Jan 27, 2026

कबीरदास के दोहे: सरल हिंदी में अर्थ


1. दुर्बल को न सताइए, जाकी मोटी हाय।
मरी खाल की साँस से, लोहा भस्म हो जाय॥

भावार्थ: कमजोर पर अत्याचार करने से स्वयं का नुकसान होता है।

2. मधुर वचन है औषधि, कटुक वचन है तीर।
मधुर वचन जो बोलिए, कटुक वचन मत तीर॥

भावार्थ: मीठा बोल इंसान और समाज को लाभ पहुंचाता है, कटु शब्द हानि पहुँचाते हैं।

3. बुरा जो देखन मैं चला, बुरा न मिलया कोय।
जो दिल खोजा आपना, मुझसे बुरा न कोय॥

भावार्थ: दूसरों की गलतियाँ देखने से बेहतर है खुद की आत्मा का निरीक्षण।

4. साधु ऐसा चाहिए, जैसा सूप सुभाय।
सार-सार को गहि रहे, थोथा देई उड़ाय॥

भावार्थ: सच्चा साधु वही है जो सार को अपनाए और व्यर्थ को छोड़ दे।

5. धीरे-धीरे रे मना, धीरे सब कुछ होय।
माली सींचे सौ घड़ा, ऋतु आए फल होय॥

भावार्थ: सब कुछ समय और प्रयास के साथ होता है; धैर्य आवश्यक है।

6. कबिरा मन निर्मल भया , जैसे गंगा नीर।
पीछे-पीछे हरि फिरै , कहत कबीर कबीर

भावार्थ: शुद्ध मन वाला व्यक्ति सच्चे भक्ति मार्ग पर चलता है।

7. पीर मरे, पैगम्बर मरि हैं, मरि हैं ज़िन्दा जोगी,
राजा मरि हैं, परजा मरि हैं, मरि हैं बैद और रोगी।
साधो ये मुरदों का गाँव !

भावार्थ: सभी जीवन अंतहीन हैं; मौत सभी को समान रूप से लेती है।

8. बिरहा बुरहा जिनि कहौ, बिरहा है सुलतान।
जा घट बिरह न संचरै, सो घट सदा मसान॥

भावार्थ: विरह का अनुभव ही जीवन में सच्ची चेतना देता है; जो विरह न जानता वह शून्य है।

9. राम बुलावा भेजिया, दिया कबीरा रोय।
जो सुख साधू संग में, सो बैकुंठ न होय॥

भावार्थ: भक्ति और संतों के साथ सुख ही वास्तविक स्वर्ग है।

10. मन मैला तन ऊजरा, बगुला कपटी अंग
तासों तो कौआ भला, तन मन एकही रंग

भावार्थ: यदि मन और तन अस्वच्छ हैं, बाहरी रूप का कोई लाभ नहीं।

11. नहाय, धोए क्या हुआ, जो मन मैल ना जाये;
मीन सदा जल में रहे, धोए बास ना जाये।

भावार्थ: बाहरी शुद्धि से कुछ नहीं होता, जब तक मन शुद्ध न हो।

12. जाति न पूछो साधु की, पूछ लीजिए ज्ञान।
मोल करो तरवार का, पड़ा रहन दो म्यान॥

भावार्थ: व्यक्ति की जाति नहीं, ज्ञान और कर्म महत्वपूर्ण हैं।

13. पोथी पढ़ि पढ़ि जग मुआ, पंडित भया न कोय;
ढाई आखर प्रेम का, पढ़े सो पंडित होय॥

भावार्थ: वास्तविक ज्ञान और पंडित वही है जो प्रेम को समझे।

14. बड़ा हुआ तो क्या हुआ जैसे पेड़ खजूर;
पंछी को छाया नहीं, फल लागे अति दूर॥

भावार्थ: ऊँचाई या पद से कुछ नहीं, यदि दूसरों के लिए उपयोगी न हो।

15. चलती चक्की देख कर, दिया कबीरा रोए;
दो पाटन के बीच में, सबूत बचा न कोए॥

भावार्थ: संसार की नश्वरता देखकर दुख होना स्वाभाविक है।

16. क़ल करे सो आज कर, आज करे सो अब;
पल में प्रलय भएगी, बहुरि करेगा कब॥

भावार्थ: समय की कीमत समझो, काम को टालना खतरे में डालता है।

17. माटी कहे कुम्हार से, तू क्या रौंदे मोहे;
एक दिन ऐसा आएगा, मैं रौंंदूँ तोहे॥

भावार्थ: जो कुछ हम दूसरों पर थोपते हैं, वही हमें भविष्य में भुगतना पड़ता है।

18. गुरु गोविंद दोऊ खड़े, काके लागूं पाय;
बलिहारी गुरु आपने, गोविंद दियो बताय॥

भावार्थ: गुरु के बिना ईश्वर का ज्ञान नहीं; गुरु ही मार्ग दिखाते हैं।

19. कंकर‑पत्थर जोड़ि के, मस्जिद लई बनाय।
ता चढ़ि मुल्ला बांग दे, क्या बहरा हुआ खुदाय॥

भावार्थ: ईश्वर भवनों में नहीं, बल्कि मनुष्य के मन में वास करता है।

20. माला फेरत जुग भया, गया न मन का फेर।
कर का मनका डार दे, मन का मनका फेर॥

भावार्थ: केवल कर्मकांड से नहीं, मन की शुद्धि से भक्ति सिद्ध होती है।

21. साईं इतना दीजिए, जामे कुटुंब समाय;
मैं भी भूखा न रहूँ, साधु भी भूखा न जाय॥

भावार्थ: भगवान से साधारण जीवन और संतुलित संसाधन की प्रार्थना।

22. कबीर मनहिं गयन्द है, अंकुश दै दै राखु ।
विष की बेली परिहारो, अमृत का फल चाखु ।।

भावार्थ: मन मस्ताना हाथी है, इसे ज्ञान का अंकुश देकर अपने वश में रखो और विषय - विष - लता को त्यागकर स्वरूप - ज्ञानामृत का शान्ति फल चखो।

23. मन के मते न चलिये, मन के मते अनेक।
जो मन पर असवार है, सो साधु कोई एक।।

भावार्थ: मन के मत में न चलो, क्योंकि मन के अनेको मत हैं। जो मन को सदैव अपने अधीन रखता है, वह साधु कोई विरला ही होता है।

24. जो सुख में सुमिरन करें, दुख काहे को होय। 
कबीर दुखिया काहे रे, राम बिछोड़ा होय॥

भावार्थ: जो सुख में भी ईश्वर का स्मरण करते हैं, उन्हें दुख क्यों होगा? कबीर कहते हैं कि दुख इसलिए होता है क्योंकि हम राम (ईश्वर) को भूल जाते हैं। 

25. मोंको कहाँ ढूँढे बंदे, मैं तो तेरे पास में।
 ना मैं देवल ना मैं मस्जिद, ना काबे कैलास में॥

भावार्थ: हे बंदे, मुझे कहाँ ढूंढते हो? मैं तो तुम्हारे पास ही हूँ। न मैं मंदिर में हूँ, न मस्जिद में, न काबा में और न कैलाश में। 

26. कबीरा खड़ा बजार में, मांगे सबकी खैर।
ना काहू से दोस्ती, ना काहू से बैर।।

भावार्थ:  कबीरदास बाजार (संसार) में खड़े होकर सभी का कल्याण चाहते हैं। न किसी से गहरी दोस्ती, न किसी से दुश्मनी— सभी के प्रति समान भाव रखना चाहिए।

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