Friday, June 11, 2010

चुनरी में दाग

मनवा में मेरे आँधी है उठी, और स्तब्ध खड़ी हूँ मैं
सांसो में बाँध अपनी ही सांस, निशब्द खड़ी हूँ मैं

दुनिया से जीती जीती, खुद से हारी बर ध्वस्त खड़ी हूँ मैं
आइना में और अक्स में, मद मस्त खड़ी हूँ मैं

लागा चुनरी में दाग छुपाऊँ कैसे
लागा चुनरी में दाग
चुनरी में दाग छुपाऊँ कैसे, घर जाऊँ कैसे
लागा चुनरी में दाग

झम झम झम झम झमजवात
अंतर में गूँजे दिवस रात
एक शून्य शून्य कपटी विशाल
माया की दशे से लड़ती मैं भिड़ी
विश्वस्त खड़ी हूँ मैं
मेरी लाज में हूँ, चूनर भी मैं हूँ
चुनर पे दाग भी मैं

[ हो गयी मैली मोरी चुनरिया
कोरे बदन सी कोरी चुनरिया] - 2

हाँ जाके बाबुल से नजरें मिलाऊँ कैसे
घर जाऊँ कैसे

[लगा चुनरी में दाग छुपाऊँ कैसे] - 2

मैं ध्वस्त ध्वस्त, मैं नष्ट पष्ट
मैं सरल विरल, मैं अति विशिष्ट
मैं श्याम श्वेत, बादल में रेत
निर्झर सी झरी हूँ मैं
अंधियारी रात, दीपक में बाती
स्वपनिल सी खड़ी हूँ मै
कंचन की काया, अपना ही साया
बस खुद से डरी हूँ में
लकड़ी मैं गीली, थोड़ी सीली सीली
थम थम के जली हूँ मैं
मैं माया माया, मैं छाया छाया
आत्मा और काया मैं

[निशब्द खड़ी हूँ मैं] - 2
विश्वस्त खड़ी हूँ मैं
लागा चुनरी में दाग
सर्वत्र खड़ी हूँ मैं

लागा चुनरी में दाग
सर्वत्र खड़ी हूँ मैं

--- स्वानंद किरकिरे

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