Oct 21, 2026
To the rain
falling on fallow, on field and forest,
on house-roof, low hovel, high tower,
downwelling waters all-washing, wider
than cities, softer than sisterhood, vaster
than countrysides, calming, recalling:
return to us, teaching our troubled
souls in your ceaseless descent
to fall, to be fellow, to feel to the root,
to sink in, to heal, to sweeten the sea.
Oct 17, 2026
इतने भले नहीं बन जाना साथी
जितने भले हुआ करते हैं
सरकस के हाथी
गदहा बनने में लगा दी
अपनी सारी कूवत सारी प्रतिभा
किसी से कुछ लिया नहीं
न किसी को कुछ दिया
ऐसा भी जिया जीवन तो क्या जिया?
इतने दुर्गम मत बन जाना
संभव ही रह जाए न तुम तक
कोई राह बनाना
अपने ऊंचे सन्नाटे में सर धुनते रह गये
लेकिन किंचित भी जीवन का मर्म नहीं जाना
इतने चालू मत हो जाना
सुन-सुन कर हरकतें तुम्हारी पड़े हमें शरमाना
बग़ल दबी हो बोतल मुंह में जनता का अफ़साना
ऐसे घाघ नहीं हो जाना
ऐसे कठमुल्ले मत बनना
बात नहीं जो मन की तो बस
तन जाना
दुनिया देख चुके हो यारो
एक नज़र थोड़ा-सा अपने जीवन पर भी मारो
पोथी-पतरा-ज्ञान-कपट से बहुत बड़ा है मानव
कठमुल्लापन छोड़ो, उस पर भी तो तनिक विचारो
काफ़ी बुरा समय है साथी
गरज रहे हैं घन घमंड के नभ की फटती है छाती
अंधकार की सत्ता चिल-बिल
चिल-बिल मानव-जीवन
जिस पर बिजली रह-रह अपना चाबुक चमकाती
संस्कृति के दर्पण में ये जो शक्लें हैं मुस्काती
इनकी असल समझना साथी
अपनी समझ बदलना साथी
--- वीरेन डंगवाल
Oct 12, 2026
किस अपराध पर उठीं थीं लाठियां...
किस अपराध में उठी थीं वे लाठियाँ...?
क्या इसलिए
कि कुछ लड़के-लड़कियाँ
अपनी बरबाद होती उम्र का हिसाब माँग रहे थे...?
या इसलिए
कि उन्होंने पूछ लिया था—कि
अगर प्रश्नपत्र बाज़ार में बिक सकता है
तो फिर ईमानदारी
किस विश्वविद्यालय में पढ़ाई जाती है...?
बताओ...
जिस हाथ में कलम होनी चाहिए थी
उसी हाथ पर लाठी के निशान क्यों हैं...?
वे नौकरी नहीं माँग रहे थे
न्याय माँग रहे थे...
वे कुर्सी नहीं माँग रहे थे
विश्वास माँग रहे थे...
वे किसी का अधिकार नहीं छीन रहे थे
वे अपना भविष्य वापस माँग रहे थे....
तुम कहते हो
देश युवाओं का है
फिर युवा अपना ही भविष्य माँगने
आज सड़कों पर क्यों खड़े हैं...?
जंतर-मंतर पर खड़े छात्र
सिर्फ़ छात्र नहीं थे...
वे अपने कंधों पर भविष्य का बस्ता नहीं
पूरे देश की उम्मीद उठाए खड़े थे...
उनके हाथों में पत्थर नहीं थे
कुछ माँगें ,कुछ प्रश्न , कुछ सपनों के काग़ज़ थे
जो संविधान की रोशनी में पढ़े जाना चाहते थे...
लेकिन सत्ता ने
प्रश्नों की भाषा नहीं पढ़ी...
उसने उनकी
आवाज़ों को शोर लिख दिया
और सपनों को अपराध...
जंतर-मंतर
जहाँ कभी लोकतंत्र
अपनी धड़कन सुनता था
वहीं आज
लाठी की आवाज़ नारों से ऊँची कर दी गई....
कैसा समय है यह...?
जहाँ
हक़ की आवाज़ अपराध है
और चुप रहना सबसे बड़ा पुरस्कार...
याद रखना...
जब-जब
किताबों से डरने लगती हैं सत्ताएँ
तब-तब इतिहास नई वर्णमाला लिखता है...
ज़ख्मों की स्याही कभी सूखती नहीं
वह एक घायल उँगली से निकलकर
सैकड़ों उँगलियों में फैल जाती है...
उँगलियाँ काँप सकती हैं
मगर इरादे नहीं...
और जिस दिन
इन उँगलियों की स्याही सड़कों पर फैल गई
उस दिन
तुम्हारी ऊँची कुर्सियों के पाए
अपने आप काँपने लगेंगे...
क्योंकि
छात्र भीड़ नहीं होते...
वे आने वाले समय की पहली पंक्ति होते हैं..
लाठियाँ
सिर्फ़ शरीरों को घायल कर सकती हैं
विचारों को नहीं...
स्याही पर पहरा नहीं लगाया जा सकता
सपनों को हथकड़ियाँ नहीं पहनाई जा सकतीं...
जिस दिन
युवा अपने प्रश्नों के साथ
इतिहास के दरवाज़े पर दस्तक देने लगें
उस दिन
सिंहासन नहीं बोलते
समय अपना फैसला सुनाता है....
#हरकीरत_हीर
Oct 9, 2026
"गीतावचनामृतान" अर्थात् श्रीमद्भगवद्गीता के अमृतमय श्लोक और हिन्दी अर्थ
वेत्तासि वेद्यं च परं च धाम, त्वया तं विश्वमनन्तरूपं॥११॥
हिन्दी अर्थ: हे भगवान! आप आदिदेव, पुरातन पुरुष हैं। यह सृष्टि आपसे ही उत्पन्न होती है। आप ही सबका जानने वाले और परम उद्देश्य हैं। आपसे ही यह विश्व अनंत रूप में व्याप्त है।
2. यदा यदा हि धर्मस्य ग्लानिर्भवति भारत। अभ्युत्थानमधर्मस्य तदात्मानं सृजाम्यहम्॥
हिन्दी अर्थ: हे अर्जुन! जब-जब धरती पर धर्म की कमी और अधर्म का उदय होता है, तब-तब मैं अपने आपको अवतरित करता हूं। सदाचारियों की रक्षा, दुष्टों के विनाश और धर्म की पुनः स्थापना के लिए मैं हर युग में जन्म लेता हूं।
3. यद्यदाचरति श्रेष्ठस्तत्तदेवेतरो जनः। स यत् प्रमाणं कुरुते लोकस्तदनुवर्तते॥
5. वासांसि जीर्णानि यथा विहाय, नवानि गृह्णाति नरोऽपराणि।
तथा शरीराणि विहाय जीर्ण - न्यानि संयाति नवानि देही॥
6. नैनं छिन्दन्ति शस्त्राणि नैनं दहति पावकः। न चैनं क्लेदयन्त्यापो न शोषयति मारुतः॥
हिन्दी अर्थ: इस आत्मा को शस्त्र काट नहीं सकते, अग्नि जला नहीं सकती, जल गला नहीं सकता और वायु सुखा नहीं सकती।
7. कर्मण्येवाधिकारस्ते मा फलेषु कदाचन। मा कर्मफलहेतुर्भूः मा ते सङ्गोऽस्त्वकर्मणि॥१७॥
हिन्दी अर्थ: तेरा अधिकार केवल कर्म करने में है, उसके फल में कभी नहीं। कर्म का फल पाने की इच्छा न कर और अकर्म में भी तेरा आकर्षण न हो।
8. चञ्चलं हि मन: कृष्ण! प्रमाथि बलवद्दृढम्। तस्याहं निग्रहं मन्ये वायोरिव सुदुष्करम्॥
हिन्दी अर्थ: हे कृष्ण! यह मन अत्यंत चंचल, बलशाली और हठी है, इसे वश में करना वायु को वश में करने के समान कठिन है।
9. काम एष क्रोध एष रजोगुणसमुद्भव:। महाशनो महापाप्मा विद्ध्येनमिह वैरिणम्॥
हिन्दी अर्थ: यह काम (इच्छा) और क्रोध रजोगुण से उत्पन्न होते हैं। ये महान भक्षक और महान पाप हैं, इन्हें इसी जीवन में अपना शत्रु समझो।
10. त्रिविधं नरकस्येदं द्वारं नाशनमात्मन:। काम: क्रोधस्तथा लोभस्तस्मात् एतत्त्रयं त्यजेत्॥
हिन्दी अर्थ: काम, क्रोध और लोभ — ये तीन नरक के द्वार हैं, जो आत्मा का नाश करते हैं। अत: व्यक्ति को इनका त्याग करना चाहिए।
11. सर्वधर्मान् परित्यज्य मामेकं शरणं व्रज। अहं त्वां सर्वपापेभ्यो मोक्षयिष्यामि मा शुच:॥
हिन्दी अर्थ: सभी कर्तव्यों को छोड़ कर केवल मेरी (भगवान की) शरण में आ जाओ, मैं तुम्हें सभी पापों से मुक्त कर दूँगा, चिंता मत करो।
Oct 3, 2026
सकल हंस में राम बिराजे
टेक:
सकल हंस में राम बिराजे, राम बिना कोई धाम नहीं।
सब ब्रह्माण्ड में जोत का वासा, राम को सुमरू दूजा नहीं।।
1.
तीन गुण पर तेज हमारा, पांच तत्व पर जोत जले
जिनका उजाला चौदह लोक में, सूरत डोर आकास चढ़े।
सकल हंस में राम बिराजे, राम बिना कोई धाम नहीं।
सब ब्रह्माण्ड में जोत का वासा, राम को सुमरू दूजा नहीं।।
2.
नाभि कमल से परख लेना, हिरदे कमल बिच फिरे मणी
अनहद बाजा बाजे शहर में, ब्रह्माण्ड पर आवाज हुई।
सकल हंस में राम बिराजे, राम बिना कोई धाम नहीं।
सब ब्रह्माण्ड में जोत का वासा, राम को सुमरू दूजा नहीं।।
3.
हीरा मोती लाल जवारत, प्रेम पदारथ परखों यहीं
साँचा मोती सुमर लेना, राम धणी से म्हारी डोर लगी।।
सकल हंस में राम बिराजे, राम बिना कोई धाम नहीं।
सब ब्रह्माण्ड में जोत का वासा, राम को सुमरू दूजा नहीं।।
4.
गुरू जन होय तो हेरी लो घट में, बाहर शहर में भटको मति
गुरू प्रताप नानक सा का वरणे, भीतर बोले कोई दूजो नहीं।
सकल हंस में राम बिराजे, राम बिना कोई धाम नहीं।
सब ब्रह्माण्ड में जोत का वासा, राम को सुमरू दूजा नहीं।।
Sep 30, 2026
15 बेहतरीन शेर - 25 !!!
Sep 28, 2026
अग्निपथ! अग्निपथ! अग्निपथ!
वृक्ष हों भले खड़े,
हों घने, हों बड़े,
एक पत्र छाँह भी
मांग मत! मांग मत! मांग मत!
अग्निपथ! अग्निपथ! अग्निपथ!
तू न थकेगा कभी,
तू न थमेगा कभी,
तू न मुड़ेगा कभी,
कर शपथ! कर शपथ! कर शपथ!
अग्निपथ! अग्निपथ! अग्निपथ!
यह महान दृश्य है,
चल रहा मनुष्य है,
अश्रु, स्वेद, रक्त से
लथ-पथ, लथ-पथ, लथ-पथ,
अग्निपथ! अग्निपथ! अग्निपथ!
Sep 24, 2026
Was It Necessary?
For my heart to drop like an unripe apple
From the orphan branch on the family tree
So they can discover the law of love?
For the pest to spread,
With its manicured nails
And its glamorous necktie,
To bury the newborn babies
Before they are given suitable names?
Was it necessary to have
All this beastly terror,
Flooding like the moon,
All this lunar silence?
For us to turn backwards
To all these centuries?
--- Samih Al-Qasim
Sep 21, 2026
तू भी है राणा का वंशज फेंक जहां तक भाला जाए
दूध छीन बच्चों के मुख से
क्यों नागों को पाला जाए
दोनों ओर लिखा हो भारत
सिक्का वही उछाला जाए
तू भी है राणा का वंशज
फेंक जहां तक भाला जाए
फिर शीशे में ढाला जाए
तेरे मेरे दिल पर ताला
राम करें ये ताला जाए
वाहिद के घर दीप जले तो
मंदिर तलक उजाला जाए
--- वाहिद अली वाहिद
Sep 19, 2026
ब्रम्हांड Serial Title Song - Doordarshan
आकाश बहुत ऊंचा है
और दूर बहुत हैं तारे
फिरते हुए सैकड़ों सूरज
ब्रह्मांड के ये बंजारे
सदियों के भंवर बहते हैं
अनगिनत हैं समय के धारे
और नीला सा एक मोती
कहते हैं ज़मीं, हम सारे
छोटी सी बूंद सी धरती
सागर से कहीं गहरी है
आकाश की गंगा में ये बजरे की तरह बहती है
आकाश बहुत ऊंचा है
- गुलज़ार
#Gulzar #SureshWadkar #RaghunathSeth
Sep 15, 2026
आंधियां आती थीं लेकिन कभी ऐसा न हुआ...
आँधियाँ आती थीं लेकिन कभी ऐसा न हुआ
ख़ौफ़ के मारे जुदा शाख़ से पत्ता न हुआ
रूह ने पैरहन-ए-जिस्म बदल भी डाला
ये अलग बात किसी बज़्म में चर्चा न हुआ
रात को दिन से मिलाने की हवस थी हम को
काम अच्छा न था अंजाम भी अच्छा न हुआ
वक़्त की डोर को थामे रहे मज़बूती से
और जब छूटी तो अफ़्सोस भी इस का न हुआ
ख़ूब दुनिया है कि सूरज से रक़ाबत थी जिन्हें
उन को हासिल किसी दीवार का साया न हुआ
रईस अमरोह
Sep 11, 2026
The Sky
It's not bars you see but the sky overhead .
Yesterday's bread smells of mould and loss ,
but tomorrow's smells like genuine bread .
You say : the sky is a trick of the light .
But the bars are the trick of the light , I say !
Because bars are a hashtag , just a habit , right ?
And this is the hashtag trending today .
Yet the sky cares nothing for hashtags at all ,
the sky has no thought for trends up ahead ,
it does not feel the ground where our feet fall ,
nor count the centuries and slices of bread .
The sky just draws clouds of cotton wool over time
this is all that goes on really .
And the sky does not see any bars at all
when it peers deep into the sky in me .
Sep 8, 2026
IN NATURE'S CELL
Death is the sea,
the mountain, the breeze,
it blooms in fragments of love
and is crowned in every wedding the seasons tend.
Where can death go
to escape the face of man?
Man is the sea,
the mountain, the breeze,
he blooms in fragments of love
and is crowned in every wedding the seasons tend.
In nature's prison cell
they find themselves neighbors,
are forced to become fast friends:
death, and man.
Sep 4, 2026
मैं जिसे ओढ़ता-बिछाता हूँ
वो ग़ज़ल आपको सुनाता हूँ
एक जंगल है तेरी आँखों में
मैं जहाँ राह भूल जाता हूँ
तू किसी रेल-सी गुज़रती है
मैं किसी पुल-सा थरथराता हूँ
हर तरफ़ ऐतराज़ होता है
मैं अगर रौशनी में आता हूँ
एक बाज़ू उखड़ गया जबसे
और ज़्यादा वज़न उठाता हूँ
मैं तुझे भूलने की कोशिश में
आज कितने क़रीब पाता हूँ
कौन ये फ़ासला निभाएगा
मैं फ़रिश्ता हूँ सच बताता हूँ
--- दुष्यंत कुमार
Aug 31, 2026
माँ
कभी छोड़कर
जाती नहीं
जाती है तो
आँसुओं में
रह जाती है
जब तक दुख
बचा है मुझमें
कविता बची है
माँ है
--- पंकज चतुर्वेदी
Aug 26, 2026
So
Not about much of anything.
No more about anyone else than ourselves. Perhaps
not even of death, except that it’s bound
to happen. To you, yes; to me, us: the lot
of humankind, given how humankind sees it
from this near side. So what.
So nothing that we here and now
can perfectly know. Save, though the lens
our eyes raise, the old here and now.
The this, the already-going that moves us.
The red-shift we’re constantly part of.
And why not? Between what we were, and
are going to be, is who and how we best love.
--- Philip Booth
Aug 23, 2026
वो ज़माना गुज़र गया कब का
था जो दीवाना मर गया कब का
ढूंढ़ता था जो इक नई दुनिया
लूट के अपने घर गया कब का
वो जो लाया था हम को दरिया तक
पार अकेले उतर गया कब का
उस का जो हाल है वही जाने
अपना तो ज़ख़्म भर गया कब का
ख़्वाब-दर-ख़्वाब था जो शीराज़ा
अब कहां है बिखर गया कब का
--- जावेद अख़्तर
Aug 21, 2026
Urdu Shayari (Poetry) & Dialogues from Parizaad Serial
### **1. "Tum Toh Siyah Mein Bhi Jachti Ho" (University Scene)**
> **Devanagari (हिंदी):**
> जब धीमे-धीमे हँसती हो, उस बारिश जैसी लगती हो।
> थोड़ी दिल की कहती हो, ज़्यादा दिल में रखती हो।
> क्यों जाऊँ रंगरेज़ के पास, तुम तो सियाह में भी जचती हो।
> करने दो उन्हें सिंगार, तुम सादा भी सजती हो।
> **Urdu (اردو):**
> جب دھیمے دھیمے ہنستی ہو، اس بارش جیسی لگتی ہو۔
> تھوڑی دل کی کہتی ہو، زیادہ دل میں رکھتی ہو۔
> کیوں جاؤں رنگ ریز کے پاس، تم تو سیاہ میں بھی جچتی ہو۔
> کرنے دو انہیں سنگھار، تم سادہ بھی سجتی ہو۔
> **Roman Urdu:**
> *Jab dheeme dheeme hasti ho, us barish jaisi lagti ho.*
> *Thodi dil ki kehti ho, zyada dil mein rakhti ho.*
> *Kyun jaaon rangrez ke paas, tum toh siyah mein bhi jachti ho.*
> *Karne do unhein singaar, tum saada bhi sajti ho.*
---
### **2. "Sitare Jo Damakte Hain"**
> **Devanagari (हिंदी):**
> सितारे जो दमकते हैं, किसी की चश्म-ए-हैरान में
> मुलाक़ातें जो होती हैं, जमाल-ए-अब्र-ओ-बारान में
> ये ना-आबाद वक़्तों में, दिल-ए-नाशाद में होगी
> मोहब्बत अब नहीं होगी, ये कुछ दिन बाद में होगी
> गुज़र जाएँगे जब ये दिन, ये उन की याद में होगी
> **Urdu (اردو):**
> ستارے جو دمکتے ہیں، کسی کی چشمِ حَیراں میں
> ملاقاتیں جو ہوتی ہیں، جمالِ ابرِ باراں میں
> یہ نا آباد وقتوں میں، دلِ ناشاد میں ہوگی
> محبت اب نہیں ہوگی، یہ کچھ دن بعد میں ہوگی
> گزر جائیں گے جب یہ دن، یہ ان کی یاد میں ہوگی
> **Roman Urdu:**
> *Sitare jo damakte hain, kisi ki chashm-e-hairaan mein*
> *Mulaqatein jo hoti hain, jamaal-e-abr-o-baaraan mein*
> *Ye na-aabaad waqton mein, dil-e-naashaad mein hogi*
> *Mohabbat ab nahi होगी, ye kuch din baad mein hogi*
> *Guzar جائیں ge jab ye din, ye un ki yaad mein hogi*
---
### **3. "Qissay Meri Ulfat Ke"**
> **Devanagari (हिंदी):**
> क़िस्से मेरी उल्फ़त के जो मरक़ूम हैं सारे,
> आ देख तेरे नाम से मन्सूब हैं सारे।
> शायद ये ज़र्फ़ है जो ख़ामोश हूँ अब तक,
> वरना तो तेरे ऐब भी मालूम हैं सारे।
> सब जुर्म मेरी ज़ात से मन्सूब हुए,
> क्या मेरे सिवा इस शहर में मासूम हैं सारे?
> **Urdu (اردو):**
> قصے میری الفت کے جو مرقوم ہیں سارے
> آ دیکھ تیرے نام سے منسوب ہیں سارے
> شاید یہ ظرف ہے جو خاموش ہوں اب تک
> ورنہ تو تیرے عیب بھی معلوم ہیں سارے
> سب جرم میری ذات سے منسوب ہوئے
> کیا میرے سوا اس شہر میں معصوم ہیں سارے؟
> **Roman Urdu:**
> *Qissay meri ulfat ke jo marqoom hain saare,*
> *Aa dekh tere naam se mansoob hain saare.*
> *Shayad ye zarf hai jo khamosh hoon ab tak,*
> *Warna toh tere aib bhi maloom hain saare.*
> *Sub jurm meri zaat se mansoob hue,*
> *Kya mere siwa is shehar mein masoom hain saare?*
---
### **4. "Suno! Mujhse Aur Bas Mujhse Nafrat Karna"**
> **Devanagari (हिंदी):**
> सुनो! तुम्हारी वफ़ा पे मुझको गरचे पूरा यक़ीन है,
> मगर ज़माने के वार का कुछ भरोसा नहीं है।
> सो गर कभी ऐसा हो कि तुम्हें मुझसे नफ़रत हो जाए,
> तो कभी उन बातों से नफ़रत मत करना जो हमने एक दूसरे से की थीं,
> वो बेंच जहाँ हम बैठा करते थे, वो पहली बारिश,
> वो कॉफ़ी के ख़ाली मग, वो सिनेमा का पहला टिकट और आख़िरी दो सीटें,
> सबको याद रखना... कभी उनसे नफ़रत ना करना।
> सुनो, मुझसे... और बस मुझसे नफ़रत करना,
> क्योंकि सिर्फ़ मैं और फ़क़त मैं ही तुम्हारी उस नफ़रत के क़ाबिल हूँ।
> **Roman Urdu:**
> *Suno! Tumhari wafa pe mujhko garche poora yaqeen hai,*
> *Magar zamane ke waar ka kuch bharosa nahi hai.*
> *So gar kabhi aisa ho ki tumhein mujhse nafrat ho jaaye,*
> *Toh kabhi un baaton se nafrat mat karna jo humne ek doosre se ki thi,*
> *Wo bench jahaan hum baitha karte the, wo pehli baarish,*
> *Wo coffee ke khaali mug, wo cinema ka pehla ticket aur aakhri do seatein,*
> *Sabko yaad rakhna... kabhi unse nafrat na karna.*
> *Suno, mujhse... aur bas mujhse nafrat karna,*
> *Kyunki sirf main aur faqat main hi tumhari us nafrat ke qabil hoon.*
---
### **Iconic Dialogue:**
> **Devanagari (हिंदी):**
> "शक्ल-ओ-सूरज इंसान का पहला तआरुफ़ है। इंसान का दूसरा और असल तआरुफ़ उसके अल्फ़ाज़ हैं। अपना दूसरा तआरुफ़ इतना मुकम्मल कर लो कि लोग तुम्हारा पहला तआरुफ़ भूल जाएँ।"
> **Roman Urdu:**
> *"Shakl-o-soorat insaan ka pehla taaruf hai. Insaan ka doosra aur asal taaruf uske alfaaz hain. Apna doosra taaruf itna mukammal karlo ke log tumhara pehla taaruf bhool jaayen."*
Aug 19, 2026
I Ask Percy How I Should Live My Life
And hurry as fast as you can
along the shining beach, or the rubble, or the dust.
Then, go to sleep.
Give up your body heat, your beating heart.
Then, trust.
--- Mary Oliver
Aug 15, 2026
वतन को कुछ नहीं ख़तरा निज़ाम-ए-ज़र है ख़तरे में
हक़ीक़त में जो रहज़न है वही रहबर है ख़तरे में
जो बैठा है सफ़-ए-मातम बिछाए मर्ग-ए-ज़ुल्मत पर
वो नौहागर है ख़तरे में वो दानिश-वर है ख़तरे में
अगर तशवीश लाहक़ है तो सुलतानों को लाहक़ है
न तेरा घर है ख़तरे में न मेरा घर है ख़तरे में
जहाँ 'इक़बाल' भी नज़्र-ए-ख़त-ए-तनसीख़ हो 'जालिब'
वहाँ तुझ को शिकायत है तिरा जौहर है ख़तरे
--- हबीब जालिब



