Oct 12, 2026

किस अपराध पर उठीं थीं लाठियां...


किस अपराध में उठी थीं वे लाठियाँ...?

क्या इसलिए

कि कुछ लड़के-लड़कियाँ

अपनी बरबाद होती उम्र का हिसाब माँग रहे थे...?

या इसलिए

कि उन्होंने पूछ लिया था—कि 

अगर प्रश्नपत्र बाज़ार में बिक सकता है

तो फिर ईमानदारी 

किस विश्वविद्यालय में पढ़ाई जाती है...?

बताओ...

जिस हाथ में कलम होनी चाहिए थी

उसी हाथ पर लाठी के निशान क्यों हैं...?

वे नौकरी नहीं माँग रहे थे

न्याय माँग रहे थे...

वे कुर्सी नहीं माँग रहे थे

विश्वास माँग रहे थे...

वे किसी का अधिकार नहीं छीन रहे थे

वे अपना भविष्य वापस माँग रहे थे....

तुम कहते हो

देश युवाओं का है

फिर युवा अपना ही भविष्य माँगने

आज सड़कों पर क्यों खड़े हैं...?

जंतर-मंतर पर खड़े छात्र

सिर्फ़ छात्र नहीं थे...

वे अपने कंधों पर भविष्य का बस्ता नहीं 

पूरे देश की उम्मीद उठाए खड़े थे...

उनके हाथों में पत्थर नहीं थे

कुछ माँगें ,कुछ प्रश्न , कुछ सपनों के काग़ज़ थे

जो संविधान की रोशनी में पढ़े जाना चाहते थे...

लेकिन सत्ता ने

प्रश्नों की भाषा नहीं पढ़ी...

उसने उनकी

आवाज़ों को शोर लिख दिया

और सपनों को अपराध...

जंतर-मंतर

जहाँ कभी लोकतंत्र 

अपनी धड़कन सुनता था

वहीं आज

लाठी की आवाज़ नारों से ऊँची कर दी गई....

कैसा समय है यह...?

जहाँ

हक़ की आवाज़ अपराध है

और चुप रहना सबसे बड़ा पुरस्कार...

याद रखना...

जब-जब

किताबों से डरने लगती हैं सत्ताएँ

तब-तब इतिहास नई वर्णमाला लिखता है...

ज़ख्मों की स्याही कभी सूखती नहीं

वह एक घायल उँगली से निकलकर

सैकड़ों उँगलियों में फैल जाती है...

उँगलियाँ काँप सकती हैं

मगर इरादे नहीं...

और जिस दिन

इन उँगलियों की स्याही सड़कों पर फैल गई

उस दिन

तुम्हारी ऊँची कुर्सियों के पाए

अपने आप काँपने लगेंगे...

क्योंकि

छात्र भीड़ नहीं होते...

वे आने वाले समय की पहली पंक्ति होते हैं..

लाठियाँ

सिर्फ़ शरीरों को घायल कर सकती हैं

विचारों को नहीं...

स्याही पर पहरा नहीं लगाया जा सकता

सपनों को हथकड़ियाँ नहीं पहनाई जा सकतीं...

जिस दिन

युवा अपने प्रश्नों के साथ

इतिहास के दरवाज़े पर दस्तक देने लगें

उस दिन

सिंहासन नहीं बोलते

समय अपना फैसला सुनाता है....

#हरकीरत_हीर


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