Dec 31, 2025
UP Board Hindi Book "महान व्यक्तित्व" (पूर्व नाम – हमारे पूर्वज) के प्रेरक दोहे
Dec 29, 2025
Picture - Kurdish Poem
Four children
a Turk, a Persian
an Arab and a Kurd were collectively drawing the picture of a man.
The first drew his head
The second drew his hands and upper limbs
The third drew his legs and torso
The fourth drew a gun on his shoulder
--- Sherko Bekas [1979]
Dec 27, 2025
Pind Apne Nu Jaanwa - Lyrics - Dharmendra Poem from Ikkis Movie
Dec 24, 2025
अरावली के आख़िरी दिन
एक मधुमक्खी परागकणों के साथ
उड़ते-उड़ते थक जाएगी।
सभी बहेलिए जाल को देखकर
उलझन में पड़ जाएँगे।
एक नन्हा ख़रगोश लू की बौछार में
हाँफते-हाँफते थक जाएगा।
चेतना आकुलित बघेरे कहीं नहीं दिखेंगे
इस निरीह-निर्वसन धरती पर।
अरावली के आख़िरी दिन
युवतियाँ छाता लेकर सैर करने जाएँगी
और लॉन में टहलकर लौट आएँगी।
एक शराबी चंद्रमा की रोशनी में
बहेलिए बस्तियों की ओर लौटते नज़र आएँगे।
कुछ पीले चेहरे सब्ज़ियों के ठेले लेकर
मुहल्लों में रेंगते हुए आवाज़ें देंगे।
बिना तारों वाली सघन अँधेरी रात में
रावण-हत्थे की आवाज़ के साथ तैरेगी
बच रह गए एक गीदड़ की टीस।
और जिन्हें नीले नभ में बिजलियाँ चमकने,
बादल गरजने और वर्षा की बूँदों का इंतिज़ार है,
सूखे काले अँधेरे में आँख मिचमिचाते और
कानों में कनिष्ठिकाएँ हिलाते थक जाएँगे।
और जिन्हें किताबें पढ़ने का शौक होगा,
शब्दकोश में साँप का अर्थ ढूँढ़कर
अपने बच्चों को कालबेलिया जोगियों की कथा सुनाएँगे
और सुनहरे केंचुल ओढ़े कोई देवता
सितारों की ओट में धरती को भरी आँख से निर्निमेष निहारेगा।
हालाँकि बात ऐसी है
अरावली की कोई एक तस्वीर देखकर
सूरज और चाँद के नीचे सुन नहीं पाता कोई
कभी ख़त्म न होने वाली बिलख, जो हर
इमारत की नींव तले दबी फूटती रहती है।
बड़ी आलीशान इमारतों में खिलते रहते हैं
ख़ूबसूरत गुलाबों जैसे नन्हे शिशु
और इसीलिए किसी को विश्वास नहीं होता कि
अरावली के आख़िरी दिन अरावली ऐसी होगी?
अरावली के आख़िरी दिन ऐसा ज़रूर होगा
एक अवतारी पुरुष आएँगे
एक नबी पुकारेगा
लेकिन बात ऐसी है कि वे दोनों आईफ़ोन पर व्यस्त होंगे
उन्हें न धनिए, न हरी मिर्च, न मेथी, न आलू,
न टमाटर, न ज़ीरे और न हरे चने की ज़रूरत होगी,
क्योंकि उनके बैग में
मैक्डॉनल्ड के बर्गर, मैकपफ़ और सालसा रैप होंगे।
अरावली का इसके अलावा यहाँ और क्या अंत होगा?
अरावली का इसके अलावा वहाँ और क्या अंत होगा?
स्रोत :रचनाकार : त्रिभुवन
प्रकाशन : हिन्दवी के लिए लेखक द्वारा चयनित
संदर्भ : सुप्रीम कोर्ट ने नवंबर 2025 में अरावली पहाड़ियों की नई परिभाषा को मंजूरी दी, जिसमें 100 मीटर ऊंचाई से कम की पहाड़ियों को बाहर रखा गया, जिससे राजस्थान के 91% से अधिक क्षेत्र असुरक्षित हो गए। यह फैसला पर्यावरण मंत्रालय की सिफारिश पर आधारित था, लेकिन सुप्रीम कोर्ट की ही समिति (सीईसी) और भारतीय वन सर्वेक्षण (एफएसआई) ने इसका विरोध किया, क्योंकि इससे अवैध खनन को बढ़ावा मिलेगा।अरावली, जो दुनिया की सबसे प्राचीन पर्वतमाला है, दिल्ली-एनसीआर को रेगिस्तान से बचाती है, भूजल रिचार्ज करती है और जैव विविधता का केंद्र है, लेकिन पिछले दो दशक में 25-35% हिस्सा खनन से नष्ट हो चुका।ग्रामीणों, पर्यावरणविदों और आदिवासी समुदायों ने जयपुर, अलवर, उदयपुर जैसे क्षेत्रों में बड़े प्रदर्शन शुरू कर दिए, जहाँ गुर्जर-मेव किसान उपवास, जनसभाएँ और हस्ताक्षर अभियान चला रहे हैं।"अरावली विरासत जन अभियान" के तहत चार राज्यों के प्रतिनिधि खनन माफियाओं के खिलाफ एकजुट हुए, मांग की कि पूरी 692 किमी रेंज को पारिस्थितिक क्षेत्र घोषित कर नई खदानों पर पूर्ण रोक लगे।कार्यकर्ता राजेंद्र सिंह और नीलम अहुवालिया जैसे नेता चेतावनी दे रहे हैं कि यह फैसला मरुस्थलीकरण, जल संकट और प्रदूषण को बढ़ेगा, जबकि कोर्ट ने सस्टेनेबल माइनिंग प्लान तक नई लीज पर रोक का निर्देश दिया है।यह संघर्ष पर्यावरण रक्षा से आगे लोकतांत्रिक अधिकारों की लड़ाई बन गया है।
Dec 22, 2025
I am Kurdish ( أنا كردي )
I have courage.
I do not love angel eyes, skin white as marble.
I love the rocks, the hills, the peaks lost among the clouds.
I challenge misfortune, misery, solitude
With all my strength
Dec 19, 2025
यह वह बनारस नहीं गिंसबर्ग
परवर्ती पीढ़ी हमारी
नहीं मालूम जिसे क्यों कब
किसने लिखा कुछ पढ़कर सो कुछ लिखकर सो
देख रही बिकती बोटियाँ जिगर कीं
छह दो सात पाँच बोली न्यूयॉर्क-टोक्यो की
हाँ ऐलेन क्यों आए थे बनारस
यहाँ तो छूटा फॉर्टी सेकंड स्ट्रीट बहुत पीछे
कुत्तों ने किया हमेशा सड़कों पर संभोग यहाँ
रंग-बिरंगी नंगी रंभाएँ बेच रहा ईश्वर ख़ुराक आज़ादी के मसीहे की
चीत्कार इस पीढ़ी की नहीं बनेगी लंबी कविता नहीं बजेंगे ढोल
यह वह बनारस नहीं बीटनिक बहुत बड़ा गड्ढा है
रेंग रहा कीड़ा जिसमें
नहीं किसी और ग्रह का, मेरा ही दिमाग़ है लिंग है
हे भगवान चली गोलियाँ छत्तीसगढ़
भाई मेरा भूमिगत मैं क्यों गड्ढे में फिर
पाखंडी पीढ़ी मेरी
जाँघियों में खटमल-सी
भूखी बहुत भूखी
बनारस ले गए कहाँ तुम
जाएँ कहाँ हम छिपकर इन ख़ाली-ख़ाली तक़दीरों से
इन नंगे राजाओं से
कहाँ वह औरत वह मोक्षदात्री
बहुत प्यार है उससे
चाहा मैंने भी विवस्त्र उसे हे सिद्धार्थ
भूखे मरते मजूर वह क्यों फैलाती जाँघें
कहते कोई डर नहीं उसे एड्स का
बहुत दुखी इस पीढ़ी का पीछे छूटा यह बीमार
कई शीशों के बीच खड़ा ढोता लाशें अनगिनत
उठो औरतों प्यार करो हमसे
बना दो दीवार बाँध की हमें
कहो गिंसबर्ग कहो हमें गाने को यह गीत
बनारस नहीं आवाज़ हमारी अंतिम कविता
कहो।
--- लाल्टू
Dec 15, 2025
BORDERS
Dec 10, 2025
खेले मसाने में होरी दिगम्बर
भुत पिसाच बटोरी दिगंबर खेले मसाने में होरी,
लखि सूंदर फागुनी झता के,
मन से रंग गुलाल हटा के,
चिता बसम की झोरी दिगंबर खेले मसाने में होरी,
नाचत गावत डमरू धारी,
छोडत सर पे गर्ल पिचकारी,
बीते प्रेत थपोरी दिगंबर खेले मसाने में होरी,
भुत नाथ की मंगल होरी,
देख सिहाये ब्रिज की छोरी,
धन धन नाथ अगोहरी,
दिगंबर खेले मसाने में होरी,
गोप न गोपी श्याम न राधा,
ना कोई रोक न कोहनू वाधा
न साजन न गोरी, दिगंबर खेले मसाने में होरी |
Dec 6, 2025
हिंदू मुस्लिम करने वाले देश के दुश्मन
हिंदू मुस्लिम करने वाले देश के दुश्मन
दूर दूर तक देख न पाने की मजबूरी
हिलते से आंखों के जाले देश के दुश्मन
बंद पड़े दरवाज़े, आख़िर कैसे खोलें
ज़हनों पर लटके से ताले देश के दुश्मन
ज़हर भरा सा राग लिये अपने होठों पर
बहुत बेसुरे, ये बेताले देश के दुश्मन
एक बार फिर चिता पे रोटी सेंक रहे हैं
बहते से नफ़रत के नाले देश के दुश्मन
दो पग चलना मुश्किल, बोलें तो क्या बोलें
पैरों और ज़बान के छाले देश के दुश्मन
तरह तरह के गड़बड़झाले देश के दुश्मन
फ़सल वोट की, रक्त सनी धरती की छाती
खादी पहने ये परकाले देश के दुश्मन
मां का आंचल तार तार करने में आगे
भारत मां के ये रखवाले देश के दुश्मन
राम नाम के ये मतवाले देश के दुश्मन
बड़ी आपदा इनकी ख़ातिर अवसर जैसी
बड़े अनोखे बड़े निराले देश के दुश्मन
--- यश मालवीय
Dec 2, 2025
Ame ni mo Makezu
Kaze ni mo makezu
Yuki ni mo natsu no atsusa ni mo makenu
Joubu na karada wo mochi
Yoku wa naku
Kesshite ikarazu
Itsumo shizuka ni waratte iru
Ichinichi ni genmai yon gou to
Miso to sukoshi no yasai wo tabe
Arayuru koto wo
Jibun wo kanjou ni irezuni
Yoku miki kishi wakari
Soshite wasurezu
Nohara no matsu no hayashi no kage no
Chiisana kayabuki no koya ni ite
Higashi ni byouki no kodomo areba
Itte kanbyou shite yari
Nishi ni tsukareta haha areba
Itte sono ine no taba wo oi
Minami ni shinisou na hito areba
Itte kowagaranakute mo ii to ii
Kita ni kenka ya soshou areba
Tsumaranai kara yamero to ii
Hideri no toki wa namida wo nagashi
Samusa no natsu wa orooro aruki
Minna ni dekunobou to yobare
Homerare mo sezu
Kuni mo sarezu
Sou iu mono ni
Watashi wa naritai
***
Be not defeated by the rain,
Nor let the wind prove your better.
Succumb not to the snows of winter,
Nor be bested by the heat of summer.
Be strong in body,
Unfettered by desire,
Not enticed to anger.
Cultivate a quiet joy.
Count yourself last in everything,
Put others before you.
Watch well and listen closely.
Hold the learned lessons dear.
A thatch-roof house, in a meadow,
Nestled in a pine grove’s shade.
If, to the East, a child lies sick:
Go forth and nurse him to health.
If, to the West, an old lady stands exhausted:
Go forth, and relieve her of burden.
If, to the South, a man lies dying:
Go forth with words of courage to dispel his fear.
If, to the North, an argument or fight ensues:
Go forth and beg them stop such a waste of effort and of spirit.
In times of drought, shed tears of sympathy.
In summer’s cold, walk in concern and empathy.
Stand aloof of the unknowing masses:
Better dismissed as useless than flattered as a “Great Man”.
This is my goal, the person I strive to become.
--- Kenji Miyazawa in original Japanese text, with a popular English translation by David Sulz

