31.12.11

What the heart is Like

Officially the heart
is oblong, muscular,
and filled with longing.

But anyone who has painted the heart knows
that it is also

spiked like a star
and sometimes bedraggled
like a stray dog at night
and sometimes powerful
like an archangel’s drum.

And sometimes cube-shaped
like a draughtsman’s dream
and sometimes gaily round
like a ball in a net.

And sometimes like a thin line
and sometimes like an explosion.

And in it is
only a river,
a weir
and at most one little fish
by no means golden.

More like a grey
jealous
loach.

It certainly isn’t noticeable
at first sight.

Anyone who has painted the heart knows
that first he had to
discard his spectacles,
his mirror,
throw away his fine-point pencil
and carbon paper

and for a long while
walk
outside.

Miroslav Holub, trans. from Czech by Ewald Osers

29.12.11

क्यों करें हम

नया एक रिश्ता पैदा क्यों करें हम
बिछड़ना है तो झगडा क्यों करें हम

ख़ामोशी से अदा हो रस्मे-दूरी
कोई हंगामा बरपा क्यों करें हम

ये काफी है कि हम दुश्मन नहीं हैं
वफादारी का दावा क्यों करें हम

वफ़ा इखलास* कुर्बानी मोहब्बत
अब इन लफ़्ज़ों का पीछा क्यों करें हम

सुना दें इस्मते-मरियम का किस्सा
पर अब इस बाब को वा क्यों करें हम

ज़ुलेखा-ए-अजीजाँ बात ये है
भला घाटे का सौदा क्यों करें हम

हमारी ही तमन्ना क्यों करो तुम
तुम्हारी ही तमन्ना क्यों करें हम

किया था अहद जब लम्हों में हमने
तो सारी उम्र इफा क्यों करें हम

उठा कर क्यों न फेंकें सारी चीज़ें
फकत कमरों में टहला क्यों करें हम

नहीं दुनिया को जब परवाह हमारी
तो दुनिया की परवाह क्यों करें हम

बरहना हैं सरे बाज़ार तो क्या
भला अंधों से परा क्यों करें हम

हैं बाशिंदे इसी बस्ती के हम भी
सो खुद पर भी भरोसा क्यों करें हम

पड़ी रहने दो इंसानों की लाशें
ज़मीं का बोझ हल्का क्यों करें हम

ये बस्ती है मुसलामानों की बस्ती
यहाँ कारे-मसीहा क्यों करें हम

-: जौन एलिया

ये सोचा नहीं है किधर जाएँगे

ये सोचा नहीं है किधर जाएँगे
मगर हम यहाँ से गुज़र जाएँगे

इसी खौफ से नींद आती नहीं
कि हम ख्वाब देखेंगे डर जाएँगे

डराता बहुत है समन्दर हमें
समन्दर में इक दिन उतर जाएँगे

जो रोकेगी रस्ता कभी मंज़िलें
घड़ी दो घड़ी को ठहर जाएँगे

कहाँ देर तक रात ठहरी कोई
किसी तरह ये दिन गुज़र जाएँगे

इसी खुशगुमानी ने तनहा किया
जिधर जाऊँगा, हमसफ़र जाएँगे

बदलता है सब कुछ तो 'आलम' कभी
ज़मीं पर सितारे बिखर जाएँगे

--'आलम खुर्शीद'

6.12.11

6 दिसम्बर को मिला दूसरा बनवास मुझे

राम बनवास से जब लौट के घर में आये,
याद जंगल बहुत आया जो नगर में आये,
रक्स-ए-दीवानगी आँगन में जो देखा होगा,
6 दिसम्बर को श्री राम ने सोचा होगा,
इतने दीवाने कहाँ से मेरे घर में आये?

जगमगाते थे जहाँ राम के क़दमों के निशाँ,
प्यार की कहकशां लेती थी अंगड़ाई जहाँ,
मोड़ नफरत के उसी रह गुज़र में आये,
धरम क्या उनका है, क्या ज़ात है, ये जानता कौन?
घर न जलता तो उन्हें रात में पहचानता कौन,
घर जलने को मेरा, लोग जो घर में आये,
शाकाहारी है मेरे दोस्त तुम्हारा खंजर.

तुमने बाबर की तरफ फेके थे सारे पत्थर,
है मेरे सर की खता ज़ख्म जो सर में आये,
पावँ सरजू में अभी राम ने धोये भी न थे,
के नज़र आये वहां खून के गहरे धब्बे,
पावँ धोये बिना सरजू के किनारे से उठे,
राम ये कहते हुए अपने द्वारे से उठे,
राजधानी की फिजा आयी नहीं रास मुझे,
6 दिसम्बर को मिला दूसरा बनवास मुझे.

 by Kaifi Azmi 

14.11.11

Mind has no color

Mind has no color,
Is neither long nor short,
Doesn't appear or disappear;
It is free from both purity and impurity;
It was never born and can never die;
It is utterly serene.
This is the form of our
Original mind,
Which is also our original body.

- Hui-hai (8th cent)

12.11.11

No man is an island

No man is an island,
Entire of itself.
Each is a piece of the continent,
A part of the main.
If a clod be washed away by the sea,
Europe is the less.
As well as if a promontory were.
As well as if a manor of thine own
Or of thine friend's were.
Each man's death diminishes me,
For I am involved in mankind.
Therefore, send not to know
For whom the bell tolls,
It tolls for thee.

---John Donne

11.11.11

Advice to Women

Keep cats
if you want to learn to cope with
the otherness of lovers.
Otherness is not always neglect --
Cats return to their litter trays
when they need to.
Don't cuss out of the window
at their enemies.
That stare of perpetual surprise
in those great green eyes
will teach you
to die alone.

---Eunice deSouza

1.11.11

ज़िन्दगी ना मिलेगी दोबारा.

जब जब दर्द का बादल छाया
जब गम का साया लैहराया
जब आँसू पलकों तक आया
जब ये तन्हा दिल घबराया
हमने दिल को ये समझाया
दिल आखिर तू क्यों रोता है
दुनिया मे यूँ ही होता है
ये जो गहरे सऩ्नाटे हैं
वक़्त ने सबको ही बाँटे हैं
थोड़ा गम है सबका किस्सा
थोड़ी धूप है सबका हिस्सा
आँख तेरी बेकार ही नम हैं
हर पल एक नय़ा मौसम है
क्यों तु ऐसे पल खोता है
दिल आखिर तू क्यों रोता है....


ऐक बात होटों तक है जो आइ नहीं
बस आँखों से है झाँकती
तुमसे कभी, मुझसे कभी
कुछ लव्ज़ हैं वो माँगती
जिनको पहन के होटों तक आ जाए वो
आवाज़ की बाहों मे बाहें डाले इठलाए वो
लेकिन जो ये एक बात है
ऐहसास ही ऐहसास है
खुशबू सी है जैसे हवा में तैरती
खुशबू जो बेआवाज़ है
जिसका पता तुमको भी है
जिसकी खबर मुझको भी है
दुनिया से भी छुपता नहीं
ये जाने कैसा राज़ है....


पिघले नीलम सा बेहता हुआ ये समा
नीली नीली सी खामोशियाँ
ना कहीं है ज़मीन
ना कहीं है आसमां
सरसराती हुई तनहाइयां,
पत्तियां कह रही हैं की बस ऐक तुम हो यहाँ
सिर्फ मैं हूँ मेरी साँसे हैं और मेरी धड़कनें
ऐसी गहराइयाँ
ऐसी तनहाइयां
और मैं सिर्फ मैं
अपने होने पे मुझको यकीन आ गया...



दिलों में तुम अपनी बेताबियाँ लेके चल रहे हो
तो ज़िन्दा हो तुम
नज़र में ख्वाबों की बिजलियाँ लेके चल रहे हो
तो ज़िन्दा हो तुम

हवा के झोंकों के जैसे
आज़ाद रहना सीखो
तुम एक दरिया के जैसे
लहरों में बहना सीखो
हर एक लमहे से मिलो
खोले अपनी बाँहें
हर एक पल एक नया समा
देखे ये निगांहे

जो अपनी आँखों मे हैरानियाँ लेके चल रहे हो
तो ज़िन्दा हो तुम
दिलों में तुम अपनी बेताबियाँ लेके चल रहे हो
तो ज़िन्दा हो तुम....

- जावेद अख़्तर

28.9.11

जुस्तजू खोये हुओं की

जुस्तजू खोये हुओं की उम्र भर करते रहे
चाँद के हमराह हम हर शब सफ़र करते रहे

रास्तों का इल्म था हम को न सिम्तों की ख़बर
शहर-ए-नामालूम की चाहत मगर करते रहे

हम ने ख़ुद से भी छुपाया और सारे शहर से
तेरे जाने की ख़बर दर-ओ-दिवार करते रहे

वो न आयेगा हमें मालूम था उस शाम भी
इंतज़ार उस का मगर कुछ सोच कर करते रहे

आज आया है हमें भी उन उड़ानों का ख़याल
जिन को तेरे ज़ौम में बे-बाल-ओ-पर करते रहे|

- परवीन शाकिर

20.9.11

दोस्त बनकर भी नहीं साथ निभाने वाला

दोस्त बनकर भी नहीं साथ निभाने वाला
वो ही अंदाज़ है ज़ालिम का ज़माने वाला।

क्या कहें कितने मरासिम थे हमारे उससे
वो जो इक शख़्स है मुँह फेर के जाने वाला।

क्या ख़बर थी जो मेरी जाँ में घुला रहता है
है वही मुझको सर-ए-दार भी लाने वाला।

मैंने देखा है बहारों में चमन को जलते
है कोई ख़्वाब की ताबीर बताने वाला।

तुम तक़ल्लुफ़ को भी इख़लास समझते हो ‘फ़राज़’
दोस्त होता नहीं हर हाथ मिलाने वाला।


मरासिम = Relations, Agreements
सर-ए-दार = At the Tomb
ताबीर = Interpretation
तक़ल्लुफ़ = Formality
इख़लास = Sincerity, Love, Selfless Worship

---अहमद फ़राज़

18.9.11

अपना ग़म लेके कहीं और न जाया जाये

अपना ग़म लेके कहीं और न जाया जाये
घर में बिखरी हुई चीज़ों को सजाया जाये

जिन चिराग़ों को हवाओं का कोई ख़ौफ़ नहीं
उन चिराग़ों को हवाओं से बचाया जाये

बाग में जाने के आदाब हुआ करते हैं
किसी तितली को न फूलों से उड़ाया जाये

ख़ुदकुशी करने की हिम्मत नहीं होती सब में
और कुछ दिन यूँ ही औरों को सताया जाये

घर से मस्जिद है बहुत दूर चलो यूँ कर लें
किसी रोते हुए बच्चे को हँसाया जाये |

---निदा फ़ाज़ली

6.9.11

सत्य

सत्य को लकवा मार गया है
वह लंबे काठ की तरह
पड़ा रहता है सारा दिन, सारी रात
वह फटी–फटी आँखों से
टुकुर–टुकुर ताकता रहता है सारा दिन, सारी रात
कोई भी सामने से आए–जाए
सत्य की सूनी निगाहों में जरा भी फर्क नहीं पड़ता
पथराई नज़रों से वह यों ही देखता रहेगा
सारा–सारा दिन, सारी–सारी रात

सत्य को लकवा मार गया है
गले से ऊपरवाली मशीनरी पूरी तरह बेकार हो गई है
सोचना बंद
समझना बंद
याद करना बंद
याद रखना बंद
दिमाग की रगों में ज़रा भी हरकत नहीं होती
सत्य को लकवा मार गया है
कौर अंदर डालकर जबड़ों को झटका देना पड़ता है
तब जाकर खाना गले के अंदर उतरता है
ऊपरवाली मशीनरी पूरी तरह बेकार हो गई है
सत्य को लकवा मार गया है

वह लंबे काठ की तरह पड़ा रहता है
सारा–सारा दिन, सारी–सारी रात
वह आपका हाथ थामे रहेगा देर तक
वह आपकी ओर देखता रहेगा देर तक
वह आपकी बातें सुनता रहेगा देर तक

लेकिन लगेगा नहीं कि उसने आपको पहचान लिया है

जी नहीं, सत्य आपको बिल्कुल नहीं पहचानेगा
पहचान की उसकी क्षमता हमेशा के लिए लुप्त हो चुकी है
जी हाँ, सत्य को लकवा मार गया है
उसे इमर्जेंसी का शाक लगा है
लगता है, अब वह किसी काम का न रहा
जी हाँ, सत्य अब पड़ा रहेगा
लोथ की तरह, स्पंदनशून्य मांसल देह की तरह!

--- नागार्जुन

सच हम नहीं सच तुम नहीं

सच हम नहीं सच तुम नहीं
सच है सतत संघर्ष ही ।

संघर्ष से हट कर जिए तो क्या जिए हम या कि तुम।
जो नत हुआ वह मृत हुआ ज्यों वृन्त से झर कर कुसुम।
जो पंथ भूल रुका नहीं,
जो हार देखा झुका नहीं,
जिसने मरण को भी लिया हो जीत, है जीवन वही।
सच हम नहीं सच तुम नहीं।

ऐसा करो जिससे न प्राणों में कहीं जड़ता रहे।
जो है जहाँ चुपचाप अपने आपसे लड़ता रहे।
जो भी परिस्थितियाँ मिलें,
काँटें चुभें, कलियाँ खिलें,
टूटे नहीं इन्सान, बस सन्देश यौवन का यही।
सच हम नहीं सच तुम नहीं।

हमने रचा आओ हमीं अब तोड़ दें इस प्यार को।
यह क्या मिलन, मिलना वही जो मोड़ दे मँझधार को।
जो साथ कूलों के चले,
जो ढाल पाते ही ढले,
यह ज़िन्दगी क्या ज़िन्दगी जो सिर्फ़ पानी-सी बही।
सच हम नहीं सच तुम नहीं।

अपने हृदय का सत्य अपने आप हमको खोजना।
अपने नयन का नीर अपने आप हमको पोंछना।
आकाश सुख देगा नहीं,
धरती पसीजी है कहीं,
हर एक राही को भटक कर ही दिशा मिलती रही
सच हम नहीं सच तुम नहीं।

बेकार है मुस्कान से ढकना हृदय की खिन्नता।
आदर्श हो सकती नहीं तन और मन की भिन्नता।
जब तक बंधी है चेतना,
जब तक प्रणय दुख से घना,
तब तक न मानूँगा कभी इस राह को ही मैं सही।
सच हम नहीं सच तुम नहीं।

---जगदीश गुप्त

5.9.11

कल और आज

अभी कल तक
गालियॉं देती तुम्‍हें
हताश खेतिहर,
अभी कल तक
धूल में नहाते थे
गोरैयों के झुंड,
अभी कल तक
पथराई हुई थी
धनहर खेतों की माटी,
अभी कल तक
धरती की कोख में
दुबके पेड़ थे मेंढक,
अभी कल तक
उदास और बदरंग था आसमान!

और आज
ऊपर-ही-ऊपर तन गए हैं
तम्हारे तंबू,
और आज
छमका रही है पावस रानी
बूँदा-बूँदियों की अपनी पायल,
और आज
चालू हो गई है
झींगुरो की शहनाई अविराम,
और आज
ज़ोरों से कूक पड़े
नाचते थिरकते मोर,
और आज
आ गई वापस जान
दूब की झुलसी शिराओं के अंदर,
और आज विदा हुआ चुपचाप ग्रीष्म
समेटकर अपने लाव-लश्कर।

--- नागार्जुन

27.8.11

नीड का निर्माण

नीड़ का निर्माण फिर-फिर,
नेह का आह्णान फिर-फिर!

वह उठी आँधी कि नभ में
छा गया सहसा अँधेरा,
धूलि धूसर बादलों ने
भूमि को इस भाँति घेरा,

रात-सा दिन हो गया, फिर
रात आ‌ई और काली,
लग रहा था अब न होगा
इस निशा का फिर सवेरा,

रात के उत्पात-भय से
भीत जन-जन, भीत कण-कण
किंतु प्राची से उषा की
मोहिनी मुस्कान फिर-फिर!

नीड़ का निर्माण फिर-फिर,
नेह का आह्णान फिर-फिर!

वह चले झोंके कि काँपे
भीम कायावान भूधर,
जड़ समेत उखड़-पुखड़कर
गिर पड़े, टूटे विटप वर,

हाय, तिनकों से विनिर्मित
घोंसलो पर क्या न बीती,
डगमगा‌ए जबकि कंकड़,
ईंट, पत्थर के महल-घर;

बोल आशा के विहंगम,
किस जगह पर तू छिपा था,
जो गगन पर चढ़ उठाता
गर्व से निज तान फिर-फिर!

नीड़ का निर्माण फिर-फिर,
नेह का आह्णान फिर-फिर!

क्रुद्ध नभ के वज्र दंतों
में उषा है मुसकराती,
घोर गर्जनमय गगन के
कंठ में खग पंक्ति गाती;

एक चिड़िया चोंच में तिनका
लि‌ए जो जा रही है,
वह सहज में ही पवन
उंचास को नीचा दिखाती!

नाश के दुख से कभी
दबता नहीं निर्माण का सुख
प्रलय की निस्तब्धता से
सृष्टि का नव गान फिर-फिर!

नीड़ का निर्माण फिर-फिर,
नेह का आह्णान फिर-फिर!

--- हरिवंशराय बच्चन

24.8.11

Chand Sher - 1

1)
न मौजें, न तूफां, न माझी, न साहिल
मगर मन की नैया बही जा रही है
चला जा रहा है वफ़ा का मुसाफ़िर
जिधर भी तमन्ना लिये जा रही है |

-दिल शाहजहांपुरी

2)
रख कदम फूंक-फूंक कर नादान
ज़र्रे-ज़र्रे में जान है प्यारे
मीर आमदन भी कोई मरता है
जान है तो जहान है प्यारे

(आमदन = ज़िद करके, जान-बूझ कर)

- मीर तक़ी मीर

3)
लाए उस बुत को इल्तिज़ा करके, कुफ़्र टूटा ख़ुदा ख़ुदा करके|

- पंडित दयाशंकर नसीम

4)
हमारे बाद अब महफ़िल में अफ़साने बयां होंगे
बहारें हमको ढूँढेंगी ना जाने हम कहाँ होंगे
ना हम होंगे ना तुम होगे और ना ये दिल होगा फिर भी
हज़ारों मंज़िले होंगी हज़ारों कारँवा होंगे|

- मजरूह सुल्तानपुरी

5)
अब तो घबरा के ये कहते हैं कि मर जाएंगे
मर के भी अगर चैन ना पाया तो किधर जाएंगे
हम नहीं वो जो करें ख़ून का दावा तुझ पर
बल्कि पूछेगा ख़ुदा भी तो मुकर जाएंगे
“ज़ौक” जो मदरसे के बिगडे हुए हैं मुल्लाह
उनको मयख़ाने में ले आओ संवर जाएंगे|

- इब्राहिम “ज़ौक़”

6)
इस से पहले कि बेवफ़ा हो जाएँ
क्यूँ न ए दोस्त हम जुदा हो जाएँ
तू भी हीरे से बन गया पत्थर
हम भी कल जाने क्या से क्या हो जाएँ
बंदगी हमने छोड़ दी है फ़राज़
क्या करें लोग जब ख़ुदा हो जाएँ|

- अहमद फ़राज़

15.8.11

जोश मलीहाबादी की एक नज़्म – आज के नाम

लोग हमसे रोज कहते हैं ये आदत छोडिये

ये तिजारत है खिलाफे-आदमियत छोडिये

इससे बदतर लत नहीं है कोई, ये लत छोडिये

रोज अखबारों में छपता है की रिश्वत छोडिये

भूल कर भी जो कोई लेता है रिश्वत, चोर है

आज कौमी पागलों में रात-दिन ये शोर है.

किसको समझाएं इसे खो दें तो फिर पाएंगे क्या?

हम अगर रिश्वत नहीं लेंगे तो फिर खायेंगे क्या?

क़ैद भी कर दें तो हमें रह पर लायेंगे क्या?

ये जूनूने -इश्क के अंदाज़ छूट जायेंगे क्या?

मुल्क भर को क़ैद कर दे किसके बस की बात है

खैर से सब हैं, कोई दो-चार-दस की बात है?

ये हवस, ये चोरबाजारी, ये महंगे, ये भाव

राइ की कीमत हो जब परबत तो क्यों न आये ताव

अपनी तनख्वाहों के नाले में पानी है आध पाव

और लाखों टन की भरी अपने जीवन की है नाव

जब तलक रिश्वत न लें हम, दाल गल सकती नहीं

नाव तनख्वाहों के पानी में तो चल सकती नहीं

ये है मिलवाला, वो बनिया, औ ये साहूकार है

ये है दूकानदार, वो हैं वैद, ये अत्तार है

वोह अगर है ठग, तो ये डाकू है, वो बटमार है

आज हर गर्दन में काली जीत का इक हार है

हैफ़! मुल्क-ओ-कॉम की खिदमतगुजारी के लिए

रह गए हैं इ हमीं ईमानदारी के लिए?

भूक के कानून में ईमानदारी जुर्म है

और बे-ईमानियों पर शर्मसारी जुर्म है

डाकुओं के दौर में परहेजगारी जुर्म है

जब हुकूमत खाम हो तो पुख्ताकारी जुर्म है

लोग अटकाते हैं क्यों रोड़े हमारे काम में

जिसको देखो, खैर से नंगा है वो हमाम में

………..

तोंद वालों की तो आईनादारी, वाहवाह

और हम भूकों के सर पर चांदमारी, वाहवाह

उनकी खातिर सुबह होते ही नहरी, वाहवाह

और हम चाटा करें ईमानदारी, वाहवाह

सेठजी तो खूब मोटर में हवा खाते फिरें

और हम सब जूतियाँ गलियों में चटकाते फिरें

………

आप हैं फज़ल-ए-खुदा-ए-पाक से कुर्सिनाशीं

इंतज़ाम-ए-सल्तनत है आपके ज़ेरे-नगीं

आसमां है आपका खादिम तो लौंडी है ज़मीं

आप खुद रिश्वर के ज़िम्मेदार हैं, फिदवी नहीं

बख्शते हैं आप दरिया, कश्तियाँ खेते हैं हम

आप देते हैं मवाके, रिश्वत लेते हैं हम

ठीक तो करते नहीं बुनियाद-ए-नाहमवार को

दे रहे हैं गालियाँ गिरती हुई दीवार को

…….
---जोश मलीहाबादी.
जोश मलीहाबादी की नज़्म ‘रिश्वत’ के कुछ टुकड़े, इस स्वाधीनता दिवस के नाम.
Taken from Kafila posted by Aditya Nigam;

10.8.11

Your Love

My dear with the deep eyes, Your love
is extreme,
mystical
sacred.
Like birth and death, your love
is unrepeatable.

---Nizar Qabbani
Translated by A.Z. Foreman

8.8.11

I'm No Teacher

I am no teacher
To teach you how to love,
For the fish need no teacher
To teach them to swim
And birds need no teacher
To teach them flight.
Swim on your own.
Fly on your own.
Love comes with no textbooks
And the greatest lovers in history were illiterate.

---Nizar Qabbani
Translated by A.Z. Foreman

5.8.11

Mohabbat bade kaam ki cheez hai

हर तरफ हुस्न है, जवानी है, आज की रात क्या सुहानी है
रेशमी जिस्म तरथराते है, मरमरी ख्वाब गुनगुनाते है

धड़कानों में सुरूर फैला है, रंग नज़दीक-ओ-डोर फैला है
दावता-ये-इश्क दे रही हैं फज़ा
आज हो जा किसी हसीन पे फिदा
के मोहब्बत बड़े काम की चीज़ हैं काम की

मोहब्बत के दम से हैं दुनियाँ की रौनक
मोहब्बत ना होती तो कुच्छ भी ना होता
नज़र और दिल की पनाहों की खातिर
ये जन्नत ना होती तो कुच्छ भी ना होता
यही एक आराम की चीज़ है

किताबों में छपते हैं चाहत के किससे
हक़ीकत की दुनियाँ में चाहत नहीं है
जमाने के बाजार में ये वो शे है
के जिस की किसी को ज़रूरत नहीं है
ये बेकार, बेदाम की चीज़ है
ये कुदरत के आराम की चीज़ है
ये बस नाम ही नाम की चीज़ है

मोहब्बत से इतना खफा होनेवाले
चल आ आज तुझे को मोहब्बत सीखा दे
तेरा दिल जो बरसों से वीरान पड़ा हैं
किसी नाज़नीनान को इस में बसा दे
मेरा मशवरा काम की चीज़ है.

---Lyricist :Saahir Ludhiyanvi
Singer :Lata Mangeshkar - Kishor Kumar - Yeshudaas
Music Director :Khayyam
Movie :Trishul - 1978

Refinement by Reading your Body

The day the conversation ended
Between your breasts awash in water
And the tribes that battled over water,
That day ended our Golden Age
And began the Age of Decay.
The rainclouds went on strike and said no rain
For the next five hundred years
The spring birds went on strike and stopped all flying
And the ears of grain abstained from procreation
And the fertile crescent moon took on the shape
Of a bottle full of crude oil.

The day they exiled me from the tribe
For leaving a poem and a rose
At the doorflap of your tent,
That day ended our Golden Age
And began the Age of Decay
An age that knew its grammar and syntax
But not a thing of womanhood,
The generations of degeneration
And the erasure of all women's names
From the memory of the nation.

Oh darling
What kind of nation is this,
Policing love like a dirty cop,
Considering the rose
A conspiracy against the regime,
Considering the poem
A manifesto of the underground?
What kind of nation is this
In the form of a yellow locust
Crawling out on its gut from the ocean to the Gulf
From the Gulf to the ocean,
Talking like a holy man all day
And woozy over a woman's navel all night?

What kind of nation is this?
Deleting love's material from curricula.
Deleting poetry,
And women's eyes.
What kind of nation is this?
Going to war with every raincloud,
Opening a classified file for every breast
And filing a police report for every rose.

Oh darling
What are we to do in this nation?
This nation that dare not see its body in the mirror
For fear of craving it?
That dare not hear a woman's voice on the phone
For fear of being too impure to pray?
What are we to do in this nation
That knows all there is to know
Of the October revolution,
Of the Zanj slaves who rose against their Caliph master
Of the Karmathians who stood against the Caliph's armies
And still keeps talking down to women like some Sheikh?
What are we to do in this nation
Between the works of Imam Ash-Shafi'i... and the works of Lenin
Between Qur'anic exegeses.... and Playboy magazines
Between Mu'tazilism... and the music of The Beatles?

O darling dumbfounder, you
Who amaze me like a child's toy,
I feel civilized
For loving you.
I call my poems historical
Because they have been your contemporaries.
All time before your eyes had yet to be,
All time after them went to pieces.
Do not ask me why I'm with you.
I just want an escape from being backwater,
To re-enter the time of water,
I want to defect from the Republic of Thirst,
To leave my backward desert life,
To sit beneath the trees
And bathe in springwater
And learn the names of the flowers.

I want you to teach me to read and write
For writing on your body is the ABC
Of entry into civilization.
Your body is not counterculture.
No, it is culture incarnate.
Whoever does not read the notebooks of your body
Will spend his life illiterate.

--- Nizar Qabbani
Translated by A.Z. Foreman

4.8.11

Why

Why do you ask me to write to you?
Why do you ask me
To go naked before you
Like a paleolithic?
Writing is the one thing that leaves me naked.
When I speak
I keep somewhat clad.
When I write
I roam light,
Free as a legendary bird.
When I write
I divorce myself from history
And from earth's gravity
To orbit in the outer space of your eyes.

--- Nizar Qabbani
Translated by A.Z. Foreman

26.7.11

We Won’t Look Truth in the Eye

Truth has no eyes
no face
no tongue

truth is wingless
it doesn’t live
beyond the seven seas hills forests

I think that truth
is more like a nagging growth
that gnaws inside

I think it’s
that sticky thing
rolled into a ball somewhere under your skin
it hates comfort
it suddenly swells
and sends out desperate signals
dark ones like a deaf-mute’s moving hands

it hurts
it chokes
you can’t keep quiet any longer

you scream

---Urszula Koziol
(Translated by Stanislaw Baranczak and Clare Cavanagh;

23.7.11

The Dream

I had the dream where you read your own poems,
Like those written sometime ago,
only these were in the grey book
written after death…

And you look finer, paler and tinier every passing moment,
Then you disappeare.

The last to vanish were your hands
And only the poems were left unharmed
And in the poems was left
someone’s heart.

--- Grazyna Chrostowska


(Translated by Jarek Gajewski)

22.7.11

Dedication

You whom I could not save
Listen to me.
Try to understand this simple speech as I would be ashamed of another.
I swear, there is in me no wizardry of words.
I speak to you with silence like a cloud or a tree.

What strengthened me, for you was lethal.
You mixed up farewell to an epoch with the beginning of a new one,
Inspiration of hatred with lyrical beauty,
Blind force with accomplished shape.

Here is the valley of shallow Polish rivers. And an immense bridge
Going into white fog. Here is a broken city,
And the wind throws the screams of gulls on your grave
When I am talking with you.

What is poetry which does not save
Nations or people?
A connivance with official lies,
A song of drunkards whose throats will be cut in a moment,
Readings for sophomore girls.
That I wanted good poetry without knowing it,
That I discovered, late, its salutary aim,
In this and only this I find salvation.

They used to pour millet on graves or poppy seeds
To feed the dead who would come disguised as birds.
I put this book here for you, who once lived
So that you should visit us no more.

--- Czeslaw Milosz

20.7.11

Proofs

Death will not correct
a single line of verse
she is no proof-reader
she is no sympathetic
lady editor

a bad metaphor is immortal

a shoddy poet who has died
is a shoddy dead poet

a bore bores after death
a fool keeps up his foolish chatter
from beyond the grave

--- Tadeusz Rozewicz

(Translated by Adam Czerniawski;)

16.7.11

मन बहुत सोचता है

मन बहुत सोचता है कि उदास न हो
पर उदासी के बिना रहा कैसे जाय?

शहर के दूर के तनाव-दबाव कोई सह भी ले,
पर यह अपने ही रचे एकांत का दबाव सहा कैसे जाय!

नील आकाश, तैरते-से-मेघ के टुकड़े,
खुली घासों में दौड़ती मेघ-छायाएँ,
पहाड़ी नदी : पारदर्शी पानी,
धूप-धुले तल के रंगारंग पत्थर,
सब देख बहुत गहरे कहीं जो उठे,
वह कहूँ भी तो सुनने को कोई पास न हो-
इसी पर जो जी में उठे वह कहा कैसे जाय!

मन बहुत सोचता है कि उदास न हो, न हो,
पर उदासी के बिना रहा कैसे जाय!

--- अज्ञेय

10.7.11

बहुत पहले से ...

बहुत पहले से उन क़दमों की आहट जान लेते हैं
तुझे ऐ ज़िन्दगी हम दूर से पहचान लेते हैं

मेरी नज़रें भी ऐसे काफिरों कि जानो-ईमान हैं
निगाहें मिलते ही जो जान और ईमान लेते हैं

जिसे कहती है दुनिया कामयाबी वाये नादानी
उसे किन कीमतों पर कामयाब इंसान लेते हैं

निगाहें बादागूं यूँ तो तेरी बातों का क्या कहना
तेरी हर बात लेकिन अह्तियातन छान लेते हैं

तबियत अपनी घबराती है जब सुनसान रातों में
हम ऐसे में तेरी यादों की चादर तान लेते हैं

खुद अपना फैसला भी इश्क में काफी नहीं होता
उसे भी कैसे कर गुजरें जो दिल में ठान लेते हैं

हयाते इश्क का इक इक नफास जामे शहादत है
वो जाने-नाज़ बर दारां कोई आसन लेते हैं

हम आहंगी में भी इक चाशनी है इख्तिलाफों की
मेरी बातें बउन्वाने दीगर वो मान लेते हैं

तेरी मकबूलियत कि वजह वाहिद तेरी राम्ज़ियत
कि उस को मानते कब हैं जिसको जान लेते हैं

अब इस को कुफ्र मानें या बुलंदी-ए-नज़र जानें
खुदा-ए-दोजहां को दे के हम इंसान लेते हैं

जिसे सूरत बताते हैं पता देती है सीरत का
इबारत देख कर जिस तरह मानी जान लेते हैं

तुझे घाटा न होने देंगे कारोबारे उल्फत में
हम अपने सर तेरा ऐ दोस्त हर नुक्सान लेते हैं

हमारी हर नज़र तुझसे नई सौगंध खाती है
तो तेरी हर नज़र से हम नया पैमान लेते हैं

रफ़ीके ज़िन्दगी थी अब अनीसे वक्ते-आखिर है
तेरा ऐ मौत हम ये दूसरा एहसान लेते हैं

ज़माना वारिदाते-कल्ब सुनने को तरसता है
उसी से तो सर आँखों पर मेरा दीवान लेते हैं

फ़िराक अक्सर बदल कर भेस मिलता है कोई काफिर
कभी हम जान लेते हैं कभी पहचान लेते हैं.

---फ़िराक़ गोरखपुरी

1.7.11

कुछ तो मजबूरियाँ रही होंगी

कुछ तो मजबूरियाँ रही होंगी
यूँ कोई बेवफ़ा नहीं होता

जी बहुत चाहता है सच बोलें
क्या करें हौसला नहीं होता

अपना दिल भी टटोल कर देखो
फासला बेवजह नही होता

कोई काँटा चुभा नहीं होता
दिल अगर फूल सा नहीं होता

गुफ़्तगू उनसे रोज़ होती है
मुद्दतों सामना नहीं होता

रात का इंतज़ार कौन करे
आज कल दिन में क्या नहीं होता.

--बशीर बद्र

रोने से और इशक़ में बेबाक हो गए

रोने से और इशक़ में बेबाक हो गए
धोये गए हम ऐसे हे बस पाक हो गए

कहता है कौन नाला-ए-बुलबुल को बेअसर
पर्दे में गुल के लाख जिगर चाक हो गए

पूछे है क्या वजूदो-अदम अहले-शौक का
आप अपनी आग से खसो-ख़ाशाक हो गए

करने गए थे उससे तगाफुल का हम गिला
की एक ही निगाह की बस ख़ाक हो गए

इस रंग से उठायी कल उसने 'असद' की लाश
दुश्मन भी जिसको देख के गमनाक हो गए

---'असद'


Glossary:
नाला-ए-बुलबुल : sound of bulbul
चाक : break
वजूदो-अदम अहले-शौक : why you ask about the life and death of a lover
खसो-ख़ाशाक : trash
तगाफुल : negligence

15.6.11

Two Poems of Resistance

First Poem

We neither want to live in a palace.

Nor do we love the leaders.

We are a people who kill degradation and misery.

We are a people who destroy the foundation of oppression.

We are a people who do not want the people to remain in this setback.

Second Poem

(A dialogue between Hamad bin Khalifa and Iblis, the Devil, takes place on a table set with the suffering of the people)

Devil: Hamad, have some fear of God, on their behalf.

My heart is in pieces over them.

I and I, Iblis, by God, now want to put my hands in theirs.

Turn against you, my tyrant.

Kneel this hour before their prophet,

And return to my Lord,

As I am distraught by the way they are chased.



Hamad: You have taught me, my supporter,

How to renounce them,

With humiliation and degradation and disasters

For which I blame them.

And the time has come, little brother Iblis,

When you act as their mediator.

Your identity appears to have been shaken

By their father, by their consciousness



Devil: Yes, Hamad, your people have shaken me.

Don’t you hear their cries?

Don’t you see the crowds?

Don’t you see their case?

Listen to their complaints,

To their attempt to plan their steps.

Listen to your people’s cries, which you have purchased,

Hamad.



Hamad: My stomach still has not had its fill of their blood,

Little brother Iblis.

I have yet to nationalize the rest of my family and their wives.

I have yet to decree the uncivilized become machines.

I have yet to leave every candle at the streetlight,

Imploring every passerby:

I have water, come, buy.

I have yet to torture every mu’amam in this land,

Every youth and child,

And push into my prisons the blossom of youth,

And open for degradation a thousand doors,

And force all the people to cry for their lamentations.

Still, little brother Iblis, the number of youth hasn’t risen,

Each one of them, a diploma on his chest.

No occupation and no pre-occupation left to them.

I still have not had every Indian on this land.

Hold in his hand our flag and cheer: “Long live, Abu Sleiman!”

I still have not sucked their blood.

From the scourge of rents and leases,

From apartment to apartment,

While the uncivilized have homes and lands,

But they still number 120.

I don’t think anyone hears their echoes.



Devil: Listen.

How could the Hajji say the world?

If 120 and their echoes don’t reach?

Look, Abu Sleiman, my brave pupil,

Your treachery has surpassed your teacher’s.

Your people in revolt have aged me.

And their brothers have aged me.

Sunni, Shi’a are brothers.

There is no division among them.

But your heart is like stone.

Will you heed some advice from

Your supporter, oppressive one?

Pack up your regime’s encampment,

Until they are satisfied.

Because your people, my darling …

You are not at their level.

---Ayat al-Qormezi [ Poet was sentenced to one year in prison. Below are some of her poems, translated to English by Nahrain Al-Mousawi]

8.6.11

ज़िंदगी की कहानी रही अनकही !

ज़िंदगी की कहानी रही अनकही !
दिन गुज़रते रहे, साँस चलती रही !

अर्थ क्या ? शब्द ही अनमने रह गए,
कोष से जो खिंचे तो तने रह गए,
वेदना अश्रु-पानी बनी, बह गई,

धूप ढलती रही, छाँह छलती रही !

बाँसुरी जब बजी कल्पना-कुंज में
चाँदनी थरथराई तिमिर पुंज में
पूछिए मत कि तब प्राण का क्या हुआ,

आग बुझती रही, आग जलती रही !

जो जला सो जला, ख़ाक खोदे बला,
मन न कुंदन बना, तन तपा, तन गला,
कब झुका आसमाँ, कब रुका कारवाँ,

द्वंद्व चलता रहा पीर पलती रही !

बात ईमान की या कहो मान की
चाहता गान में मैं झलक प्राण की,
साज़ सजता नहीं, बीन बजती नहीं,

उँगलियाँ तार पर यों मचलती रहीं !

और तो और वह भी न अपना बना,
आँख मूंदे रहा, वह न सपना बना !
चाँद मदहोश प्याला लिए व्योम का,

रात ढलती रही, रात ढलती रही !

यह नहीं जानता मैं किनारा नहीं,
यह नहीं, थम गई वारिधारा कहीं !
जुस्तजू में किसी मौज की, सिंधु के-

थाहने की घड़ी किन्तु टलती रही !

---Acharya Janki Ballabh Shashtri

कविता पर रोक

कविता लिखना चाहता हूँ
शर्त रख दी जाती हैः

मुसलमान हो तो;
कुरआन-हदीस पर मत लिखना.

ईसाई हो तो; ईसा के पिता का सवाल
नहीं उठाओगे.

हिंदू हो तो; अयोध्या छोड़कर सारी
‘रामायण’ लिख सकते हो.

मैं बोलना चाहता हूँ
तो प्रतिबंधित कर दिया जाता हूँ.

****शहरोज़

Thanks to BBC article for this poem.

Shamm-E-Mazaar Thi Na Koi Sogwaar Tha

शम्म-ए-मज़ार थी ना कोई सोगवार था,
तुम जिस पे रो रहे थे वो किसका मज़ार था ।

तड़पूँगा उम्र भर दिल-ए-मर्हुम के लिये,
कम्बख़्त नामुराद लड़कपन का यार था ।

जादू है या तिलिस्म तुम्हारी ज़ुबान में,
तुम झूठ कह रहे थे मुझे ऐतबार था ।

क्या क्या हमारे सज़दे की रूसवाईयाँ हुई,
नक़्श-ए-क़दम किसी का सरे रह-गुज़ार था ।

---Bekhud Dehlvi

6.6.11

Like you (Como tu)

I, like you,
love love, life, the sweet delight
of things, the blue
landscape of January days.

Also my blood bubbles over
laughing through my eyes
which have known the rush of tears.

I believe the world is beautiful,
that poetry is, like bread, for everyone.

And that my veins don’t end in me
but in the unanimous blood
of those who struggle for life,
love,
things,
countryside and bread,
poetry for everyone.

---Roque Dalton

3.6.11

I wandered lonely as a cloud

I wandered lonely as a cloud
That floats on high o'er vales and hills,
When all at once I saw a crowd,
A host, of golden daffodils;
Beside the lake, beneath the trees,
Fluttering and dancing in the breeze.

Continuous as the stars that shine
And twinkle on the milky way,
They stretched in never-ending line
Along the margin of a bay:
Ten thousand saw I at a glance,
Tossing their heads in sprightly dance.

The waves beside them danced, but they
Out-did the sparkling leaves in glee;
A poet could not be but gay,
In such a jocund company!
I gazed—and gazed—but little thought
What wealth the show to me had brought:

For oft, when on my couch I lie
In vacant or in pensive mood,
They flash upon that inward eye
Which is the bliss of solitude;
And then my heart with pleasure fills,
And dances with the daffodils.

---William Wordsworth

29.5.11

सिली हवा छू गयी, सिला बदन छिल गया

सिली हवा छू गयी, सिला बदन छिल गया
सिली हवा छू गयी, सिला बदन छिल गया
नीली नदी के परे, गीला सा चाँद खिल गया
सिली हवा छू गयी, सिला बदन छिल गया

तुमसे मिली जो ज़िन्दगी, हमने अभी बोई नहीं
तुमसे मिली जो ज़िन्दगी, हमने अभी बोई नहीं
तेरे सिवा कोई न था, तेरे सिवा कोई नहीं
सिली हवा छू गयी, सिला बदन छिल गया

जाने कहाँ कैसे शहर, ले के चला ये दिल मुझे
जाने कहाँ कैसे शहर, ले के चला ये दिल मुझे
तेरे बगैर दिन न जला, तेरे बगैर शब् न बुझे
सिली हवा छू गयी, सिला बदन छिल गया

जितने भी तै करते गए, बढे गए ये फासले
जितने भी तै करते गए, बढे गए ये फासले
मीलों से दिन छोड़ आये, सालों सी रात ले के चले
सिली हवा छू गयी, सिला बदन छिल गया
नीली नदी के परे, गीला सा चाँद खिल गया.

--- गुलज़ार

# You can hear this song in the voice of Lata Mangeshkar at Youtube

28.5.11

3 Poems from संग्रह: उजाले अपनी यादों के

1-अगर तलाश करूँ कोई मिल ही जायेगा
मगर तुम्हारी तरह कौन मुझे चाहेगा

तुम्हें ज़रूर कोई चाहतों से देखेगा
मगर वो आँखें हमारी कहाँ से लायेगा

ना जाने कब तेरे दिल पर नई सी दस्तक हो
मकान ख़ाली हुआ है तो कोई आयेगा

मैं अपनी राह में दीवार बन के बैठा हूँ
अगर वो आया तो किस रास्ते से आयेगा

तुम्हारे साथ ये मौसम फ़रिश्तों जैसा है
तुम्हारे बाद ये मौसम बहुत सतायेगा


2- जब सहर चुप हो, हँसा लो हमको
जब अन्धेरा हो, जला लो हमको

हम हक़ीक़त हैं, नज़र आते हैं
दास्तानों में छुपा लो हमको

ख़ून का काम रवाँ रहना है
जिस जगह चाहे बहा लो हमको

दिन न पा जाए कहीं शब का राज़
सुबह से पहले उठा लो हमको

दूर हो जाएंगे सूरज की तरह
हम न कहते थे, उछालो हमको

हम ज़माने के सताये हैं बहोत
अपने सीने से लगा लो हमको

वक़्त के होंट हमें छू लेंगे
अनकहे बोल हैं गा लो हमको


3- गज़लों का हुनर अपनी आँखों को सिखायेंगे
रोयेंगे बहुत, लेकिन आँसू नहीं आयेंगे

कह देना समन्दर से, हम ओस के मोती हैं
दरिया की तरह तुझ से मिलने नहीं आयेंगे

वो धूप के छप्पर हों या छाँव की दीवारें
अब जो भी उठायेंगे, मिलजुल के उठायेंगे

जब कोई साथ न दे, आवाज़ हमें देना
हम फूल सही लेकिन पत्थर भी उठायेंगे.

---बशीर बद्र

जिन्दगी आयी बनारस का जहाँ नाम आया

मेरे होते भी अगर उनको न आराम आया
जिन्दगी फिर मेरा जीना मेरे किस काम आया

सिर्फ सहबा ही नहीं रात हुई है बदनाम
आप की मस्त निगाहों पे भी इल्जाम आया

तेरे बचने की घड़ी गर्दिशे अय्याम आया
मुझसे हुशियार मेरे हाथ में अब जाम आया

फिर वो सूरज की कड़ी धूप कभी सह न सका
जिसको जुल्फों की घनी छाँव में आराम आया

आज हर फूल को मैं देख रहा था ऐसे
मेरे महबूब का खत जैसे मेरे नाम आया

मौजे गंगा की तरह झूम उठी बज्म नजीर
जिन्दगी आयी बनारस का जहाँ नाम आया

- नजीर बनारसी

21.5.11

बदला न अपने आप को जो थे वही रहे

बदला न अपने आप को जो थे वही रहे
मिलते रहे सभी से मगर अजनबी रहे.

दुनिया न जीत पाओ तो हारो न ख़ुद को तुम
थोड़ी बहुत तो ज़हन में नाराज़गी रहे.

अपनी तरह सभी को किसी की तलाश थी
हम जिसके भी क़रीब रहे दूर ही रहे.

गुज़रो जो बाग़ से तो दुआ माँगते चलो
जिसमें खिले हैं फूल वो डाली हरी रहे |

---निदा फ़ाज़ली

ज़िन्दगी से यही गिला है मुझे

ज़िन्दगी से यही गिला है मुझे
तू बहुत देर से मिला है मुझे

हमसफ़र चाहिये हुजूम नहीं
इक मुसाफ़िर भी काफ़िला है मुझे

तू मोहब्बत से कोई चाल तो चल
हार जाने का हौसला है मुझे

लब कुशां हूं तो इस यकीन के साथ
कत्ल होने का हौसला है मुझे

दिल धडकता नहीं सुलगता है
वो जो ख्वाहिश थी, आबला है मुझे

कौन जाने कि चाहतो में फ़राज़
क्या गंवाया है क्या मिला है मुझे.

--- Ahmed Faraz

13.5.11

कोई उम्मीद बर नहीं आती

कोई उम्मीद बर नहीं आती
कोई सूरत नज़र नहीं आती

मौत का एक दिन मु'अय्यन है
नींद क्यों रात भर नहीं आती

आगे आती थी हाल-ए-दिल पे हँसी
अब किसी बात पर नहीं आती

जानता हूँ सवाब-ए-ता'अत-ओ-ज़हद
पर तबीयत इधर नहीं आती

है कुछ ऐसी ही बात जो चुप हूँ
वर्ना क्या बात कर नहीं आती

क्यों न चीख़ूँ कि याद करते हैं
मेरी आवाज़ गर नहीं आती

दाग़-ए-दिल नज़र नहीं आता
बू-ए-चारागर नहीं आती

हम वहाँ हैं जहाँ से हम को भी
कुछ हमारी ख़बर नहीं आती

मरते हैं आरज़ू में मरने की
मौत आती है पर नहीं आती

काबा किस मुँह से जाओगे 'ग़ालिब'
शर्म तुमको मगर नहीं आती.

---ग़ालिब

Freedom

The Arab Revolt 2011

The story begins
with a song—
it’s stubborn,
breaks air
into history;
for a minute
it’s quiet
to allow everyone in,
and then it raises
to celebrate voices,
clears its throat,
says:
We will bury the smoke that blinds us,
plant our soul on every page,
we will divide our pain into towers
and fill our hands with rain,
we will arrive on time every day
to chase you away,
we will no longer be afraid
of what makes us shiver under the sun,
we will leave our names in every teahouse,
our messages at the bottom of every cup.

Light will no longer be illegal
nor will hope—
even the guards will count
the scars on their tongue
and prepare to heal,
even the children will keep
homeland in the mirror
and prepare to see,
even the women will turn
the fire inside the door
off, and prepare to live.

We will never whisper again.
There is evidence, there is evidence,
that now we can hear
the sounds that lift freedom
across a continent,
and say, Salaam to you,
welcome to my country.

--- by Nathalie Handal (May 2011)

Listen to Nathalie Handal read "Freedom"


2.5.11

मेरा कलम नहीं तजवीज़...

मेरा कलम नहीं तजवीज़1 उस मुबल्लिस की
जो बन्दिगी का भी हरदम हिसाब रखता है
मेरा कलम नहीं मीज़ान2 ऍसे आदिल3 की
जो अपने चेहरे पर दोहरा नकाब रखता है
मेरा कलम तो अमानत है मेरे लोगों की
मेरा कलम तो अदालत मेरे ज़मीर की है
इसीलिए तो जो लिखा शफा-ए-जां से लिखा
ज़बीं4 तो लोच कमान का जुबां तीर की है
मैं कट गिरूँ कि सलामत रहूँ यक़ीन है मुझे
कि ये हिसार5-ए-सितम कोई तो गिराएगा

1. सम्मति, राय, 2.तराजू, 3.न्याय करने वाला, 4. मस्तक, 5. गढ़, किला

--अहमद फ़राज़  

वो गया था

वो गया था साथ ही ले गया, सभी रंग उतार के शहर का
कोई शख्स था मेरे शहर में किसी दूर पार के शहर का

चलो कोई दिल तो उदास था, चलो कोई आँख तो नम रही
चलो कोई दर तो खुला रहा शबे इंतजार के शहर का

किसी और देश की ओर को सुना है फराज़ चला गया
सभी दुख समेट के शहर के सभी कर्ज उतार के शहर का ...

--अहमद फ़राज़  

29.4.11

मैं ढूँढता हूँ जिसे वो जहाँ नहीं मिलता

मैं ढूँढता हूँ जिसे वो जहाँ नहीं मिलता
नई ज़मीं नया आसमाँ नहीं मिलता

नई ज़मीं नया आसमाँ भी मिल जाये
नये बशर का कहीं कुछ निशाँ नहीं मिलता

वो तेग़ मिल गई जिस से हुआ है क़त्ल मेरा
किसी के हाथ का उस पर निशाँ नहीं मिलता

वो मेरा गाँव है वो मेरे गाँव के चूल्हे
कि जिन में शोले तो शोले धुआँ नहीं मिलता

जो इक ख़ुदा नहीं मिलता तो इतना मातम क्यूँ
यहाँ तो कोई मेरा हमज़बाँ नहीं मिलता

खड़ा हूँ कब से मैं चेहरों के एक जंगल में
तुम्हारे चेहरे का कुछ भी यहाँ नहीं मिलता.

--कैफ़ी आज़मी

25.4.11

Poems of Kunwar Mahendra Singh Bedi Sahar

कुँवर महेंद्र सिंह बेदी 'सहर' की शायरी से:

1---

आए हैं समझाने लोग
हैं कितने दीवाने लोग

दैर-ओ-हरम1 में चैन जो मिलता
क्यूं जाते मैखाने2 लोग

1. मंदिर मस्जिद, 2. शराबखाना

जान के सब कुछ कुछ भी ना जाने
हैं कितने अनजाने लोग

वक़्त पे काम नहीं आते हैं
ये जाने पहचाने लोग

अब जब मुझको होश नहीं है
आए हैं समझाने लोग

2---

तुम हमारे नही तो क्या गम है
हम तुम्हारे तो हैं यह क्या कम है

मुस्कुरा दो ज़रा ख़ुदा के लिए,
शाम-ए-महफिल में रौशनी कम है,

3---

अभी वो कमसिन उभर रहा है, अभी है उस पर शबाब आधा
अभी जिगर में ख़लिश है आधी, अभी है मुझ पर एतमाद1 आधा

मेरे सवाल-ए-वस्ल2 पर तुम नज़र झुका कर खड़े हुए हो
तुम्हीं बताओ ये बात क्या है, सवाल पूरा, जवाब आधा

कभी सितम है कभी करम है, कभी तवज़्जह3 कभी तगाफ़ुल4
ये साफ ज़ाहिर है मुझ पे अब तक, हुआ हूँ मैं कामयाब आधा
1. विश्वास, 2. मिलने की बात पर, 3.ध्यान देना , 4. उपेक्षा

4---

ऐ नौजवान बज़ा कि जवानी का दौर है
रंगीन सुबह शाम सुहानी का दौर है
ये भी बज़ा कि प्रेम कहानी का दौर है
लेकिन रहे ये याद गरानी1 का दौर है
1.मँहगाई

5---

इश्क़ हो जाए किसी से कोई चारा तो नहीं
सिर्फ मुस्लिम का मोहम्मद से इजारा* तो नहीं
*अधिकार
************************************

17.4.11

It’s the Dream

It’s the dream we carry

that something wondrous will happen

that it must happen

time will open

hearts will open

doors will open

spring will gush forth from the ground–

that the dream itself will open

that one morning we’ll quietly drift

into a harbor we didn’t know was there.

---by Olav H. Hauge from Borealis (March/April 2002), translated from the Norwegian by Robert Hadin.

11.4.11

बोल कि लब आज़ाद हैं तेरे

बोल कि लब आजाद हैं तेरे
बोल, जबां अब तक तेरी है
तेरा सुतवां* जिस्म हे तेरा
बोल कि जां अब तक तेरी है.

देख कि आहनगर** की दुकां में
तुन्द** हैं शोले, सुर्ख है आहन^
खुलने लगे कुफलों के दहाने^^
फैला हर जंजीर का दामन.

बोल, ये थोड़ा वक्त बहुत है
जिस्मों जबां की मौत से पहले
बोल कि सच जिंदा है अब तक
बोल कि जो कहना है कह ले.

* तना हुआ,**लोहार, *** तेज, ^लोहा, ^^तालों के मुंह

---

शबाना आज़मी एक कुशल अभिनेत्री के साथ साथ एक अच्छी गायिका हैं. शबाना आज़मी की आवाज़ में फ़ैज़ की ये मशहूर नज़्म जो हमेशा से लोगों की आवाज़ को हुक्मरानों तक पहुंचाने के लिए प्रेरित करती रही है।:

7.4.11

With the Land

The land comes near me
drinks from me
leaves its orchards with me
to become a beautiful weapon
defending me

Even when I sleep
the land comes near me
in my dream.
I smuggle its wild thyme
between exiles
I sing its stones
I will even sweat blood
from my veins
to drink its news
so the land comes near me
leaves a stone of love with me
to defend it
and defend me

When I repay it
I will embrace it a thousand times
I will worship it a thousand times
I will celebrate its wedding on my forehead
on the rubble of exiles
and the ruins of prisons

I will drink from it
It will drink from me
So that the Galilee would remain
beauty, struggle, and love
defending it
defending me

I see the land;
a morning that will come
---Rashid Hussein
* Translated by Sinan Antoon. The poem appear in Al-A`mal al-Shi`riyya (al-Taybe: Markaz Ihya’ al-Turath al-`Arabi, 1990)

Without a Passport

I was born without a passport
I grew up
and saw my country
become prisons
without a passport

So I raised a country
a sun
and wheat
in every house
I tended to the trees therein
I learned how to write poetry
to make the people of my village happy
without a passport

I learned that he whose land is stolen
does not like the rain
If he were ever to return to it, he will
without a passport

But I am tired of minds
that have become hotels
for wishes that never give birth
except with a passport

Without a passport
I came to you
and revolted against you
so slaughter me
perhaps I will then feel that I am dying
without a passport

---Rashid Hussein
* Translated by Sinan Antoon. The poem appear in Al-A`mal al-Shi`riyya (al-Taybe: Markaz Ihya’ al-Turath al-`Arabi, 1990)

Trees

I think that I shall never see
A poem lovely as a tree.

A tree whose hungry mouth is prest
Against the earth's sweet flowing breast;

A tree that looks at God all day,
And lifts her leafy arms to pray;

A tree that may in Summer wear
A nest of robins in her hair;

Upon whose bosom snow has lain;
Who intimately lives with rain.

Poems are made by fools like me,
But only God can make a tree.

---Joyce Kilmer

4.4.11

कहाँ तो तय था (Kahan to Tay ttha)

कहाँ तो तय था चिराग़ाँ हर एक घर के लिए
कहाँ चिराग़ मयस्सर नहीं शहर के लिए

यहाँ दरख़तों के साये में धूप लगती है
चलो यहाँ से चलें और उम्र भर के लिए

न हो कमीज़ तो पाँओं से पेट ढँक लेंगे
ये लोग कितने मुनासिब हैं इस सफ़र के लिए

ख़ुदा नहीं न सही आदमी का ख़्वाब सही
कोई हसीन नज़ारा तो है नज़र के लिए

वो मुतमइन हैं कि पत्थर पिघल नहीं सकता
मैं बेक़रार हूँ आवाज़ में असर के लिए

तेरा निज़ाम है सिल दे ज़ुबान शायर की
ये एहतियात ज़रूरी है इस बहर के लिए

जिएँ तो अपने बग़ीचे में गुलमोहर के तले
मरें तो ग़ैर की गलियों में गुलमोहर के लिए.

---Dushyant Kumar

And If...

And if the branches tap my pane
And the poplars whisper nightly,
It is to make me dream again
I hold you to me tightly.

And if the stars shine on the pond
And light its sombre shoal,
It is to quench my mind's despond
And flood with peace my soul.

And if the clouds their tresses part
And does the moon outblaze,
It is but to remind my heart
I long for you always.

-Written by Mihai Eminescu. (Translated by Corneliu M. Popescu)

Imparat si poletar (Emperor and Proletarian)

Squatting on wooden benches, within a tavern bare,
Where daylight's rays but dimly through dirty windows show,
Before a long, stained table, their faces drawn with care,
Wearied out by wandering and doubting's black despair,
These are the wretched sons of poverty and woe.

"Ah friends," said one, "you think man is a light that glows
Upon this earth of sorrowing and misery?
Why, not a spark is there in him that candid shows;
His lamp is dark as is this globe on which he grows,
And over which the lord omnipotent is he.

Tell me then what justice means... The powerful secure
Behind their wealth, within their circling laws conspire
To mass still greater wealth against the needy poor,
Against ourselves, that we shall all the toil endure
Bowed down and bent in labour's yoke our lives entire.

Some pass their time in ceaseless revelry and play;
The hours smile for them, and amber wine they drink;
The winter months in gardens do they wile away,
Coolness of alpine snows the summer fires allay;
They turn the morn to eve, and from the sun's eye shrink.

Virtue for them does not exist, but they will preach
Sacrificing, love and diligence to us.
The heavy car of state must rumble on, and each
Of you must pour his blood into the battle's breach,
That of your endless pain they may grow prosperous.

Countless, mighty hosts, and navies on the sea,
Splendid golden crowns on noble foreheads worn,
Riches from near and far, in thoughtless quantity,
These hold the rich aloft in high sublimely;
While on our aching backs are all the burdens born.

Religion-but a tale, astutely spread abroad
To rivet on your shoulders the heavy harnessed load,
For, had you lost all hope of heavenly reward
After a life on earth with pain and hardship scored,
Would you go on working as an ox beneath the goad?

With what strange phantom shadows are your illusions fed
That make you set your faith in heaven's promised store?
No, when your life is passed, all hope of joy is sped,
And he who dies in misery, in misery is dead;
For those who pass the grave come back again no more.

In lies and windy phrases their state and safety stands,
Their holy law and order is but an empty creed,
To keep their stolen wealth safe from your needy hands,
They arm you to destroy your like on foreign lands,
And you against yourselves triumphantly they lead.

Why should you be slaves of their immoral gold,
You who scarcely live for all your endless toil?
Why should disease and death you in their arms enfold,
While they in plenitude and boundless wealth grow old
Even as though they hoped to cheat death of its spoil?

How do you forget the power that numbers mean?
You could take back today your rights they will not give.
Build no more these walls with which their wealth they screen,
Or which for prisons serve when pressed by torments keen
You dare assert at last the right you have to live.

Every pleasure they enjoy surrounded by their law
And all their careless days in utmost sweetness spend,
In luxury and vice, and drunken wild uproar.
They call your virgins in, blind instruments before
Their old corrupted satyrs who their young beauty rend.

And should you ask yourselves what part is left for you
The drudgery on which is based their happiness,
A lifelong servitude, and crumbs of bread a few.
Robbed of your daughters, and dishonoured too . .
For them the earth and sky, for you naught but distress.

They have no need of rules: virtue is easy when
All that you want you have. Round you their laws are wound,
Their punishments designed to strike you, wretched men
Who date to stretch a hand to ask your own again:
Even your needs become a crime that has no bound.

Hurl to the earth their scheme founded on greed and wrong.
This system that divides, making us rich and poor !
Since there will be no prize in death awaited long,
Demand the rights today that do to you belong,
And let us live in equal brotherhood secure !

Smash down the antique bronze that Venus naked shows;
Let pictures that do wickedly entice be brought to dust,
Snowy limbs that tell of wonders no man knows,
And break in passions rude our maidens soft repose,
And lead them unawares into the claws of lust !

Scatter wide what rouses and sustains perverted mind,
Temple and palace storm that shield disgrace and crime,
Melt the statues tall that of tyranny remind;
Wash from the marble steps the footprints left behind
By those who near the great through lies and pandering climb !

Banish the signs of pomp and false deceiving pride;
O, strip from daily life the granite robe it wears,
Its purple and its gold... its foul and ugly hide;
To make of life a dream, of living purified,
That without passion is and happiness prepares.

Gigantic pyramids from this life's ruins raise,
A memento mori unto the end of time;
To open out our souls that we may justice praise
Unto eternity, not nude and shameful ways,
With harlot soul, and eyes grown wild with lust and crime

Oh, let the deluge loose; you've waited long to know
What recompense your meek humility will get;
The wolf and the hyena do in the courtiers grow,
Their cruelties of old still baser patterns show,
Only the form is changed, the evil lives on yet.

Strike and the golden era will return to us again,
Of which old legends tell us that all was gay and fair;
That happiness in life be equal for all men.
Even the touch of death will not be awful then,
But seem a smiling angel with long and golden hair.

Then you will die contented and not by sorrow wrung,
Your children will be born and in full gladness live.
Even the church will not bewail with iron tongue
The passing of the free to live the blest among:
None will lament the dead who took all life could give.

Thus slowly will grow less the toll of dire disease,
While that alone will flourish which nature did intend,
And all these things will come in gradual degrees,
Till man but leaves the earth when earth no more can please.
The brimming cup of life drained empty to the end."
.............................................................................

Along the banks of Seine, drawn in a gala coach
The great king slowly goes, pallid and deep in thought.
Neither the lapping waves, nor rumbling wheels encroach
Upon his brooding mind; before his train's approach
There stands the suffering crowd with suffering distraught.

With ready piercing glance, and subtle smiling air,
He reads the secret thought that fills the people's soul,
The hand that holds the fate of those poor creatures there
Salutes them now with bland, acutely reasoned care
Because his fate and theirs is but one single whole.

Loveless he is, and lone, going so grandly by;
Convinced like all of you that malice, vice and hate
Will always govern all things and under all things lie,
While ever human history its age-old course will ply
As on time's heavy anvil blind hammers heedless fate.

So he whose very person is tyranny's high crest
Nods a gentle greeting to these ragged human things.
If they who are the power on which his glories rest
Would one day raise their heads or challenge his behest,
Low, yes low indeed, would fall the king of kings.

For all your shrewd mistrust, your deeply doubting sense,
Your cold and bitter smile that ne'er to pity woke,
For all your strong belief that law is but pretence,
For all your numbers might, the shade of violence,
'Tis he who holds you dumbly, still toiling in the yoke.
.............................................................................

Paris is drowned in fire; the tempest bathes in flame,
Steeples like black torches blaze in the wind away.
Amidst the billowing sea whose waves no power could tame,
Cries and the clash of arms high battle do acclaim.
In very truth in France an age has died today.

Down streets where flaming houses glitter on pikes and sword
Barricades arise from blocks of granite piled;
An army marching forwards, the proletarian horde,
Company on company, that soon the ramparts board
Midst thunderous echoing clang of the alarm bells wild.

With faces pale as marble, as marble too as cold,
Women carrying muskets pass through the ruddy glow.
Their hair hangs o'er their shoulders and does their breasts enfold;
Mad with lifelong suffering and with dark hatred bold,
Black their eyes, yet gleaming with the brightness of despair.

Courage little soldiers wrapped in your tresses long,
Great today has grown the poor abandoned child,
Through the fire and ashes to justice march along,
For all your deeds of horror do to this hour belong;
Not you to blame, but those who your young souls defiled !
.............................................................................

And now the ocean shines, as though were on it laid
And slid upon themselves broad plates of crystal bright;
While low above the trees, the secret forest glade,
The lonely yellow moon on azure field displayed
O'er floods the silent world with her triumphal light.

Across the silver swell, with motion smooth and slow
Ocean battered ships draw their old wooden sides;
Like mighty gliding shadows across the sea they go
While through their straining canvass the moonbeams seem to throw
A fiery golden wheel that e'er before them rides.

Upon a cliff corroded by the billows' restless chide,
Beneath a weeping willow, with branches to the ground,
The king of kings is gazing out o'er the falling tide
Where gleaming silver circles midst one another glide,
And where the night breeze wanders with slow and cadenced sound.

And to the king it seemed that through the starlight fair,
Treading the forest trees, and crossing the ocean clear,
With long and snowy beard, and heavy thoughtful air,
A crown of withered grasses caught to his tangled hair
There came the mad King Lear.

With mute astonishment he watched that shadow hang
Against the riven clouds, through which the stars unfurled
Blazed out; and in his head a train of visions sprang..
Till loudly echoing above it all there rang
The people's voices that clothed in fire the stricken world:

"In every man the earth is entirely built once more.
Old Demiurges still strives within each heart in vain,
For every mind puts in questions that all have put before:
Why is the flower that blooms to death inheritor?
Longings strange and sad, that rise in obscure pain.

The seed of a whole world of greatness and desire
At hazard have been sown within the hearts of all;
And when their time is come, their nature does aspire
After a perfect fruit, with all its strength entire;
Yet ere the fruit be ripe, the blossoms often fall.

Thus is the human fruit oft frozen in the bloom;
One man becomes a king, another but a slave,
Covering with chaos their different lots too soon,
Before the morning sun their works like petals strewn;
Yet nature to them all an equal knowledge gave.

Throughout the length of time, different and still the same
Their yearnings and their hopes are of one kind composed,
And though of countless fashions does seem life's secret flame,
All are alike deceived that call upon her name;
While infinite desire is in an atom closed.

When you but recollect that death will end this dream,
That nothing much is changed the day your life is passed,
This struggling desire to right the world will seem
Folly, and you'll grow tired; but one thing true you'll deem:
That life is but the way to endless death at last.

--- Mihai Eminescu. English version by Corneliu M. Popescu

2.4.11

शीशों का मसीहा कोई नहीं (Sheeshon Ka Maseeha Koi Nahin)

मोती हो कि शीशा, जाम कि दुर1
जो टूट गया सो टूट गया
कब अश्कों से जुड़ सकता है
जो टूट गया, सो छूट गया

तुम नाहक टुकड़े चुन चुन कर
दामन में छुपाए बैठे हो
शीशों का मसीहा कोई नहीं
क्या आस लगाए बैठे हो

शायद कि इन्हीं टुकड़ों में कहीं
वो साग़रे-दिल2 है जिसमें कभी
सद नाज़3 से उतरा करती थी
सहबाए-गमें-जानां की परी

फिर दुनिया वालों ने तुम से
ये सागर लेकर फोड़ दिया
जो मय थी बहा दी मिट्टी में
मेहमान का शहपर4 तोड़ दिया

ये रंगी रेजे5 हैं शाहिद6
उन शोख बिल्लूरी7 सपनों के
तुम मस्त जवानी में जिन से
खल्वत8 को सजाया करते थे

नादारी 9, दफ्तर, भूख और गम
इन सपनों से टकराते रहे
बेरहम था चौमुख पथराओ
ये कांच के ढ़ांचे क्या करते

या शायद इन जर्रों में कहीं
मोती है तुम्हारी इज्जत का
वो जिस से तुम्हारे इज्ज़10 पे भी
शमशादक़दों11 ने नाज़ किया

उस माल की धुन में फिरते थे
ताजिर भी बहुत रहजन भी बहुत
है चोर‍नगर, यां मुफलिस की
गर जान बची तो आन गई

ये सागर शीशे, लालो- गुहर
सालम हो तो कीमत पाते हैं
यूँ टुकड़े टुकड़े हों तो फकत12
चुभते हैं, लहू रुलवाते हैं

तुम नाहक टुकड़े चुन चुन कर
दामन में छुपाए बैठे हो
शीशों का मसीहा कोई नहीं
क्या आस लगाए बैठे हो

यादों के गरेबानों के रफ़ू
पर दिल की गुज़र कब होती है
इक बखिया उधेड़ा, एक सिया
यूँ उम्र बसर कब होती है

इस कारगहे-हस्ती13 में जहाँ
ये सागर शीशे ढ़लते हैं
हर शै का बदल मिल सकता है
सब दामन पुर हो सकते हैं

जो हाथ बढ़े यावर14 है यहाँ
जो आंख उठे वो बख़्तावर15
यां धन दौलत का अंत नहीं
हों घात में डाकू लाख यहाँ

कब लूट झपट में हस्ती16 की
दुकानें खाली होती हैं
यां परबत परबत हीरे हैं
या सागर सागर मोती है

कुछ लोग हैं जो इस दौलत पर
पर्दे लटकाया फिरते हैं
हर परबत को हर सागर को
नीलाम चढ़ाते फिरते हैं

कुछ वो भी हैं जो लड़ भिड़ कर
ये पर्दे नोच गिराते हैं
हस्ती के उठाईगीरों की
हर चाल उलझाए जाते हैं

इन दोनों में रन१७ पड़ता है
नित बस्ती बस्ती नगर नगर
हर बसते घर के सीने में
हर चलती राह के माथे पर

ये कालक भरते फिरते हैं
वो जोत जगाते रहते हैं
ये आग लगाते फिरते हैं
वो आग बुझाते रहते हैं

सब सागर शीशे, लालो-‍गुहर
इस बाज़ी में बिद जाते हैं
उठो, सब ख़ाली हाथों को
इस रन से बुलावे आते हैं.

1. एक तरह का माणिक
2. हृदय रूपी मदिरा पात्र, 3.गर्व से
4. सबसे मज़बूत पंख
5. टुकड़े, 6. साक्षी, 7. काँच, 8. एकाकीपन
9. दरिद्रता
10. विनम्रता 11. सरों के पेड़ ऍसे कद वालों ने
12. सिर्फ
13. संसार
14. सहायक, 15. भाग्यवान
16. जीवन
१७. संघर्ष

---

जो बीत गई सो बात गई ( Jo Beet Gayi So Baat Gayi)

जीवन में एक सितारा था
माना वह बेहद प्यारा था
वह डूब गया तो डूब गया
अंबर के आंगन को देखो
कितने इसके तारे टूटे
कितने इसके प्यारे छूटे
जो छूट गए फ़िर कहाँ मिले
पर बोलो टूटे तारों पर
कब अंबर शोक मनाता है
जो बीत गई सो बात गई

जीवन में वह था एक कुसुम
थे उस पर नित्य निछावर तुम
वह सूख गया तो सूख गया
मधुबन की छाती को देखो
सूखी कितनी इसकी कलियाँ
मुरझाईं कितनी वल्लरियाँ
जो मुरझाईं फ़िर कहाँ खिलीं
पर बोलो सूखे फूलों पर
कब मधुबन शोर मचाता है
जो बीत गई सो बात गई

जीवन में मधु का प्याला था
तुमने तन मन दे डाला था
वह टूट गया तो टूट गया
मदिरालय का आंगन देखो
कितने प्याले हिल जाते हैं
गिर मिट्टी में मिल जाते हैं
जो गिरते हैं कब उठते हैं
पर बोलो टूटे प्यालों पर
कब मदिरालय पछताता है
जो बीत गई सो बात गई

मृदु मिट्टी के बने हुए हैं
मधु घट फूटा ही करते हैं
लघु जीवन ले कर आए हैं
प्याले टूटा ही करते हैं
फ़िर भी मदिरालय के अन्दर
मधु के घट हैं,मधु प्याले हैं
जो मादकता के मारे हैं
वे मधु लूटा ही करते हैं
वह कच्चा पीने वाला है
जिसकी ममता घट प्यालों पर
जो सच्चे मधु से जला हुआ
कब रोता है चिल्लाता है
जो बीत गई सो बात गई.

---

1.4.11

आरज़ू

जाने किसकी तलाश उनकी आँखों मे थी,
आरज़ू के मुसाफिर भटकते रहे,
जितने भी वो चले उतने ही बिछ गए राह में फासले,
ख्वाब मंजिलें थे और मंजिलें ख्वाब थी,
रास्तों से निकलते रहे रास्ते जाने किसके वास्ते,
आरज़ू के मुसाफिर भटकते रहे...

कोई पुरानी याद मेरा रास्ता रोककर मुझसे कहती है
इतनी जलती धुप में यूँ कब तक बैठोगे
आओ चल के बीते दिनों की छाव में बैठे
उस लम्हे की बात करे जिसमे कोई फूल खिला था
उस लम्हे की बात करे जिसमे किसी की आवाज की चांदी खनक उठी थी
उस लम्हे की बात करे जिसमे किसी की नजरो के मोती बरसे थे
कोई पुरानी याद मेरा रास्ता रोके...

सच तो यह है की कसूर अपना था,
चाँद को छूने की तमन्ना की,
आसमान को ज़मीन पर माँगा,
फूल, चाहा की पत्थरों में खिलें,
कांटो में की तलाश खुशबू की,
आरज़ू थी की आग ठंडक दे,
बर्फ में ढूंढते रहे गर्मी,
ख्वाब जो देखा चाहा सच हो जाये,
इसकी हमको सज़ा तो मिलनी ही थी,
सच तो यह है कसूर अपना ही था...

---जावेद अख़्तर

23.3.11

America, America

God save America,
My home, sweet home!

The French general who raised his tricolor over Nuqrat al-Salman
where I was a prisoner thirty years ago …
in the middle of that U-turn that split the back of the Iraqi army,
the general who loved Saint Emilion wines called Nuqrat al-Salman a fort …
Of the surface of the earth, generals know only two dimensions:
whatever rises is a fort,
whatever spreads is a battlefield.
How ignorant the general was!

But Liberation was better versed in topography.
The Iraqi boy who conquered her front page sat carbonized behind a steering wheel
on the Kuwait-Safwan highway while television cameras
(the booty of the defeated and their identity)
were safe in a truck like a storefront on Rivoli Street.
The neutron bomb is highly intelligent.
It distinguishes between an "I" and an "Identity."

God save America,
My home, sweet home!

Blues
How long must I walk to Sacramento?
How long must I walk to Sacramento?
How long will I walk to reach my home?
How long will I walk to reach my girl?
How long must I walk to Sacramento?
For two days, no boat has sailed this stream,
Two days, two days, two days.
Honey, how can I ride?
I know this stream,
But, O but, O but,
For two days, no boat has sailed this stream.
La Li La La Li La
La Li La La Li La
A stranger becomes afraid.
Have no fear, dear horse.
No fear of the wolves of the wild,
No fear, for the land is my land.
La Li La La Li La
La Li La La Li La
A stranger becomes afraid.

God save America,
My home, sweet home!

I too love jeans and jazz and Treasure Island
and John Silver's parrot and the balconies of New Orleans.
I love Mark Twain and the Mississippi steam-boats and Abraham Lincoln's dogs.
I love the fields of wheat and corn and the smell of Virginia tobacco.
But I am not American.
Is that enough for the Phantom pilot to turn me back to the Stone Age?
I need neither oil nor America herself,
neither the elephant nor the donkey.
Leave me, pilot, leave my house roofed with palm fronds and this wooden bridge.
I need neither your Golden Gate nor your skyscrapers.
I need the village, not New York.
Why did you come to me from your Nevada desert, soldier armed to the teeth?
Why did you come all the way to distant Basra, where fish used to swim by our doorsteps?
Pigs do not forage here.
I only have these water buffaloes lazily chewing on water lilies.
Leave me alone, soldier.
Leave me my floating cane hut and my fishing spear.
Leave me my migrating birds and the green plumes.
Take your roaring iron birds and your Toma-hawk missiles.
I am not your foe.
I am the one who wades up to the knees in rice paddies.
Leave me to my curse.
I do not need your day of doom.

God save America,
My home, sweet home!

America:
let's exchange gifts.
Take your smuggled cigarettes
and give us potatoes.
Take James Bond's golden pistol
and give us Marilyn Monroe's giggle.
Take the heroin syringe under the tree
and give us vaccines.
Take your blueprints for model penitentiaries
and give us village homes.
Take the books of your missionaries
and give us paper for poems to defame you.
Take what you do not have
and give us what we have.
Take the stripes of your flag
and give us the stars.
Take the Afghani mujahideen beard
and give us Walt Whitman's beard filled with butterflies.
Take Saddam Hussein
and give us Abraham Lincoln or give us no one.

Now as I look across the balcony,
across the summer sky, the summery summer,
Damascus spins, dizzied among television aerials,
then it sinks, deeply,
in the stones of the forts, in towers, in the arabesques of ivory,
and sinks, deeply, far from Rukn el-Din
and disappears far from the balcony.

And now
I remember trees:
the date palm of our mosque in Basra,
at the end of Basra
a bird's beak, a child's secret, a summer feast.
I remember the date palm.
I touch it. I become it, when it falls black without fronds,
when a dam fell, hewn by lightning.
And I remember the mighty mulberry
when it rumbled, butchered with an axe …
to fill the stream with leaves
and birds
and angels
and green blood.
I remember when pomegranate blossoms covered the sidewalks.
The students were leading the workers parade …

The trees die pummeled.
Dizzied, not standing, the trees die.

God save America,
My home, sweet home!

We are not hostages, America,
and your soldiers are not God's soldiers …
We are the poor ones, ours is the earth of the
drowned gods,
the gods of bulls,
the gods of fires,
the gods of sorrows that intertwine clay and
blood in a song ‥

We are the poor, ours is the god of the poor,
who emerges out of farmers' ribs,
hungry
and bright,
and raises heads up high …
America, we are the dead.
Let your soldiers come.
Whoever kills a man, let him resurrect him.
We are the drowned ones, dear lady.
We are the drowned.
Let the water come.

--- Saadi Youssef

(translated from the Arabic by Khaled Mattawa)

22.3.11

Solitude

Seven hundred thousand women live single in Paris
Their age between thirty and forty
Unmarried, divorced, or
Mothers
The voice of the announcer was so neutral
Chewing this plain number from among the many details of modern life
Closing the news with it
Seven hundred thousand single women
O man!
And for four hours you have been tormenting yourself before a computer
In search of good sentences that express hard life without a woman.

---Abdel-ilah Salhi

13.3.11

अपनी मर्ज़ी से कहाँ अपने सफ़र के हम हैं

अपनी मर्ज़ी से कहाँ अपने सफ़र के हम हैं
रुख़ हवाओं का जिधर का है उधर के हम हैं

पहले हर चीज़ थी अपनी मगर अब लगता है
अपने ही घर में किसी दूसरे घर के हम हैं

वक़्त के साथ है मिट्टी का सफ़र सदियों तक
किसको मालूम कहाँ के हैं किधर के हम हैं

चलते रहते हैं कि चलना है मुसाफ़िर का नसीब
सोचते रहते हैं कि किस राहगुज़र के हम हैं

गिनतियों में ही गिने जाते हैं हर दौर में हम
हर क़लमकार की बेनाम ख़बर के हम हैं.

---निदा फ़ाज़ली

हर ख़ुशी में कोई कमी सी है

हर ख़ुशी में कोई कमी सी है
हँसती आँखों में भी नमी सी है

दिन भी चुप चाप सर झुकाये था
रात की नफ़्ज़ भी थमी सी है

किसको समझायेँ किसकी बात नहीं
ज़हन और दिल में फिर ठनी सी है

ख़्वाब था या ग़ुबार था कोई
गर्द इन पलकों पे जमी सी है

कह गए हम किससे दिल की बात
शहर में एक सनसनी सी है

हसरतें राख हो गईं लेकिन
आग अब भी कहीं दबी सी है

---जावेद अख़्तर

मुमकिन है सफ़र हो आसान

मुमकिन है सफ़र हो आसान, अब साथ भी चल कर देखें
कुछ तुम भी बदल कर देखो, कुछ हम भी बदल कर देखें

दो-चार कदम हर रस्ता, पहले की तरह लगता है
शायद कोई मंज़र बदले, कुछ दूर तो चल कर देखें

झूठा ही सही ये रिश्ता, मिलते ही रहे हम यूँ ही
हालात नहीं बदलें , चेहरे ही बदल कर देखें

सूरज की तपिश भी देखी, शोलों कि कशिश भी देखी
अबके जो घटाएं छायें, बरसात में जल कर देखें

अब वक़्त बचा है कितना, जो और लड़ें दुनिया से
दुनिया की नसीहत पर भी थोडा सा अमल कर देखें.

---निदा फ़ाज़ली

She walks in beauty

She walks in beauty like the night
Of cloudless climes and starry skies,
And all that's best of dark and bright
Meet in her aspect and her eyes;
Thus mellowed to the tender light
Which heaven to gaudy day denies.

One ray the more, one shade the less
Had half impaired the nameless grace
Which waves in every raven tress
Or softly lightens o'er her face,
Where thoughts serenely sweet express
How pure, how dear their dwelling place.

And on that cheek and o'er that brow
So soft, so calm yet eloquent,
The smiles that win, the tints that glow
But tell of days in goodness spent
A mind at peace with all below,
A heart whose love is innocent.

--- George Gordon, Lord Byron

There is a pleasure in the pathless woods

There is a pleasure in the pathless woods,
There is a rapture on the lonely shore,
There is society, where none intrudes,
By the deep sea, and music in its roar:
I love not man the less, but Nature more,
From these our interviews, in which I steal
From all I may be, or have been before,
To mingle with the Universe, and feel
What I can ne'er express, yet cannot all conceal.

--- George Gordon, Lord Byron (from Childe Harold, Canto iv, Verse 178)

Break, break, break

Break, break, break,
On thy cold gray stones, O sea!
And I would that my tongue could utter
The thoughts that arise in me.

O, well for the fisherman's boy,
That he shouts with his sister at play!
O, well for the sailor lad,
That he sings in his boat on the bay!

And the stately ships go on
To their haven under the hill;
But O for the touch of a vanished hand,
And the sound of a voice that is still!

Break, break, break,
At the foot of thy crags, O sea!
But the tender grace of a day that is dead
Will never come back to me.

---Alfred, Lord Tennyson.

In Memoriam A. H. H. , Section 5

I sometimes hold it half a sin
To put in words the grief I feel;
For words, like Nature, half reveal
And half conceal the Soul within.

But, for the unquiet heart and brain,
A use in measured language lies;
The sad mechanic exercise,
Like dull narcotics, numbing pain.

In words, like weeds, I'll wrap me o'er,
Like coarsest clothes against the cold;
But that large grief which these enfold
Is given outline and no more.

---Alfred, Lord Tennyson.

Tennyson wrote In Memoriam, which consists of 133 sections; A. H. H. stands for Arthur Henry Hallam. Hallam was a close friend of Tennyson's who was also engaged to Tennyson's sister. He died before the wedding at the age of 22.

हर हक़ीक़त मजाज़ हो जाये

हर हक़ीक़त मजाज़ हो जाये
काफ़िरों की नमाज़ हो जाये

मिन्नत-ए-चारासाज़ कौन करे
दर्द जब जाँ नवाज़ हो जाये

इश्क़ दिल में रहे तो रुसवा हो
लब पे आये तो राज़ हो जाये

लुत्फ़ का इन्तज़ार करता हूँ
जोर ता हद्द-ए-नाज़ हो जाये

उम्र बेसूद कट रही है 'फ़ैज़'
काश अफ़्शा-ए-राज़ हो जाये.

---फ़ैज़ अहमद फ़ैज़

26.2.11

Don’t grieve. Anything you lose comes round in another form.

Don’t grieve. Anything you lose comes round in another form.
Friends are enemies sometimes, and enemies friends.

I was a tiny bug. Now a mountain. I was left behind. Now honored at the head. You healed my wounded hunger and anger, and made me a poet who sings about joy.

If your guidance is your ego, don’t rely on luck for help. you sleep during the day and the nights are short. By the time you wake up your life may be over.

Let the beauty we love be what we do.

Let the lover be disgraceful, crazy, absent-minded. Someone sober will worry about events going badly. Let the lover be.

Let yourself be silently drawn by the stronger pull of what you really love.

Most people guard against going into the fire, and so end up in it.

My friend, the sufi is the friend of the present moment. To say tomorrow is not our way.

Nightingales are put in cages because their songs give pleasure. Whoever heard of keeping a crow?

No longer a stranger, you listen all day to these crazy love-words. Like a bee you fill hundreds of homes with honey, though yours is a long flight from here.

No mirror ever became iron again; No bread ever became wheat; No ripened grape ever became sour fruit. Mature yourself and be secure from a change for the worse. Become the light.

Only from the heart Can you touch the sky.

Patience is the key to joy.

People of the world don’t look at themselves, and so they blame one another.

Since in order to speak, one must first listen, learn to speak by listening.

That which is false troubles the heart, but truth brings joyous tranquility.

The intelligent want self-control; children want candy.

The middle path is the way to wisdom.

The only lasting beauty is the beauty of the heart.

Thirst drove me down to the water where I drank the moon’s reflection.

To praise is to praise how one surrenders to the emptiness.

We come spinning out of nothingness, scattering stars like dust.

We rarely hear the inward music, but we’re all dancing to it nevertheless.

You think the shadow is the substance.

---Jalal-Uddin Rumi (1207-1273)

25.2.11

Write down ! I am an Arab

Write down !

I am an Arab

And my identity card number is fifty thousand

I have eight children

And the ninth will come after a summer

Will you be angry?

.

Write down!

I am an Arab

Employed with fellow workers at a quarry

I have eight children

I get them bread

Garments and books

from the rocks..

I do not supplicate charity at your doors

Nor do I belittle myself at the footsteps of your chamber

So will you be angry?

.

Write down!

I am an Arab

I have a name without a title

Patient in a country

Where people are enraged

My roots

Were entrenched before the birth of time

And before the opening of the eras

Before the pines, and the olive trees

And before the grass grew

.

My father.. descends from the family of the plow

Not from a privileged class

And my grandfather..was a farmer

Neither well-bred, nor well-born!

Teaches me the pride of the sun

Before teaching me how to read

And my house is like a watchman’s hut

Made of branches and cane

Are you satisfied with my status?

I have a name without a title!

.

Write down!

I am an Arab

You have stolen the orchards of my ancestors

And the land which I cultivated

Along with my children

And you left nothing for us

Except for these rocks..

So will the State take them

As it has been said?!

.

Therefore!

Write down on the top of the first page:

I do not hate poeple

Nor do I encroach

But if I become hungry

The usurper’s flesh will be my food

Beware..

Beware..

Of my hunger

And my anger!

---Mahmoud Darwish

A Word on Statistics

Out of every hundred people,
those who always know better:
fifty-two.

Unsure of every step:
almost all the rest.

Ready to help,
if it doesn't take long:
forty-nine.

Always good,
because they cannot be otherwise:
four -- well, maybe five.

Able to admire without envy:
eighteen.

Led to error
by youth (which passes):
sixty, plus or minus.

Those not to be messed with:
four-and-forty.

Living in constant fear
of someone or something:
seventy-seven.

Capable of happiness:
twenty-some-odd at most.

Harmless alone,
turning savage in crowds:
more than half, for sure.

Cruel
when forced by circumstances:
it's better not to know,
not even approximately.

Wise in hindsight:
not many more
than wise in foresight.

Getting nothing out of life except things:
thirty
(though I would like to be wrong).

Balled up in pain
and without a flashlight in the dark:
eighty-three, sooner or later.

Those who are just:
quite a few, thirty-five.

But if it takes effort to understand:
three.

Worthy of empathy:
ninety-nine.

Mortal:
one hundred out of one hundred --
a figure that has never varied yet.

---A poem by Wislawa Szymborska
(translated from the Polish by Joanna Trzeciak)
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22.2.11

दिल-ए-मन मुसाफ़िर-ए-मन

मेरे दिल मेरे मुसाफ़िर
हुआ फिर से हुक्म् सादिर
के वतन बदर हों हम तुम
दें गली गली सदायेँ
करें रुख़ नगर नगर का
के सुराग़ कोई पायेँ
किसी यार-ए-नामाबर का
हर एक अजनबी से पूछें
जो पता था अपने घर का
सर-ए-कू-ए-नाशनायाँ
हमें दिन से रात करना
कभी इस से बात करना
कभी उस से बात करना
तुम्हें क्या कहूँ के क्या है
शब-ए-ग़म बुरी बला है
हमें ये भी था ग़निमत
जो कोई शुमार होता
हमें क्या बुरा था मरना
अगर एक बार होता

---फ़ैज़ अहमद फ़ैज़

15.2.11

Curse

Furrowed motherland,
I swear that in your ashes
you will be born like a flower of eternal water

I swear that from your mouth of thirst
will come to the air the petals of bread,
the spilt inaugurated flower.

Cursed, cursed, cursed be those
who with an ax and serpent came to your earthly arena,
cursed those who waited for this day to open the door of the dwelling
to the moor and the bandit:
What have you achieved?

Bring,
bring the lamp,
see the soaked earth,
see the blackened little bone eaten by the flames,
the garment of murdered Spain.

--- Pablo Neruda from Spain In Our Hearts (1973) translated by Donald D. Walsh

Su Nombre es Hoy (His Name is Today)

We are guilty of many errors and many faults,
but our worst crime is abandoning the children,
neglecting the fountain of life.

Many of the things we need can wait.
The child cannot.
Right now is the time his bones are being formed,
his blood is being made,
and his senses are being developed.

To him we cannot answer ‘Tomorrow,’
his name is today.

---Gabriela Mistral

La Standard Oil Co

When the drill bored down toward the stony fissures
and plunged its implacable intestine
into the subterranean estates,
and dead years, eyes of the ages,
imprisoned plants’ roots
and scaly systems
became strata of water,
fire shot up through the tubes
transformed into cold liquid,
in the customs house of the heights,
issuing from its world of sinister depth,
it encountered a pale engineer
and a title deed.

However entangled the petroleum’s arteries may be,
however the layers may change their silent site
and move their sovereignty amid the earth’s bowels,
when the fountain gushes its paraffin foliage,
Standard Oil arrived beforehand
with its checks and it guns,
with its governments and its prisoners.

Their obese emperors from New York
are suave smiling assassins
who buy silk, nylon, cigars
petty tyrants and dictators.

They buy countries, people, seas, police, county councils,
distant regions where the poor hoard their corn
like misers their gold:
Standard Oil awakens them,
clothes them in uniforms, designates
which brother is the enemy.
the Paraguayan fights its war,
and the Bolivian wastes away
in the jungle with its machine gun.

A President assassinated for a drop of petroleum,
a million-acre mortgage,
a swift execution on a morning mortal with light, petrified,
a new prison camp for subversives,
in Patagonia, a betrayal, scattered shots
beneath a petroliferous moon,
a subtle change of ministers
in the capital, a whisper
like an oil tide,
and zap, you’ll see
how Standard Oil’s letters shine above the clouds,
above the seas, in your home,
illuminating their dominions.

--- by Pablo Neruda, Canto General, 1940 and Translated by Jack Schmitt

Still I Rise

You may write me down in history
With your bitter, twisted lies,
You may trod me in the very dirt
But still, like dust, I'll rise.

Does my sassiness upset you?
Why are you beset with gloom?
'Cause I walk like I've got oil wells
Pumping in my living room.

Just like moons and like suns,
With the certainty of tides,
Just like hopes springing high,
Still I'll rise.

Did you want to see me broken?
Bowed head and lowered eyes?
Shoulders falling down like teardrops.
Weakened by my soulful cries.

Does my haughtiness offend you?
Don't you take it awful hard
'Cause I laugh like I've got gold mines
Diggin' in my own back yard.

You may shoot me with your words,
You may cut me with your eyes,
You may kill me with your hatefulness,
But still, like air, I'll rise.

Does my sexiness upset you?
Does it come as a surprise
That I dance like I've got diamonds
At the meeting of my thighs?

Out of the huts of history's shame
I rise
Up from a past that's rooted in pain
I rise
I'm a black ocean, leaping and wide,
Welling and swelling I bear in the tide.
Leaving behind nights of terror and fear
I rise
Into a daybreak that's wondrously clear
I rise
Bringing the gifts that my ancestors gave,
I am the dream and the hope of the slave.
I rise
I rise
I rise.

---Maya Angelou

13.2.11

एक बूँद

ज्यों निकल कर बादलों की गोद से
थी अभी एक बूँद कुछ आगे बढ़ी
सोचने फिर-फिर यही जी में लगी,
आह ! क्यों घर छोड़कर मैं यों बढ़ी ?

देव मेरे भाग्य में क्या है बढ़ा,
मैं बचूँगी या मिलूँगी धूल में ?
या जलूँगी फिर अंगारे पर किसी,
चू पडूँगी या कमल के फूल में ?

बह गयी उस काल एक ऐसी हवा
वह समुन्दर ओर आई अनमनी
एक सुन्दर सीप का मुँह था खुला
वह उसी में जा पड़ी मोती बनी ।

लोग यों ही हैं झिझकते, सोचते
जबकि उनको छोड़ना पड़ता है घर
किन्तु घर का छोड़ना अक्सर उन्हें
बूँद लौं कुछ और ही देता है कर ।

---अयोध्या सिंह उपाध्याय ‘हरिऔध’

12.2.11

कभी मोम बन के पिघल गया

कभी मोम बन के पिघल गया कभी गिरते गिरते सँभल गया
वो बन के लम्हा गुरेज़ का मेरे पास से निकल गया

उसे रोकता भी तो किस तरह के वो शख़्स इतना अजीब था
कभी तड़प उठा मेरी आह से कभी अश्क़ से न पिघल सका

सरे-राह मिला वो अगर कभी तो नज़र चुरा के गुज़र गया
वो उतर गया मेरी आँख से मेरे दिल से क्यूँ न उतर सका

वो चला गया जहाँ छोड़ के मैं वहाँ से फिर न पलट सका
वो सँभल गया था 'फ़राज़' मगर मैं बिखर के न सिमट सका

---अहमद फ़राज़ 

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