Feb 13, 2026

अकबर इलाहाबादी और सर सैयद: व्यंग्य और सामाजिक सुधार की शायरी

अकबर इलाहाबादी केवल आलोचक नहीं थे; वे सर सैयद के सामाजिक सुधारों के समर्थक भी थे। उनके दृष्टिकोण में सर सैयद के प्रयासों का सम्मान था, लेकिन कुछ बातें उनके तरीक़े और शैली में उन्हें कमज़ोर या असंगत प्रतीत होती थीं। यही संतुलित दृष्टि इलाहाबादी की शायरी में झलकती है। यहाँ कुछ उद्धृत शेर और उनका विश्लेषण प्रस्तुत है:

शेर 1: ईमान बेचने को तो तैयार हैं हम भी, लेकिन, खरीद हो जो अलीगढ़ के भाव से।

व्याख्या: यहाँ इलाहाबादी व्यंग्य करते हैं कि लोग तो ईमान भी बेच सकते हैं, पर यदि इसे अलीगढ़ (जहाँ सर सैयद ने आधुनिक शिक्षा को बढ़ावा दिया) के तर्ज़ पर खरीदा जाए, तभी यह स्वीकार्य होगा। यह हल्का-फुल्का व्यंग्य अलीगढ़ मूवमेंट पर है।

शेर 2: हजार शेख ने डाढ़ी बढ़ाई सन की – सी, मगर, वो बात कहाँ मालवी मदन की – सी।

व्याख्या: इस शेर में इलाहाबादी कहते हैं कि लाखों लोगों ने बाहरी रूप (जैसे दाढ़ी बढ़ाना) अपनाया, लेकिन असली असर वही नहीं हुआ जो मालवी मदन या असली दृष्टिकोण वाला व्यक्ति दर्शाता। यह शेर दिखावे और वास्तविकता के बीच अंतर को उजागर करता है।

शेर 3: तालीम–ए दुस्तुराँ से ये उम्मीद है ज़रा, नाचे दुल्हन ख़ुशी से ख़ुद अपनी बरात में।

व्याख्या: यह शेर शिक्षा और सुधार की उम्मीदों पर व्यंग्य करता है। इलाहाबादी कहते हैं कि शिक्षा का लक्ष्य सिर्फ़ दिखावा न बन जाए, बल्कि उसका असर वास्तविक जीवन में महसूस होना चाहिए।

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अकबर इलाहाबादी की शायरी यह दिखाती है कि आलोचना हमेशा विरोध नहीं होती, बल्कि यह सुधार और सुधारकों के दृष्टिकोण को समझने और परखने का माध्यम भी हो सकती है। उनकी शेरों में व्यंग्य, सामाजिक टिप्पणियाँ और गहरी समझ का सुंदर मिश्रण मिलता है।

Feb 9, 2026

15 बेहतरीन शेर - 19 !!!

1. हमें तो ख़ैर कोई दूसरा अच्छा नहीं लगता, उन्हें ख़ुद भी कोई अपने सिवा अच्छा नहीं लगता -मोहसिन ज़ैदी

2. मिरे लहू से वज़ू और फिर वज़ू पे वज़ू, डरा हुआ हूँ ज़माने तिरी नमाज़ से मैं - रफ़ी रज़ा

3. कुछ मेरे बाद और भी आएंगे क़ाफ़िले, कांटे ये रास्ते से हटा लूं तो चैन लूं। -तसव्वुर किरतपुरी

4. हमारे दिल में भी झांको अगर मिले फुर्सत, हम अपने चेहरे से उतने नजर नहीं आते..!! ~ वसीम बरेलवी

5. अब छोड़ साथ मेरा ऐ याद-ए-नौजवानी, इस उम्र का मुसाफ़िर तन्हाई चाहता है - क़तील शिफ़ाई

6. बुरा न मान अगर यार कुछ बुरा कह दे, दिलों के खेल में ख़ुद्दारियाँ नहीं चलतीं - कैफ़ भोपाली

7. मोहब्बत क्या बला है चैन लेना ही भुला दे है, ज़रा भी आँख झपके है तो बेताबी जगा दे है -कलीम आजिज़

8. मैं तो इस वास्ते चुप हूँ कि तमाशा न बने, तू समझता है मुझे तुझ से गिला कुछ भी नहीं - अख़्तर शुमार

9.सुब्ह हो जाएगी हाथ आ न सकेगा महताब, आप अगर ख़्वाब में चलते हैं तो चलते रहिए - मलिकज़ादा मंज़ूर अहमद

10. मैं मुद्दतों जिया हूँ किसी दोस्त के बग़ैर अब तुम भी साथ छोड़ने को कह रहे हो ख़ैर ~ फ़िराक़ गोरखपुरी

11. तुम पूछो और मैं न बताऊँ ऐसे तो हालात नहीं, एक ज़रा सा दिल टूटा है और तो कोई बात नहीं - क़तील शिफ़ाई

12. जाने ये कैसा ज़हर दिलों में उतर गया, परछाईं ज़िंदा रह गई, इंसान मर गया...!!! - उम्मीद फ़ाज़ली

13. लाई हयात आए क़ज़ा ले चली चले, अपनी ख़ुशी न आए न अपनी ख़ुशी चले - शेख़ इब्राहीम ज़ौक़

14. वो आए घर में हमारे ख़ुदा की क़ुदरत है, कभी हम उन को कभी अपने घर को देखते हैं - मिर्ज़ा ग़ालिब

15. देखिए पाते हैं उश्शाक़ बुतों से क्या फ़ैज़ इक बरहमन ने कहा है कि ये साल अच्छा है - मिर्ज़ा ग़ालिब

Feb 6, 2026

Why Write Love Poetry in a Burning World

Why Write Love Poetry in a Burning World

To train myself to find in the midst of hell

what isn’t hell.

The body bald

cancerous but still

beautiful enough to

imagine living the body

washing the body

replacing a loose front

porch step the body chewing

what it takes to keep a body going—

This scene has a tune

a language I can read a door

I cannot close I stand

within its wedge

a shield.

Why write love poetry in a burning world?

To train myself in the midst of a burning world

to offer poems of love to a burning world.

--- Katie Farris

Standing in the Forest of Being Alive by Katie Farris, Alice James Books, 2023"

Feb 3, 2026

The State

A hyena attacks a herd of deer
Their hooves inscribe a thousand branches on the earth

A tree of tracks and shadows, growing fast
There’s no time to think
Which doe to choose

The hyena must decide in haste
Who will live and who will die
She chooses at random

The hyena does not know the deer
There’s no enmity here, no competition
If it were just another day

The hyena might have picked another
Even after the deer is dead
The hyena is incapable of explaining her choice

Yet I believe the hyena is aware
Of the balance of fear

If the herd
Runs, not from her, but towards her
They crush her, bone and all

If only the deer change the direction of their flight
I also believe the herd is aware of its abilities

Yet each doe fears she'll be abandoned by her sisters
If she runs at the common foe
So she abandons her sisters
And each doe thinks the same

The deer do not fear the hyena much
They only doubt themselves

Each deer lives and dies alone
Yet, there are moments

When God is kind to the world:
A young deer darts at the hyena without thinking

The rest follow
Like rain
In moments such as these
You feel it being born

A breathing dawn
Or a baby speaking eloquently
In the cradle

I’m not writing an allegory
On Revolution
And the meek empowered

I’m simply stating a scientific fact
The hyena is weaker than her victims
And she’s very much the coward

--- Mourid Barghouti

Translated by Tamim Al-barghouti 

Jan 30, 2026

What I know of the sea

What I know of the sea is so little
yet all I want to do is swim!
Without leaning too long on reality
I'd like to view all my memories
one by one; leisurely.

I'd like to go, for example, to your dream world
where you open the window and walk 
where you rise and weave
your fingers into unkempt hair.

Rains wander your face, the gentleness of dew is in your voice.
Let each and every spring be yours!
May all mountains tire and arrive here!
Here at the place where stars have spilled you
where waters flow; the place where you say
Curl up on my lap and let birds take flight
In the place where we collected questions
such as 'what was before words?'

What I know of love is so little!
Yet I'm constantly thinking of you!

- İlhan Sami Çomak
Translated by Caroline Stockford

Jan 27, 2026

कबीरदास के दोहे: सरल हिंदी में अर्थ


1. दुर्बल को न सताइए, जाकी मोटी हाय।
मरी खाल की साँस से, लोहा भस्म हो जाय॥

भावार्थ: कमजोर पर अत्याचार करने से स्वयं का नुकसान होता है।

2. मधुर वचन है औषधि, कटुक वचन है तीर।
मधुर वचन जो बोलिए, कटुक वचन मत तीर॥

भावार्थ: मीठा बोल इंसान और समाज को लाभ पहुंचाता है, कटु शब्द हानि पहुँचाते हैं।

3. बुरा जो देखन मैं चला, बुरा न मिलया कोय।
जो दिल खोजा आपना, मुझसे बुरा न कोय॥

भावार्थ: दूसरों की गलतियाँ देखने से बेहतर है खुद की आत्मा का निरीक्षण।

4. साधु ऐसा चाहिए, जैसा सूप सुभाय।
सार-सार को गहि रहे, थोथा देई उड़ाय॥

भावार्थ: सच्चा साधु वही है जो सार को अपनाए और व्यर्थ को छोड़ दे।

5. धीरे-धीरे रे मना, धीरे सब कुछ होय।
माली सींचे सौ घड़ा, ऋतु आए फल होय॥

भावार्थ: सब कुछ समय और प्रयास के साथ होता है; धैर्य आवश्यक है।

6. कबिरा मन निर्मल भया , जैसे गंगा नीर।
पीछे-पीछे हरि फिरै , कहत कबीर कबीर

भावार्थ: शुद्ध मन वाला व्यक्ति सच्चे भक्ति मार्ग पर चलता है।

7. पीर मरे, पैगम्बर मरि हैं, मरि हैं ज़िन्दा जोगी,
राजा मरि हैं, परजा मरि हैं, मरि हैं बैद और रोगी।
साधो ये मुरदों का गाँव !

भावार्थ: सभी जीवन अंतहीन हैं; मौत सभी को समान रूप से लेती है।

8. बिरहा बुरहा जिनि कहौ, बिरहा है सुलतान।
जा घट बिरह न संचरै, सो घट सदा मसान॥

भावार्थ: विरह का अनुभव ही जीवन में सच्ची चेतना देता है; जो विरह न जानता वह शून्य है।

9. राम बुलावा भेजिया, दिया कबीरा रोय।
जो सुख साधू संग में, सो बैकुंठ न होय॥

भावार्थ: भक्ति और संतों के साथ सुख ही वास्तविक स्वर्ग है।

10. मन मैला तन ऊजरा, बगुला कपटी अंग
तासों तो कौआ भला, तन मन एकही रंग

भावार्थ: यदि मन और तन अस्वच्छ हैं, बाहरी रूप का कोई लाभ नहीं।

11. नहाय, धोए क्या हुआ, जो मन मैल ना जाये;
मीन सदा जल में रहे, धोए बास ना जाये।

भावार्थ: बाहरी शुद्धि से कुछ नहीं होता, जब तक मन शुद्ध न हो।

12. जाति न पूछो साधु की, पूछ लीजिए ज्ञान।
मोल करो तरवार का, पड़ा रहन दो म्यान॥

भावार्थ: व्यक्ति की जाति नहीं, ज्ञान और कर्म महत्वपूर्ण हैं।

13. पोथी पढ़ि पढ़ि जग मुआ, पंडित भया न कोय;
ढाई आखर प्रेम का, पढ़े सो पंडित होय॥

भावार्थ: वास्तविक ज्ञान और पंडित वही है जो प्रेम को समझे।

14. बड़ा हुआ तो क्या हुआ जैसे पेड़ खजूर;
पंछी को छाया नहीं, फल लागे अति दूर॥

भावार्थ: ऊँचाई या पद से कुछ नहीं, यदि दूसरों के लिए उपयोगी न हो।

15. चलती चक्की देख कर, दिया कबीरा रोए;
दो पाटन के बीच में, सबूत बचा न कोए॥

भावार्थ: संसार की नश्वरता देखकर दुख होना स्वाभाविक है।

16. क़ल करे सो आज कर, आज करे सो अब;
पल में प्रलय भएगी, बहुरि करेगा कब॥

भावार्थ: समय की कीमत समझो, काम को टालना खतरे में डालता है।

17. माटी कहे कुम्हार से, तू क्या रौंदे मोहे;
एक दिन ऐसा आएगा, मैं रौंंदूँ तोहे॥

भावार्थ: जो कुछ हम दूसरों पर थोपते हैं, वही हमें भविष्य में भुगतना पड़ता है।

18. गुरु गोविंद दोऊ खड़े, काके लागूं पाय;
बलिहारी गुरु आपने, गोविंद दियो बताय॥

भावार्थ: गुरु के बिना ईश्वर का ज्ञान नहीं; गुरु ही मार्ग दिखाते हैं।

19. कंकर‑पत्थर जोड़ि के, मस्जिद लई बनाय।
ता चढ़ि मुल्ला बांग दे, क्या बहरा हुआ खुदाय॥

भावार्थ: ईश्वर भवनों में नहीं, बल्कि मनुष्य के मन में वास करता है।

20. माला फेरत जुग भया, गया न मन का फेर।
कर का मनका डार दे, मन का मनका फेर॥

भावार्थ: केवल कर्मकांड से नहीं, मन की शुद्धि से भक्ति सिद्ध होती है।

21. साईं इतना दीजिए, जामे कुटुंब समाय;
मैं भी भूखा न रहूँ, साधु भी भूखा न जाय॥

भावार्थ: भगवान से साधारण जीवन और संतुलित संसाधन की प्रार्थना।

22. कबीर मनहिं गयन्द है, अंकुश दै दै राखु ।
विष की बेली परिहारो, अमृत का फल चाखु ।।

भावार्थ: मन मस्ताना हाथी है, इसे ज्ञान का अंकुश देकर अपने वश में रखो और विषय - विष - लता को त्यागकर स्वरूप - ज्ञानामृत का शान्ति फल चखो।

23. मन के मते न चलिये, मन के मते अनेक।
जो मन पर असवार है, सो साधु कोई एक।।

भावार्थ: मन के मत में न चलो, क्योंकि मन के अनेको मत हैं। जो मन को सदैव अपने अधीन रखता है, वह साधु कोई विरला ही होता है।

24. जो सुख में सुमिरन करें, दुख काहे को होय। 
कबीर दुखिया काहे रे, राम बिछोड़ा होय॥

भावार्थ: जो सुख में भी ईश्वर का स्मरण करते हैं, उन्हें दुख क्यों होगा? कबीर कहते हैं कि दुख इसलिए होता है क्योंकि हम राम (ईश्वर) को भूल जाते हैं। 

25. मोंको कहाँ ढूँढे बंदे, मैं तो तेरे पास में।
 ना मैं देवल ना मैं मस्जिद, ना काबे कैलास में॥

भावार्थ: हे बंदे, मुझे कहाँ ढूंढते हो? मैं तो तुम्हारे पास ही हूँ। न मैं मंदिर में हूँ, न मस्जिद में, न काबा में और न कैलाश में। 

26. कबीरा खड़ा बजार में, मांगे सबकी खैर।
ना काहू से दोस्ती, ना काहू से बैर।।

भावार्थ:  कबीरदास बाजार (संसार) में खड़े होकर सभी का कल्याण चाहते हैं। न किसी से गहरी दोस्ती, न किसी से दुश्मनी— सभी के प्रति समान भाव रखना चाहिए।

Jan 24, 2026

Part of the sorrows and suffering of Kurdish girls (1941)

The sorrow and suffering of Kurdish girls
cannot be told in a hundred stories

From the ranks of humanity, they have been driven away
lower than animals, weak and incurable

Until the age of fifteen, just like a servant 
They are forced to toil on the plains and the outdoors

Then when it is time for the demands of marriage
Quickly she is betrothed according to the terms of Sharia

Either she is conquered in exchange for much property 
Or she is captured, exchanged, woman for woman

she is given away to a filthy or old man
without opportunity, she is forced and hastily given away

her nineteenth century is pitiful 
Though in Sharia law she is said to be free

Those who so disobey 
in heart's sorrow they become mad and filled with fury

As long as they are girls, they are flawless and blameless
When married, they become subhuman

For every girl who suffers wrongdoing 
Let the responsibility lie with father and brother

Whoever marries her, again
persecutes her until the day of judgement

Mufti Penjweni

Jan 21, 2026

वो मिट्टी के बेटे - (Mitti Ke Bete Lyrics in Hindi) - INS Vikrant


क्या मन मौजी बेफ़िक्रे थे..ए..

क्या मन मौजी बेफ़िक्रे थे

मौत पे अपने हँसते थे

दिल में वतन को रखने वाले

सर पे कफ़न भी रखते थे


हम जो तिरंगा लहराएँगे

हिचकी बनके याद आएँगे


वो मिट्टी के बेटे, जो वापस ना लौटे

जो वापस ना लौटे, वो मिट्टी के बेटे


वो माँ के अलबेले, जो वापस ना लौटे

जो वापस ना लौटे, वो मिट्टी के बेटे

इस मिट्टी के बेटे


ओ..ओ..ओ..ओ. वो मिट्टी के बेटे

ओ..ओ..ओ..ओ. वो मिट्टी के बेटे

इस मिट्टी के बेटे


जिसके लिए सरदार हमारा

झूल गया था फंदे पर

धूल नहीं लगने दी हमने

उस बेदाग तिरंगे पर

उस बेदाग तिरंगे पर..

उस बेदाग तिरंगे पर


तेरा दर्द तू जाने बाबा

तेरा दर्द तू जाने बाबा

मैं तो खुशी से पागल हूँ

जिसकी गोदी में खेला मैं

चला उसी के कंधे पर


लाडले जब सरहद जाएँगे

हिचकी बनके याद आएँगे

वो मिट्टी के बेटे, जो वापस ना लौटे

जो वापस ना लौटे, वो मिट्टी के बेटे

वो माँ के अलबेले, जो वापस ना लौटे

जो वापस ना लौटे, वो मिट्टी के बेटे

इस मिट्टी के बेटे


ओ छलिये कहाँ पता था?

तू यारों को छल जाएगा

जो चढ़ता सूरज था अपना

वो ऐसे ढल जाएगा,

वो ऐसे ढल जाएगा

वो ऐसे ढल जाएगा


तेरे बिन सरहद से हम भी

तेरे बिन सरहद से हम भी

आधे-अधूरे लौटेंगे

तेरी चिता में धीरे से

कुछ अपना भी जल जाएगा


यार गले जब लग जाएँगे

हिचकी बनके याद आएँगे

वो मिट्टी के बेटे, जो वापस ना लौटे

जो वापस ना लौटे, वो मिट्टी के बेटे

वो माँ के अलबेले, जो वापस ना लौटे

जो वापस ना लौटे, वो मिट्टी के बेटे


इस मिट्टी के बेटे

कुछ दर्द कभी सोते ही नहीं

वनवास ख़तम होते ही नहीं

चौखट पे दीये जलते ही रहे

कुछ राम कभी लौटे ही नहीं

कुछ राम कभी लौटे ही नहीं

कुछ राम कभी लौटे ही नहीं


मेरे नाम का प्याला भर के, हो..ओ..

मेरे नाम का प्याला भर के

बरसातों में पी लेना

बाबा मैं तो रहा नहीं

तू मेरी जवानी जी लेना


हम जब जन गण मन गाएँगे

हिचकी बनके याद आएँगे

वो मिट्टी के बेटे, जो वापस ना लौटे

जो वापस ना लौटे, वो मिट्टी के बेटे

वो माँ के अलबेले, जो वापस ना लौटे

जो वापस ना लौटे, वो मिट्टी के बेटे

इस मिट्टी के बेटे


ओ..ओ..ओ..ओ. वो मिट्टी के बेटे

ओ..ओ..ओ..ओ. वो मिट्टी के बेटे

इस मिट्टी के बेटे...!

--- मनोज मुन्तशिर

गीत का संदर्भ : "वो मिट्टी के बेटे" एक देशभक्ति गीत की पंक्ति है जो हाल ही में रिलीज़ हुई फिल्म बॉर्डर 2 से ली गई है। यह उन शहीद सैनिकों को श्रद्धांजलि है जो मातृभूमि की रक्षा में लौटकर नहीं आए।यह गीत सोनू निगम द्वारा गाया गया है, संगीत मिथून का है, और बोल मनोज मुंतशिर ने लिखे हैं। गीत सैनिकों के बलिदान, माँ के लालों की बेफिक्री और तिरंगे की रक्षा पर केंद्रित है।

Sweet memories (1974)

The happy day of Kurdish youth is still hidden by a heavy black cloud
until the face of the city´s daughter is hidden from the eyes

Your veil does not let your beautiful eyebrows be seen 
Alas for the filthy cloud, preventing a gaze at the moon

How can a people be free, when its girl is shackled
Is that not enough of slavery-girls and shackled to their

Your father has closed the door for you, but has no door himself
To close the door for you, is to close the door of hope

Scandalous, it's death, how will they tell you
"You may not go out”, where is the right to life? Woman

Remove your black veil, let your shining cheek be seen
For in this, the 20th century, this veiling is filled with shame

Other people's girls build atomic bombs, but you 
Only know the words like (barbecue tongs), (potholder) and
(breadboard).

Thanks to her education, she learnt science and art
You (knit yarn) for us, such sweet memories

She flew across the sky, travelled the world, dived under the sea
My grief, and your only chore is to sit inside

Boy is successful, learning, working, making art
But your art is knitting socks, I rejoice for you

your grandmother never saw the veil, the shawl and the shroud
Those meaningless rags are the enemy's gift

Let us have a thousand clear sea like (Ze), (Gader), (Lawen) 
Until the woman is free, for the fountain of life is muddy

Slavery is not common anymore, beloved Kurdish girl
Go to battle, wake up, now is not a time for sleeping

Smash the door, tear the veil, run to school
The cure for Kurdish pain is education, only education

It is the educated mother who sends a strong son to the fight
I said it, you must understand: (the water never reaches the sea)

Your gold earrings are of no use, hear my words
Worthy of your ears, my love, is (Hemn's) simple poem

--- Hemin Mukriani

Jan 18, 2026

घर लौट के रोएँगे माँ बाप अकेले में

घर लौट के रोएँगे माँ बाप अकेले में
मिट्टी के खिलौने भी सस्ते न थे मेले में
 
काँटों पे चले लेकिन होने न दिया ज़ाहिर
तलवों का लहू धोया छुप छुप के अकेले में

ऐ दावर-ए-महशर ले देख आए तिरी दुनिया
हम ख़ुद को भी खो बैठे वो भीड़ थी मेले में
 
ख़ुशबू की तिजारत ने दीवार खड़ी कर दी
आँगन की चमेली में बाज़ार के बेले में

--- क़ैसर उल जाफ़री

Jan 15, 2026

Fuck Your Lecture on Craft, My People Are Dying

Colonizers write about flowers.

I tell you about children throwing rocks at Israeli tanks 
seconds before becoming daisies.
I want to be like those poets
who care about the moon. 

Palestinians don't see the moon 
from jail cells and prisons.
It's so beautiful, the moon.
They're so beautiful, the flowers.

I pick flowers for my dead father when I'm sad.
He watches Al Jazeera all day.
I wish Jessica would stop texting me Happy Ramadan.
I know I'm American because when I walk into a room something dies.

Metaphors about death are for poets who think ghosts care about sound.
When I die, I promise to haunt you forever.
One day, I'll write about the flowers like we own them.

--- Noor Hindi

Jan 12, 2026

पाँच साल

पाँच सालों में
उग आता है
बाप की आँखों में मोतियाबिंद
जम जाती हैं
माँ के चेहरे पर झुर्रियाँ
चल बसता है दादा
बिस्तर पकड़ लेती है दादी
रिश्तेदार बदल लेते हैं घर

पाँच सालों में गुज़र जाते हैं
सैकड़ों हंगामे अख़बार सीखा देते हैं
लोगों को नुकीली ज़बान
लाशों के नज़ारे बढ़ा देते हैं
खून की प्यास
घरों के मलबों पर नाचने लगते हैं तमाशबीन

ज़हरीली चरस खींच कर 
समाज हो जाता है सुन्न 
अंदर और बाहर से 
देश हो जाता हैं ठूंठ

पाँच सालों में हो जाता है 
बहुत कहने को 
सब कुछ ही हो जाता है 
हंगामों की अफ़रा-तफ़री में बस... 

नहीं होता अदालत में
एक ख़ास मुक़दमा
या किसी हाक़िम की हिम्मत
कि वो दे सके ज़मानत

पाँच सालों में 
सिर्फ़ ये ही नहीं हो पाता
हमेशा बस होते-होते रह जाता है

- हुसैन हैदरी

Jan 8, 2026

WHAT TO SAY TO THOSE WHO THINK YOU’RE A FOOL FOR CHOOSING POETRY

Tell them yes.
Tell them poetry is what chose you.
Tell them
you had a night, once,
just as they did,
when you knelt alone on the cold tiles
and asked the night
to give you a reason for being.
Tell them the answer was your life.
Tell them we are nothing, nothing
without passion,
the wild dark flock
that fills our rooms with joy.
Tell them
you will give the rest of your blazing days
to try to give another life
that moment,
that moment when you opened
to the coldness
and found that the music of your ruin
was too beautiful to ever be destroyed.

--- Joseph Fasano

Jan 4, 2026

रहीम के 25 अमर दोहे: सरल भाषा में विस्तृत अर्थ


1. अब रहीम मुश्किल पड़ी, गाढ़े दोऊ काम।
सांचे से तो जग नहीं, झूठे मिलें न राम॥

विस्तृत अर्थ: जब मनुष्य पर कठिन समय आता है, तब सच्चाई का साथ देने वाला समाज नहीं मिलता और झूठ का सहारा लेने पर ईश्वर भी प्राप्त नहीं होते। अर्थात विपत्ति में मनुष्य अकेला पड़ जाता है।

2. वे रहीम नर धन्य हैं, पर उपकारी अंग।
बाटनवारे को लगे, ज्यों मेंहदी को रंग॥

विस्तृत अर्थ: उपकारी व्यक्ति चाहे कितना ही बाँट दिया जाए, उसका गुण और प्रभाव कभी कम नहीं होता, जैसे मेहंदी बाँटने पर भी अपना रंग छोड़ती है।

3. रहिमन पानी राखिए, बिन पानी सब सून।
पानी गए न ऊबरै, मोती, मानुष, चून॥

विस्तृत अर्थ:: यहाँ ‘पानी’ का अर्थ मर्यादा, लज्जा और आत्मसम्मान से है। इनके बिना मनुष्य, मोती और चूना—सबका मूल्य नष्ट हो जाता है।

4. रहिमन निज मन की व्यथा, मन ही राखो गोय।
सुनि अठलैहैं लोग सब, बाँटि न लेहैं कोय॥

विस्तृत अर्थ: अपनी पीड़ा सबको बताने से लोग मज़ाक तो उड़ाते हैं, पर दुख बाँटने या सहायता करने कोई आगे नहीं आता।

5. जो बड़ेन को लघु कहे, नहिं रहीम घट जाय।
गिरधर मुरलीधर कहे, कछु दुख मानत नाह॥

विस्तृत अर्थ: महान व्यक्ति छोटे नाम या साधारण संबोधन से छोटा नहीं हो जाता, जैसे कृष्ण को कोई भी नाम कहे, उनकी महत्ता कम नहीं होती।

6. समय लाभ सम लाभ नहिं, समय चूक सम चूक।
चतुरन चित रहीम लगी, समय चूक कछु चूक॥

विस्तृत अर्थ: समय का सदुपयोग सबसे बड़ा लाभ है और समय चूक जाना सबसे बड़ा नुकसान, क्योंकि समय हाथ से निकल जाए तो अवसर लौटकर नहीं आते।

7. ए रहीम दर दर फिरहिं, माँगि मधुकरी खाहिं।
यारो यारी छोड़िये, वे रहीम अब नाहिं॥

विस्तृत अर्थ: जो व्यक्ति स्वाभिमान छोड़कर दर-दर भीख माँगता फिरता है, उससे मित्रता छोड़ देनी चाहिए, क्योंकि वह अपना आत्मसम्मान खो चुका होता है।

8. रहिमन वे नर मर चुके, जे कहुँ माँगन जाहिं।
उनते पहिले वे मुए, जिन मुख निकसत नाहिं॥

विस्तृत अर्थ:: माँगकर जीना आत्मसम्मान की मृत्यु है; पर उससे भी पहले वे मर चुके हैं जिनके मुख से ‘न’ शब्द नहीं निकलता।

9. जो रहीम उत्तम प्रकृति, का करि सकत कुसंग।
चन्दन विष व्यापत नहीं, लिपटे रहत भुजंग॥

विस्तृत अर्थ: अच्छे स्वभाव वाला व्यक्ति बुरी संगति में रहकर भी अपना गुण नहीं खोता, जैसे चंदन पर लिपटा साँप भी उसे विषैला नहीं बना पाता।

10. रहिमन प्रीति न कीजिए, जस खीरा ने कीन।
ऊपर से तो दिल मिला, भीतर फांकें तीन॥

विस्तृत अर्थ:: जो प्रेम केवल दिखावे का हो, उसमें भीतर से टूटन होती है; ऐसा प्रेम अंत में धोखा ही देता है।

11. तरुवर फल नहिं खात है, सरवर पियहि न पान।
कहि रहीम पर काज हित, संपति संचहि सुजान॥

विस्तृत अर्थ:: जैसे पेड़ अपने फल नहीं खाते और तालाब अपना पानी नहीं पीते, वैसे ही सज्जन व्यक्ति अपनी संपत्ति दूसरों के कल्याण के लिए संचित करता है।

12. रूठे सुजन मनाइए, जो रूठे सौ बार।
रहीमन फिरि फिरि पोइए, टूटे मुक्ता हार॥

विस्तृत अर्थ: अच्छे और सज्जन लोगों से संबंध टूटने न दें, क्योंकि वे टूटे मोती के हार जैसे होते हैं जिन्हें फिर से पिरोना चाहिए।

13. क्षमा बड़न को चाहिए, छोटन को उत्पात।
कह रहीम हरि का घट्यौ, जो भृगु मारी लात॥

विस्तृत अर्थ: क्षमा केवल महान लोगों का गुण है; क्रोध करना छोटे मन का लक्षण है | उदाहरण के रूप में वे कहते हैं कि जब महर्षि भृगु ने भगवान विष्णु को पैर मारा, तब भी भगवान ने क्रोध नहीं किया, बल्कि उनके पैर दबाने लगे। 

14. रहिमन धागा प्रेम का, मत तोड़ो चटकाय।
टूटे से फिर ना जुड़े, जुड़े गाँठ पड़ जाय॥

विस्तृत अर्थ: प्रेम का संबंध बहुत नाज़ुक होता है; एक बार टूट जाए तो दोबारा जुड़ने पर भी उसमें गाँठ रह जाती है।

15. एकही साधे सब सधै, सब साधे सब जाय।
रहिमन मूल सींच बोये, फूल लहि अघाय॥

विस्तृत अर्थ: यदि मूल कारण पर ध्यान दिया जाए तो सभी कार्य सफल हो जाते हैं; इधर-उधर भटकने से सब कुछ नष्ट हो जाता है।

16. रहिमन ओछे नरन सो, बैर भली न कीत।
काटे चाटे स्वान के, दोऊ भाँति ती प्रतीत॥

विस्तृत अर्थ: नीच व्यक्ति से शत्रुता दोनों ही स्थितियों में नुकसानदायक होती है, चाहे वह नुकसान करे या दिखावटी प्रेम दिखाए।

17. जो रहीम गति दीप की, कुल कपूत गति सोय।
बारे उजियारो करे, बढ़े अँधेरो होय॥

विस्तृत अर्थ: कुपुत्र परिवार का नाम रोशन करने के बजाय बदनामी लाता है, जैसे दीपक बुझने पर अंधकार बढ़ जाता है।

18.  रहिमन चुप हो बैठिए, देखि दिनन को फेर।
जब नीके दिन आइहैं, बनत न लागै बेर॥

विस्तृत अर्थ: बुरे समय में धैर्य और मौन रखना चाहिए, क्योंकि अच्छे दिन आने पर परिस्थितियाँ स्वयं सुधर जाती हैं।

19. रहिमन प्रेम न छाँड़िए, लघु जन जानि।
कूँजा पथिक न छोड़ई, देखि बावड़ी पानी॥

विस्तृत अर्थ: छोटे व्यक्ति या छोटे साधन को तुच्छ न समझें, क्योंकि संकट में वही सहारा बन सकता है।

20. रहिमन मीत बनाइए, कठिन समय के काम।
आपत्ति काज न आवहीं, संपत्ति साँचि सुजान॥

विस्तृत अर्थ: सच्चे मित्र वही होते हैं जो संकट में साथ दें; धन केवल सुरक्षित रखा जा सकता है, मदद नहीं कर सकता।

21. रहिमन गति अगम्य है, प्रेम की रीति अपार।
दादुर डूबे पंक में, मीन न उबरै पार॥

विस्तृत अर्थ: प्रेम की शक्ति और उसकी गति को समझना कठिन है; इसमें अयोग्य डूब जाते हैं और योग्य भी पार नहीं पा पाते।

22. रहिमन जिह्वा बावरी, कह गई सरग पाताल।
आप तो कह भीतर रही, जूता खात कपाल॥

विस्तृत अर्थ: असंयमित वाणी मनुष्य को अपमान और संकट में डाल देती है, जबकि बोलने वाली जिह्वा स्वयं सुरक्षित रहती है।

23. रहिमन हानि लाभ जीवन मरण, यश अपयश विधि हाथ।
जेति बने तित होइये, एहि विधि रहीम रीत॥

विस्तृत अर्थ: लाभ-हानि, जीवन-मरण और मान-अपमान सब विधि के हाथ में हैं; इसलिए जो मिले उसे स्वीकार करना चाहिए।

24. 
ओछो काम बड़े करैं तौ न बड़ाई होय।
ज्‍यों रहीम हनुमंत को, गिरधर कहै न कोय॥

विस्तृत अर्थ: यदि कोई छोटा या सामान्य व्यक्ति कोई बड़ा काम करता है, तो भी उसकी बड़ाई नहीं होती, जैसे हनुमान को कोई कृष्ण (गिरधर) नहीं कहता।

25. रहिमन यह तन विष की बेलरी, गुरु अमृत की खान।
सीस दिए जो गुरु मिले, तो भी सस्ता जान॥

विस्तृत अर्थ: यह शरीर नश्वर और विष के समान है, जबकि गुरु का ज्ञान अमृत तुल्य है; गुरु के लिए जीवन भी न्योछावर करना सस्ता सौदा है।

26. “बिगरी बात बने नहीं, लाख करो किन कोय।
रहिमन फाटे दूध को, मथे न माखन होय॥” 

विस्तृत अर्थ:  कुछ नुकसान लौटकर ठीक नहीं होते - बिगड़ा हुआ संबंध या अवसर, कितनी भी कोशिश करो, वैसा पहले जैसा नहीं बनता।

27. रहिमन चुप हो बैठिये, देखि दिनन के फेर।
जब नीके दिन आइहैं, बनत न लगिहैं बेर॥

विस्तृत अर्थ: रहीम कहते हैं—दिनों के चक्र को देखकर चुपचाप बैठ जाओ। बुरे दिन भी गुजर जाते हैं। जब सुख के दिन आएँगे, तब ये दुखमय दिन तुच्छ और अर्थहीन प्रतीत होंगे


“बचपन में पिता जी ने ये दोहे सिखाए थे—आज समझ आता है कि ये सिर्फ़ कविता नहीं, जीवन के सबसे गहरे पाठ थे।”

Dec 31, 2025

UP Board Hindi Book "महान व्यक्तित्व" (पूर्व नाम – हमारे पूर्वज) के प्रेरक दोहे

1. चढ़ै टरै सूरज टरै, टरै जगत व्यवहार। पै दृढ़ हरिचंद को, टरै न सत्य विचार।।

2. नौ लख पातर आगे नाचै, पीछे सहज अखाड़ा।  ऐसो मन लै जोगी खेलै तव अंतर बसै भंडारा।।   गोरखनाथ

3. गोरी सोवे सेज पर, मुख पर डारै केस। चल खुसरो घर आपल्या, साँझ भई चहुँ देस।। – अमीर खुसरो

4. परहित सरिस धरम नहि भाई। पर पीड़ा सम नहि अधमाई।। – तुलसीदास

5. सुरतिय, नरतिय, नागतिय, यह चाहत सब कोय। गोद लिए लली फिरै, तुलसी सो सुत होय।। – तुलसीदास

6. हे री! मैं तो प्रेम दिवानी, मेरो दरद न जाने कोय।  सूली ऊपर सेज हमारी, सोवण कोन विध होय।। – मीराबाई

7. मेरे तो गिरधर गोपाल, दूसरो न कोई। जाके सिर मोर मुकुट, मेरो पति सोई।।-  मीराबाई

8. चकित में रहिमन रहै, रहिमन जब पर विपदा पड़े। अवध नरेस वह आवत यह देस।। – रहीम

9. जो गरीब सहत कर, कहाँ सुदामा‑धन रहीम? वे बापुरे लोग, कृष्ण मथाई जोग। – रहीम

10. कबिरा हर के ठाठ ते, गु के सरन न जाइ। गु के ठाठ नित नवें, हर ठाढ़ रहें सहाइ॥ - कबीरदास

11. निंदक नियरे राखिए, आँगन कुटी छवाय।  बिन पानी, साबुन बिना, निर्मल करे सुभाय॥ -  कबीरदास

12. आजु जो हरिहि नहिं दुःख गहाऊँ, तौ लाज गंगा जननी को; शान्तनु सुत न कहाऊँ। -भीष्म प्रतिज्ञा

13. भला भयो विधि ना धियो शेषनाग के कान धरा मेरु सब डोलते तानसेन की तान ।

14. विद्या बिना मति गई, मति बिना गति गई, गति बिना नीति गई, नीति बिना वित्त गया, वित्त बिना शूद्र खचले।

15. अब न अहले वलवले हैं और न अरमानों की भीड़। एक मिट जाने की हसरत अब दिल-ए-बिस्मिल में है ।

16. कुछ आरजू नहीं है, है आरजू तो यह। रख दे कोई ज़रा सी ख़ाक़े वतन कफ़न में।

हमारे पूर्वज" (Hamare Purvaj) नाम की किताबें यूपी बोर्ड में पहले पढ़ाई जाती थीं, खासकर जूनियर कक्षाओं (जैसे कक्षा 6 - 8) में, लेकिन अब ये किताबों के नाम बदल गए हैं या इनका पाठ्यक्रम बदल गया है, और अब ये किताबें 'महान व्यक्तित्व' (Mahan Vyaktitva) जैसे नामों से या अन्य विषयों के तहत मिल सकती हैं, जो शुरुआती भारतीय इतिहास और पूर्वजों के बारे में जानकारी देती हैं

Dec 29, 2025

Picture - Kurdish Poem

Four children

a Turk, a Persian

an Arab and a Kurd were collectively drawing the picture of a man.

The first drew his head

The second drew his hands and upper limbs

The third drew his legs and torso

The fourth drew a gun on his shoulder

--- Sherko Bekas [1979]

Dec 27, 2025

Pind Apne Nu Jaanwa - Lyrics - Dharmendra Poem from Ikkis Movie

आज वी जी करदा पिंड अपने नू जावां
डोबे विच भड़कें मझियां नवावां

लेके दाती पैयां विचों पत्ते वी ल्यावां
मिटीयां च खेलना कबड्डी वाला खेल

पिंड वाली ज़िंदगी दा किहड़े नाल मेल
पंज दरियावां दा मीठा मीठा पानी

वगदी हवावां विच गुरूआं दी वाणी
ओ कदे बेबे वाली बुक्कल चित्त चे ਭੁਲੋणी

हां नी मायिये मेरिये मैं सदके तेरे जावां
आज वी जी करदा पिंड अपने नू जावां

आज वी जी करदा पिंड अपने नू जावां....


यह कविता धर्मेंद्र द्वारा स्वयं लिखी गई है, जो उनकी आखिरी फिल्म 'इक्कीस' (परम वीर चक्र विजेता अरुण खेतारपाल पर बायोपिक) में प्रस्तुत की गई। धर्मेंद्र का निधन 24 नवंबर 2025 को हो गया।कविता पिंड की मिट्टी, नदी के पानी, कबड्डी और मां के प्यार के प्रति गहरी लालसा व्यक्त करती है। 
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Aaj vi jee karda pind apne nu jaava
Dobbe vich bhadke majhiyan nawava

Leke daati paiyan vichon patthe v lyava
Mitiyan ch khedna kabadi wala khed

Pind wali zindagi da kihde naal mel
Panj dariyawan da mitha mitha pani

Vagdi hawaan vich guruan di vaani
O kade bebe wali bukkal chitt che bhuloni

Han ni maaye meriye mai sadke tere jaava
Aaj vi jee karda pind apne nu jaava

Aaj vi jee karda pind apne nu jaava....

Dec 24, 2025

अरावली के आख़िरी दिन

एक मधुमक्खी परागकणों के साथ

उड़ते-उड़ते थक जाएगी।

सभी बहेलिए जाल को देखकर

उलझन में पड़ जाएँगे।

एक नन्हा ख़रगोश लू की बौछार में

हाँफते-हाँफते थक जाएगा।

चेतना आकुलित बघेरे कहीं नहीं दिखेंगे

इस निरीह-निर्वसन धरती पर।

अरावली के आख़िरी दिन

युवतियाँ छाता लेकर सैर करने जाएँगी

और लॉन में टहलकर लौट आएँगी।

एक शराबी चंद्रमा की रोशनी में

बहेलिए बस्तियों की ओर लौटते नज़र आएँगे।

कुछ पीले चेहरे सब्ज़ियों के ठेले लेकर

मुहल्लों में रेंगते हुए आवाज़ें देंगे।

बिना तारों वाली सघन अँधेरी रात में

रावण-हत्थे की आवाज़ के साथ तैरेगी

बच रह गए एक गीदड़ की टीस।

और जिन्हें नीले नभ में बिजलियाँ चमकने,

बादल गरजने और वर्षा की बूँदों का इंतिज़ार है,

सूखे काले अँधेरे में आँख मिचमिचाते और

कानों में कनिष्ठिकाएँ हिलाते थक जाएँगे।

और जिन्हें किताबें पढ़ने का शौक होगा,

शब्दकोश में साँप का अर्थ ढूँढ़कर

अपने बच्चों को कालबेलिया जोगियों की कथा सुनाएँगे

और सुनहरे केंचुल ओढ़े कोई देवता

सितारों की ओट में धरती को भरी आँख से निर्निमेष निहारेगा।

हालाँकि बात ऐसी है


अरावली की कोई एक तस्वीर देखकर

सूरज और चाँद के नीचे सुन नहीं पाता कोई

कभी ख़त्म न होने वाली बिलख, जो हर

इमारत की नींव तले दबी फूटती रहती है।

बड़ी आलीशान इमारतों में खिलते रहते हैं

ख़ूबसूरत गुलाबों जैसे नन्हे शिशु

और इसीलिए किसी को विश्वास नहीं होता कि

अरावली के आख़िरी दिन अरावली ऐसी होगी?

अरावली के आख़िरी दिन ऐसा ज़रूर होगा

एक अवतारी पुरुष आएँगे

एक नबी पुकारेगा

लेकिन बात ऐसी है कि वे दोनों आईफ़ोन पर व्यस्त होंगे

उन्हें न धनिए, न हरी मिर्च, न मेथी, न आलू,

न टमाटर, न ज़ीरे और न हरे चने की ज़रूरत होगी,

क्योंकि उनके बैग में

मैक्डॉनल्ड के बर्गर, मैकपफ़ और सालसा रैप होंगे।

अरावली का इसके अलावा यहाँ और क्या अंत होगा?

अरावली का इसके अलावा वहाँ और क्या अंत होगा?

स्रोत :रचनाकार : त्रिभुवन

प्रकाशन : हिन्दवी के लिए लेखक द्वारा चयनित

सौरभ द्विवेदी ने कविता “अरावली के आख़िरी दिन” अपने अंदाज़ में पढ़ी है और इसे आज के अरावली के दर्द से जोड़ दिया है। 

संदर्भ : सुप्रीम कोर्ट ने नवंबर 2025 में अरावली पहाड़ियों की नई परिभाषा को मंजूरी दी, जिसमें 100 मीटर ऊंचाई से कम की पहाड़ियों को बाहर रखा गया, जिससे राजस्थान के 91% से अधिक क्षेत्र असुरक्षित हो गए। यह फैसला पर्यावरण मंत्रालय की सिफारिश पर आधारित था, लेकिन सुप्रीम कोर्ट की ही समिति (सीईसी) और भारतीय वन सर्वेक्षण (एफएसआई) ने इसका विरोध किया, क्योंकि इससे अवैध खनन को बढ़ावा मिलेगा।अरावली, जो दुनिया की सबसे प्राचीन पर्वतमाला है, दिल्ली-एनसीआर को रेगिस्तान से बचाती है, भूजल रिचार्ज करती है और जैव विविधता का केंद्र है, लेकिन पिछले दो दशक में 25-35% हिस्सा खनन से नष्ट हो चुका।ग्रामीणों, पर्यावरणविदों और आदिवासी समुदायों ने जयपुर, अलवर, उदयपुर जैसे क्षेत्रों में बड़े प्रदर्शन शुरू कर दिए, जहाँ गुर्जर-मेव किसान उपवास, जनसभाएँ और हस्ताक्षर अभियान चला रहे हैं।"अरावली विरासत जन अभियान" के तहत चार राज्यों के प्रतिनिधि खनन माफियाओं के खिलाफ एकजुट हुए, मांग की कि पूरी 692 किमी रेंज को पारिस्थितिक क्षेत्र घोषित कर नई खदानों पर पूर्ण रोक लगे।कार्यकर्ता राजेंद्र सिंह और नीलम अहुवालिया जैसे नेता चेतावनी दे रहे हैं कि यह फैसला मरुस्थलीकरण, जल संकट और प्रदूषण को बढ़ेगा, जबकि कोर्ट ने सस्टेनेबल माइनिंग प्लान तक नई लीज पर रोक का निर्देश दिया है।यह संघर्ष पर्यावरण रक्षा से आगे लोकतांत्रिक अधिकारों की लड़ाई बन गया है।

Dec 22, 2025

I am Kurdish ( أنا كردي )

I challenge poverty, privation, pain. 
I resist times of oppression with strength.
I have courage.
I do not love angel eyes, skin white as marble.
I love the rocks, the hills, the peaks lost among the clouds.
I challenge misfortune, misery, solitude 
And I shall never be a slave of the enemy, never grant him treaty!
I challenge batons, chains, torture. 
And even if my body lies torn in pieces,
With all my strength 
I shall scream: I am Kurdish.


Kurds are an ethnic group indigenous to a region called Kurdistan spanning parts of Turkey, Iraq, Iran, and Syria. They have long sought the creation of an independent Kurdish nation due to historic repression and the denial of autonomy. Despite partial autonomy in Iraq and Syria, the demand for a separate nation remains unresolved, with Kurdish nationalism still actively suppressed in several countries

Dec 19, 2025

यह वह बनारस नहीं गिंसबर्ग

'हाउल' नहीं गिंसबर्ग
परवर्ती पीढ़ी हमारी

नहीं मालूम जिसे क्यों कब
किसने लिखा कुछ पढ़कर सो कुछ लिखकर सो

देख रही बिकती बोटियाँ जिगर कीं
छह दो सात पाँच बोली न्यूयॉर्क-टोक्यो की

हाँ ऐलेन क्यों आए थे बनारस
यहाँ तो छूटा फॉर्टी सेकंड स्ट्रीट बहुत पीछे

कुत्तों ने किया हमेशा सड़कों पर संभोग यहाँ
रंग-बिरंगी नंगी रंभाएँ बेच रहा ईश्वर ख़ुराक आज़ादी के मसीहे की

चीत्कार इस पीढ़ी की नहीं बनेगी लंबी कविता नहीं बजेंगे ढोल
यह वह बनारस नहीं बीटनिक बहुत बड़ा गड्ढा है

रेंग रहा कीड़ा जिसमें
नहीं किसी और ग्रह का, मेरा ही दिमाग़ है लिंग है

हे भगवान चली गोलियाँ छत्तीसगढ़
भाई मेरा भूमिगत मैं क्यों गड्ढे में फिर

पाखंडी पीढ़ी मेरी
जाँघियों में खटमल-सी

भूखी बहुत भूखी
बनारस ले गए कहाँ तुम

जाएँ कहाँ हम छिपकर इन ख़ाली-ख़ाली तक़दीरों से
इन नंगे राजाओं से

कहाँ वह औरत वह मोक्षदात्री
बहुत प्यार है उससे

चाहा मैंने भी विवस्त्र उसे हे सिद्धार्थ
भूखे मरते मजूर वह क्यों फैलाती जाँघें

कहते कोई डर नहीं उसे एड्स का
बहुत दुखी इस पीढ़ी का पीछे छूटा यह बीमार

कई शीशों के बीच खड़ा ढोता लाशें अनगिनत
उठो औरतों प्यार करो हमसे

बना दो दीवार बाँध की हमें
कहो गिंसबर्ग कहो हमें गाने को यह गीत

बनारस नहीं आवाज़ हमारी अंतिम कविता
कहो।

--- लाल्टू