Jan 4, 2026

रहीम के 25 अमर दोहे: सरल भाषा में विस्तृत अर्थ


1. अब रहीम मुश्किल पड़ी, गाढ़े दोऊ काम।
सांचे से तो जग नहीं, झूठे मिलें न राम॥

विस्तृत अर्थ: जब मनुष्य पर कठिन समय आता है, तब सच्चाई का साथ देने वाला समाज नहीं मिलता और झूठ का सहारा लेने पर ईश्वर भी प्राप्त नहीं होते। अर्थात विपत्ति में मनुष्य अकेला पड़ जाता है।

2. वे रहीम नर धन्य हैं, पर उपकारी अंग।
बाटनवारे को लगे, ज्यों मेंहदी को रंग॥

विस्तृत अर्थ: उपकारी व्यक्ति चाहे कितना ही बाँट दिया जाए, उसका गुण और प्रभाव कभी कम नहीं होता, जैसे मेहंदी बाँटने पर भी अपना रंग छोड़ती है।

3. रहिमन पानी राखिए, बिन पानी सब सून।
पानी गए न ऊबरै, मोती, मानुष, चून॥

विस्तृत अर्थ:: यहाँ ‘पानी’ का अर्थ मर्यादा, लज्जा और आत्मसम्मान से है। इनके बिना मनुष्य, मोती और चूना—सबका मूल्य नष्ट हो जाता है।

4. रहिमन निज मन की व्यथा, मन ही राखो गोय।
सुनि अठलैहैं लोग सब, बाँटि न लेहैं कोय॥

विस्तृत अर्थ: अपनी पीड़ा सबको बताने से लोग मज़ाक तो उड़ाते हैं, पर दुख बाँटने या सहायता करने कोई आगे नहीं आता।

5. जो बड़ेन को लघु कहे, नहिं रहीम घट जाय।
गिरधर मुरलीधर कहे, कछु दुख मानत नाह॥

विस्तृत अर्थ: महान व्यक्ति छोटे नाम या साधारण संबोधन से छोटा नहीं हो जाता, जैसे कृष्ण को कोई भी नाम कहे, उनकी महत्ता कम नहीं होती।

6. समय लाभ सम लाभ नहिं, समय चूक सम चूक।
चतुरन चित रहीम लगी, समय चूक कछु चूक॥

विस्तृत अर्थ: समय का सदुपयोग सबसे बड़ा लाभ है और समय चूक जाना सबसे बड़ा नुकसान, क्योंकि समय हाथ से निकल जाए तो अवसर लौटकर नहीं आते।

7. ए रहीम दर दर फिरहिं, माँगि मधुकरी खाहिं।
यारो यारी छोड़िये, वे रहीम अब नाहिं॥

विस्तृत अर्थ: जो व्यक्ति स्वाभिमान छोड़कर दर-दर भीख माँगता फिरता है, उससे मित्रता छोड़ देनी चाहिए, क्योंकि वह अपना आत्मसम्मान खो चुका होता है।

8. रहिमन वे नर मर चुके, जे कहुँ माँगन जाहिं।
उनते पहिले वे मुए, जिन मुख निकसत नाहिं॥

विस्तृत अर्थ:: माँगकर जीना आत्मसम्मान की मृत्यु है; पर उससे भी पहले वे मर चुके हैं जिनके मुख से ‘न’ शब्द नहीं निकलता।

9. जो रहीम उत्तम प्रकृति, का करि सकत कुसंग।
चन्दन विष व्यापत नहीं, लिपटे रहत भुजंग॥

विस्तृत अर्थ: अच्छे स्वभाव वाला व्यक्ति बुरी संगति में रहकर भी अपना गुण नहीं खोता, जैसे चंदन पर लिपटा साँप भी उसे विषैला नहीं बना पाता।

10. रहिमन प्रीति न कीजिए, जस खीरा ने कीन।
ऊपर से तो दिल मिला, भीतर फांकें तीन॥

विस्तृत अर्थ:: जो प्रेम केवल दिखावे का हो, उसमें भीतर से टूटन होती है; ऐसा प्रेम अंत में धोखा ही देता है।

11. तरुवर फल नहिं खात है, सरवर पियहि न पान।
कहि रहीम पर काज हित, संपति संचहि सुजान॥

विस्तृत अर्थ:: जैसे पेड़ अपने फल नहीं खाते और तालाब अपना पानी नहीं पीते, वैसे ही सज्जन व्यक्ति अपनी संपत्ति दूसरों के कल्याण के लिए संचित करता है।

12. रूठे सुजन मनाइए, जो रूठे सौ बार।
रहीमन फिरि फिरि पोइए, टूटे मुक्ता हार॥

विस्तृत अर्थ: अच्छे और सज्जन लोगों से संबंध टूटने न दें, क्योंकि वे टूटे मोती के हार जैसे होते हैं जिन्हें फिर से पिरोना चाहिए।

13. क्षमा बड़न को चाहिए, छोटन को उत्पात।
कह रहीम हरि का घट्यौ, जो भृगु मारी लात॥

विस्तृत अर्थ: क्षमा केवल महान लोगों का गुण है; क्रोध करना छोटे मन का लक्षण है | उदाहरण के रूप में वे कहते हैं कि जब महर्षि भृगु ने भगवान विष्णु को पैर मारा, तब भी भगवान ने क्रोध नहीं किया, बल्कि उनके पैर दबाने लगे। 

14. रहिमन धागा प्रेम का, मत तोड़ो चटकाय।
टूटे से फिर ना जुड़े, जुड़े गाँठ पड़ जाय॥

विस्तृत अर्थ: प्रेम का संबंध बहुत नाज़ुक होता है; एक बार टूट जाए तो दोबारा जुड़ने पर भी उसमें गाँठ रह जाती है।

15. एकही साधे सब सधै, सब साधे सब जाय।
रहिमन मूल सींच बोये, फूल लहि अघाय॥

विस्तृत अर्थ: यदि मूल कारण पर ध्यान दिया जाए तो सभी कार्य सफल हो जाते हैं; इधर-उधर भटकने से सब कुछ नष्ट हो जाता है।

16. रहिमन ओछे नरन सो, बैर भली न कीत।
काटे चाटे स्वान के, दोऊ भाँति ती प्रतीत॥

विस्तृत अर्थ: नीच व्यक्ति से शत्रुता दोनों ही स्थितियों में नुकसानदायक होती है, चाहे वह नुकसान करे या दिखावटी प्रेम दिखाए।

17. जो रहीम गति दीप की, कुल कपूत गति सोय।
बारे उजियारो करे, बढ़े अँधेरो होय॥

विस्तृत अर्थ: कुपुत्र परिवार का नाम रोशन करने के बजाय बदनामी लाता है, जैसे दीपक बुझने पर अंधकार बढ़ जाता है।

18.  रहिमन चुप हो बैठिए, देखि दिनन को फेर।
जब नीके दिन आइहैं, बनत न लागै बेर॥

विस्तृत अर्थ: बुरे समय में धैर्य और मौन रखना चाहिए, क्योंकि अच्छे दिन आने पर परिस्थितियाँ स्वयं सुधर जाती हैं।

19. रहिमन प्रेम न छाँड़िए, लघु जन जानि।
कूँजा पथिक न छोड़ई, देखि बावड़ी पानी॥

विस्तृत अर्थ: छोटे व्यक्ति या छोटे साधन को तुच्छ न समझें, क्योंकि संकट में वही सहारा बन सकता है।

20. रहिमन मीत बनाइए, कठिन समय के काम।
आपत्ति काज न आवहीं, संपत्ति साँचि सुजान॥

विस्तृत अर्थ: सच्चे मित्र वही होते हैं जो संकट में साथ दें; धन केवल सुरक्षित रखा जा सकता है, मदद नहीं कर सकता।

21. रहिमन गति अगम्य है, प्रेम की रीति अपार।
दादुर डूबे पंक में, मीन न उबरै पार॥

विस्तृत अर्थ: प्रेम की शक्ति और उसकी गति को समझना कठिन है; इसमें अयोग्य डूब जाते हैं और योग्य भी पार नहीं पा पाते।

22. रहिमन जिह्वा बावरी, कह गई सरग पाताल।
आप तो कह भीतर रही, जूता खात कपाल॥

विस्तृत अर्थ: असंयमित वाणी मनुष्य को अपमान और संकट में डाल देती है, जबकि बोलने वाली जिह्वा स्वयं सुरक्षित रहती है।

23. रहिमन हानि लाभ जीवन मरण, यश अपयश विधि हाथ।
जेति बने तित होइये, एहि विधि रहीम रीत॥

विस्तृत अर्थ: लाभ-हानि, जीवन-मरण और मान-अपमान सब विधि के हाथ में हैं; इसलिए जो मिले उसे स्वीकार करना चाहिए।

24. 
ओछो काम बड़े करैं तौ न बड़ाई होय।
ज्‍यों रहीम हनुमंत को, गिरधर कहै न कोय॥

विस्तृत अर्थ: यदि कोई छोटा या सामान्य व्यक्ति कोई बड़ा काम करता है, तो भी उसकी बड़ाई नहीं होती, जैसे हनुमान को कोई कृष्ण (गिरधर) नहीं कहता।

25. रहिमन यह तन विष की बेलरी, गुरु अमृत की खान।
सीस दिए जो गुरु मिले, तो भी सस्ता जान॥

विस्तृत अर्थ: यह शरीर नश्वर और विष के समान है, जबकि गुरु का ज्ञान अमृत तुल्य है; गुरु के लिए जीवन भी न्योछावर करना सस्ता सौदा है।


“बचपन में पिता जी ने ये दोहे सिखाए थे—आज समझ आता है कि ये सिर्फ़ कविता नहीं, जीवन के सबसे गहरे पाठ थे।”

Dec 31, 2025

UP Board Hindi Book "महान व्यक्तित्व" (पूर्व नाम – हमारे पूर्वज) के प्रेरक दोहे

1. चढ़ै टरै सूरज टरै, टरै जगत व्यवहार। पै दृढ़ हरिचंद को, टरै न सत्य विचार।।

2. नौ लख पातर आगे नाचै, पीछे सहज अखाड़ा।  ऐसो मन लै जोगी खेलै तव अंतर बसै भंडारा।।   गोरखनाथ

3. गोरी सोवे सेज पर, मुख पर डारै केस। चल खुसरो घर आपल्या, साँझ भई चहुँ देस।। – अमीर खुसरो

4. परहित सरिस धरम नहि भाई। पर पीड़ा सम नहि अधमाई।। – तुलसीदास

5. सुरतिय, नरतिय, नागतिय, यह चाहत सब कोय। गोद लिए लली फिरै, तुलसी सो सुत होय।। – तुलसीदास

6. हे री! मैं तो प्रेम दिवानी, मेरो दरद न जाने कोय।  सूली ऊपर सेज हमारी, सोवण कोन विध होय।। – मीराबाई

7. मेरे तो गिरधर गोपाल, दूसरो न कोई। जाके सिर मोर मुकुट, मेरो पति सोई।।-  मीराबाई

8. चकित में रहिमन रहै, रहिमन जब पर विपदा पड़े। अवध नरेस वह आवत यह देस।। – रहीम

9. जो गरीब सहत कर, कहाँ सुदामा‑धन रहीम? वे बापुरे लोग, कृष्ण मथाई जोग। – रहीम

10. कबिरा हर के ठाठ ते, गु के सरन न जाइ। गु के ठाठ नित नवें, हर ठाढ़ रहें सहाइ॥ - कबीरदास

11. निंदक नियरे राखिए, आँगन कुटी छवाय।  बिन पानी, साबुन बिना, निर्मल करे सुभाय॥ -  कबीरदास

12. आजु जो हरिहि नहिं दुःख गहाऊँ, तौ लाज गंगा जननी को; शान्तनु सुत न कहाऊँ। -भीष्म प्रतिज्ञा

13. भला भयो विधि ना धियो शेषनाग के कान धरा मेरु सब डोलते तानसेन की तान ।

14. विद्या बिना मति गई, मति बिना गति गई, गति बिना नीति गई, नीति बिना वित्त गया, वित्त बिना शूद्र खचले।

15. अब न अहले वलवले हैं और न अरमानों की भीड़। एक मिट जाने की हसरत अब दिल-ए-बिस्मिल में है ।

16. कुछ आरजू नहीं है, है आरजू तो यह। रख दे कोई ज़रा सी ख़ाक़े वतन कफ़न में।

हमारे पूर्वज" (Hamare Purvaj) नाम की किताबें यूपी बोर्ड में पहले पढ़ाई जाती थीं, खासकर जूनियर कक्षाओं (जैसे कक्षा 6 - 8) में, लेकिन अब ये किताबों के नाम बदल गए हैं या इनका पाठ्यक्रम बदल गया है, और अब ये किताबें 'महान व्यक्तित्व' (Mahan Vyaktitva) जैसे नामों से या अन्य विषयों के तहत मिल सकती हैं, जो शुरुआती भारतीय इतिहास और पूर्वजों के बारे में जानकारी देती हैं

Dec 29, 2025

Picture - Kurdish Poem

Four children

a Turk, a Persian

an Arab and a Kurd were collectively drawing the picture of a man.

The first drew his head

The second drew his hands and upper limbs

The third drew his legs and torso

The fourth drew a gun on his shoulder

--- Sherko Bekas [1979]

Dec 27, 2025

Pind Apne Nu Jaanwa - Lyrics - Dharmendra Poem from Ikkis Movie

आज वी जी करदा पिंड अपने नू जावां
डोबे विच भड़कें मझियां नवावां

लेके दाती पैयां विचों पत्ते वी ल्यावां
मिटीयां च खेलना कबड्डी वाला खेल

पिंड वाली ज़िंदगी दा किहड़े नाल मेल
पंज दरियावां दा मीठा मीठा पानी

वगदी हवावां विच गुरूआं दी वाणी
ओ कदे बेबे वाली बुक्कल चित्त चे ਭੁਲੋणी

हां नी मायिये मेरिये मैं सदके तेरे जावां
आज वी जी करदा पिंड अपने नू जावां

आज वी जी करदा पिंड अपने नू जावां....


यह कविता धर्मेंद्र द्वारा स्वयं लिखी गई है, जो उनकी आखिरी फिल्म 'इक्कीस' (परम वीर चक्र विजेता अरुण खेतारपाल पर बायोपिक) में प्रस्तुत की गई। धर्मेंद्र का निधन 24 नवंबर 2025 को हो गया।कविता पिंड की मिट्टी, नदी के पानी, कबड्डी और मां के प्यार के प्रति गहरी लालसा व्यक्त करती है। 
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Aaj vi jee karda pind apne nu jaava
Dobbe vich bhadke majhiyan nawava

Leke daati paiyan vichon patthe v lyava
Mitiyan ch khedna kabadi wala khed

Pind wali zindagi da kihde naal mel
Panj dariyawan da mitha mitha pani

Vagdi hawaan vich guruan di vaani
O kade bebe wali bukkal chitt che bhuloni

Han ni maaye meriye mai sadke tere jaava
Aaj vi jee karda pind apne nu jaava

Aaj vi jee karda pind apne nu jaava....

Dec 24, 2025

अरावली के आख़िरी दिन

एक मधुमक्खी परागकणों के साथ

उड़ते-उड़ते थक जाएगी।

सभी बहेलिए जाल को देखकर

उलझन में पड़ जाएँगे।

एक नन्हा ख़रगोश लू की बौछार में

हाँफते-हाँफते थक जाएगा।

चेतना आकुलित बघेरे कहीं नहीं दिखेंगे

इस निरीह-निर्वसन धरती पर।

अरावली के आख़िरी दिन

युवतियाँ छाता लेकर सैर करने जाएँगी

और लॉन में टहलकर लौट आएँगी।

एक शराबी चंद्रमा की रोशनी में

बहेलिए बस्तियों की ओर लौटते नज़र आएँगे।

कुछ पीले चेहरे सब्ज़ियों के ठेले लेकर

मुहल्लों में रेंगते हुए आवाज़ें देंगे।

बिना तारों वाली सघन अँधेरी रात में

रावण-हत्थे की आवाज़ के साथ तैरेगी

बच रह गए एक गीदड़ की टीस।

और जिन्हें नीले नभ में बिजलियाँ चमकने,

बादल गरजने और वर्षा की बूँदों का इंतिज़ार है,

सूखे काले अँधेरे में आँख मिचमिचाते और

कानों में कनिष्ठिकाएँ हिलाते थक जाएँगे।

और जिन्हें किताबें पढ़ने का शौक होगा,

शब्दकोश में साँप का अर्थ ढूँढ़कर

अपने बच्चों को कालबेलिया जोगियों की कथा सुनाएँगे

और सुनहरे केंचुल ओढ़े कोई देवता

सितारों की ओट में धरती को भरी आँख से निर्निमेष निहारेगा।

हालाँकि बात ऐसी है


अरावली की कोई एक तस्वीर देखकर

सूरज और चाँद के नीचे सुन नहीं पाता कोई

कभी ख़त्म न होने वाली बिलख, जो हर

इमारत की नींव तले दबी फूटती रहती है।

बड़ी आलीशान इमारतों में खिलते रहते हैं

ख़ूबसूरत गुलाबों जैसे नन्हे शिशु

और इसीलिए किसी को विश्वास नहीं होता कि

अरावली के आख़िरी दिन अरावली ऐसी होगी?

अरावली के आख़िरी दिन ऐसा ज़रूर होगा

एक अवतारी पुरुष आएँगे

एक नबी पुकारेगा

लेकिन बात ऐसी है कि वे दोनों आईफ़ोन पर व्यस्त होंगे

उन्हें न धनिए, न हरी मिर्च, न मेथी, न आलू,

न टमाटर, न ज़ीरे और न हरे चने की ज़रूरत होगी,

क्योंकि उनके बैग में

मैक्डॉनल्ड के बर्गर, मैकपफ़ और सालसा रैप होंगे।

अरावली का इसके अलावा यहाँ और क्या अंत होगा?

अरावली का इसके अलावा वहाँ और क्या अंत होगा?

स्रोत :रचनाकार : त्रिभुवन

प्रकाशन : हिन्दवी के लिए लेखक द्वारा चयनित

सौरभ द्विवेदी ने कविता “अरावली के आख़िरी दिन” अपने अंदाज़ में पढ़ी है और इसे आज के अरावली के दर्द से जोड़ दिया है। 

संदर्भ : सुप्रीम कोर्ट ने नवंबर 2025 में अरावली पहाड़ियों की नई परिभाषा को मंजूरी दी, जिसमें 100 मीटर ऊंचाई से कम की पहाड़ियों को बाहर रखा गया, जिससे राजस्थान के 91% से अधिक क्षेत्र असुरक्षित हो गए। यह फैसला पर्यावरण मंत्रालय की सिफारिश पर आधारित था, लेकिन सुप्रीम कोर्ट की ही समिति (सीईसी) और भारतीय वन सर्वेक्षण (एफएसआई) ने इसका विरोध किया, क्योंकि इससे अवैध खनन को बढ़ावा मिलेगा।अरावली, जो दुनिया की सबसे प्राचीन पर्वतमाला है, दिल्ली-एनसीआर को रेगिस्तान से बचाती है, भूजल रिचार्ज करती है और जैव विविधता का केंद्र है, लेकिन पिछले दो दशक में 25-35% हिस्सा खनन से नष्ट हो चुका।ग्रामीणों, पर्यावरणविदों और आदिवासी समुदायों ने जयपुर, अलवर, उदयपुर जैसे क्षेत्रों में बड़े प्रदर्शन शुरू कर दिए, जहाँ गुर्जर-मेव किसान उपवास, जनसभाएँ और हस्ताक्षर अभियान चला रहे हैं।"अरावली विरासत जन अभियान" के तहत चार राज्यों के प्रतिनिधि खनन माफियाओं के खिलाफ एकजुट हुए, मांग की कि पूरी 692 किमी रेंज को पारिस्थितिक क्षेत्र घोषित कर नई खदानों पर पूर्ण रोक लगे।कार्यकर्ता राजेंद्र सिंह और नीलम अहुवालिया जैसे नेता चेतावनी दे रहे हैं कि यह फैसला मरुस्थलीकरण, जल संकट और प्रदूषण को बढ़ेगा, जबकि कोर्ट ने सस्टेनेबल माइनिंग प्लान तक नई लीज पर रोक का निर्देश दिया है।यह संघर्ष पर्यावरण रक्षा से आगे लोकतांत्रिक अधिकारों की लड़ाई बन गया है।

Dec 22, 2025

I am Kurdish ( أنا كردي )

I challenge poverty, privation, pain. 
I resist times of oppression with strength.
I have courage.
I do not love angel eyes, skin white as marble.
I love the rocks, the hills, the peaks lost among the clouds.
I challenge misfortune, misery, solitude 
And I shall never be a slave of the enemy, never grant him treaty!
I challenge batons, chains, torture. 
And even if my body lies torn in pieces,
With all my strength 
I shall scream: I am Kurdish.


Kurds are an ethnic group indigenous to a region called Kurdistan spanning parts of Turkey, Iraq, Iran, and Syria. They have long sought the creation of an independent Kurdish nation due to historic repression and the denial of autonomy. Despite partial autonomy in Iraq and Syria, the demand for a separate nation remains unresolved, with Kurdish nationalism still actively suppressed in several countries

Dec 19, 2025

यह वह बनारस नहीं गिंसबर्ग

'हाउल' नहीं गिंसबर्ग
परवर्ती पीढ़ी हमारी

नहीं मालूम जिसे क्यों कब
किसने लिखा कुछ पढ़कर सो कुछ लिखकर सो

देख रही बिकती बोटियाँ जिगर कीं
छह दो सात पाँच बोली न्यूयॉर्क-टोक्यो की

हाँ ऐलेन क्यों आए थे बनारस
यहाँ तो छूटा फॉर्टी सेकंड स्ट्रीट बहुत पीछे

कुत्तों ने किया हमेशा सड़कों पर संभोग यहाँ
रंग-बिरंगी नंगी रंभाएँ बेच रहा ईश्वर ख़ुराक आज़ादी के मसीहे की

चीत्कार इस पीढ़ी की नहीं बनेगी लंबी कविता नहीं बजेंगे ढोल
यह वह बनारस नहीं बीटनिक बहुत बड़ा गड्ढा है

रेंग रहा कीड़ा जिसमें
नहीं किसी और ग्रह का, मेरा ही दिमाग़ है लिंग है

हे भगवान चली गोलियाँ छत्तीसगढ़
भाई मेरा भूमिगत मैं क्यों गड्ढे में फिर

पाखंडी पीढ़ी मेरी
जाँघियों में खटमल-सी

भूखी बहुत भूखी
बनारस ले गए कहाँ तुम

जाएँ कहाँ हम छिपकर इन ख़ाली-ख़ाली तक़दीरों से
इन नंगे राजाओं से

कहाँ वह औरत वह मोक्षदात्री
बहुत प्यार है उससे

चाहा मैंने भी विवस्त्र उसे हे सिद्धार्थ
भूखे मरते मजूर वह क्यों फैलाती जाँघें

कहते कोई डर नहीं उसे एड्स का
बहुत दुखी इस पीढ़ी का पीछे छूटा यह बीमार

कई शीशों के बीच खड़ा ढोता लाशें अनगिनत
उठो औरतों प्यार करो हमसे

बना दो दीवार बाँध की हमें
कहो गिंसबर्ग कहो हमें गाने को यह गीत

बनारस नहीं आवाज़ हमारी अंतिम कविता
कहो।

--- लाल्टू

Dec 15, 2025

BORDERS



Adored land, my country,

a love that I had lost..

if you had been remote 

in an inaccessible sky

or at a summit of the world

I would have known 

how to run to you 

even with iron shoes.

But a narrow distance 

separates you from me..

The invader calls it a border.

--- Hemin Mukriyani

Kurds are an ethnic group indigenous to a region called Kurdistan spanning parts of Turkey, Iraq, Iran, and Syria. They have long sought the creation of an independent Kurdish nation due to historic repression and the denial of autonom. Despite partial autonomy in Iraq and Syria, the demand for a separate nation remains unresolved, with Kurdish nationalism still actively suppressed in several countries.

Dec 10, 2025

खेले मसाने में होरी दिगम्बर

खेले मसाने में होरी दिगम्बर
भुत पिसाच बटोरी दिगंबर खेले मसाने में होरी,

लखि सूंदर फागुनी झता के,
मन से रंग गुलाल हटा के,
चिता बसम की झोरी दिगंबर खेले मसाने में होरी,

नाचत गावत डमरू धारी,
छोडत सर पे गर्ल पिचकारी,
बीते प्रेत थपोरी दिगंबर खेले मसाने में होरी,

भुत नाथ की मंगल होरी,
देख सिहाये ब्रिज की छोरी,
धन धन नाथ अगोहरी,
दिगंबर खेले मसाने में होरी,

गोप न गोपी श्याम न राधा,
ना कोई रोक न कोहनू वाधा
न साजन न गोरी, दिगंबर खेले मसाने में होरी |

"खेले मसाने में होरी दिगम्बर" एक प्रसिद्ध भजन और लोकगीत है जो खासकर काशी (वाराणसी) के मणिकर्णिका घाट पर होली के त्योहार के दौरान गाया जाता है। इस गीत में भगवान शिव की महिमा का वर्णन होता है, जो श्मशान (मसाना) की पवित्रता और शक्ति को दर्शाता है।

Dec 6, 2025

हिंदू मुस्लिम करने वाले देश के दुश्मन

उजले कपड़े, मन के काले देश के दुश्मन
हिंदू मुस्लिम करने वाले देश के दुश्मन

दूर दूर तक देख न पाने की मजबूरी
हिलते से आंखों के जाले देश के दुश्मन

बंद पड़े दरवाज़े, आख़िर कैसे खोलें
ज़हनों पर लटके से ताले देश के दुश्मन

ज़हर भरा सा राग लिये अपने होठों पर
बहुत बेसुरे, ये बेताले देश के दुश्मन

एक बार फिर चिता पे रोटी सेंक रहे हैं
बहते से नफ़रत के नाले देश के दुश्मन

दो पग चलना मुश्किल, बोलें तो क्या बोलें
पैरों और ज़बान के छाले देश के दुश्मन

देखो जमकर करें सियासत संकट में भी
तरह तरह के गड़बड़झाले देश के दुश्मन

फ़सल वोट की, रक्त सनी धरती की छाती
खादी पहने ये परकाले देश के दुश्मन

मां का आंचल तार तार करने में आगे
भारत मां के ये रखवाले देश के दुश्मन

धज्जी धज्जी उड़ा रहे हैं मर्यादा की
राम नाम के ये मतवाले देश के दुश्मन

बड़ी आपदा इनकी ख़ातिर अवसर जैसी
बड़े अनोखे बड़े निराले देश के दुश्मन

--- यश मालवीय

Dec 2, 2025

Ame ni mo Makezu

Ame ni mo makezu

Kaze ni mo makezu
Yuki ni mo natsu no atsusa ni mo makenu
Joubu na karada wo mochi
Yoku wa naku
Kesshite ikarazu
Itsumo shizuka ni waratte iru

Ichinichi ni genmai yon gou to
Miso to sukoshi no yasai wo tabe
Arayuru koto wo
Jibun wo kanjou ni irezuni
Yoku miki kishi wakari
Soshite wasurezu

Nohara no matsu no hayashi no kage no
Chiisana kayabuki no koya ni ite
Higashi ni byouki no kodomo areba
Itte kanbyou shite yari
Nishi ni tsukareta haha areba
Itte sono ine no taba wo oi

Minami ni shinisou na hito areba
Itte kowagaranakute mo ii to ii
Kita ni kenka ya soshou areba
Tsumaranai kara yamero to ii

Hideri no toki wa namida wo nagashi
Samusa no natsu wa orooro aruki

Minna ni dekunobou to yobare
Homerare mo sezu
Kuni mo sarezu

Sou iu mono ni
Watashi wa naritai

***
Be not defeated by the rain,
Nor let the wind prove your better.
Succumb not to the snows of winter,
Nor be bested by the heat of summer.
Be strong in body,
Unfettered by desire,
Not enticed to anger.
Cultivate a quiet joy.

Count yourself last in everything,
Put others before you.
Watch well and listen closely.
Hold the learned lessons dear.

A thatch-roof house, in a meadow,
Nestled in a pine grove’s shade.

If, to the East, a child lies sick:
Go forth and nurse him to health.
If, to the West, an old lady stands exhausted:
Go forth, and relieve her of burden.

If, to the South, a man lies dying:
Go forth with words of courage to dispel his fear.
If, to the North, an argument or fight ensues:
Go forth and beg them stop such a waste of effort and of spirit.

In times of drought, shed tears of sympathy.
In summer’s cold, walk in concern and empathy.

Stand aloof of the unknowing masses:
Better dismissed as useless than flattered as a “Great Man”.

This is my goal, the person I strive to become.

--- Kenji Miyazawa in original Japanese text, with a popular English translation by David Sulz

This poem, written in 1931 is one of the most beloved works of Japanese literature. It has become a beloved symbol of perseverance and empathy in Japanese culture. Notably, it inspired the 2013 animated film "Rain Won't" (雨ニモマケズ), which beautifully illustrates the poem's message of resilience and compassion.

Nov 26, 2025

इश्क़ जलाकर - Ishq Jalakar | Karvaan - Hindi Lyrics– Dhurandhar Movie

धूप टूट के
कांच की तरह
चुभ गई तो क्या
अब देखा जाएगा आंधियां कई
दिल में है मेरे
चुभ गई तो क्या
अब देखा जाएगा दिल है टूटा
मेरा मैं इश्क जला कर आ गया...

दिल है टूटा
मेरा मैं इश्क जला कर आ गया
आंधी बन के आया हूं
मेरा हौसला भी अय्याश है...
ना तो कारवां की तलाश है
ना तो कारवां की तलाश है
ना तो हमसफर की तलाश है
ना तो कारवां की तलाश है

आधी बातें आँखें बोले
आधी बातें आँखें बोले
बाकी आधी खामोशी कह दे...
हमजुबान की तलाश है
ना तो कारवां की तलाश है
ना तो कारवां की तलाश है
ना तो हमसफर की तलाश है
मेरा शौक तेरा दीदार है
यही उम्र भर की तलाश है

- इरशाद कामिल और साहिर लुधियानवी



Nov 24, 2025

ये एक मेला है वादा किसी से क्या लेगा

मैं इस उम्मीद पे डूबा के तू बचा लेगा
अब इसके बाद मेरा इम्तेहान क्या लेगा

ये एक मेला है वादा किसी से क्या लेगा
ढलेगा दिन तो हर एक अपना रास्ता लेगा

मैं बुझ गया तो हमेशा को बुझ ही जाऊंगा
कोई चराग़ नहीं हूं जो फिर जला लेगा

कलेजा चाहिए दुश्मन से दुश्मनी के लिए
जो बे-अमल है वो बदला किसी से क्या लेगा

मैं उसका हो नहीं सकता बता न देना उसे
सुनेगा तो लकीरें हाथ की अपनी जला लेगा

हज़ार तोड़ के आ जाऊं उस से रिश्ता वसीम
मैं जानता हूं वो जब चाहेगा बुला लेगा

--- वसीम बरेलवी

Nov 20, 2025

सुभाषितानि - 4 (Subhashitani -4)

 1. सर्वे भवन्तु सुखिनः, सर्वे सन्तु निरामयाः। सर्वे भद्राणि पश्यन्तु, मा कश्चिद् दुःखभाग् भवेत्॥

हिन्दी अर्थ: सब लोग सुखी हों, सब लोग स्वस्थ एवं निरोगी रहें। सबको शुभ फल प्राप्त हों, कोई भी दुःखी न हो।

2. अलस्यस्य कुतो विद्या? अविद्यस्य कुतो धनम्? अधनस्य कुतो मित्रम्? अमित्रस्य कुतः सुखम्॥

हिन्दी अर्थ: आलसी व्यक्ति को विद्या कहाँ? अनपढ़ को धन कहाँ? गरीब को मित्र कहाँ? और जिसका मित्र नहीं है, उसे सुख कहाँ?

3. विद्या ददाति विनयम्, विनयाद् याति पात्रता। पात्रत्वात् धनमाप्नोति, धनात् धर्मः ततः सुखम्॥

हिन्दी अर्थ: विद्या से विनय मिलता है, विनय से योग्य बनने की शक्ति मिलती है। पात्रता से धन मिलता है, धन से धर्म, और धर्म से सुख की प्राप्ति होती है।

4. पुस्तकस्था तु या विद्या, परहस्तगतं धनम्। कार्यकाले समुपस्थिते, न सा विद्या न तत् धनम्॥

हिन्दी अर्थ: जो विद्या केवल पुस्तकों में है, जैसा धन जो केवल दूसरों के पास है, वह दोनों आवश्यकता के समय काम नहीं आते।

5. परोपकाराय फलन्ति वृक्षाः, परोपकाराय वहन्ति नद्यः। परोपकाराय दुहन्ति गावः, परोपकारार्थमिदं शरीरम्॥

हिन्दी अर्थ: वृक्ष फल दूसरों के लिए देते हैं, नदियाँ दूसरों के लिए अपना जल बहाती हैं, गायें दूसरों के लिए दूध देती हैं, मनुष्य का शरीर भी दूसरों की भलाई के लिए होना चाहिए।

6. अहिंसा परमो धर्मः धर्म हिंसा तथैव च। धर्मेणैव जीवितं हि लोकः सुखमास्थितः।

हिन्दी अर्थ:  अहिंसा ही परम धर्म है, परंतु यदि धर्म की रक्षा के लिए हिंसा आवश्यक हो तो वह भी धर्म के अन्तर्गत आती है। इससे जीवन का सही अर्थ और संसार का संतुलन समझ आता है।

7. अर्थस्य निश्चयो दृष्टो विचारेण हितोक्तितः । न स्नानेन न दानेन प्राणायाम शतेन वा ॥

हिंदी अर्थ: विवेकपूर्ण विचार-मनन और हितकारी उपदेशों के द्वारा ही तत्त्वज्ञान की निश्चयात्मक प्राप्ति होती है। केवल स्नान करने से, दान देने से अथवा सैकड़ों प्राणायाम करने से आत्मज्ञान प्राप्त नहीं होता. 

Nov 18, 2025

सुभाषितानि - 3 (Subhashitani -3)

 1. क्षणशः कणशश्चैव विद्यामर्थं च साधयेत्। क्षणत्यागे कुतो विद्या कणत्यागे कुतो धनम्॥

अर्थ : हर क्षण और हर छोटे से छोटे कण का ध्यान रखकर विद्या और धन का अर्जन करना चाहिए। अगर समय या संसाधन व्यर्थ जाते हैं तो विद्या या धन कैसे प्राप्त होंगे?

2.  शरणागतः कर्णाक्षैव विद्यामर्थं च चिन्तयेत्। शरण्यागः कुलो विद्या कुलन्यागः कुलो धनम॥

अर्थ : जो व्यक्ति शरण में आता है, उसे विद्या और धन के बारे में चिन्ता करनी चाहिए। कुल (वंश) की प्रतिष्ठा विद्या और धन से होती है।

3. प्रथमे नार्जिता विद्या द्वितीये नार्जितं धनम्। तृतीयं नार्जितं पुण्यं चतुर्थं किं करिष्यति॥

अर्थ : पहले विद्या, फिर धन और फिर पुण्य अर्जित करो। यदि पहले तीनों नहीं, तो चौथे में क्या होगा?

4. सर्वदीव्यमभी माता सर्वदीव्यम पिता। मातरं पितरं तस्मात् सर्वदेव्यं पूजयेत्॥

अर्थ : सब देवताओं में माता और पिता सर्वोच्च हैं, इसलिए उनका सम्मान करना चाहिए।

5. प्रियवाच्पवादेन सर्वं दुर्व्ययं जनतः। तस्मात्तव वचस्य कच्चति च दरिद्रता॥

अर्थ : प्रिय वार्ता से भी अपकार होता है। इसलिए जरूरी है कि अपने शब्दों का सावधानी से प्रयोग करें।

6. "सत्यं ब्रूयात् प्रियं ब्रूयात् न ब्रूयात् सत्यमप्रियम्। प्रियं च नानृतं ब्रूयात् एष धर्मः सनातनः॥"

अर्थ : हमेशा सच बोलो, परंतु ऐसा सच जो प्रिय हो। जो सत्य अप्रिय हो, उसे न कहो। साथ ही प्रिय बातें बोलो, पर झूठ नहीं।

Nov 16, 2025

सुभाषितानि -2 (Subhashitani -2)

1. अक्रोधेन जयेत्त्क्रोधम् असाधुं साधुना जयेत्।  जयेत्त्कदर्यं दानेन जयेत्स्तेनं चातुतम्॥  

अर्थ : गुस्से से क्रोध को हराया जा सकता है। बुरे मनुष्य को अच्छे मनुष्य से जीता जा सकता है। दान से लालच को हराया जा सकता है और सत्य बोलने से झूठ पर जीत होती है।  

2. गच्छन् पिपीलिको याति योजनानां शतान्यपि।  अगच्छन् वैनतेयोऽपि पदमेकं न गच्छति॥  

अर्थ : चलती हुई चींटी सैकड़ों योजन की दूरी तय कर जाती है, परंतु न चलने वाला गरुड़ पक्षी भी एक कदम नहीं बढ़ा सकता। इससे यह सीख मिलती है कि निरंतर प्रयास से ही सफलता मिलती है, चाहे गति धीमी हो।  

3. दिनान्ते च पिबेद् दुग्धं निशान्ते च पिबेत् पयः।  भोजनान्ते च पिबेत् तक्रं किम् वैध्यस्य प्रयोजनम्॥  

अर्थ : दिन के अंत में दूध पिए और रात के अंत में जल पिए। भोजन के अंत में दही पिए। ऐसे आहार से शरीर स्वस्थ रहता है, अन्यथा चिकित्सक (वैद्य) का कोई लाभ नहीं।  

4. षड्दोषाः पुरुषेणेः हाथव्याः भूतमता।  निद्रा तन्द्रा भयं क्रोधः आलस्यं दीर्घसूत्रता॥  

अर्थ : मनुष्य को छह दोषों से बचना चाहिए, जो उसके विनाश के कारण हैं – नींद, सुस्ती, भय, क्रोध, आलस्य और बहुत लंबे समय तक निरंतर विचार करना।  

5. निन्दन्तु नीतिनिपुणा यदि वा स्तुवन्तु लक्ष्मीः समाविशतु गच्छतु वा यथेष्टम्।  

अधेव वा मरणमस्तु युगान्तरे वा न्याय्यात् पथः प्रविचलन्ति पदं न धीरा:॥  

अर्थ : जो लोग नीति में पारंगत हैं, चाहे उनका कोई भी निंदा करें या स्तुति, लक्ष्मी (श्री, समृद्धि) उनका साथ देती है या नहीं, चलो, मर जाना बेहतर है। क्योंकि जो धीर पुरुष सत्य और न्याय के मार्ग पर चलते हैं, उनका कभी पद भी नहीं हिलता। 

Nov 14, 2025

सुभाषितानि - 1 (Subhashitani -1)

 १. अयं निजः परो वेति गणना लघुचेतसाम्। उदारचरितानां तु वसुधैव कुटुम्बकम्॥

हिन्दी अर्थ: यह मेरा है, वह पराया है - यह सोच संकीर्ण चित्त वाले लोगों की है। उदार हृदय वाले लोगों के लिए तो पूरा विश्व ही एक परिवार है।

२. सर्वं परवशं दुःखं सर्वमात्मवशं सुखम्। एतद् विद्यात् समासेन लक्षणं सुखदुःखयोः॥

हिन्दी अर्थ: दूसरों पर निर्भर रहना दुख का कारण है; अपने अधिकार में रहना ही सुख है। सुख-दुख की यही पहचान है।

३. वृथा वृद्धि: समुद्रेऽपि वृथा तृप्तस्य भोजनम्। वृथा दानं समर्थस्य वृथा दीपो दिवापि च॥

हिन्दी अर्थ: समुद्र में अनावश्यक वृद्धि (पानी डालना) व्यर्थ है, संतुष्ट व्यक्ति को भोजन देना भी व्यर्थ है; सम्पन्न व्यक्ति को दान देना और दिन के उजाले में दीप जलाना भी व्यर्थ है।

४. काव्यशास्त्रविनोदेन् काले गच्छति धीमताम्। व्यसनेन तु मूर्खाणां निद्रया कलहेन वा॥

हिन्दी अर्थ: समझदार लोग अपना समय काव्य, शास्त्र और विद्या में लगाते हैं। मूर्ख लोग अपना समय व्यसनों, नींद और झगड़ों में गँवा देते हैं।

५. महान्तं प्रायः सद्बुद्धेः संयोजनं लघुजनम्। यत्रास्ति सूचिकार्पः कृपाण: किं करिष्यति॥

हिन्दी अर्थ: जहां बुद्धि, सद्बुद्धि (विवेक) और महापुरुषों का संग होता है, वहीं महानता आती है। सुई में अगर तलवार की धार लगा दी जाए, तो भी वह तलवार का काम नहीं कर सकती।

६. किं कुलेन विशालेन विद्याहीनस्य देहिनः। विद्यावान् पूज्यते लोके नाविध्य: परिपूज्यते॥

हिन्दी अर्थ: बड़े कुल (परिवार) में जन्म लेने का क्या लाभ, अगर मनुष्य में विद्या नहीं है। संसार में विद्वान् की ही पूजा होती है, अविद्वान् की नहीं।

७. वेशेन वपुषा वाचा विद्यया विनयेन च। वकारैः पञ्चाभिजुक्तो नरो भवति पूजितः॥

हिन्दी अर्थ: वेश (वस्त्र), शरीर, वाणी, विद्या और विनय - ये पांच 'व' गुण जिस मनुष्य में होते हैं, वही समाज में सम्मान पाता है।

Nov 9, 2025

Comrade poets!

 Comrade poets!

 We're in a new world

 What's past is dead, who writes a poem

 In the age of wind and the atom

 Creates prophets!

 Our verses

 Have no colour

 No taste

 No sound

 If they do not carry the lantern

 From house to house!

 And if the "simple" cannot understand our poems

 Better for us to shed them

 And resort to silence

 If only these words were

 A plough in the hands of a peasant

 A shirt, a door, a key

 If only these words were!

 A poet says

 If my poems please my friends

 And anger my enemies

 Then I'm a poet.

 And I shall speak!

---Mahmoud Darwish   

Nov 6, 2025

बुद्ध भगवान

बुद्ध भगवान,

अमीरों के ड्राइंगरूम,

रईसों के मकान

तुम्हारे चित्र, तुम्हारी मूर्ति से शोभायमान।

पर वे हैं तुम्हारे दर्शन से अनभिज्ञ,

तुम्हारे विचारों से अनजान,

सपने में भी उन्हें इसका नहीं आता ध्यान।

--- हरिवंश राय 'बच्चन'

Nov 3, 2025

The Physics of Love

사랑의 물리학

질량의 크기는 부피와 비례하지 않는다

제비꽃같이 조그마한 그 계집애가

꽃잎같이 하늘거리는 그 계집애가

지구보다 더 큰 질량으로 나를 끌어당긴다.


순간, 나는

뉴턴의 사과처럼

사정없이 그녀에게로 굴러 떨어졌다

쿵 소리를 내며, 쿵쿵 소리를 내며

심장이

하늘에서땅까지

아찔한 진자운동을 계속하였다

첫사랑이었다.

The Physics of Love

Mass is not proportional to volume.
That girl as small as a violet,
that girl who floats like a petal
pulls me toward her with a force
greater than the Earth’s mass.

In an instant,
like Newton’s apple,
I dropped with a thump
and rolled to her
without stopping.

Thump. Thump.
My dizzy heart kept swinging
between Heaven and Earth—
it was my first love.

--- Kim In-yook  with English translation by David Bowles.

This poem became very popular after it was featured in the Korean drama "Goblin" (Guardian: The Great and Lonely God). It describes love using simple physics ideas.