverty, privation, pain. 
I resist times of oppression with strength.
I have courage.
I do not love angel eyes, skin white as marble.
I love the rocks, the hills, the peaks lost among the clouds.
I challenge misfortune, misery, solitude 
And I shall never be a slave of the enemy, never grant him treaty!
I challenge batons, chains, torture. 
And even if my body lies torn in pieces,
With all my strength 
I shall scream: I am Kurdish.


Kurds are an ethnic group indigenous to a region called Kurdistan spanning parts of Turkey, Iraq, Iran, and Syria. They have long sought the creation of an independent Kurdish nation due to historic repression and the denial of autonomy. Despite partial autonomy in Iraq and Syria, the demand for a separate nation remains unresolved, with Kurdish nationalism still actively suppressed in several countries

Dec 19, 2025

यह वह बनारस नहीं गिंसबर्ग

'हाउल' नहीं गिंसबर्ग
परवर्ती पीढ़ी हमारी

नहीं मालूम जिसे क्यों कब
किसने लिखा कुछ पढ़कर सो कुछ लिखकर सो

देख रही बिकती बोटियाँ जिगर कीं
छह दो सात पाँच बोली न्यूयॉर्क-टोक्यो की

हाँ ऐलेन क्यों आए थे बनारस
यहाँ तो छूटा फॉर्टी सेकंड स्ट्रीट बहुत पीछे

कुत्तों ने किया हमेशा सड़कों पर संभोग यहाँ
रंग-बिरंगी नंगी रंभाएँ बेच रहा ईश्वर ख़ुराक आज़ादी के मसीहे की

चीत्कार इस पीढ़ी की नहीं बनेगी लंबी कविता नहीं बजेंगे ढोल
यह वह बनारस नहीं बीटनिक बहुत बड़ा गड्ढा है

रेंग रहा कीड़ा जिसमें
नहीं किसी और ग्रह का, मेरा ही दिमाग़ है लिंग है

हे भगवान चली गोलियाँ छत्तीसगढ़
भाई मेरा भूमिगत मैं क्यों गड्ढे में फिर

पाखंडी पीढ़ी मेरी
जाँघियों में खटमल-सी

भूखी बहुत भूखी
बनारस ले गए कहाँ तुम

जाएँ कहाँ हम छिपकर इन ख़ाली-ख़ाली तक़दीरों से
इन नंगे राजाओं से

कहाँ वह औरत वह मोक्षदात्री
बहुत प्यार है उससे

चाहा मैंने भी विवस्त्र उसे हे सिद्धार्थ
भूखे मरते मजूर वह क्यों फैलाती जाँघें

कहते कोई डर नहीं उसे एड्स का
बहुत दुखी इस पीढ़ी का पीछे छूटा यह बीमार

कई शीशों के बीच खड़ा ढोता लाशें अनगिनत
उठो औरतों प्यार करो हमसे

बना दो दीवार बाँध की हमें
कहो गिंसबर्ग कहो हमें गाने को यह गीत

बनारस नहीं आवाज़ हमारी अंतिम कविता
कहो।

--- लाल्टू

Dec 15, 2025

BORDERS



Adored land, my country,

a love that I had lost..

if you had been remote 

in an inaccessible sky

or at a summit of the world

I would have known 

how to run to you 

even with iron shoes.

But a narrow distance 

separates you from me..

The invader calls it a border.

--- Hemin Mukriyani

Kurds are an ethnic group indigenous to a region called Kurdistan spanning parts of Turkey, Iraq, Iran, and Syria. They have long sought the creation of an independent Kurdish nation due to historic repression and the denial of autonom. Despite partial autonomy in Iraq and Syria, the demand for a separate nation remains unresolved, with Kurdish nationalism still actively suppressed in several countries.