When I left, I left my childhood in the drawer and on the kitchen table. I left my toy horse in its plastic bag.
I left without looking at the clock
I forget whether it was noon or evening.
Our horse spent the night alone,
no water, no grains for dinner.
It must have thought we'd left to cook a meal
for late guests or to
for late guests or make a cake for my sister's tenth birthday.
I walked with my sister towards our road with no end point. We sang a birthday song. The hovering warplanes echoed across the heaven.
My tired parents strolled behind, my father clutching to his chest the keys to our house and to the stable.
We arrived at a rescue station. News of ceaseless strikes roared on the radio. I hated death, but I hated life, too, when we had to walk to our prolonged death, reciting our never-ending ode.
As you prepare your breakfast, think of others (do not forget the pigeon’s food). As you conduct your wars, think of others (do not forget those who seek peace). As you pay your water bill, think of others (those who are nursed by clouds). As you return home, to your home, think of others (do not forget the people of the camps). As you sleep and count the stars, think of others (those who have nowhere to sleep). As you liberate yourself in metaphor, think of others (those who have lost the right to speak). As you think of others far away, think of yourself (say: “If only I were a candle in the dark”).
We deserve a better death. Our bodies are disfigured and twisted, embroidered with bullets and shrapnel. Our names are pronounced incorrectly on the radio and TV Our photos, plastered onto the walls of our buildings, fade and grow pale. The inscriptions on our gravestones disappear, covered in the feces of birds and reptiles. No one waters the trees that give shade to our graves. The blazing sun has overwhelmed our rotting bodies.
मेरे जीवन में एक ऐसा वक़्त आ गया है जब खोने को कुछ भी नहीं है मेरे पास— दिन, दोस्ती, रवैया, राजनीति, गपशप, घास और स्त्री हालाँकि वह बैठी हुई है मेरे पास कई साल से क्षमाप्रार्थी हूँ मैं काल से मैं जिसके सामने निहत्था हूँ निसंग हूँ— मुझे न किसी ने प्रस्तावित किया है न पेश। मंच पर खड़े होकर कुछ बेवक़ूफ़ चीख़ रहे हैं कवि से आशा करता है सारा देश। मूर्खों! देश को खोकर ही मैंने प्राप्त की थी यह कविता जो किसी की भी हो सकती है जिसके जीवन में वह वक़्त आ गया हो जब कुछ भी नहीं हो उसके पास खोने को। जो न उम्मीद करता हो न अपने से छल जो न करता हो प्रश्न न ढूँढ़ता हो हल। हल ढूँढ़ने का काम कवियों ने ऊबकर सौंप दिया है गणितज्ञ पर और उसने राजनीति पर। कहाँ है तुम्हारा घर? अपना देश खोकर कई देश लाँघ पहाड़ से उतरती हुई चिड़ियों का झुंड यह पूछता हुआ ऊपर-ऊपर गुज़र जाता है : कहाँ है तुम्हारा घर? दफ़्तर में, होटल में, समाचार-पत्र में, सिनेमा में, स्त्री के साथ खाट में? नावें कई यात्रियों को उतारकर वेश्याओं की तरह थकी पड़ी हैं घाट में।
मुझे दुख नहीं मैं किसी का नहीं हुआ। दुख है कि मैंने सारा समय हरेक का होने की कोशिश की। प्रेम किया। प्रेम करते हुए एक स्त्री के कहने पर भविष्य की खोज की और एक दिन सब कुछ पा लेने की सरहद पर दिखा एक द्वार: एक ड्राइंगरूम। भविष्य वर्तमान के लाउंज की तरह कहीं जाकर खुल जाता है।
रुको, कोई आता है सुनाई पड़ती है किसी के पैरों की चाप। कोई मेरे जूतों का माप लेने आ रहा है।
मेरे तलुए घिस गए हैं और फीतों की चाबुक हिला-हिला मैंने आस-पास की भीड़ को खदेड़ दिया है, भगा दिया है। औरों के साथ दग़ा करती है स्त्री मेरे साथ मैंने दग़ा किया है। पछतावा नहीं; यह एक क़ानून था जिसमें से होकर मुझे आना था। असल में यह एक बहाना था एक दिन अयोध्या से जाने का मैं अपने कारख़ाने का एक मज़दूर भी हो सकता था मैं अपना अफ़सोस ढो सकता था बाज़ार में लाने को बेचैन हो सकता था कविता सुनाने को फिर से एक बार इसे और उसे और उसे पाने को
लेकिन एक बार उड़ जाने के बाद इच्छाएँ लौटकर नहीं आतीं किसी और जगह पर घोंसले बनाती हैं विधवाएँ बुड़बुड़ाती हैं रँडापे पर तरस खाती हैं बुढ़ापे पर नौजवान स्त्रियाँ गली में ताक़-झाँक करती हैं चेचक और हैजे से मरती हैं बस्तियाँ कैंसर से हस्तियाँ वकील रक्तचाप से कोई नहीं मरता अपने-पाप से धुँआ उठ रहा है कई माह से। दिन चला जाता है मारकर छलाँग एक ख़रगोश-सा। बंद होने वाली दुकानों के दिल में रह जाता है कुछ-कुछ अफ़सोस-सा।
'रात भर चलती हैं रेलें ट्रक ढोते हैं माल रात भर कारख़ाने चलते हैं कामगार रहते हैं बेहोश होशमंद करवटें बदलते हैं रात भर अपराधी सोते हैं अपराधों का कोई सम्बन्ध अब अँधेरे से नहीं रहा सुबह सभी दफ़्तर खुलते हैं अपराध के'
मुश्किल है अपना मेल प्रिये, ये प्यार नहीं है खेल प्रिये मुश्किल है अपना मेल प्रिये, ये प्यार नहीं है खेल प्रिये तुम MA फर्स्ट डिविजन हो, मैं हुआ मेट्रिक फेल प्रिये मुश्किल है अपना मेल प्रिये, ये प्यार नहीं है खेल प्रिये
तुम फौजी अफसर की बेटी, मैं तो किसान का बेटा हूं तुम रबड़ी खीर मलाई हो, मैं तो सत्तू सपरेटा हूं तुम AC घर में रहती हो, मैं पेड़ के नीचे लेटा हूं तुम नई मारुती लगती हो, मैं स्कूटर लम्ब्रेटा हूं
इस कदर अगर हम छुप छुप कर, आपस में प्यार बढ़ाएंगे तो एक रोज तेरे डेडी, अमरीश पुरी बन जाएंगे सब हड्डी पसली तोड़ मुझे वो भिजवा देंगे जेल प्रिये मुश्किल है अपना मेल प्रिये, ये प्यार नहीं है खेल प्रिये
तुम अरब देश की घोड़ी हो, मैं हूं गदहे की नाल प्रिये तुम दीवाली का बोनस हो, मैं भूखों की हड़ताल प्रिये तुम हीरे जड़ी तश्तरी हो, मैं एल्युमिनियम का थाल प्रिये तुम चिकन सूप बिरयानी हो, मैं कंकड़ वाली दाल प्रिये
तुम हिरन चौकड़ी भरती हो, मैं हूं कछुए की चाल प्रिये तुम चंदन वन की लकड़ी हो, मैं हूं बबूल की छाल प्रिये मैं पके आम सा लटका हूं मत मारो मुझे गुलेल प्रिये मुश्किल है अपना मेल प्रिये, ये प्यार नहीं है खेल प्रिये
मैं शनि देव जैसा कुरूप, तुम कोमल कंचन काया हो मैं तन से मन से कांशीराम, तुम महा चंचला माया हो तुम निर्मल पावन गंगा हो, मैं जलता हुआ पतंगा हूं तुम राज घाट का शांति मार्च, मैं हिन्दू-मुस्लिम दंगा हूं
मैं ढाबे के ढांचे जैसा, तुम पांच-सितारा होटल हो मैं महुए का देसी ठर्रा, तुम ‘रेड लेबल’ की बोतल हो तुम चित्रहार का मधुर गीत, मैं कृषि दर्शन की झाड़ी हूं तुम विश्व सुन्दरी सी कमाल, मैं तेलिया-छाप कबाड़ी हूं
तुम सोनी का मोबाइल हो, मैं टेलीफोन वाला चोगा तुम मछली मनसरोवर की, मैं हूं सागर तट का घोंघा दस मंजिल से गिर जाऊंगा, मत आगे मुझे धकेल प्रिये मुश्किल है अपना मेल प्रिये, ये प्यार नहीं है खेल प्रिये
मुझको रेफ्री ही रहने दो, मत खेलो मुझसे खेल प्रिये मुश्किल है अपना मेल प्रिये, ये प्यार नहीं है खेल प्रिये